Saturday, 29 July 2017

विस्थापन और खालीपन के दंश की अभिव्यक्ति

पुस्तक समीक्षा /डॉ.अभिज्ञात

सड़क मोड़ घर और मैं/ निर्मला तोदी/ 

वाणी प्रकाशन, 4695, 21 ए, दरियागंज,

 नयी दिल्ली-110002, मूल्य-295 रुपये



निर्मला तोदी की कविताओं को पढ़ना एक ऐसे काव्यात्मक संसार से गुज़रना है, जहां इस बात का चौकन्नापन और सजगता मिलती है कि अमुक शै अमुक ज़गह पर होनी चाहिए थी, वह वहां क्यों नहीं है। अगर वह अपनी ज़गह से हट रही है, हट चुकी है या हटेगी तो उसके कारक क्या हैं। विस्थापन की ऐसी चिन्ताएं उनकी सोच को काव्यात्मक प्रतिबद्धता प्रदान करती है। विस्थापन और खालीपन के दंश का सामना उनकी कविताओं में बार-बार होता है और इस क्रम में हर बार कविता की एक नयी ज़मीन टूटती लगती है। उनकी काव्य- शैली इतनी सधी हुई है कि कविता अपने होने को अलग से उजागर नहीं करती। साधारण घटनाओं के बीच चुपचाप बहती रहती है। न तो उनकी कविताओं में टूटन की तीव्र आवाज़ें हैं और ना रूदन की तेजतर हिचकियां, पर उदासी है और जहां-तहां पसरी पड़ी है-'बड़े मज़बूत हैं दीवारों के कंधे/सिर रखकर रोया जा सकता है/अपनी बात कही जा सकती है/ खूब धैर्य से सुनती हैं/बड़े सुन्दर हैं इसके कान/किसी और से कहती भी नहीं/मेरी बातें सिर्फ़ मुझसे करती हैं/मुझे अपने जैसी लगती हैं।'
ये कविताएं किसी के न होने में होने का आभास करातीं और होने की अर्थवत्ता को भी उजागर करतीं हैं। और समय के चूक जाने के बाद होने के अर्थ को समझना स्थिति को कारुणिक भी बनाता है। कभी पूरी न होने वाली एक क्षति का पता देता है और कई बार खालीपन से उपजी उपलब्धियों से संतोष करना भी सिखाता है-'बड़ों का सिर पर हाथ हो/बहुत कुछ संभल जाता है/अपने आप/ बड़ों की खड़ाऊं/ संभाल लेती है राज-पाट।' मृत्यु पर लिखी गयी हिन्दी कविताओं के क्रम में निर्मला तोदी की कविता उनके जाने के बाद एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है, यह कविता उन्होंने अपनी सास की मृत्यु पर लिखी है-'सुबह नल की सबसे पहली आवाज़/शाम के कूकर की पहली सीटी/अब चुप है/वह जिस जिस आवाज़ में थी/यह भी मालूम हुआ/उनके जाने के बाद/रसोई से/उनका पानी का लोटा गुम है/तनी पर सूखते कपड़ों में/सफ़ेद रंग कम है/लगातार हाथ में घूमती माला/बैठी है चुपचाप/सब चीज़ें कहां थीं/मालूम हुईं उनके जाने के बाद।'
अभिव्यक्ति की विकलता और अपने अंतरमन को पन्नों पर उकेरने की बेचैनी कि कविताएं हैं सड़क मोड़ घर और मैं काव्य संग्रह में। अच्छी, उत्कृष्ट समकालीन काव्यात्मक मुहावरों से कदमताल करने का कोई प्रयास नहीं दिखायी देता और यही सादगी उनकी खूबी है। कई कविताएं शृंखलाबद्ध हैं। एक पूरा परिदृश्य उनकी कई कविताओं को मिलाकर उपस्थित है। अर्थात् तीन-चार-पांच कविताएं एक ही ज़मीन पर लिखी गयी हैं या फिर उन्हें मिला भी दिया जाये तो एक ही कविता का हिस्सा बन जाये, अर्थात् एक भावभूमि पर शृंखला की एकाधिक कविताएं हैं। ऐसा हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह में भी है। उन्होंने सूर्य पर कई कविताएं लिखी हैं, हालांकि उन्हें अब तक वैसे शृंखलाबद्ध नहीं किया गया है जैसे बाघ कविता का किया गया। उनकी सूर्य सम्बंधी कविताओं को शृंखलाबद्ध करने पर एक नये विस्मयलोक और अर्थपूर्ण जगत का उद्घाटन संभव है। केदारजी के पूर्ववर्ती कवि मुक्तिबोध में भी यह शृंखलाबद्धता दिखती है, भावबोध की। मुक्तिबोध साथ तो यह भी हुआ कि उनकी लम्बी कविता के टुकड़े अलग-अलग कविता के तौर पर प्रकाशित हुए। निर्मला तोदी में शृंखलाबद्धता की प्रवृत्ति इसलिए दिखायी देती है कि उनमें एक समूचा काव्य व्यक्तित्व है, जो एक बड़ी सम्भावना वाले रचनाकार में दिखायी देता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर, अज्ञेय, शमशेर आदि की तरह। सारी रचनाओं की कड़ियां कोई सावधानी से मिलाये तो मिलेंगी। उनके जाने के बाद, जिस समय सांस निकलती है’, ‘इस तरह’, ‘जीवन चलता रहता है’, ‘बड़ों की खड़ाऊं एक ही भावभूमि की कविताएं हैं। उसी प्रकार 198 बी बी गांगुली स्ट्रीट’, ‘अपनी गली की दुनिया’, ‘रैली में, होड़ एक शृंखला की कविताएं हैं जो उनके अपने व्यक्तित्व और उनके आसपास के परिवेश और मनोजगत की हलचलों का पता देंगी। वैसे शमशेरित उनकी कविताओं में चित्रात्मकता के संदर्भ में है। उनकी कई कविताओं में दृश्य ऐसे उपस्थित हैं, जैसे वे किसी पेंटिंग का विवरण हों। या फिर कोई चाहे तो उनकी कविताओं को पढ़कर पेंटिंग बना ले।
उनकी कविताओं में प्रकृति भी बड़ी गरिमा से उपस्थित है तथा उसकी छोटी- बड़ी हलचलों का जीवंत समूचा दृश्य है, खासतौर पर बारिश का अंतरबाह्य प्रभाव परिलक्षित है और उसका बारीक विवरण भी। जीप की घरघराती आवाज़ से दरख़्तों की टूटती तन्मयता तक की फ़िक्र उन्हें है-'कौन सी साधना/ कैसी तन्मयता/ टूटती है/जब घरघराती जीप गुज़रती है।' कई बार तो वे मनुष्य तो वृक्षों से सीखने की नसीहत तक दे डालती हैं-'सभी पेड़ खड़े हैं/ साथ साथ/ पास पास/ हम लोगों में/ ऐसा क्यों नहीं होता।'
उनकी कविताओं में कई ज़रूरी सवाल और मुद्दे हैं, जिनमें शहर के आगे गांव की हैसियत, वर्तमान समाज में स्त्री की स्थिति, परित्यक्त स्थलों की उदासी, मृत्यु से उपजा सूनापन उल्लेखनीय है। स्त्री के सम्बंध में वे लिखती हैं-'चांदनी फैली हो/ या हो अमावस्या की रात /उसे क्या फ़र्क पड़ता है/ वह सोती है/ रोज़ ही/ वाणों की शैया पर।' ध्यान पर भी उनकी कविताएं हैं, जो उनकी कविताओं में आध्यात्मिक रुझान को पुष्ट करता है।



