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Sunday, 1 September 2019

उदित वाणी में डॉ.अभिज्ञात का समकालीन पत्रकारिता पर इंटरव्यू


पत्रकार अब हाशिए पर हैं और सम्पादक कंटेंट व कांटेक्ट मैनेजरः डॉ.अभिज्ञात
पंजाब के जालंधर व अमृतसर में अमर उजाला, इंदौर में वेब दुनिया डॉट काम, जमशेदपुर में 2003 में दैनिक जागरण में पत्रकारिता करने के बाद गत 16 वर्षों से सन्मार्ग, कोलकाता में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार डॉ.हृदय नारायण सिंह साहित्य की दुनिया में अभिज्ञात के नाम से जाने जाते हैं। कविता, कहानी व उपन्यास विधाओं में उनकी एक दर्जन क़िताबें प्रकाशित हैं। वर्तमान पत्रकारिता को लेकर प्रस्तुत है विनय पूर्ति से उनकी संक्षिप्त बातचीत 
सवाल : 1. समकालीन हिन्दी पत्रकारिता (प्रिंट) का भविष्य क्या है?
प्रिंट मीडिया इन दिनों विभिन्न चुनौतियों से घिर गया है। इलैक्ट्रानिक मीडिया ने उसकी आवश्यकता और तेवर को बुरी तरह से प्रभावित किया है। लगतार खबरें उगलने वाले संचार माध्यमों के बरक्स इसकी ज़रूरत को लेकर ही कई लोग प्रिंट मीडिया की आसन्न मौत की मातमपूर्सी में लग गये हैं तो कई ने महंगे हुए न्यूज़प्रिंट पेपर की बढ़ती क़ीमत और छिनते जा रहे विज्ञापनों का हवाला दिया है। वेबसाइट, सोशल मीडिया एवं कुकुरमुत्ता और भोंपू टीवी चैनलों की अंधी दौड़ में प्रिंट मीडिया अपनी ठसक कब तक बरकरार रख पायेगा यह चिन्तनीय है। जिन लोगों ने अपनी युवावस्था में प्रिंट मीडिया को प्रमुख समाचार माध्यम के तौर पर अपनाया था वह पीढ़ी तो इससे विरत नहीं होगी किन्तु इलैक्ट्रानिक मीडिया के विकास के बीच पढ़ना- लिखना और दुनिया को समझना शुरू करने वाली पीढ़ी प्रिंट मीडिया को ढोयेगी या नहीं कहना मुश्किल है। प्रिंट मीडिया को अपना स्थान सुरक्षित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना होगा क्योंकि वह मुख्य मीडिया नहीं रह जायेगा यह तय है। हां, यह बाद दीगर है कि विश्वसनीयता के मामले में वह अब भी शीर्ष पर है और बाद में भी शीर्ष पर ही रहेगा। वह एक नयी केटेगरी होगी मीडिया और साहित्य के बीच की। तुरत- फुरत की प्रतिक्रियाओं व अपुष्ट खबरों के बीच विश्वसनीय, खोजी और घटनाक्रमों को दिशानिर्देश देने वाली सामग्री व विवेक ही उसे बचायेगा। प्रिंट मीडिया को आंखों देखी पत्रकारिता भर से ही संतोष नहीं करना होगा क्योंकि उसका प्लेटफार्म इलैक्ट्रानिक मीडिया है। प्रिंट मीडिया को विवेकदृष्टि से संचालित होना होगा..आंखों देखी के खोट को उजागर करना होगा, परदे के पीछे क्या है यह बताना होगा। प्रिंट मीडिया में अपढ़ पत्रकारों से काम नहीं चलेगा। मूल्य से जुड़े जुझारू लोग जुड़ेगे तभी बचेगा। उसे फिर सोदेश्य पत्रकारिता से अपना सम्बंध जोड़ना होगा।
2. क्या प्रिंट मीडिया निष्पक्ष नजर आ रहा है?
अब जबकि टीवी चैनल मीडिया के बदले किस एक पक्ष का प्रवक्ता हो जायें तो निष्पक्षता तो प्रभावित होगी ही। वे तटस्थ नहीं रहते। वे जिस तरह से सवाल उठाते हैं उसमें ही उनकी पक्षधरता स्पष्ट नज़र आती है। जबकि प्रिंट मीडिया में इस अनुशासन पर बड़ा ज़ोर रहा है कि ख़बरें लिखते समय पत्रकार का नज़रिया या पक्षधरता नहीं दिखनी चाहिए। यदि किसी पर कोई आरोप लगे हैं तो उसका पक्ष भी समाचार में होना चाहिए। लेकिन टीवी चैनलों में खबरों की जिस तरह प्रस्तुति होती है उसमें पक्षधरता अतिरिक्त उत्साह में दिखती है और कहना न होगा कि इससे प्रिंट मीडिया भी परोक्ष तौर पर निर्देशित होता है। प्रलोभन व दमन के बीच झूलते अखबार किसी का मुखपत्र हो जायें यह स्वाभाविक है। ऐसे में अपने पाठकों का होकर और उनका विश्वास अर्जित कर ही प्रिंट मीडिया अपने को उबार सकता है। प्रिंट मीडिया को क्लोन बनने से बचने की भी ज़रूरत है। आम तौर पर जो ख़बरें आती हैं उसके प्रकाशन के कुछ अघोषित मानदंड हैं, जिनसे अखबार का कलेवर तय होता है और हम पाते हैं कि अगले दिन प्रकाशित होने वाले अखबारों में एक सी खबरें फ्रंट पेज पर होती हैं और लगभग उनकी भाषा और लहजा भी। कई बार तो सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख भी क्योंकि सेंडिकेट राइटिंग का दौर चल रहा है। फीचर एजेंसी की सेवाओं भी इस संकट को और गहरा करती हैं और वे पृष्ठ भी कई बार एक ही सामग्री से लैस होते हैं। एक सी खबरें एक सी प्रस्तुति के बीच प्रिंट मीडिया अपना कितने दिन तक बचाव करेगा। जाहिर है कि जो बड़े मीडिया हाउस हैं, वे छोटों को निगल जायेंगे। दूसरे यह कि निष्पक्षता कभी समाज में एक मूल्य हुआ करती थी। अब बदलते संदर्भों में वह मूल्य क्षरित हो चुके हैं। अब पक्षधरता का दौर है और आप किसके साथ खड़ें हैं स्पष्ट कीजिए। आप जिसके साथ हैं, वही आप हैं। दुर्भाग्य से इस प्रवृत्ति का शिकार प्रिंट मीडिया भी हो रहा है। राजनीति में तो कभी एक दूसरे को गाली-गलौज करने वाले मौका पाकर गलबहियां करने लग जाते हैं। पार्टी बदलते ही तमाम मामलों में अभियुक्त रहे नेता दूध के धुले हो जाते हैं किन्तु मीडिया ऐसा नहीं कर सकता। उसे दूरगामी लक्ष्य तय करके ही चलना होता है। खबरों की प्रस्तुति में प्रिंट मीडिया को तटस्थ ही रहना चाहिए। प्रिंट मीडिया को अपना नजरिया अपने सम्पादकीय लेखों के जरिये ही व्यक्त करना चाहिए।
3. कस्बाई और नागरीय पत्रकारों की चुनौतियां क्या हैं?
