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Saturday, 29 July 2017

विस्थापन और खालीपन के दंश की अभिव्यक्ति

पुस्तक समीक्षा /डॉ.अभिज्ञात

सड़क मोड़ घर और मैं/ निर्मला तोदी/ 

वाणी प्रकाशन, 4695, 21 ए, दरियागंज,

 नयी दिल्ली-110002, मूल्य-295 रुपये



निर्मला तोदी की कविताओं को पढ़ना एक ऐसे काव्यात्मक संसार से गुज़रना है, जहां इस बात का चौकन्नापन और सजगता मिलती है कि अमुक शै अमुक ज़गह पर होनी चाहिए थी, वह वहां क्यों नहीं है। अगर वह अपनी ज़गह से हट रही है, हट चुकी है या हटेगी तो उसके कारक क्या हैं। विस्थापन की ऐसी चिन्ताएं उनकी सोच को काव्यात्मक प्रतिबद्धता प्रदान करती है। विस्थापन और खालीपन के दंश का सामना उनकी कविताओं में बार-बार होता है और इस क्रम में हर बार कविता की एक नयी ज़मीन टूटती लगती है। उनकी काव्य- शैली इतनी सधी हुई है कि कविता अपने होने को अलग से उजागर नहीं करती। साधारण घटनाओं के बीच चुपचाप बहती रहती है। न तो उनकी कविताओं में टूटन की तीव्र आवाज़ें हैं और ना रूदन की तेजतर हिचकियां, पर उदासी है और जहां-तहां पसरी पड़ी है-'बड़े मज़बूत हैं दीवारों के कंधे/सिर रखकर रोया जा सकता है/अपनी बात कही जा सकती है/ खूब धैर्य से सुनती हैं/बड़े सुन्दर हैं इसके कान/किसी और से कहती भी नहीं/मेरी बातें सिर्फ़ मुझसे करती हैं/मुझे अपने जैसी लगती हैं।'
ये कविताएं किसी के न होने में होने का आभास करातीं और होने की अर्थवत्ता को भी उजागर करतीं हैं। और समय के चूक जाने के बाद होने के अर्थ को समझना स्थिति को कारुणिक भी बनाता है। कभी पूरी न होने वाली एक क्षति का पता देता है और कई बार खालीपन से उपजी उपलब्धियों से संतोष करना भी सिखाता है-'बड़ों का सिर पर हाथ हो/बहुत कुछ संभल जाता है/अपने आप/ बड़ों की खड़ाऊं/ संभाल लेती है राज-पाट।' मृत्यु पर लिखी गयी हिन्दी कविताओं के क्रम में निर्मला तोदी की कविता उनके जाने के बाद एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है, यह कविता उन्होंने अपनी सास की मृत्यु पर लिखी है-'सुबह नल की सबसे पहली आवाज़/शाम के कूकर की पहली सीटी/अब चुप है/वह जिस जिस आवाज़ में थी/यह भी मालूम हुआ/उनके जाने के बाद/रसोई से/उनका पानी का लोटा गुम है/तनी पर सूखते कपड़ों में/सफ़ेद रंग कम है/लगातार हाथ में घूमती माला/बैठी है चुपचाप/सब चीज़ें कहां थीं/मालूम हुईं उनके जाने के बाद।'
अभिव्यक्ति की विकलता और अपने अंतरमन को पन्नों पर उकेरने की बेचैनी कि कविताएं हैं सड़क मोड़ घर और मैं काव्य संग्रह में। अच्छी, उत्कृष्ट समकालीन काव्यात्मक मुहावरों से कदमताल करने का कोई प्रयास नहीं दिखायी देता और यही सादगी उनकी खूबी है। कई कविताएं शृंखलाबद्ध हैं। एक पूरा परिदृश्य उनकी कई कविताओं को मिलाकर उपस्थित है। अर्थात् तीन-चार-पांच कविताएं एक ही ज़मीन पर लिखी गयी हैं या फिर उन्हें मिला भी दिया जाये तो एक ही कविता का हिस्सा बन जाये, अर्थात् एक भावभूमि पर शृंखला की एकाधिक कविताएं हैं। ऐसा हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह में भी है। उन्होंने सूर्य पर कई कविताएं लिखी हैं, हालांकि उन्हें अब तक वैसे शृंखलाबद्ध नहीं किया गया है जैसे बाघ कविता का किया गया। उनकी सूर्य सम्बंधी कविताओं को शृंखलाबद्ध करने पर एक नये विस्मयलोक और अर्थपूर्ण जगत का उद्घाटन संभव है। केदारजी के पूर्ववर्ती कवि मुक्तिबोध में भी यह शृंखलाबद्धता दिखती है, भावबोध की। मुक्तिबोध साथ तो यह भी हुआ कि उनकी लम्बी कविता के टुकड़े अलग-अलग कविता के तौर पर प्रकाशित हुए। निर्मला तोदी में शृंखलाबद्धता की प्रवृत्ति इसलिए दिखायी देती है कि उनमें एक समूचा काव्य व्यक्तित्व है, जो एक बड़ी सम्भावना वाले रचनाकार में दिखायी देता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर, अज्ञेय, शमशेर आदि की तरह। सारी रचनाओं की कड़ियां कोई सावधानी से मिलाये तो मिलेंगी। उनके जाने के बाद, जिस समय सांस निकलती है’, ‘इस तरह’, ‘जीवन चलता रहता है’, ‘बड़ों की खड़ाऊं एक ही भावभूमि की कविताएं हैं। उसी प्रकार 198 बी बी गांगुली स्ट्रीट’, ‘अपनी गली की दुनिया’, ‘रैली में, होड़ एक शृंखला की कविताएं हैं जो उनके अपने व्यक्तित्व और उनके आसपास के परिवेश और मनोजगत की हलचलों का पता देंगी। वैसे शमशेरित उनकी कविताओं में चित्रात्मकता के संदर्भ में है। उनकी कई कविताओं में दृश्य ऐसे उपस्थित हैं, जैसे वे किसी पेंटिंग का विवरण हों। या फिर कोई चाहे तो उनकी कविताओं को पढ़कर पेंटिंग बना ले।
उनकी कविताओं में प्रकृति भी बड़ी गरिमा से उपस्थित है तथा उसकी छोटी- बड़ी हलचलों का जीवंत समूचा दृश्य है, खासतौर पर बारिश का अंतरबाह्य प्रभाव परिलक्षित है और उसका बारीक विवरण भी। जीप की घरघराती आवाज़ से दरख़्तों की टूटती तन्मयता तक की फ़िक्र उन्हें है-'कौन सी साधना/ कैसी तन्मयता/ टूटती है/जब घरघराती जीप गुज़रती है।' कई बार तो वे मनुष्य तो वृक्षों से सीखने की नसीहत तक दे डालती हैं-'सभी पेड़ खड़े हैं/ साथ साथ/ पास पास/ हम लोगों में/ ऐसा क्यों नहीं होता।'
उनकी कविताओं में कई ज़रूरी सवाल और मुद्दे हैं, जिनमें शहर के आगे गांव की हैसियत, वर्तमान समाज में स्त्री की स्थिति, परित्यक्त स्थलों की उदासी, मृत्यु से उपजा सूनापन उल्लेखनीय है। स्त्री के सम्बंध में वे लिखती हैं-'चांदनी फैली हो/ या हो अमावस्या की रात /उसे क्या फ़र्क पड़ता है/ वह सोती है/ रोज़ ही/ वाणों की शैया पर।' ध्यान पर भी उनकी कविताएं हैं, जो उनकी कविताओं में आध्यात्मिक रुझान को पुष्ट करता है।