Saturday, 15 July 2017

प्रकृति से अप्रतिम संवादशीलता और गहन तादात्म्य



समीक्षा-डॉ.अभिज्ञात
पुस्तक का नामः प्रकृति राग/ लेखक : मानिक बच्छावत

 प्रकाशक : समकालीन सृजन, 20 बालमुकुंद रोड, कोलकाता-700007/मूल्यः 150/-

लगभग साठ वर्षों से सतत रचनाशील वरिष्ठ साहित्यकार मानिक बच्छावत की प्रकृति से घनी आत्मीयता की रचनाओं का साक्ष्य उनका काव्य-संग्रह 'प्रकृति राग' है। उनकी प्रकृति पर लिखी कविताओं का चयन पीयूषकांति राय ने किया है। मानिक जी का प्रकृति के प्रति मैत्री भाव रहा है, जिससे वे लगातार संवादशील रहे हैं। उसके द्वंद्व को समझते हैं और उससे अपनी मानसिक ऊर्जा व संवेदनशीलता भी ग्रहण करते हैं। ऐसे दौर में जबकि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के बचाव की चिन्ता की जा रही है, ये रचनाएं उस मनोभूमि का निर्माण करती हैं, जहां प्रकृति का साहचर्य सुखद, विस्मयकारी और आह्लादकारी है। प्रकृति से मनुष्य के रिश्ते की पड़ताल इन कविताओं में है। कहना न होगा कि मानिक जी प्रकृति प्रेम से भी अपनी रचनात्मक खूराक प्राप्त करते हैं और ये रचनाएं उस ऋण का स्वीकार भी हैं।
इन रचनाओं में प्रकृति को उजाड़ने की साजिशों की ओर भी उन्होंने इशारा किया है। 'पहाड़ों पर आग कविता' में उन्होंने लिखा है-'सब कुछ खाक होता/दिखा/नंगे होते दिखे पहाड़/पहाड़ों पर न होंगे/पेड़ न फूल न फल/न घास घसियारे/न पशु न पक्षी/आस-पास क्यारियों में/बस खाली ज़मीन होगी/उस पर उठने लगेंगे/मकान दुकान/कारखाने/पहाड़ों पर लगी है आग/ या लगायी गयी है आग।' यह जो 'लगायी गयी है' का ज़िक्र है वही बताता है कि कवि का प्रकृति के प्रति कैसा अनुराग है तथा प्रकृति का संकट कितना गहरा है। एक ओर प्रकृति के बचाने की नारेबाजी है, दूसरी ओर मनुष्य की स्वार्थपरता प्रकृति की नैसर्गिक सुषमा को तहस- नहस करने में जुटी हुई है।
ऐसा नहीं है कि उनकी कविताओं में केवल तार्किकता है, बल्कि वे प्रकृति से गहन साहचर्य रखने वालों पर भी रीझते हैं-'वन कन्या कविता में वे लिखते हैं-'उसके पास/फुलदानी के/पुष्प नहीं/जूड़े में/पूरे वन की श्री है/उसे कृत्रिम प्रसाधनों की/ कोई ज़रूरत नहीं/अंग अंग में/ नैसर्गिंक महक है।' वन के पंछी के प्रति भी उनका अनुराग कम नहीं-'बस्तर की मैना' कविता की बानगी यूं है-'उसका बदन/रेशम की तरह/चमक रहा था/पक्षियों का अंतर्ज्ञान/नहीं बदला है/न मंद हुआ है/न बंद हुआ है/बदले हैं मनुष्य/जो उनके संकेतों को/ पढ़ नहीं पाते।' इस कविता में मनुष्य के प्रकृति से अलग-थलग पड़ जाने की टीस व्यक्त होती है।
प्रकृति की उपेक्षा और दुर्दशा से कवि दुःखी और चिन्तित है-'रेत की नदी' कविता में वे कहते हैं-'वर्षों से पड़ी हूं/अछूती/पीतवर्णी/दर्दीले मरुस्थल की/छाती पर पसरी/स्वर्ण झरी/मर्म भरी/परी-सी लेटी/निर्वसना/पीताभ रेत कणों की/ झर-झर कन्था/अपने निष्कासन के/दुख की परत कथा/सहती रही व्योम का ताप।'
प्रकृति की तमाम हलचलें उनके इस संग्रह में पूरी गरिमा के साथ उपस्थित हैं-'पका धान' कविता का एक अंश यूं है-'धरती के बेटों का/मन खुश है/अभी-अभी जो धान पका है/जीवन में जैसे मान पका है/और उमंगें नाच रही हैं/पके धान पर।' इन कविताओं में एक आंतरिक छंद है, जो भाषा को और नम करता है और उन भावों तक पहुंचने में और सुगम्यता प्रदान करता है।

Friday, 17 March 2017

एक नये सौंदर्य की सृष्टि करती कविताएं

-डॉ.अभिज्ञात
पुस्तक एक दिन अचानक
लेखक-जितेन्द्र जितांशु
प्रकाशक-सदीनामा प्रकाशन, एच-5. गवर्नमेंट क्वार्टर्स, बजबज, कोलकाता-700137
मूल्य-30 रुपये


जितेन्द्र जितांशु का दूसरा कविता संग्रह है एक दिन अचानक। पहला संग्रह कबूतर काफी अरसा पहले 1975 में आया था। तब से उनकी कविता काफी आगे बढी है और उन्होंने विचार और संवेदना के नये धरातल की लगातार तलाश की है। उनकी कविता में जहां एक ओर जूझारूपन है वहीं एक बेफिक्री और मस्ती भी है, जो एक नये तरह का सम्मोहन रचती है। शब्दों और आशय की नयी गति और नयी लय उनके नये संग्रह की विशेषता है। गंभीर बातें वे बड़ी आसानी से कह जाती हैं जिसमें कई जगह तुक बैठती तो कहीं टूटती है..लेकिन यह टूटन, यह लापरवाही एक सौंदर्य की सृष्टि करती है। ये प्यार क्या है कविता में वे लिखते हैं-
इंकार भी इकरार भी
धिक्कार भी तकरार भी
किस्से कहानी नज़्म कविता गीत
थिरकते चित्र, कितने रंग, कितने संग, कितने गीत
कट के गिरा तो पता चला धार क्या है
ये प्यार क्या है
सुखी को सोने न दे
दुखी को रोने न दे
हर एक युग में जीत
कैसा ज़िन्दगी का गीत
कितनी सभ्यताएं, बनीं बिगड़ीं दौड़ते रथ
ज़िन्दगी के आख़िरी क्षण तक खुला पथ
मोक्ष क्या है..धर्म क्या संसार क्या है
ये प्यार क्या है
सुखी को सोने न दे
दुखी को रोने न दे।
जितेन्द्र जितांशु संवादधर्मी कवि हैं। वे हर समस्या का निदान संघर्ष से नहीं बल्कि संवाद से खोजने के हिमायती रहे हैं। बिना संवाद के की गयी कोई भी कार्यवाही समस्या को जहां की तहां रखना ही साबित होगा, चाहे जिसनी पुरानी बात हो उसका समाधान संवाद से ही सम्भव है..एक दिन अचानक शीर्षक कविता में वे कहते है-
आ ही गया प्रश्न
क्या तुम भी मानते हो
क्या तुम जानते हो
कितनी ज़रूरत है सभ्यताओं के बीच संवाद की
एक दिन अचानक
कविता की धार
शब्दों की गूंज
तितली के पंख
पसीने की गंध
मिलेंगे म्यूज़ियम में
हमारे इन्तजार में।
इस संग्रह की कविता में आज के मनुष्य की इच्छा, आकांक्षा, स्वप्न और उलाहने सब कुछ हैं। कवि के लिए तो उनकी कविताएं उनके लिए उनका दर्शन और धर्म तक हैजीते रहने के प्रमुख कारणों में से एक। इन संवादधर्मी कविताओं के बीच जहां तहां अभिव्यक्ति का एक टटकापन है, जो हमें दुखद विस्मय में डाल देता है-
मौन होते जा रहे पुर्जे सृजन के
कौन सा बारूद बरसेगा गगन से
इस सृजन की सार्वभौमिकता, सरलता नि:स्वार्थ
साथ रहना है समझ के साथ।
कवि को सिर्फ साथ नहीं चाहिए बल्कि समझ के साथ साथ चाहिए।
नववर्ष की शाम कविता में जितेन्द्र जितांशु ईदगाह कहानी को नये संदर्भ में रचते हुए कहते हैं कि बच्चे हामिद को अपनी दादी के लिए अब मेले से चिमटा नहीं खरीदना है, जिनसे वह रोटी सेंकते हाथों को जलने से बचा सके बल्कि उसे अब एक जिस्ता काग़ज और कलम चाहिए, जिससे वह अपनी दादी को हर मुश्किल से बचा सके।



Wednesday, 18 March 2015

लघु नाटिका-मुक्ति

मुक्ति

लघु नाटिका

-डॉ.अभिज्ञात

पात्र-

1-महिला सामाजिक कार्यकर्ता
2-सामाजिक कार्यकर्ता का सहायक
3-शिकारी
4-महिला जज
5-पुलिस
6-फारेस्ट आफिसर