कस्बाई पत्रकारिता को स्थानीय मुद्दे प्रभावित करते हैं लेकिन उनकी अनुगूंज दूर तक जाती है। यदि कस्बाई मुद्दे को संजीदगी से उठाया जाये को वह केन्द्रीय मुद्दा बन जाता है। उन्नाव बलात्कार कांड इसका पुख्ता उदाहरण है। कहना न होगा कि कस्बों को पत्रकारिता इसलिए कठिन है कि पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं। और आर्थिक विपन्नता भी उन्हें ग्रसती है। उन पर आसानी से दबाव डाला जाता रहा है और खबरों का स्वरूप दबाव के कारण वह नहीं रह जाता, जो था। कस्बों में खबरें लिखी कम जाती हैं दबाई अधिक जाती हैं। नागरीय पत्रकारों के सामने होड़ का संकट है। दबाव के कारण अपुष्ट खबरें भी देनी पड़ जाती हैं। नागरीय पत्रकारों के लिए विश्वस्त सूत्र बहुत बड़ा फैक्टर हैं। जोड़- तोड़ के बगैर खबरें ब्रेक करना मुश्किल है। अंदरखाने तक पैठ यूं ही नहीं बन जाती उसके लिए शीर्ष अधिकारियों व नेताओं का भरोसमंद बनना पड़ता है। ऐसे में तटस्थता नहीं रह जाती। ऐसा न करें तो प्रेस कांफ्रेंस, प्रेस ब्रीफिंग और प्रेस रिलीज की ही पत्रकारिता होगी। नागरीय पत्रकारों को कई बार किसी नेता से अप्रिय सवाल पूछने पर नौकरी से हाथ धोना भी पड़ सकता है। जिस तरह अर्थव्यवस्था बैठ रही है पत्रकारों को मीडिया संस्थान के हर तरह के हुक्म का पालन करने को तैयार रहना पड़ रहा है, वरना इस्तीफे का विकल्प तो है ही।
4. देश के वर्तमान माहौल में क्या पत्रकारिता निरपेक्ष नज़र आती है?
पत्रकारिता क्या देश के वर्तमान माहौल में कोई निरपेक्ष नहीं रह पायेगा। अब असहमति मूल्य नहीं रह गयी है। विरोध अब किसी न किसी साजिश के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। यह दौर संवाद नहीं जयकारे का है। सौभाग्य से हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी शैशवावस्था में ही आंदोलनकारियों का संगसाथ पाया और वह बड़े मूल्यों से जुड़ी। लोगों में सचेतनता पैदा करना और देशभक्ति की भावना को भरना उसका उद्देश्य था। इसलिए उस समय के प्रखर साहित्यकार व आंदोलनकारी पत्रकारिता से जुड़े। अब पत्रकारिता के मूल्य बदल गये हैं। मार्केटिंग हावी हो गयी है। अब मीडिया ने पीआर को ही अपनी भूमिका मान ली है। मीडिया अब शुद्ध रूप से व्यवसाय बनता जा रहा है। कहने को तो वह उदात्त मूल्यों से जुड़ा हुआ है, किन्तु वह एक आड़ भर है। अन्य व्यवसाय से जुड़े लोगों ने इसे भी अपना एक व्यवसाय बना लिया है। पत्रकार भले मुगालते में रहें कि वे कोई बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, किन्तु उसका संचालक समाचार पत्र को एक व्यवसायिक प्रतिष्ठान ही मानता है। ऐसे में निरपेक्षता का प्रश्न बेमानी है। पत्रकार हाशिए पर रहकर चुपचाप सार्थक काम करते हैं, जितना भी बन पड़ता है। और सम्पादक कंटेंट और कांटेक्ट मैनेजर बन चुके हैं। प्रिंट मीडिया में एक संकट भाषा को लेकर भी है। ऐसी भाषा कम लिखी जा रही है जो पाठक को बांध ले। कभी प्रभाष जोशी के लम्बे लम्बे लेखों को हम पढ़ते थे और आनंदित व मोहित होते थे। भले उनके लिखे विषयों में हमारी दिलचस्पी न हो। हम उनके लेखों से जीना भी सीखते थे और संघर्ष करना भी। जीवन के मूल्य भी। अखबार केवल सूचना नहीं देते। जीवन में सकारात्मक सोच भी दे सकते हैं। वह भूमिका कम होती जा रही है।
5. जमशेदपुर में पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति और भविष्य का स्कोप
जमशेदपुर में पत्रकारिता में झारखंड के आदिवासी समुदाय के संघर्ष और उनकी समस्याओं को उजागर करने व उनके अधिकारों के संरक्षण को स्वर देने की  चुनौती है दूसरी ओर आधुनिक शिक्षित कामकाजी वर्ग और व्यवसायिक गतिविधियां हैं। दोनों का तालमेल बैठना आम बात है। जिन दिनों झारखंड के तीन शहरों से दैनिक जागरण लांच करने की तैयारी चल रही थी मैं वर्ष 2003 में जमशेदपुर में फ़ीचर डेस्क प्रभारी बनकर पहुंचा था। मैंने महसूस किया था कि एक गहरी समझ व जनहित के प्रति संवेदनशील रुख की पत्रकारिता जमेशपुर व झारखंड की पत्रकारिता के लिए आवश्यक है। क्योंकि यहां दो विपरीत ध्रुव हैं जिन्हें साधना कठिन चुनौती है। मैंने तमाम साहित्यकारों का सहयोग लिया। बार-बार उनके घर गया। उनकी रुचियों को जाना व उन्हें प्रेरित किया कि वे साहित्येतर विषयों पर लिखें। आज की पत्रकारिता की एक चुनौती यह है कि साहित्येतर विषयों पर साहित्यकार नहीं लिखते हैं। कविता, कहानी व साहित्यिक विषयों पर आलोचना उनके केन्द्र में हैं। लेकिन उनसे बार -बार तकादा कर साहित्येतर विषयों पर लिखवाया जाये तो वे पत्रकारों से अच्छा लिख सकते हैं। क्योंकि साहित्यकारों की चिन्ताएं समष्टिगत होती हैं। वे साहित्य पर लिखते हुए भी व्यापक सरोकारों से जुड़े होते हैं। प्रिंट मीडिया की पत्रकारिता का भविष्य ऐसे लोगों के बूते सुरक्षित किया जा सकता है। धर्मयुग में धर्मवीर भारतीय ने ऐसा किया था। उन्होंने विष्णुकांत शास्त्री से रिपोर्ताज लिखवाये थे। मुझे याद है जमशेदपुर के प्रख्यात कथाकार जयनंदन जी ने वहां की नदियों पर जो लिखा था, वह एक बेहतरीन रिपोर्ताज का उदाहरण बन सकता है। मुझे नहीं लगता कि जमेशपुर का कोई भी साहित्यकार ऐसा होगा जो उन दिनों दैनिक जागरण से न जुड़ा हो। आर्थिक मसलों पर मैंने अर्थशास्त्र के प्रोफेसरों से और नाट्य समीक्षाएं वरिष्ठ रंगकर्मियों से लिखवायी थी।