Friday, 10 January 2014

यदि कुछ अच्छा लगता है तो यह बड़ी बात है-केदारनाथ सिंह

कोलकाता : 'आज तब कि हर ओर निराशा और हताशा कि स्थिति है और तमाम दिशाओं में तोड़-फोड़ मची है ऐसे में यदि कुछ अच्छा लगता है तो बड़ी बात है। निर्मला तोदी का कविता संग्रह 'अच्छा लगता है' बहुत सी सकारात्मक बातों व आश्वस्ति की किरण के साथ उपस्थित है। इसमें आशा के अंखुए हैं, जो इस बात के द्योतक है कि वे अपने अगले काव्य संग्रह में बहुत कुछ महत्वपूर्ण जोड़ेंगी।' यह कहना है प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह का। वे निर्मला तोदी के काव्य संग्रह का लोकार्पण करने के बाद सभा को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि किसी छठे सातवें दशक में बांग्ला कवि सुभाष मुखोपाध्याय ने लिखा था 'मुझे अच्छा नहीं लगता'। कई दशक बाद जब कोई कवि कहता है अच्छा लगता है तो यह नयी बात है। चलो कुछ तो सकारात्मक है, जो जीवन को नयी ऊर्जा देता है। 
आलोचक और कलकत्ता विश्वविद्यालय को प्रोफेसर डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि निर्मला जी की कविता में उनके भीतर एक और स्त्री के होने का अनुभव है। यह वह स्त्री है, जो घर परिवार के बीच रहते हुए और उसे सजाते-संवारते हुए भी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की तलाश में है। स्त्री की अपनी आवाज का होना एक बड़ी बात है, जो उनकी कविता को अर्थवान बनाता है। किसी स्त्री को कविता लिखना अच्छा लगे तो यह इस बात का संकेत है कि उसमें स्वतंत्र व्यक्तित्व का बनना प्रारंभ हो गया है। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से नंदन परिसर के जीवनानंद सभागार में शुक्रवार की शाम आयोजित इस समारोह में कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका डॉ.सोमा बंद्योपाध्याय, पत्रकार डॉ.अभिज्ञात, स्काटिश चर्च कालेज की प्राध्यापिका प्रो.गीता दूबे, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ.जय कौशल ने संग्रह की कविताओं पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन युवा कवि निशांत ने किया। इस अवसर पर बालकिशन तोदी ने निर्मला तोदी का सम्मान किया। धन्यवाद ज्ञापन किशन तोदी ने किया।