दृश्य- एक
(परदा उठता है। झील का दृश्य। सर्दी का मौसम। मध्य एशिया के साइबेरिया से अपने तमाम दोस्तों के साथ उड़कर आया एक ग्रे हंस बल्लभपुर की झील के पास बैठा है। गोली चलने की आवाज़ आती है। हंस कराह कर गिर पड़ता है। झाड़ियों के पीछे से निकलकर एक शिकारी सामने आता है। वह पक्षी को छूकर देखता है। )
शिकारी-चलो बेहोश हो रहा है। एकदम टारगेट पर दाई ओर लगी है यह विशेष गोली। इसे ले चलते हैं। जल्दी ही यह ठीक हो जायेगा फिर बेच दिया जायेगा यह विदेशी बाज़ार में। अच्छी खासी रकम मिलेगी। कितने सुन्दर होते हैं कम्बख्त ये मध्य एशिया के साइबेरियन ग्रे हंस। अपने तमाम दोस्तों के साथ यह हर सर्दी में उड़कर आते हैं। यहां की झीलों में डेरा डालते हैं। यहां अंडे देते हैं। यहीं पर उन्हें सेते हैं। इनके चूजे धीरे-धीरे उड़ना सीखते हैं। और जब सर्दियां ख़त्म हो जाती है वे अपने परिवार और दोस्तों के साथ उड़ जाते हैं। अपने मूल स्थान की ओर।
(शिकारी हंस को गोद में उठाता है और उसे लेकर आगे बढ़ता है कि एक महिला वहां आ पहुंचती है।)
महिला-खबरदार। वहीं रुक जाओ। भागे तो मारे जाओगे। हमारे साथी चारों ओर खड़े हैं। हमारी एनजीओ को बहुत दिन से खबर थी कि तुम लोग इन विदेशी मेहमानों को बेहोशी की गोलियां मारकर अपने कब्जे में ले लेते हो और उनकी तस्करी दूसरे देशों में करते हो। आज रंगे हाथ पकड़े गये। अरे, रामप्रसाद आओ इधर आओ। पकड़ो इसे और ले चलते हैं थाने। और इस हंस को वन विभाग के अस्पताल।
 (एक आदमी आता है और शिकारी की कालर पकड़ कर ले जाता है और महिला हंस को अपनी गोद में लेकर जाती है।)

दृश्य- दो
(अदालत का दृश्य। एक महिला जज कुर्सी पर बैठी है। कटघरे में एनजीओ की महिला कायकर्ता खड़ी है।)
जज-तो शांति देवी। आप बताइए कि उस दिन क्या हुआ था।
कार्यकर्ता-मैं झील के पास से गुज़र रही है थी। मैंने गोली की आवाज़ सुनी। मैं घटनास्थल पर पहुंची तो मैंने पाया कि यह ग्रे हंस बेहोश पड़ा है जिसे एक व्यक्ति उठाकर ले जाने की कोशिश कर रहा है। मुझे लगा कि यह शिकारी है और गोली उसी ने मारी है इसलिए मैंने उसे थाने में दे दिया। और उस पर मुकदमा दायर कर दिया।
जज-तो क्या आप दावे के साथ नहीं कह सकती हैं कि हंस के पास जो व्यक्ति था गोली उसी ने मारी थी।
कार्यकर्ता-जी हां। मुझे बाद में अपनी गलती का एहसास हुआ कि मैंने एक निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी है। इसलिए मैं यह मुकदमा वापस लेती हूं और अपनी गलती है लिए अदालत से माफी मांगती हूं।
जज-ध्यान रखे अइन्दा ऐसी गलती न हो। वरना आपको सज़ा हो सकती है।
कार्यकर्ता-जी अब से ऐसा नहीं होगा। आपका शुक्रिया।
जज-वन विभाग को आदेश दिया जाता है कि चूंकि ग्रे हंस अब स्वस्थ हो चुका है इसलिए उसे आज शाम रिहा कर दिया जाये। अदालत की कार्यवाई समाप्त होती है।

दृश्य- तीन
(डाइनिंग टेबल के पास फारेस्ट आफिसर, थानेदार, शिकारी एवं एनजीओ महिला कार्यकर्ता खड़े हैं।)
शिकारी-मैडम आपने मुझे बचाने का जो वादा कल किया था आपने उसे पूरा किया। वरना मेरी जेल तो पक्की थी। आपके लिए जो तोहफा मैंने आपके घर भिजवाया था आशा है पसंद आया होगा।
महिला कार्यकर्ता-आप समझदार हैं।
थानेदार-भई हमें भी तो धन्यवाद तो। मामले को रफा-दफा करने में हमारी भी भूमिका कम नहीं।
शिकारी-यह भी कोई कहने की बात है। और फारेस्ट आफिसर साहब आप का गिफ्ट भी ठीक था न।
फारेस्ट आफिसर-हां जी हां। आपकी गिफ्ट लाजबाब है।
शिकारी-तो हंस साहब को आपने मुक्त कर दिया न।
फारेस्ट आफिसर-एकदम आजाद। ये रहे हंस साहब। हमारे खानसामा ने इन्हें हमारे लिये खास तौर पर बनाया है एकदम लाजबाब। आओ दोस्तो खाओ और हंस की आत्मा की शांति की दुआ मांगो। उन्हें मिल गयी है मुक्ति।
सब एक साथ-मुक्ति....। (सभी मिलकर जोर जोर से हंसते हैं-) मुक्ति हा हा हा हा मुक्ति...
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Tuesday, 24 February 2015

पत्रकारिता को नयी भाषा व संवेदना के नये धरातल दिये प्रभाष जी ने

(कम्प्यूटर खंगाने के दौरान यह पुराना लेख मिल गया)