 


Wednesday, 1 November 2017

काइनात में कुछ भी नहीं है,दो दिल इक धड़कन



साभार- सन्मार्ग 12.11.2017

पुस्तक समीक्षा/डॉ.अभिज्ञात

पुस्तक : झील के बिस्तर पर/गीत/लेखक-फ़े.सीन.एजाज़/प्रकाशक: इंशा पब्लिकेशंस, 26 ज़करिया स्ट्रीट, कोलकाता-700073/मूल्य: 120 रुपये


दिल के अहसासों को पूरी शिद्दत से व्यक्त करने वाले गीतों का संग्रह ‘झील के बिस्तर पर’ आया है। इसे लिखा है उर्दू के प्रख्यात शायर, कथाकार, आलोचक और ढाई दशक से अधिक अरसे में कई देशों में अपना अच्छा-खासा पाठक वर्ग तैयार कर चुकी पत्रिका ‘महानामा इंशा’ के सम्पादक फ़े.सीन.एजाज़ ने। देवनागरी लिपि में आये ये गीत हिन्दी गीतों के प्रचलित मुहावरों और प्रतीकों से एकदम अलग हैं जिसके कारण इनमें अतिरिक्त ताज़गी है। चूंकि एजाज़ ग़ज़लगोई की दुनिया का एक सुपरिचित नाम है, जिसने गीत के मीटर पर भी अपनी वैसी ही पकड़ बरकरार रखी है इसलिए इन गीतों को गाने वालों के सामने भी कोई दुश्वारी नहीं है। हिन्दी उर्दू की मिलीजुली आसान हिन्दुस्तानी जुबान में लिखे ये गीत आसानी से लोगों की समझ में आने वाले हैं। एक और खूबी यह कि कई गीत स्त्रियों की ओर से उनके मनोभावों को व्यक्त करने वाले हैं। एक बानगी देखें-‘तरसेंगी मिरी सांस को जब सांसें तुम्हारी/उलझेंगी मंज़िलों से भी जब राहें तुम्हारी/कुछ काम न आ पायेंगी जब आहें तुम्हारी/ढूंढोगे मेरे साथ की तन्हाइयों को तुम/पर मैं नहीं मिलूंगी..।’
ताजमहल को लेकर उर्दू शायरी में साहिर लुधियानवी से लेकर तमाम रचनाकारों ने बहुत कुछ लिखा है, उस क्रम को एजाज़ ने आगे बढ़ाया है। उनका गीत यूं है-‘सोचा है कोई ताजमहल हम भी बनायें/ हल्का सा कोई तंज़ ज़फ़ाओं पे नहीं हो/इस दिल को ग़ुरूर अपनी वफ़ाओं पे नहीं हो/दिल छूने का इक तर्ज़े अमल हम भी बनायें।’
इस संग्रह के गीतों में नारेबाजी व समाज को बदल डालने की चाहतों की बातें नहीं बल्कि मुहब्बत, ज़ुदाई व उससे जुड़े मनोभावों को अधिक व्यक्त किया गया है जो युवाओं को भी आकृष्ट करेगा-‘कल तू भी नहीं होगी यहां, हम भी न होंगे/आ जा के मुलाक़ात का यह आख़िरी दिन है/इक प्यार का आलम जो गुज़ारा है तेरे साथ/बरसात का मौसम जो गुज़ारा है तेरे साथ/उस मौसमे बरसात का यह आख़िरी दिन है।’ उनके गीतों की दुनिया में और कोई नहीं बल्कि दो मुहब्बत करने वाले हैं और उनसे जुड़ी बातें हैं। इस बात को वे अपने पहले ही गीत में कह देते हैं-‘आज इक साथ हंसें तो खुल कर साथ बहें आंसू/कोई नहीं है वादी--गुल में, इक मैं और इक तू/काइनात में कुछ भी नहीं है, दो दिल इक धड़कन/यह कैसी उलझन है।’

Thursday, 12 October 2017

प्रोसेनियम की ओर से कवि सम्मेलन और मुशायरा सम्पन्न


कोलकाताः शिव कुमार झुनझुनवाला द्वारा संचालित प्रोसेनियम आर्ट सेंटर की ओर से उसके रिपन स्ट्रीट सभागार में कवि सम्मेलन और मुशायरा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि, गायक व पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक (रेलवे) मृत्युंजय कुमार सिंह ने की। उन्होंने इस अवसर पर न सिर्फ अपनी कविताएं सुनायीं बल्कि स्व लिखित अपने भोजपुरी गीतों से भी उपस्थित समुदाय का मन मोह लिया। कार्यक्रम में डॉ. अभिज्ञात ने पैसे फेंको, तुम मेरी नाभि में बसो विश्वास कविताएं और देशभक्ति गीत दुश्मन के लहू से लिखने को एक और कहानी है गीत सुनाया। वदूद आलम आफ़ाकी ने ग़ज़ल "जो कह दिया उसे कर के दिखा दिया उसने, हाँ में मुझको तमाशा बना दिया उसने' सुनाकर खूब तालियां बटोरी।
जितेन्द्र जितांशु ने बहुत धूप है ,काला चश्मा साथ नही है  तथा घर से घर को घर की तरफ  आदि कविताएं सुनायीं। सोहैल खान सोहैल की ग़ज़ल यूं थी- 'पत्थर पूजे या फिर निराकार है,सबका करता वो ही बेड़ा पार है।' पलाश चतुर्वेदी ने अपनी हिन्दी व उर्दू कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन किया डॉ.बिन्दु जायसवाल एवं अरविंद कुमार सिंह ने।