Tuesday, 24 December 2013

गृहस्थ जीवन की संवेदनात्मक सृजनशीलता

 समीक्षा-डॉ.अभिज्ञात
पुस्तक का नाम-अच्छा लगता है/रचनाकार-निर्मला तोदी
/प्रकाशक-नयी किताब, 1/11829 पंचशील गार्डन, प्रथम तल, नवीन शाहदरा, 
दिल्ली-110032/मूल्य-195 रुपये 

एक स्त्री के जीवन से जुड़ी रोजमर्रा की तमाम बातों और उसके सरोकारों की सहज, सरल और सच्ची अभिव्यक्ति निर्मला तोदी के पहले काव्य संग्रह 'अच्छा लगता है' में हुई है। उनके यहां कुछ भी मामूली नहीं है। हर चीज गहरी अर्थवत्ता और लगभग आध्यात्मिक उत्कर्ष लिए हुए है। संग्रह में अधिकांश छोटी-छोटी कविताएं हैं लेकिन वे अपने आप में एक पूरी बात को उसके वास्तविक परिप्रेक्ष्य में कहने मेंं पूरी तरह सक्षम हैं। मिथकथन न सिर्फ उनका काव्य स्वभाव है बल्कि उनके रचाव का एक कौशल भी है। उनकी रचनाओं में संकेत अधिक हैं और ये संकेत ही उनकी कविताओं के फलक का अधिकाधिक विस्तार करते हैं। ऐसी ही एक कविता है जीवन संघर्ष-'कमरे में/एक ऑक्सीजन सिलेण्डर लगा है उसके/बालकनी में एक एक्ट्रा पड़ा हुआ है/कभी-कभी/ ऐसा भी होता है/पूरी पृथ्वी का ऑक्सीजन कम पड़ जाता है।'
उनके लिए कविता क्या है, उसका उत्स क्या है और उनका रचनात्मक संघर्ष क्या है इस बात पर एक सार्थक टिप्पणी उन्हीं की एक कविता 'मेरे शब्द' है, हालांकि वह पुस्तक के अनुक्रम में न तो पहली कविता है न आखिरी-'मेरे विचार/आले में चाभियों के गुच्छे के नीचे/ दबे पड़े हैं/मेरी यादें/स्टोररूम के संदूक में धरी हैं/मेरे अनुभव/बरनियों के तेल-मसाले में डूबे हैं/मेरे शब्द/सोफा पर कुशनों के साथ बिखरे हैं/मैं इन्हें/पहचानने से भी इनकार करती हूं/जबकि मैं जानता हूं/ये हैं/एक कहानी/ एक कविता/एक संस्मरण/मैंने इन्हें बिखेर कर/दबा कर रखा है/मैं सजाने से डरती हूं।' यह कविता तमाम रचनारत महिलाओं की आवाज भी है, जो हर हाल में घर-परिवार के दायरे से मुक्त नहीं हैं। जिनके स्वतंत्र व्यक्तित्व पर गृहस्थी की जिम्मेदारियों की छाप है। उनकी यह बात उनकी एक अन्य कविता 'सबसे पहले वह एक गृहणी है' में भी व्यक्त हुई है। 'मेरी रसोई' कविता में वे लिखती हैं-'चायपत्ती व चीनी का डब्बा/मेरे स्पर्श से मेरी मन:स्थिति को भांप लेते हैं।' निर्मला जी कविता में चयन पर विशेष जोर देती है और यह चयन सार्थकता से ओत प्रोत है। 'जन्म दिन' कविता में वे लिखती हैं-'आज के दिन/मैं नहीं कहती/आपको दुनिया भर की खुशियां मिलें/मैं चाहती हूं/जो खुशियां आप पाना चाहते हैं/आपको जरूर मिलें/आज के दिन यह भी नहीं कहूंगी/आप सौ साल जीएं/आप जितना जीएं/जिन्दगी को भरपूर जीएं।' यहां जो जिन्दगी से भरपूर जीवन उल्लेख है उसका एक विस्तृत प्रारूप भी उनकी एक अन्य कविता 'छाता' में है। वे अपने लिए भरपूर जीना किसे मानती हैं, और यहीं उनका कवि अपनी तमाम विशेषताओं के साथ पाठक के समक्ष आता है। उसकी बानगी देखें-'धरती के रेशे में पानी ही पानी/मैं भी रेशा रेशा भीगना चाहता हूं......तुम देखना मैं एक दिन छाता बन जाऊंगी/ उनकी तरह।' मां, पिता, बच्चों पर लिखी उनकी कविताएं भी हमारी संवेदना को गहराई तक छूती हैं। इस प्रकार गृहस्थ जीवन की संवेदनात्मक सृजनशीलता के लिए लिहाज से उनकी कविताएं स्मरणीय हैं। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने इनकी कविताओं के बारे में ठीक ही लिखा है कि सहजता इस संग्रह की कविताओं की सबसे बड़ी खासियत है। 
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