-अभिज्ञात

जिन कुछेक लोगों ने हिन्दी पत्रकारिता की विश्लेषणात्मक क्षमता और उसकी रीति-नीति का निरन्तर विस्तार, आविष्कार और परिमार्जन किया उनमें प्रभाष जोशी का नाम प्रमुखता से लिया जायेगा। धार और संवेदना की जैसी जुगलबंदी उनकी भाषा में दिखायी देती है वह हिन्दी पत्रकारिता में विरल होती जा रही है वरना पत्रकारिता की भाषा का इकहरापन चिन्ताजनक है। भाषा का छंद नारों से नहीं नीयत से आता है यह प्रभाष जी जैसों के लेखों से ही जाना जा सकता है। उनके श्कागद कारेश् शृंखला के आलेख न तो कभी पुराने पड़ने हैं और ना ही वे कभी अप्रासंगिक होंगे क्योंकि उनमें देश दुनिया का जनमानस लगातार अपनी टोह में लगा हुआ दिखायी देता है। हमारी घनीभूत चिन्ताओं की शक्ल क्या है ही उनमें नहीं दिखायी देती बल्कि यह भी कि उसके निहितार्थ क्या हैं या भी समझाने का महती प्रयत्न दिखायी देता है। मामूली और आम बातें, घटनाएं और लोग उनके आलेखों में आकर जो रूपाकार ग्रहण करते थे वह उन्हें एक सार्थक बहस का बेहद जरूरी हिस्सा बना देता था। मैं अक्सर समय के अभाव में उनका आलेख प्रकाशन के दिन नहीं भी पढ़ पाता था तो कई दिनों तक पुराने अखबार को रखे रहता था कि उनका आलेख पढ़ लूं तो फिर अखबार को रद्दी समूह के कागजों में डालूं। अक्सर उनके आलेख उन मुद्दों पर भी रहते तो ज्वलंत प्रश्नों से मुठभेड़ लेते थे उन आलेखों में उनकी खरी नीयत बोलती थी और साफगोई उसमें नया पैनापन देती थी। मुझे क्रिकेट में तो कभी दिलचस्पी नहीं रही फिर भी कभी कभार क्रिकेट पर लिखे लेखों को भी पढ़ने की कोशिश करता। क्रिकेट पर तो हिन्दी में शायद उनके जैसा दूसरा टिप्पणीकार न होगा।
मैंने कभी सोचा न था कि पत्रकार बनूंगा फिर भी अनायास ही पत्रकारिता से शौकिया जुड़ गया जनसत्ता कोलकाता से और स्ट्रिंगर बन गया.। उन दिनों मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय से केदारनाथ सिंह पर पीएचडी के लिए शोध कर रहा था और अपने नानाजी के ठेकेदारी के कामकाज में हाथ बंटाता था। पेशे के तौर पर पारिवारिक स्तर पर तय हो चुका था कि नौकरी नहीं कारोबार करना है। उन्हीं दिनों दो एक बार प्रभाष जी को कुछ करीब से देखने का अवसर मिला। ऐसी दो एक सभाओं की कवरेज करने भी गया जिनमें प्रभाष जी वक्ता थे। उनमें एक सभा वह भी है जिसमें पं.विष्णुकान्त शास्त्री कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। उस समय वे संभवतः भाजपा के लोकसभा सांसद भी थे। यह तो नहीं याद है कि सभा का मुख्य विषय क्या है किन्तु प्रभाष जी एनरान पर बोले थे और तत्कालीन भाजपा नीत सरकार की एनरान के मुद्दे पर भूमिका की जम कर मलामत की थी। अध्यक्षीय भाषण में विष्णुकान्त जी ने उनकी बातों का जवाब दिया था और उनके तर्कों को दरकिनार कर दिया था। ऐसा लगा था कि प्रभाष जी के तर्क कुछ कमजोर पड़ गये हैं। विष्णुकान्त जी अध्यक्षीय भाषण देकर सभा की समाप्ति की घोषणा भी कर दी। लेकिन प्रभाष जी विष्णुकान्त जी के तर्कों का फिर से जवाब देने से चूकना नहीं चाहते थे। वे लपक कर फिर माइक के पास पहुंच गये और कहा कि मुझे यह अनुशासन पता है कि अध्यक्षीय भाषण के बाद फिर वक्तव्य नहीं दिया जाता है लेकिन इस अनुशासन से बढ़कर भी कुछ बातें हैं जिसके कारण मैं फिर बोलना चाहूंगा और विष्णुकान्त जी या अन्य किसी और की सहमति की प्रतीक्षा किये बिना ही उन्होंने बची खुची कसर निकाल ली और फिर मंच से उतर कर तेजी से अपनी कार की ओर बढ़े। इधर, कई भाजपा कार्यकर्ताओं को प्रभाष जी का वक्तव्य नागवार लगा और वे उन्हें घेरने का प्रयास करने लगे। वे जब तक कार में बैठते चारों ओर से भाजपा कार्यकर्ताओं ने घेर लिया था और उन्हें अपशब्द भी कहने पर उतारू थे वह तो भी भीड़ का रुख देखकर विष्णुकान्त जी वहां पहुंचे और किसी प्रकार यह कहकर लोगों को गाड़ी के आगे से हटाया कि प्रभाष जी पत्रकार हैं और पत्रकारों को कुछ भी कहने की आजादी होती है, उन्हें कहने दीजिए। आप लोग संयम बरते।
दूसरी एक घटना मुझे याद है जो प्रभाष जी के अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति उनके रवैये को स्पष्ट करती है। वह घटना है एक साहित्यक समारोह की है। उसमें प्रख्यात ललित निबन्धकार डॉ.कृष्ण बिहारी मिश्र प्रधान वक्ता थे। मंच से उन्होंने जनसत्ता की भाषा नीति की जमकर आलोचना की थी और नाम लेकर कहा था कि प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार अपने आपको कबीर बनते हैं और भाषा से खिलवाड़ कर रहे हैं। पता नहीं पत्रकार किस हेकड़ी में रहते हैं। इस वक्तव्य में कुछेक हर्फ इधर उधर हो सकते हैं मगर लब्बोलुबाब यही था। उल्लेखनीय यह है कि वहां मंच पर प्रभाष जी नहीं थे वरना वे उसका जवाब स्वयं देते। मेरी ड्यटी इस कार्यक्रम की रिपोर्टिंग की लगी थी। मैंने जो रिपोर्ट लिखी थी उसमें मैंने इंट्रो ही प्रभाष जी के भाषा सम्बंधी रुझान पर कृष्णबिहारी जी की आपत्ति को बनाया था। मामला संवेदनशील होने के कारण डेस्क ने रिपोर्ट की कापी कोलकाता के स्थानीय सम्पादक श्री श्याम आचार्य तक पहुंचायी और उन्होंने उसे दिल्ली फैक्स किया ताकि उसके प्रकाशन के सम्बंध में प्रभाष जी की राय ली जा सके। और राय हां में थी। वह रिपोर्ट उसी प्रकार प्रकाशित हुई। सचमुच प्रभाष जी ने पत्रकारिता की भाषा को जनभाषा के करीब लाने का न सिर्फ प्रयास किया बल्कि भाषा की शास्त्रीयता की दुहाई देने वालों से इस मोर्चे पर लोहा भी लिया जिसकी यह घटना उदाहरण है।
प्रभाष जी के मालवा अंचल और कुमार गंधर्व पर कई लेख जब तक पढ़ने का मौका मिलता रहा था। जब मैं अमर उजाला, जालंधर से वेबदुनिया डाट काम में कार्यभार संभलाने के लिए इंदौर गया तो इंदौर से पहले ही वह स्टेशन देवास मिला जिसके बारे में मैं पर्याप्त पढ़ चुका था और इंदौर भी मुझे इसलिए भी पहले से परिचित और मोहक लगा। प्रभाष जी के आलेख में वह शक्ति है जो अर्थ ही नहीं पूरी संवेदना को पाठक तक पहुंचाती है। एक ही संस्थान होने के कारण कुछेक बार मुझे वेबदुनिया कार्यालय से नयी दुनिया कार्यालय जाने का मौका मिला था तो वहां भी प्रभाष जी की चर्चा सुनी थी जहां से उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। वेबदुनिया कार्यालय में भी अक्सर राजेन्द्र माथुर, शरद जोशी आदि के साथ चर्चा होती थी, जिनसे नई दुनिया का प्रगाढ़ रिश्ता था। इन चर्चाओं ने मुझे उनका फैन बना दिया था। पत्रकारिता के तुरतफुरत के भाषिक और प्रतिक्रियाशील व्यवहार को नयी ऊंचाई और दिशा देने में प्रभाष जी के योगदान को मैं नमन करता हूं।

Thursday, 26 June 2014

हमारे जीवन में उत्सव का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है

 