Saturday, 15 July 2017

प्रकृति से अप्रतिम संवादशीलता और गहन तादात्म्य



समीक्षा-डॉ.अभिज्ञात
पुस्तक का नामः प्रकृति राग/ लेखक : मानिक बच्छावत

 प्रकाशक : समकालीन सृजन, 20 बालमुकुंद रोड, कोलकाता-700007/मूल्यः 150/-

लगभग साठ वर्षों से सतत रचनाशील वरिष्ठ साहित्यकार मानिक बच्छावत की प्रकृति से घनी आत्मीयता की रचनाओं का साक्ष्य उनका काव्य-संग्रह 'प्रकृति राग' है। उनकी प्रकृति पर लिखी कविताओं का चयन पीयूषकांति राय ने किया है। मानिक जी का प्रकृति के प्रति मैत्री भाव रहा है, जिससे वे लगातार संवादशील रहे हैं। उसके द्वंद्व को समझते हैं और उससे अपनी मानसिक ऊर्जा व संवेदनशीलता भी ग्रहण करते हैं। ऐसे दौर में जबकि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के बचाव की चिन्ता की जा रही है, ये रचनाएं उस मनोभूमि का निर्माण करती हैं, जहां प्रकृति का साहचर्य सुखद, विस्मयकारी और आह्लादकारी है। प्रकृति से मनुष्य के रिश्ते की पड़ताल इन कविताओं में है। कहना न होगा कि मानिक जी प्रकृति प्रेम से भी अपनी रचनात्मक खूराक प्राप्त करते हैं और ये रचनाएं उस ऋण का स्वीकार भी हैं।
इन रचनाओं में प्रकृति को उजाड़ने की साजिशों की ओर भी उन्होंने इशारा किया है। 'पहाड़ों पर आग कविता' में उन्होंने लिखा है-'सब कुछ खाक होता/दिखा/नंगे होते दिखे पहाड़/पहाड़ों पर न होंगे/पेड़ न फूल न फल/न घास घसियारे/न पशु न पक्षी/आस-पास क्यारियों में/बस खाली ज़मीन होगी/उस पर उठने लगेंगे/मकान दुकान/कारखाने/पहाड़ों पर लगी है आग/ या लगायी गयी है आग।' यह जो 'लगायी गयी है' का ज़िक्र है वही बताता है कि कवि का प्रकृति के प्रति कैसा अनुराग है तथा प्रकृति का संकट कितना गहरा है। एक ओर प्रकृति के बचाने की नारेबाजी है, दूसरी ओर मनुष्य की स्वार्थपरता प्रकृति की नैसर्गिक सुषमा को तहस- नहस करने में जुटी हुई है।
ऐसा नहीं है कि उनकी कविताओं में केवल तार्किकता है, बल्कि वे प्रकृति से गहन साहचर्य रखने वालों पर भी रीझते हैं-'वन कन्या कविता में वे लिखते हैं-'उसके पास/फुलदानी के/पुष्प नहीं/जूड़े में/पूरे वन की श्री है/उसे कृत्रिम प्रसाधनों की/ कोई ज़रूरत नहीं/अंग अंग में/ नैसर्गिंक महक है।' वन के पंछी के प्रति भी उनका अनुराग कम नहीं-'बस्तर की मैना' कविता की बानगी यूं है-'उसका बदन/रेशम की तरह/चमक रहा था/पक्षियों का अंतर्ज्ञान/नहीं बदला है/न मंद हुआ है/न बंद हुआ है/बदले हैं मनुष्य/जो उनके संकेतों को/ पढ़ नहीं पाते।' इस कविता में मनुष्य के प्रकृति से अलग-थलग पड़ जाने की टीस व्यक्त होती है।
प्रकृति की उपेक्षा और दुर्दशा से कवि दुःखी और चिन्तित है-'रेत की नदी' कविता में वे कहते हैं-'वर्षों से पड़ी हूं/अछूती/पीतवर्णी/दर्दीले मरुस्थल की/छाती पर पसरी/स्वर्ण झरी/मर्म भरी/परी-सी लेटी/निर्वसना/पीताभ रेत कणों की/ झर-झर कन्था/अपने निष्कासन के/दुख की परत कथा/सहती रही व्योम का ताप।'
प्रकृति की तमाम हलचलें उनके इस संग्रह में पूरी गरिमा के साथ उपस्थित हैं-'पका धान' कविता का एक अंश यूं है-'धरती के बेटों का/मन खुश है/अभी-अभी जो धान पका है/जीवन में जैसे मान पका है/और उमंगें नाच रही हैं/पके धान पर।' इन कविताओं में एक आंतरिक छंद है, जो भाषा को और नम करता है और उन भावों तक पहुंचने में और सुगम्यता प्रदान करता है।

Friday, 17 March 2017

एक नये सौंदर्य की सृष्टि करती कविताएं

-डॉ.अभिज्ञात
पुस्तक एक दिन अचानक
लेखक-जितेन्द्र जितांशु
प्रकाशक-सदीनामा प्रकाशन, एच-5. गवर्नमेंट क्वार्टर्स, बजबज, कोलकाता-700137
मूल्य-30 रुपये


जितेन्द्र जितांशु का दूसरा कविता संग्रह है एक दिन अचानक। पहला संग्रह कबूतर काफी अरसा पहले 1975 में आया था। तब से उनकी कविता काफी आगे बढी है और उन्होंने विचार और संवेदना के नये धरातल की लगातार तलाश की है। उनकी कविता में जहां एक ओर जूझारूपन है वहीं एक बेफिक्री और मस्ती भी है, जो एक नये तरह का सम्मोहन रचती है। शब्दों और आशय की नयी गति और नयी लय उनके नये संग्रह की विशेषता है। गंभीर बातें वे बड़ी आसानी से कह जाती हैं जिसमें कई जगह तुक बैठती तो कहीं टूटती है..लेकिन यह टूटन, यह लापरवाही एक सौंदर्य की सृष्टि करती है। ये प्यार क्या है कविता में वे लिखते हैं-
इंकार भी इकरार भी
धिक्कार भी तकरार भी
किस्से कहानी नज़्म कविता गीत
थिरकते चित्र, कितने रंग, कितने संग, कितने गीत
कट के गिरा तो पता चला धार क्या है
ये प्यार क्या है
सुखी को सोने न दे
दुखी को रोने न दे
हर एक युग में जीत
कैसा ज़िन्दगी का गीत
कितनी सभ्यताएं, बनीं बिगड़ीं दौड़ते रथ
ज़िन्दगी के आख़िरी क्षण तक खुला पथ
मोक्ष क्या है..धर्म क्या संसार क्या है
ये प्यार क्या है
सुखी को सोने न दे
दुखी को रोने न दे।
जितेन्द्र जितांशु संवादधर्मी कवि हैं। वे हर समस्या का निदान संघर्ष से नहीं बल्कि संवाद से खोजने के हिमायती रहे हैं। बिना संवाद के की गयी कोई भी कार्यवाही समस्या को जहां की तहां रखना ही साबित होगा, चाहे जिसनी पुरानी बात हो उसका समाधान संवाद से ही सम्भव है..एक दिन अचानक शीर्षक कविता में वे कहते है-
आ ही गया प्रश्न
क्या तुम भी मानते हो
क्या तुम जानते हो
कितनी ज़रूरत है सभ्यताओं के बीच संवाद की
एक दिन अचानक
कविता की धार
शब्दों की गूंज
तितली के पंख
पसीने की गंध
मिलेंगे म्यूज़ियम में
हमारे इन्तजार में।
इस संग्रह की कविता में आज के मनुष्य की इच्छा, आकांक्षा, स्वप्न और उलाहने सब कुछ हैं। कवि के लिए तो उनकी कविताएं उनके लिए उनका दर्शन और धर्म तक हैजीते रहने के प्रमुख कारणों में से एक। इन संवादधर्मी कविताओं के बीच जहां तहां अभिव्यक्ति का एक टटकापन है, जो हमें दुखद विस्मय में डाल देता है-
मौन होते जा रहे पुर्जे सृजन के
कौन सा बारूद बरसेगा गगन से
इस सृजन की सार्वभौमिकता, सरलता नि:स्वार्थ
साथ रहना है समझ के साथ।
कवि को सिर्फ साथ नहीं चाहिए बल्कि समझ के साथ साथ चाहिए।
नववर्ष की शाम कविता में जितेन्द्र जितांशु ईदगाह कहानी को नये संदर्भ में रचते हुए कहते हैं कि बच्चे हामिद को अपनी दादी के लिए अब मेले से चिमटा नहीं खरीदना है, जिनसे वह रोटी सेंकते हाथों को जलने से बचा सके बल्कि उसे अब एक जिस्ता काग़ज और कलम चाहिए, जिससे वह अपनी दादी को हर मुश्किल से बचा सके।



Thursday, 26 June 2014

हमारे जीवन में उत्सव का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है

 