प्रख्यात कथाकार, उपन्यासकार एवं यात्रा वृत्तान्तकार डॉ.कुसुम खेमानी से 

डॉ.अभिज्ञात की बातचीत

प्रश्न-साहित्य सृजन की शुरुआत कैसे हुई? प्रेरणा कैसे मिली? उस दौर में किन लेखकों को जानती थीं या किसका लिखा पढ़ती थीं?
उत्तर-इस प्रश्न का उत्तर मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है और इसकी सीधी-सी वजह यह है कि मैंने न कभी यह जाना, न कभी माना कि मैं लेखिका हूँ या अच्छा लिख सकती हूँ। हाँ, किताबें पढऩे का बेहद शौक बचपन से ही रहा। यहाँ तक कि वे रिसाले जो एक आठ वर्षीय लड़की के लिए भारी माने जाते, उन्हें भी मैं चुपके से ताक से उतार कर पढ़ लिया करती थी। लिखने की शुरुआत की उम्र इतनी कम थी कि हँसी आ सकती है। मैं जब तीसरी-चौथी कक्षा में पढ़ रही थी, उस व$क्त एक दैनिक अखबार में बहस चली थी विषय था 'प्रणय या परिणय', मैं उसमें अंशु जैन के छद्म नाम से बराबर लिखती थी। एक दिन घरवालों को इसका पता चल गया। उन्होंने खूब मजाक उड़ाया, उसी दिन से लिखना ठप्प हो गया।
वैसे मैं बाद में भी कुछ ना कुछ लिखती रहती थी। दिनमान, धर्मयुग, कादम्बिनी में एकाधिक आलेख छपे भी थे, लेकिन लेखन का क्रम टूटने का कोई $खास दु:ख नहीं है, क्योंकि मैं नियति को मानती हूँ और मेरा विश्वास है कि मैं अब जो लिखूँगी वह पहले के लिखे से बेहतर होगा। मेरे लिखे के छपने की शुरुआत का श्रेय पूर्णत: श्री रवीन्द्र कालिया को है, जिन्होंने मुझे लिखने की हिम्मत दी और मुझसे लगातार वागर्थ में लिखवाया।
प्रश्न-किनका लिखा पढ़ा है?
उत्तर-पूछिए किसे नहीं पढ़ा? छोटी उम्र से ही किताबों का शौक होने के कारण मारवाड़ी घर के सारे पैसे किताबों में ही लगते थे। किताबें पढऩे का यह हाल था कि एम.ए का इम्तहान केवल बाहरी किताबों के बल पर फस्र्ट क्लास में पास कर लिया। सोलह साल की उम्र में ही कई लेखकों को करीब से देखा। ससुराल में बच्चन, नीरज, बैरागी आदि का का$फी आना-जाना था और सत्रह-अठारह तक तो मैं सीताराम जी सेकसरिया के प्रभाव क्षेत्र में आ गयी थी इसीलिए अधिकतर समाज सुधारकों, राजनीतिज्ञों और लेखकों से मिलना-जुलना होता ही रहता था। मुझे लेखक ही प्रिय हैं
और मैं उन सभी की श्रद्धा करती हूँ। बीस की उम्र के बाद मेरे प्रिय रचनाकार रहे अज्ञेय, कुंवरनारायण, भवानी प्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती, कृष्णा सोबती, धूमिल, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,  केदारनाथ ङ्क्षसंह, मनोहर श्याम जोशी, इस्मत चुगतई, कुरतुल-एन-हैदर, राही मासूम रजा और विनोद कुमार शुक्ल ढेरों हैं पर जिनके नाम अभी याद नहीं आ रहे हैं।
प्रश्न-साहित्य में दृष्टि, विचार और अनुभव की परिपक्वता हासिल करने के बाद प्रवेश करने वाले मनोहर श्याम जोशी आदि के साथ आपका नाम लिया जा सकता है? विलम्ब से इस क्षेत्र में प्रवेश के क्या कारण रहे? इससे क्या खोया और क्या पाया?
उत्तर-आपका यह प्रश्न बहुत ही भारी है। हकीकत यह है कि शायद मुझमें  अब भी काफी बचपना है। और हे देवता! कहाँ प्रात: स्मरणीय मनोहर श्याम जोशी और कहाँ मैं? भाई, उनकी तो कलम क्या थी संगतराश की नोकीली छेनी थी, जो हर शब्द को छील-तराश कर चमका देती थी और मैं तो अभी लिखना सीख रही हूँ। अपने लेखन से मैंने क्या खोया है यह तो पता नहीं, पर अभी जो पहचान बनी है, वह बहुत ही प्यारी है।
प्रश्न-परवर्ती काल में क्या लिखने की वजह बदली..लेखन के उद्देश्य में क्या कोई बदलाव आया?
उत्तर-पहले मैं जो मन में आया वह लिख देती थी, पर अब मन करता है, कुछ ऐसा लिखूँ जो जीवन को अर्थ दे। मेरी कहानियों में भी यह अन्तध्र्वनि छिपी रहती है और मेरे पात्र भी अन्तत: बुराई को नकार कर अच्छाई को ही अपनाते हुए दिखते हैं।
प्रश्न-आपके लेखन की ऊर्जा का उत्स क्या है? सोद्देश्य लेखन और स्वांत: सुखाय में से आपका पथ कौन सा है?
उत्तर-मेरे पाठकों का प्रेम ही मेरी ऊर्जा का उत्स और अन्तिम सत्य है। जानबूझ कर कैसे लिखा जाता है.. यह मैं नहीं जानती। लेकिन मन में कोई भव आने पर या कुछ अच्छी-बुरी घटना देख कर एक मानसिक उद्वेग होता है, जिसे कागज पर उतार देने के बाद हल्कापन महसूस करती हूँ। ऐसे लिखे भाव हर बार ही कोई आकार ले लें यह $जरूरी नहीं लेकिन उन्हीं में से कई बार किसी कहानी या किसी आलेख की संरचना हो जाती है।
प्रश्न-साहित्य में प्रतिबद्धता शब्द प्रचलित और प्रतिष्ठित है.. खास तौर पर वामपंथी रुझान वाले लेखकों में, आप अपने लिए इससे क्या अर्थग्रहण करती हैं?
उत्तर-मेरी प्रतिबद्धता सिर्फ एक भाव के प्रति है  और वह है : प्रेम। मैं अपने जीवन का मूल, मध्य और अन्त सब प्रेममय रखना चाहती हूँ। चँूकि मेरे पात्र अधिकतर 'सच्चे' हैं इसलिए मेरी प्रतिबद्धता और सम्मान बेमानी है। मुझे तो जैसा वे कहते हैं, करना पड़ता है! अत: 'इज्म' और 'वाद' स्वत: ही मेरे लेखन का हिस्सा बन जाते हैं।
प्रश्न-आपके साहित्य में पूँजी, सम्पन्नता और समृद्धि का एक मानवीय चेहरा दिखायी देता है, जो हिन्दी सहित्य में प्रचलित ढर्रे से अलग ही नहीं, बल्कि विपरीत है। जो वर्ग शोषक के तौर पर साहित्य में स्थापित था आपने उसकी उदारता, करुणा और परोपकार पर फोकस किया है.. इसमें आपको झिझक नहीं हुई.. आलोचकों का कोई खौफ महसूस नहीं किया.. रिजेक्ट कर दिये जाने की चिन्ता पास नहीं फटकी?
उत्तर-दरअस्ल यह मेरे पात्रों का काम है, मेरा नहीं। और चूँकि मेरे सारे पात्र मेरे अनुभव से उपजते हैं इसलिए वे उस मिट्टी और खाद का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उनकी अ$ज्म में पिन्हा है। मेरे हितैषियों ने मुझे सुझाया भी;  नारी विमर्श पर, दलितों पर, फलां पर, ढिमका पर, लिखो.. पर मैं अक्षम थी। जो सत्य मैंने भोगा नहीं उसे कैसे लिखूँ? मेरा मानना है कि मनुष्य हर जगह मनुष्य है! न तो आभिजात्य वर्ग के ही सारे लोग बुरे होते हैं और ना ही अन्य वर्गों के सब भले! मैं समझ नहीं पाती कि मुझे सच्चाई से क्यों डरना चाहिए? फिर भी यदि कोई व्यक्ति विशेष या वर्ग, मुझसे नाराज है तो मा$फी चाहती हूँ पर मैं अवश हूँ।
प्रश्न-साहित्य में आपके रोल मॉडल कौन हैं.. किसका लिखा आपको अधिक पसंद है.. किसके जैसा लिखना चाहती हैं.. कौन -सी कृतियाँ पसन्द हैं.. देशी-विदेशी.. हिन्दी.. अन्य किसी भाषा का..।
उत्तर-कई हैं, फिर भी कृष्णा सोबती, अज्ञेय, कुंवर नारायण, इस्मत चुगताई, भीष्मू साहनी, मंटो, राही मासूम रजा, मनोहर श्याम जोशी, भवानी प्रसाद मिश्र आदि मुझे बेहद पसन्द हैं। मैं कई नये लेखकों को भी पढ़ती रहती हूँ और मुझे उनके लेखन का ताजापन और जमीनी हकीकत से जड़ाव लुभाता है। अमिताभ घोष, विक्रम सेठ, आर.के.नारायण, वी.एस.नायपॉल, अरुन्धति रॉय, आशापूर्णा देवी, जीवनानंद, सुनील गंगोपाध्याय, विमल मित्र, टॉलस्टाय, शेक्सपीयर, चेखव, बॉलजॉक, गैब्रियल मार्खेज आदि... पर क्या चाहने मात्र से मैं इनमें से किसी के भी जैसा लिख सकती हूँ? इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने जैसा ही लिखूँ..चाहे वह एकदम साधारण ही हो।
प्रश्न-विचार और संवेदना, शिल्प और कथ्य में से किसे अधिक तरजीह देती है..?
उत्तर-वैसे तो ये चारों ही किसी भी रचना के स्तम्भ हैं पर मैं संवेदना और कथ्य को ज्यादा अहमियत देना चाहती हूँ। कितना दे पाती हूँ! यह तो पाठक ही जानें...।
प्रश्न-महिला लेखक के प्रति आपका क्या नजरिया है, आप अपने को जोड़कर देखतीं हैं या उसको कोई महत्त्व नहीं देतीं..
उत्तर-क्या आप अभी भी महिला और पुरुष लेखक की गलियों में भटक रहे हैं? मुझे तो न पुरुष से चिढ़ है न महिला से। हाँ, मेरे चाहनेवालों का मानना है कि मैं स्त्रियों की विशेष पक्षधर हूँ। दरअस्ल मैं 'अद्र्धनारीश्वर' की भक्त हूँ। मुझे पुरुष में प्रेम और ममता और स्त्री में कर्मठता और जुझारूपन प्रिय है। मैं इन्हेें ही अपने जीवन का दर्शन भी मानती हूँ।
प्रश्न-आपके उपन्यास और कहानियों में नारी पात्रों को नयी गरिमा मिली है और उनकी समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ रेखांकित किया गया है.. इसके सम्बन्ध में आप अलग से कुछ कहना चाहेंगी..
उत्तर-यदि ऐसा है तो बहुत ही अच्छा हुआ है। ह$जारों सालों से अग्नि में जलती नारी को कभी तो.. कोई तो.. ठंडे जल की गंगा से सराबोर करता! मैं नाची$ज तो ऐसा क्या कर पायी होऊँगी.. पर मुझे लग रहा है कि इन दिनों स्त्रियों को समझने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि इन दिनों स्त्री ने भी स्वयं को सिद्ध किया है, पर बहुतेरे पुरुषों ने भी उन्हें मान-सम्मान, गरिमा और बराबरी का दर्जा दिया है। स्वाभाविक है यह बदलाव साहित्य में भी प्रतिबिम्बित होगा ही। अलग से न कहकर मैं सि$र्फ यह दोहराना चाहूँगी कि जैसा महसूस करती हूँ वैसा लिखती हूँ। यह स्वीकार करते हुए भी कि मुझे स्त्री सर्वदा लुटी-पिटी लगती है। मेरी दो-चार कहानियों की स्त्रियाँ बहुत ही भौतिकवादी, कर्कश और और उच्छृंखल भी हैं.. पर यह तका$जा उनके चरित्र का था, इसलिए उन्हें उसी तरह व्यक्त करना पड़ा।