प्रख्यात कथाकार, उपन्यासकार एवं यात्रा वृत्तान्तकार डॉ.कुसुम खेमानी से 

डॉ.अभिज्ञात की बातचीत

प्रश्न-साहित्य सृजन की शुरुआत कैसे हुई? प्रेरणा कैसे मिली? उस दौर में किन लेखकों को जानती थीं या किसका लिखा पढ़ती थीं?
उत्तर-इस प्रश्न का उत्तर मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है और इसकी सीधी-सी वजह यह है कि मैंने न कभी यह जाना, न कभी माना कि मैं लेखिका हूँ या अच्छा लिख सकती हूँ। हाँ, किताबें पढऩे का बेहद शौक बचपन से ही रहा। यहाँ तक कि वे रिसाले जो एक आठ वर्षीय लड़की के लिए भारी माने जाते, उन्हें भी मैं चुपके से ताक से उतार कर पढ़ लिया करती थी। लिखने की शुरुआत की उम्र इतनी कम थी कि हँसी आ सकती है। मैं जब तीसरी-चौथी कक्षा में पढ़ रही थी, उस व$क्त एक दैनिक अखबार में बहस चली थी विषय था 'प्रणय या परिणय', मैं उसमें अंशु जैन के छद्म नाम से बराबर लिखती थी। एक दिन घरवालों को इसका पता चल गया। उन्होंने खूब मजाक उड़ाया, उसी दिन से लिखना ठप्प हो गया।
वैसे मैं बाद में भी कुछ ना कुछ लिखती रहती थी। दिनमान, धर्मयुग, कादम्बिनी में एकाधिक आलेख छपे भी थे, लेकिन लेखन का क्रम टूटने का कोई $खास दु:ख नहीं है, क्योंकि मैं नियति को मानती हूँ और मेरा विश्वास है कि मैं अब जो लिखूँगी वह पहले के लिखे से बेहतर होगा। मेरे लिखे के छपने की शुरुआत का श्रेय पूर्णत: श्री रवीन्द्र कालिया को है, जिन्होंने मुझे लिखने की हिम्मत दी और मुझसे लगातार वागर्थ में लिखवाया।
प्रश्न-किनका लिखा पढ़ा है?
उत्तर-पूछिए किसे नहीं पढ़ा? छोटी उम्र से ही किताबों का शौक होने के कारण मारवाड़ी घर के सारे पैसे किताबों में ही लगते थे। किताबें पढऩे का यह हाल था कि एम.ए का इम्तहान केवल बाहरी किताबों के बल पर फस्र्ट क्लास में पास कर लिया। सोलह साल की उम्र में ही कई लेखकों को करीब से देखा। ससुराल में बच्चन, नीरज, बैरागी आदि का का$फी आना-जाना था और सत्रह-अठारह तक तो मैं सीताराम जी सेकसरिया के प्रभाव क्षेत्र में आ गयी थी इसीलिए अधिकतर समाज सुधारकों, राजनीतिज्ञों और लेखकों से मिलना-जुलना होता ही रहता था। मुझे लेखक ही प्रिय हैं
और मैं उन सभी की श्रद्धा करती हूँ। बीस की उम्र के बाद मेरे प्रिय रचनाकार रहे अज्ञेय, कुंवरनारायण, भवानी प्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती, कृष्णा सोबती, धूमिल, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,  केदारनाथ ङ्क्षसंह, मनोहर श्याम जोशी, इस्मत चुगतई, कुरतुल-एन-हैदर, राही मासूम रजा और विनोद कुमार शुक्ल ढेरों हैं पर जिनके नाम अभी याद नहीं आ रहे हैं।
प्रश्न-साहित्य में दृष्टि, विचार और अनुभव की परिपक्वता हासिल करने के बाद प्रवेश करने वाले मनोहर श्याम जोशी आदि के साथ आपका नाम लिया जा सकता है? विलम्ब से इस क्षेत्र में प्रवेश के क्या कारण रहे? इससे क्या खोया और क्या पाया?
उत्तर-आपका यह प्रश्न बहुत ही भारी है। हकीकत यह है कि शायद मुझमें  अब भी काफी बचपना है। और हे देवता! कहाँ प्रात: स्मरणीय मनोहर श्याम जोशी और कहाँ मैं? भाई, उनकी तो कलम क्या थी संगतराश की नोकीली छेनी थी, जो हर शब्द को छील-तराश कर चमका देती थी और मैं तो अभी लिखना सीख रही हूँ। अपने लेखन से मैंने क्या खोया है यह तो पता नहीं, पर अभी जो पहचान बनी है, वह बहुत ही प्यारी है।
प्रश्न-परवर्ती काल में क्या लिखने की वजह बदली..लेखन के उद्देश्य में क्या कोई बदलाव आया?
उत्तर-पहले मैं जो मन में आया वह लिख देती थी, पर अब मन करता है, कुछ ऐसा लिखूँ जो जीवन को अर्थ दे। मेरी कहानियों में भी यह अन्तध्र्वनि छिपी रहती है और मेरे पात्र भी अन्तत: बुराई को नकार कर अच्छाई को ही अपनाते हुए दिखते हैं।
प्रश्न-आपके लेखन की ऊर्जा का उत्स क्या है? सोद्देश्य लेखन और स्वांत: सुखाय में से आपका पथ कौन सा है?
उत्तर-मेरे पाठकों का प्रेम ही मेरी ऊर्जा का उत्स और अन्तिम सत्य है। जानबूझ कर कैसे लिखा जाता है.. यह मैं नहीं जानती। लेकिन मन में कोई भव आने पर या कुछ अच्छी-बुरी घटना देख कर एक मानसिक उद्वेग होता है, जिसे कागज पर उतार देने के बाद हल्कापन महसूस करती हूँ। ऐसे लिखे भाव हर बार ही कोई आकार ले लें यह $जरूरी नहीं लेकिन उन्हीं में से कई बार किसी कहानी या किसी आलेख की संरचना हो जाती है।
प्रश्न-साहित्य में प्रतिबद्धता शब्द प्रचलित और प्रतिष्ठित है.. खास तौर पर वामपंथी रुझान वाले लेखकों में, आप अपने लिए इससे क्या अर्थग्रहण करती हैं?
उत्तर-मेरी प्रतिबद्धता सिर्फ एक भाव के प्रति है  और वह है : प्रेम। मैं अपने जीवन का मूल, मध्य और अन्त सब प्रेममय रखना चाहती हूँ। चँूकि मेरे पात्र अधिकतर 'सच्चे' हैं इसलिए मेरी प्रतिबद्धता और सम्मान बेमानी है। मुझे तो जैसा वे कहते हैं, करना पड़ता है! अत: 'इज्म' और 'वाद' स्वत: ही मेरे लेखन का हिस्सा बन जाते हैं।
प्रश्न-आपके साहित्य में पूँजी, सम्पन्नता और समृद्धि का एक मानवीय चेहरा दिखायी देता है, जो हिन्दी सहित्य में प्रचलित ढर्रे से अलग ही नहीं, बल्कि विपरीत है। जो वर्ग शोषक के तौर पर साहित्य में स्थापित था आपने उसकी उदारता, करुणा और परोपकार पर फोकस किया है.. इसमें आपको झिझक नहीं हुई.. आलोचकों का कोई खौफ महसूस नहीं किया.. रिजेक्ट कर दिये जाने की चिन्ता पास नहीं फटकी?
उत्तर-दरअस्ल यह मेरे पात्रों का काम है, मेरा नहीं। और चूँकि मेरे सारे पात्र मेरे अनुभव से उपजते हैं इसलिए वे उस मिट्टी और खाद का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उनकी अ$ज्म में पिन्हा है। मेरे हितैषियों ने मुझे सुझाया भी;  नारी विमर्श पर, दलितों पर, फलां पर, ढिमका पर, लिखो.. पर मैं अक्षम थी। जो सत्य मैंने भोगा नहीं उसे कैसे लिखूँ? मेरा मानना है कि मनुष्य हर जगह मनुष्य है! न तो आभिजात्य वर्ग के ही सारे लोग बुरे होते हैं और ना ही अन्य वर्गों के सब भले! मैं समझ नहीं पाती कि मुझे सच्चाई से क्यों डरना चाहिए? फिर भी यदि कोई व्यक्ति विशेष या वर्ग, मुझसे नाराज है तो मा$फी चाहती हूँ पर मैं अवश हूँ।
प्रश्न-साहित्य में आपके रोल मॉडल कौन हैं.. किसका लिखा आपको अधिक पसंद है.. किसके जैसा लिखना चाहती हैं.. कौन -सी कृतियाँ पसन्द हैं.. देशी-विदेशी.. हिन्दी.. अन्य किसी भाषा का..।
उत्तर-कई हैं, फिर भी कृष्णा सोबती, अज्ञेय, कुंवर नारायण, इस्मत चुगताई, भीष्मू साहनी, मंटो, राही मासूम रजा, मनोहर श्याम जोशी, भवानी प्रसाद मिश्र आदि मुझे बेहद पसन्द हैं। मैं कई नये लेखकों को भी पढ़ती रहती हूँ और मुझे उनके लेखन का ताजापन और जमीनी हकीकत से जड़ाव लुभाता है। अमिताभ घोष, विक्रम सेठ, आर.के.नारायण, वी.एस.नायपॉल, अरुन्धति रॉय, आशापूर्णा देवी, जीवनानंद, सुनील गंगोपाध्याय, विमल मित्र, टॉलस्टाय, शेक्सपीयर, चेखव, बॉलजॉक, गैब्रियल मार्खेज आदि... पर क्या चाहने मात्र से मैं इनमें से किसी के भी जैसा लिख सकती हूँ? इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने जैसा ही लिखूँ..चाहे वह एकदम साधारण ही हो।
प्रश्न-विचार और संवेदना, शिल्प और कथ्य में से किसे अधिक तरजीह देती है..?
उत्तर-वैसे तो ये चारों ही किसी भी रचना के स्तम्भ हैं पर मैं संवेदना और कथ्य को ज्यादा अहमियत देना चाहती हूँ। कितना दे पाती हूँ! यह तो पाठक ही जानें...।
प्रश्न-महिला लेखक के प्रति आपका क्या नजरिया है, आप अपने को जोड़कर देखतीं हैं या उसको कोई महत्त्व नहीं देतीं..
उत्तर-क्या आप अभी भी महिला और पुरुष लेखक की गलियों में भटक रहे हैं? मुझे तो न पुरुष से चिढ़ है न महिला से। हाँ, मेरे चाहनेवालों का मानना है कि मैं स्त्रियों की विशेष पक्षधर हूँ। दरअस्ल मैं 'अद्र्धनारीश्वर' की भक्त हूँ। मुझे पुरुष में प्रेम और ममता और स्त्री में कर्मठता और जुझारूपन प्रिय है। मैं इन्हेें ही अपने जीवन का दर्शन भी मानती हूँ।
प्रश्न-आपके उपन्यास और कहानियों में नारी पात्रों को नयी गरिमा मिली है और उनकी समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ रेखांकित किया गया है.. इसके सम्बन्ध में आप अलग से कुछ कहना चाहेंगी..
उत्तर-यदि ऐसा है तो बहुत ही अच्छा हुआ है। ह$जारों सालों से अग्नि में जलती नारी को कभी तो.. कोई तो.. ठंडे जल की गंगा से सराबोर करता! मैं नाची$ज तो ऐसा क्या कर पायी होऊँगी.. पर मुझे लग रहा है कि इन दिनों स्त्रियों को समझने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि इन दिनों स्त्री ने भी स्वयं को सिद्ध किया है, पर बहुतेरे पुरुषों ने भी उन्हें मान-सम्मान, गरिमा और बराबरी का दर्जा दिया है। स्वाभाविक है यह बदलाव साहित्य में भी प्रतिबिम्बित होगा ही। अलग से न कहकर मैं सि$र्फ यह दोहराना चाहूँगी कि जैसा महसूस करती हूँ वैसा लिखती हूँ। यह स्वीकार करते हुए भी कि मुझे स्त्री सर्वदा लुटी-पिटी लगती है। मेरी दो-चार कहानियों की स्त्रियाँ बहुत ही भौतिकवादी, कर्कश और और उच्छृंखल भी हैं.. पर यह तका$जा उनके चरित्र का था, इसलिए उन्हें उसी तरह व्यक्त करना पड़ा।
प्रश्न-आपने कई देशों की यात्राएँ की हैं जिन पर आपकी पुस्तक भी आयी है, किन्तु दुनिया की तमाम अच्छी चीजों की चर्चा के दौरान आप अपने देश की चर्चा करने से नहीं रोक पाती हैं.. यह कई बार कसक के रूप में व्यक्त हुआ है... यह तटस्थ लेखन तो हुआ नहीं.. तुलना के दौरान आपने अपने देश के मूल्यों, प्राकृतिक सौन्दर्य और कलाकृतियों को अधिक महिमामंडित किया है..
उत्तर-आपको यह भ्रांति हुई है या हो सकता है यह मेरे लेखन की कमजोरी हो! प्रथमत:, तो मेरे यात्रा वृत्तान्त की पुस्तक का नाम है 'कहानियाँ सुनाती यात्राएँ' है अर्थात् वे देश जैसे मेरे मन में उगे। इसलिए $जरूरी तो नहीं है कि मैं एकदम रूखेपन से वहाँ के हवा-पानी और बारिश के आँकड़ पेश करती रहती। रिपोर्ताज और वृत्तान्त में कुछ तो अन्तर होना ही चाहिए! जहाँ तक मेरा ख्याल है मैंने अपने वर्णनों में कोई बेईमानी नहीं की है। यदि कश्मीर में कोई विदेशी सैलानी मुझसे यह कहे कि स्विट्जरलैंड कश्मीर के पासंग भी नहीं है... तो मेरे हृदय में कसक नहीं उठेगी? मैं यदि रोम की 'पियेता' के साथ रो सकती हूँ , तो इस बात पर भी दु:खी होने का ह$क है मेरा कि दूर क्यों कलकत्ते के ही इंडियन म्यूजियम में विशाल और विराट मूर्तियाँ यों ही पड़ी हैं। यदि हम मनुष्य हैं, तो राग-विराग, दु:ख-कष्ट से मुक्त कैसे हो सकते हैं? क्या हमें इस बात पर शर्म नहीं आनी चाहिए कि हम हमारे प्राकृतिक संसाधनों और हजारों वर्षों की ऐतिहासिक धरोहरों से बेखबर रहते हैं? यह तो खैर मनाइये कि मैं कोई पुरातत्त्विद् या इतिहासकार नहीं, वर्ना रात से सुबह हो जाती और हमारे देश की एक मूर्ति की भी पूरी व्याख्या पूरी तरह नहीं कर पाती! मेरी कोशिश रही है कि मैं अधिक से अधिक सच लिख पाऊँ वर्ना स्विट्जरलैंड, डर्बन, वैंकयूवर, रोम आदि पर वृत्तान्त पाठकों को इतने प्रिय कैसे हुए?
प्रश्न-आपने कहानी, उपन्यास एवं यात्रा वृत्तान्त इन तीन विधाओं में लिखा है.. आपका मन किसमें रमता है..? अपनी मूल रचनाविधा किसे मानती हैं?
उत्तर-हालाँकि उपन्यास की बजाय कहानी लिखना अधिक कठिन है, क्योंकि कहानी का $फलक छोटा होता है, पर पता नहीं क्यों इन दिनों मेरा अधिक रुझान कहानी की ओर हो रहा है। परिणामस्वरूप हंस, नया ज्ञानोदय, कथादेश, पाखी, परिकथा और वागर्थ में मेरी कहानियाँ छप रही हैं। चित्रा जीजी (मुद्गल) के आदेश से एक उपन्यास राजस्थानी पृष्ठभूमि पर लिखना शुरू किया है, पर कहानियों के पात्र भूत की तरह मुझसे चिमटे रहते हैं। अब जब उनसे निजात मिलेगी तभी कहानी के अलावा कुछ और लिख पाऊँगी।
प्रश्न-लेखन की भावी योजनाएँ क्या हैं?
उत्तर-जिसने आज तक सारा काम देर से और बिना योजना के किया है, वह भला अब क्या सोचेगा? क्या योजना बनायेगा? सब कुछ मन के हवाले हैं, वह जिधर बहेगा उसके साथ बहना होगा।