प्रश्न-आपने कई देशों की यात्राएँ की हैं जिन पर आपकी पुस्तक भी आयी है, किन्तु दुनिया की तमाम अच्छी चीजों की चर्चा के दौरान आप अपने देश की चर्चा करने से नहीं रोक पाती हैं.. यह कई बार कसक के रूप में व्यक्त हुआ है... यह तटस्थ लेखन तो हुआ नहीं.. तुलना के दौरान आपने अपने देश के मूल्यों, प्राकृतिक सौन्दर्य और कलाकृतियों को अधिक महिमामंडित किया है..
उत्तर-आपको यह भ्रांति हुई है या हो सकता है यह मेरे लेखन की कमजोरी हो! प्रथमत:, तो मेरे यात्रा वृत्तान्त की पुस्तक का नाम है 'कहानियाँ सुनाती यात्राएँ' है अर्थात् वे देश जैसे मेरे मन में उगे। इसलिए $जरूरी तो नहीं है कि मैं एकदम रूखेपन से वहाँ के हवा-पानी और बारिश के आँकड़ पेश करती रहती। रिपोर्ताज और वृत्तान्त में कुछ तो अन्तर होना ही चाहिए! जहाँ तक मेरा ख्याल है मैंने अपने वर्णनों में कोई बेईमानी नहीं की है। यदि कश्मीर में कोई विदेशी सैलानी मुझसे यह कहे कि स्विट्जरलैंड कश्मीर के पासंग भी नहीं है... तो मेरे हृदय में कसक नहीं उठेगी? मैं यदि रोम की 'पियेता' के साथ रो सकती हूँ , तो इस बात पर भी दु:खी होने का ह$क है मेरा कि दूर क्यों कलकत्ते के ही इंडियन म्यूजियम में विशाल और विराट मूर्तियाँ यों ही पड़ी हैं। यदि हम मनुष्य हैं, तो राग-विराग, दु:ख-कष्ट से मुक्त कैसे हो सकते हैं? क्या हमें इस बात पर शर्म नहीं आनी चाहिए कि हम हमारे प्राकृतिक संसाधनों और हजारों वर्षों की ऐतिहासिक धरोहरों से बेखबर रहते हैं? यह तो खैर मनाइये कि मैं कोई पुरातत्त्विद् या इतिहासकार नहीं, वर्ना रात से सुबह हो जाती और हमारे देश की एक मूर्ति की भी पूरी व्याख्या पूरी तरह नहीं कर पाती! मेरी कोशिश रही है कि मैं अधिक से अधिक सच लिख पाऊँ वर्ना स्विट्जरलैंड, डर्बन, वैंकयूवर, रोम आदि पर वृत्तान्त पाठकों को इतने प्रिय कैसे हुए?
प्रश्न-आपने कहानी, उपन्यास एवं यात्रा वृत्तान्त इन तीन विधाओं में लिखा है.. आपका मन किसमें रमता है..? अपनी मूल रचनाविधा किसे मानती हैं?
उत्तर-हालाँकि उपन्यास की बजाय कहानी लिखना अधिक कठिन है, क्योंकि कहानी का $फलक छोटा होता है, पर पता नहीं क्यों इन दिनों मेरा अधिक रुझान कहानी की ओर हो रहा है। परिणामस्वरूप हंस, नया ज्ञानोदय, कथादेश, पाखी, परिकथा और वागर्थ में मेरी कहानियाँ छप रही हैं। चित्रा जीजी (मुद्गल) के आदेश से एक उपन्यास राजस्थानी पृष्ठभूमि पर लिखना शुरू किया है, पर कहानियों के पात्र भूत की तरह मुझसे चिमटे रहते हैं। अब जब उनसे निजात मिलेगी तभी कहानी के अलावा कुछ और लिख पाऊँगी।
प्रश्न-लेखन की भावी योजनाएँ क्या हैं?
उत्तर-जिसने आज तक सारा काम देर से और बिना योजना के किया है, वह भला अब क्या सोचेगा? क्या योजना बनायेगा? सब कुछ मन के हवाले हैं, वह जिधर बहेगा उसके साथ बहना होगा।
प्रश्न-आपकी रचनाशीलता में परिपक्वता के साथ-साथ एक युवता भी है.. उसे बचाये रखने के लिए आपने क्या यत्न किये हैं?
उत्तर-क्या कोई चाह कर परिपक्व या नासमझ बन सकता है? क्या कोई जान लगाकर भी युवता को बचा सकता है? ययाति को भी अपने बेटे की जवानी उधार माँगनी पड़ी थी क्योंकि ध्रुव सत्य है कि जवानी कभी लौटती नहीं! फिर मैं क्या कोई आकाश से उतरा अजूबा हूँ जो एक मुट्ठी में जवानी और एक में समय को बन्द रख सकती हूँ? मेरा ख्याल है मेरी नासमझी भरी भरी बातें ही आपको मेरी युवता का परिचायक लगी होंगी। वैसे न तो मैं लाओत्से हूँ! और ना ही बुद्ध।
प्रश्न-इस समय कौन-सी चुनौतियाँ हैं जिनसे इस समय के रचनाकार को टकराना चाहिए.. जिससे टकराये बिना रचनाशीलता के मूलधर्म से पलायन कहा जाएगा?
उत्तर-मेरी समझ से आज के दिन की सबसे बड़ी विडम्बना है-लालच। विज्ञान ने अपने अनेकानेक भौतिक प्रकारों से सामग्रियों का ऐसा अम्बार लगा दिया है कि मनुष्य उस आडम्बर में कहीं खो गया है। सुबह से शाम सिर्फ दौडना! उन्हें पाना! भोगना! और नष्ट करना! बस उसने अपनी जीवन-पद्धति यही बना ली है। उसकी भोगसामग्री की सूची दिनोंदिन लम्बी होती जा रही है और सब कुछ भोगते हुए भी उसे कहीं भी रस नहीं मिलता। हमारे जीवन से 'आस्वाद' शब्द मिट गया है। अपनी लम्बी फेहरिश्त पर 'टिक' लगाता हुआ वह अन्त में थक कर खत्म हो जाता है।
यह गहन विषय है इस पर मैं तो क्या $खाक लिख पाऊँगी पर मेरी हार्दिक इच्छा है कि बढि़या रचनाकारों को इस अदृश्य दौड़ से मानवमात्र को बचाना चाहिए और अपने लेखन से उनकी तन्द्रा भंग करनी चाहिए। सात्विक जीवन के खूबसूरत पहलुओं का लय भरा वर्णन कर, उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे अपने पाठकों को समझा पायें कि 'देखो! देने में कितना आनन्द है।'
प्रश्न-प्रेमचन्द ने साहित्य को समाज के आगे चलने वाली मशाल कहा था.. आज साहित्य के लिए लोगों को जीवन में कितनी जगह बची है.. साहित्यकार हाशिए पर क्यों हैं?
उत्तर-साहित्य की तो छोडि़ये! पर जरा यह तो बताइये आज के लोगों को कौन सी ची$ज में आनन्द आता है? आज हमारे जीवन में उत्सव का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है और अब ऐसे उखड़े-पुखड़े समय में किसे फुर्सत है कि वह यह देखे कि कौन हाशिए पर है, कौन नहीं? मुझे नहीं पता आप हाशिये का इस्तेमाल किस सन्दर्भ में कर रहे हैं, पर शायद थोड़ा बहुत यह पता है कि हर दूसरा आदमी, पहले को धकिया कर हाशिये पर डालना चाहता है। अब ऐसे घटाटोप में तो वे ही नक्षत्र की तरह चमक कर ऊपर उठ पाएँगे, जो अपना सर्वस्व उलीच कर अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ेंगे।
प्रश्न-अंग्रेजी के लेखक साहित्य से पर्याप्त कमा रहे हैं और वे लगभग फुलटाइमर हैं, जबकि हिन्दी का लेखक साहित्य के बल पर अपना परिवार नहीं चला सकता.. उसके क्या कारण हैं?
उत्तर-क्या अंगे्रजी के सारे लेखक मजे में हैं या सिर्फ वे 'बेस्ट सेलर! जो कूद-फांद कर किस तरह सुर्खियों में आ गये हैं। मेरे हिसाब से भारत में भी बहुतेरे प्रकाशन संस्थान हैं, जो खूब कमा रहे हैं, तो फिर कमी कहाँ है! हमें  इसे खोजना चाहिए। आ$िखर वह कड़ी कौन सी है? जो बड़े-बड़े लेखकों तक को उनका प्राप्य नहीं देती?
प्रश्न-भारतीय भाषा परिषद की महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी होने के कारण देश भर के तमाम लेखकों के सम्पर्क में आप बराबर रही हैं, किनके व्यक्तित्व से आप प्रभावित हुईं। किस-किस ने आपके रचनात्मक व्यक्तित्व को बनने में मदद की। किसने आपके जीवन की दशा और दिशा को निर्देशित किया?
उत्तर-बड़े लोगों से मिलना-जुलना एक बात है और उनसे गढ़ा जाना कुछ और। मैंने ऐसा कौन सा तीर मार लिया है, जो मुझे कोई द्रोणाचार्य मिल जाते? जहाँ तक व्यक्तियों से प्रभावित होने का सवाल है मेरे लिए विष्णुकांत जी शास्त्री, दद्दा (भवानी प्रसाद मिश्र), अज्ञेय जी और कृष्णा सोबती बेजोड़ हैं। वैसे मेरा मैं दावा है कि मैं आज तक किसी बुरे आदमी से नहीं मिली। प्रत्येक लेखक की अपनी बानगी, अपनी मिठास, अपना सादापन और अपना वैशिष्ट्य होता है, जो मुझे प्रभावित ही नहीं सम्मोहित कर लेता है।
प्रश्न-साहित्य से समाज में क्या और कितना बदलाव लाया जा सकता है?
उत्तर-मेरा मानना है कि साहित्य ही वह औजार है जो समाज को बदल सकता है। मुझे बचपन से आजतक अपने पिताजी (97 वर्ष) के सुनाये हुए अनेक प्रेरक प्रसंग याद आते हैं जिसने मेरे जीवन में जो भी अच्छा है, उसे रचा है। वे दर्शन की बारीक सूक्तियों को उर्दू, संस्कृत, हिन्दी, हरियाणवी, ब्रज आदि अनेकानेक भाषाओं के दोहे, साखी, शेर, सोरठा में यों कह देते हैं कि हम कुछ भी करने से पहले रुक कर उसके सही या गलत पर विचार करने लगते हैं। इसका एक छोटा सा उदाहरण है कि 'प्रत्येक तानाशाह सबसे पहले देश के साहित्यकारों को कुचलता है, क्योंकि वह जानता है कि साहित्य के पलटवार को वह नहीं झेल पाएगा।'
प्रश्न-साहित्य के अलावा आपकी दिलचस्पी के क्षेत्र क्या हैं और उनसे आप किस प्रकार जुड़ी हैं?
उत्तर-मैंने अपने समय का एक हिस्सा उन संस्थाओं को दे रखा है जिन्हें मेरी आवश्यकता है। मैं एक लम्बे अर्से तक मदर टेरेसा के कार्यों से भी जुड़ी रही। एक समय ऐसा था जब मैं सुबह दस बजे से शाम तक विभिन्न संस्थाओं में का ही काम करती रहती थी.. पर अब मैं शारीरिक रूप से, मानसिक और आर्थिक रूप से तो कई संस्थाओं का काम करती हूँ, पर उन चल निकली संस्थाओं में अनावश्यक ही अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराती। एक लाइन में कहा जा सकता है कि मेरी दिलचस्पी झाँकावाले, झलनी वाले, खोंचेवाले, मर्सीउीज सवार काले चोगे में, अपढ़ वृद्धा, बच्चों में सबसे अधिक है। मैं राह चलते सबसे मुस्कुराकर बोलती-बतियाती रहती हूँ! और शायद मैं उनकी मुस्कुराहटें लेकर अपने आनन्द में इतना इजाफा कर लेती हूँ कि सदा मुस्कुराती रहती हूँ।