प्रश्न-आपकी रचनाशीलता में परिपक्वता के साथ-साथ एक युवता भी है.. उसे बचाये रखने के लिए आपने क्या यत्न किये हैं?
उत्तर-क्या कोई चाह कर परिपक्व या नासमझ बन सकता है? क्या कोई जान लगाकर भी युवता को बचा सकता है? ययाति को भी अपने बेटे की जवानी उधार माँगनी पड़ी थी क्योंकि ध्रुव सत्य है कि जवानी कभी लौटती नहीं! फिर मैं क्या कोई आकाश से उतरा अजूबा हूँ जो एक मुट्ठी में जवानी और एक में समय को बन्द रख सकती हूँ? मेरा ख्याल है मेरी नासमझी भरी भरी बातें ही आपको मेरी युवता का परिचायक लगी होंगी। वैसे न तो मैं लाओत्से हूँ! और ना ही बुद्ध।
प्रश्न-इस समय कौन-सी चुनौतियाँ हैं जिनसे इस समय के रचनाकार को टकराना चाहिए.. जिससे टकराये बिना रचनाशीलता के मूलधर्म से पलायन कहा जाएगा?
उत्तर-मेरी समझ से आज के दिन की सबसे बड़ी विडम्बना है-लालच। विज्ञान ने अपने अनेकानेक भौतिक प्रकारों से सामग्रियों का ऐसा अम्बार लगा दिया है कि मनुष्य उस आडम्बर में कहीं खो गया है। सुबह से शाम सिर्फ दौडना! उन्हें पाना! भोगना! और नष्ट करना! बस उसने अपनी जीवन-पद्धति यही बना ली है। उसकी भोगसामग्री की सूची दिनोंदिन लम्बी होती जा रही है और सब कुछ भोगते हुए भी उसे कहीं भी रस नहीं मिलता। हमारे जीवन से 'आस्वाद' शब्द मिट गया है। अपनी लम्बी फेहरिश्त पर 'टिक' लगाता हुआ वह अन्त में थक कर खत्म हो जाता है।
यह गहन विषय है इस पर मैं तो क्या $खाक लिख पाऊँगी पर मेरी हार्दिक इच्छा है कि बढि़या रचनाकारों को इस अदृश्य दौड़ से मानवमात्र को बचाना चाहिए और अपने लेखन से उनकी तन्द्रा भंग करनी चाहिए। सात्विक जीवन के खूबसूरत पहलुओं का लय भरा वर्णन कर, उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे अपने पाठकों को समझा पायें कि 'देखो! देने में कितना आनन्द है।'
प्रश्न-प्रेमचन्द ने साहित्य को समाज के आगे चलने वाली मशाल कहा था.. आज साहित्य के लिए लोगों को जीवन में कितनी जगह बची है.. साहित्यकार हाशिए पर क्यों हैं?
उत्तर-साहित्य की तो छोडि़ये! पर जरा यह तो बताइये आज के लोगों को कौन सी ची$ज में आनन्द आता है? आज हमारे जीवन में उत्सव का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है और अब ऐसे उखड़े-पुखड़े समय में किसे फुर्सत है कि वह यह देखे कि कौन हाशिए पर है, कौन नहीं? मुझे नहीं पता आप हाशिये का इस्तेमाल किस सन्दर्भ में कर रहे हैं, पर शायद थोड़ा बहुत यह पता है कि हर दूसरा आदमी, पहले को धकिया कर हाशिये पर डालना चाहता है। अब ऐसे घटाटोप में तो वे ही नक्षत्र की तरह चमक कर ऊपर उठ पाएँगे, जो अपना सर्वस्व उलीच कर अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ेंगे।
प्रश्न-अंग्रेजी के लेखक साहित्य से पर्याप्त कमा रहे हैं और वे लगभग फुलटाइमर हैं, जबकि हिन्दी का लेखक साहित्य के बल पर अपना परिवार नहीं चला सकता.. उसके क्या कारण हैं?
उत्तर-क्या अंगे्रजी के सारे लेखक मजे में हैं या सिर्फ वे 'बेस्ट सेलर! जो कूद-फांद कर किस तरह सुर्खियों में आ गये हैं। मेरे हिसाब से भारत में भी बहुतेरे प्रकाशन संस्थान हैं, जो खूब कमा रहे हैं, तो फिर कमी कहाँ है! हमें  इसे खोजना चाहिए। आ$िखर वह कड़ी कौन सी है? जो बड़े-बड़े लेखकों तक को उनका प्राप्य नहीं देती?
प्रश्न-भारतीय भाषा परिषद की महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी होने के कारण देश भर के तमाम लेखकों के सम्पर्क में आप बराबर रही हैं, किनके व्यक्तित्व से आप प्रभावित हुईं। किस-किस ने आपके रचनात्मक व्यक्तित्व को बनने में मदद की। किसने आपके जीवन की दशा और दिशा को निर्देशित किया?
उत्तर-बड़े लोगों से मिलना-जुलना एक बात है और उनसे गढ़ा जाना कुछ और। मैंने ऐसा कौन सा तीर मार लिया है, जो मुझे कोई द्रोणाचार्य मिल जाते? जहाँ तक व्यक्तियों से प्रभावित होने का सवाल है मेरे लिए विष्णुकांत जी शास्त्री, दद्दा (भवानी प्रसाद मिश्र), अज्ञेय जी और कृष्णा सोबती बेजोड़ हैं। वैसे मेरा मैं दावा है कि मैं आज तक किसी बुरे आदमी से नहीं मिली। प्रत्येक लेखक की अपनी बानगी, अपनी मिठास, अपना सादापन और अपना वैशिष्ट्य होता है, जो मुझे प्रभावित ही नहीं सम्मोहित कर लेता है।
प्रश्न-साहित्य से समाज में क्या और कितना बदलाव लाया जा सकता है?
उत्तर-मेरा मानना है कि साहित्य ही वह औजार है जो समाज को बदल सकता है। मुझे बचपन से आजतक अपने पिताजी (97 वर्ष) के सुनाये हुए अनेक प्रेरक प्रसंग याद आते हैं जिसने मेरे जीवन में जो भी अच्छा है, उसे रचा है। वे दर्शन की बारीक सूक्तियों को उर्दू, संस्कृत, हिन्दी, हरियाणवी, ब्रज आदि अनेकानेक भाषाओं के दोहे, साखी, शेर, सोरठा में यों कह देते हैं कि हम कुछ भी करने से पहले रुक कर उसके सही या गलत पर विचार करने लगते हैं। इसका एक छोटा सा उदाहरण है कि 'प्रत्येक तानाशाह सबसे पहले देश के साहित्यकारों को कुचलता है, क्योंकि वह जानता है कि साहित्य के पलटवार को वह नहीं झेल पाएगा।'
प्रश्न-साहित्य के अलावा आपकी दिलचस्पी के क्षेत्र क्या हैं और उनसे आप किस प्रकार जुड़ी हैं?
उत्तर-मैंने अपने समय का एक हिस्सा उन संस्थाओं को दे रखा है जिन्हें मेरी आवश्यकता है। मैं एक लम्बे अर्से तक मदर टेरेसा के कार्यों से भी जुड़ी रही। एक समय ऐसा था जब मैं सुबह दस बजे से शाम तक विभिन्न संस्थाओं में का ही काम करती रहती थी.. पर अब मैं शारीरिक रूप से, मानसिक और आर्थिक रूप से तो कई संस्थाओं का काम करती हूँ, पर उन चल निकली संस्थाओं में अनावश्यक ही अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराती। एक लाइन में कहा जा सकता है कि मेरी दिलचस्पी झाँकावाले, झलनी वाले, खोंचेवाले, मर्सीउीज सवार काले चोगे में, अपढ़ वृद्धा, बच्चों में सबसे अधिक है। मैं राह चलते सबसे मुस्कुराकर बोलती-बतियाती रहती हूँ! और शायद मैं उनकी मुस्कुराहटें लेकर अपने आनन्द में इतना इजाफा कर लेती हूँ कि सदा मुस्कुराती रहती हूँ।
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