Saturday, 24 May 2014

अब चुनौती मजबूत विपक्ष की


-डॉ.अभिज्ञात
लोकतंत्र के असली दुर्दिन तब शुरू नहींं होते जब सरकार कमजोर होती है बल्कि असली दुर्दिन वे होते हैं जब वह सशक्त होती है। सरकार की निरंकुशता का लगातार खतरा बना रहता है। हालिया लोकसभा चुनावों में जनता ने भाजपा को भरपूर शक्तियां प्रदान कर दी हैं इसलिए चुनौतियों की विकरालता भी बढ़ी है। यह चुनौतियां क्षीण विपक्ष के कारण पैदा हुई हैं। भाजपा की 282 सीटों के बरअक्स दूसरे नम्बर पर रही कांग्रेस को महज 44 सीटें ही जीत पायीं। तीसरे स्थान पर जयललिता की पार्टी अन्नाद्रमुक रही जिसे 37 सीटें मिलीं मिली हैं। चौथे स्थान पर  34 सीटों वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस है। विपक्ष का दारोमदार इन्हीं लोगों पर है। आेडिशा के बीजू जनता दल आठ सीटें जीतकर कुल 20 सीटों के साथ पांचवें स्थान पर हैं।
हमारे यहां जो पद्धति है इससे यही लगता है कि विपक्ष की स्थिति सोचनीय है। जबकि इसे
31 बनाम 69 के रूप में भी देखा जा सकता है। चुनाव के निष्कर्ष निकालने के पैमाने बदले की जरूरत है। देखना यह पड़ेगा कि 31 प्रतिशत मत 69 प्रतिशत पर कैसे भारी पड़ रहा है। यह कौन सा लाजिक है जिसके आधार पर यह कहा जा रहा है कि देश में विपक्ष नहीं है। जनादेश का मतलब यह नहीं है आपको विपुल मत मिले हैं। 31 का आंकड़ा न तो संतोषजनक है और ना ही करिश्माई। इतने प्रतिशत अंक वाले परीक्षा में पास नहीं माने जाते। सबसे बेहतर ही संतोषजनक होने का पैमाना नहीं हो सकता। हालांकि यह तथ्य है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आजादी के बाद पहली बार केंद्र में किसी गैर कांग्रेसी दल को स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने का जनादेश मिला। यह इस पार्टी की उपलब्धि है। दूसरे यह कि कांग्रेस के नेतृत्व में नरसिम्हा राव ने 1991 में विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करके केंद्र में सरकार चलाने का जो प्रयोग शुरू किया था वह ढाई दशक में चला और क्षेत्रीय दलों को केंद्र की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता खोला जिसे मोदी लहर ने बंद कर एक नये युग की शुरुआत है। ढाई दशक के घटनाक्रम ने देश के बता दिया कि गंठबंधन का एक नाम शठबंधन हो सकता है। सौदेबाजी ने लोकतंत्र को कलंकित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी। भ्रष्टाचार के कई मामलों की जड़ गठबंधन सरकार के दबाव हैं।
बहरहाल देखना यह कि संसद में विपक्ष को मजबूत बनाने के लिए गैरभाजपाई क्या रणनीति अपनाते हैं। अगर लोकसभा अध्यक्ष नियमों में छूट देते हुए संप्रग को एक इकाई की मान्यता देते हैं कि नहीं। जिसके सांसदों की संख्या 56 है। वरना कांग्रेस के पास केवल 44 सीटें हैं, जबकि मुख्य विपक्षी दल की मान्यता प्राप्त करने के लिए किसी पार्टी के पास 543 सदस्यीय लोकसभा में कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सेदारी यानी 55 सदस्य होनी चाहिए। कांग्रेस यदि इस जिम्मेदारी से कतराती है तो अन्नाद्रमुक और तृणमूल कांग्रेस विपक्ष के नेता पद का दावा करने के लिए साथ आ सकते हैं जिनके सीटों की संख्या क्रमश: 37 और 34 है। देश की निगाह विपक्ष पर रहेगी क्योंकि वही संसद में उनके हितों की आवाज बुलंद करेगा।
खास तौर पर कांग्रेक उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लोकसभा में विपक्ष के नेता पद की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। जबकि वे और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी इससे कतरा रही हैं और कमलनाथ का नाम इसके लिए आगे किये जाने के कयास लगाये जा रहे हैं। कांग्रेस मनमोहन सिंह सरकार के दोनों पारी की उपलब्धियों की जोरशोर से चुनाव प्रचार में चर्चा न कर पहले ही अपना जनाधार खो चुकी है उसे और गलतियों से बचना चाहिए। राहुल गांधी को आगे बढ़ाने के लिए मनमोहन की अनदेखी करना आवश्यक नहीं था। अब राहुल के पास एक महत्वपूर्ण दायित्व लेने का अवसर हो सकता है, जिससे उनके तेवर में एक नयी धार आयेगी।
24 मई को कांग्रेस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को एक बार फिर अपने संसदीय दल का नेता चुना है। इस अवसर पर पारित प्रस्ताव में कहा गया कि पार्टी संसद में सभी धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील ताकतों व रणनीतियों का प्रभावशाली ढंग से परस्पर समन्वय करेंगी ताकि एकजुट विपक्ष तैयार हो सके। पार्टी समान विचारधारा वाली अन्य पार्टियों को को आश्वस्त किया है कि इस संबंध में वह अपना पूरा सहयोग करेगी। कांग्रेस आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने को दृढ़संकल्प है। कांग्रेस यह देखना चाहती है कि लंबित विधेयकों को लेकर नयी सरकार क्या रुख अपनाती है। यह नहीं भूलना होगा कि भले लोकसभा में पार्टी व विपक्ष की क्षमता कम हो लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस अभी भी सबसे बड़ी पार्टी है। सोनिया ने सतर्क किया है कि 'विपक्ष में रहने का मतलब है कि अधिक नियमित उपस्थिति हो, सदन के भीतर अधिक समय बिताया जाये और विषयों का अधिक अध्ययन किया जाये। इसका मतलब हुआ कि अधिक सवाल किये जायें, अधिक मुद्दे उठाये जायें, अधिक चर्चाएं शुरू की जायें और हमेशा सतर्क प्रहरी की तरह रहा जाये।

Saturday, 17 May 2014

बंगाल में लाल लगभग बेदखल, ममता का जादू कायम

-डॉ.अभिज्ञात 
कोलकाता -देश भर में चली मोदी लहर से पश्चिम बंगाल भी अछूता नहीं रहा किन्तु यह असर लाल दुर्ग के ध्वांसावशेष पर पड़ा और ममता बनर्जी अपराजेय रहीं। उनके नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उसने पिछले लोकसभा चुनाव में 19 सीटें हासिल की थी इस बार उसे 34 सीटें मिली हैं। वामपंथी सीटों पर कब्जा करते हुए राज्य से लगभग बेदखल कर दिया। वे अपना जनाधार बचाने में कामयाब रहीं और राज्य में हुए सारधा घोटालों में अपनी पार्टी की संलिप्तता का नाम उछाले जाने और मामले की सीबीआई जांच का सामना करने जा रही ममता ने बंगाल की राजनीति के ढर्रे को को ही बदल कर रख दिया है। चुनावी नतीजे इस बात का संकेत दे रहे हैं आने वाले समय में भले कांग्रेस की स्थिति कमोबेश जस की तस बनी रही है और उसे केवल चार सीटें मिलीं, किन्तु यहां अब भाजपा भी राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करायेगी तथा वामदलों का स्थान तृणमूल लेने जा रही है। वामदल 15 सीटों से सिमट कर दो पर आ गये। माकपा को केवल दो सीट मिली उसके अन्य दलों को सिफर हाथ लगा। राज्य के अल्पसंख्यकों की सरपरस्त के तौर पर ममता ने अपनी छवि बना ली है और मुस्लिम वोट बैंक पर अपना हक समझने वाले वामदलों से उसने यह हथिया लिया है। देश भर में चली रही मोदी लहर से किसी हद तक तृणमूल के चुनावी नतीजे अप्रभावित रहे तो इसलिए कि अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण उनके पक्ष में हुआ। उन्होंने अपने तेवर व गतिविधियों से यह साबित किया है कि वे साम्प्रदायिक ताकतों को रोकने वाली एक जुझारू नेता भी हैं और आने वाले समय में वे राष्ट्रीय स्तर अपनी इस छवि का विस्तार करेंगी, जो अब तक वामदलों की थी। हिन्दीभाषियों को बंगाल में गेस्ट बताने वाली ममता ने चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में अपनी गलती को सुधार लिया था और लगातार हिन्दीभाषियों को अपना बताने मेंं जुटी रहीं, जिसका उन्हें लाभ पहुंचा। वामपंथियों ने ऐसा नहींं किया था और ममता ने भी ऐसा पहली बार किया जिसका उन्हें लाभ मिलता रहेगा। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अपनी तीखी टिप्पणियों के जरिये भी उन्होंने यह संदेश दिया है। यहां यह भी गौरतलब है कि राज्य में भाजपा के वोटों का प्रतिशत बढ़ा है।
तृणमूल की उपलब्धियों में पूर्व रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के नेता दिनेश त्रिवेदी की बैरकपुर लोकसभा सीट पर माकपा की सुभासिनी अली से 1,01,373 वोटों जीत को विशेष तौर पर उल्लेखनीय माना जा सकता है क्योंकि उनके रिश्ते कुछ अरसा पहले ममता से खटासभरे हो गये थे। त्रिवेदी ने अपनी सीट बरकरार रखी है। चुनावी नतीजों में कांग्रेस की दीपा दासमुंशी अपने पति प्रियरंजन दासमुंशी की परम्परागत सीट से हार गयी हैं। इस चुनाव में ममता ने फिल्म व ग्लैमर की दुनिया से जुड़ी हस्तियों शताब्दी राय, देव, मुनमुन सेन, संध्या राय, तापस पाल को पार्टी प्रत्याशी बनाया था जिस पर खुद उनकी पार्टी में किसी हद तक असंतोष था किन्तु चुनावी नतीजों ने यह साबित कर दिया कि वे सही थीं।
राज्य की दो सीटों पर भाजपा को अच्छी बढ़त मिली और आसनसोल से पाश्र्व गायक बाबुल सुप्रियो और दार्जिलिंग से एसएस आहलुवालिया ने जीत हासिल की है। भाजपा को इस बार एक सीट का फायदा हुआ। राज्य के भाजपा प्रमुख राहुल सिन्हा का मानना है कि तृणमूल विरोधी वोटों का कांग्रेस, भाजपा व वाम में बंटवारा हुआ जिसके कारण तृणमूल मजबूत दिखायी दे रही है, अगले चुनाव तक तृणमूल विरोधी वोटों भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण होगा।
वामदलों की बंगाल से बेदखली का कारण भले उसके नेता बूथ दखल रीगिंग बता रहे हों किन्तु इसमें केवल आंशिक सच्च्चाई है। विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में तृणमूल से अपनी शर्मनाक पराजय के बाद भी वामदलों आत्मालोचना के लिए तैयार नहीं दिखायी दिये। सांगठनिक स्तर पर जो भी बदलाव हुए वह लीपापोती और धड़ाबंदी के स्तपर ही हुआ और ना ही सिद्धांतों में किसी आमूलचूल परिवर्तन की बात उन्होंंने की इसलिए तृणमूल से असंतुष्ट लोगों को लिए भी लोग वामपंथियों को राजनीतिक विकल्प बनने योग्य नहीं मानते हैं, इसलिए यथास्थिति बनी रहेगी या नये राजनीतिक विकल्पों को तलाश की जायेगी।
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