Tuesday, 14 February 2012

शूटिंग के दौरान एक खलनायक से गपशप


बंगला फ़िल्मों के खलनायक अरुण मुखर्जी से बातचीत अच्छी रही। वे बांग्ला फिल्म 'एक्सपोर्टः मिथ्या किन्तु सत्य' में खलनायक की भूमिका निभा रहे हैं। और उसी की शूटिंग के लिए हम यहां उपस्थित थे। नाश्ता व मेकअप करके हम दोनों अपनी ओर से तैयार थे किन्तु शूटिंग शुरू होने में अभी देर थी। निर्देशक समीर बनर्जी तैयारियों में उलझे हुए थे। कोलकाता के नेचर पार्क में एक सूबसूरत जगह पर 23 फरवरी 2012, सोमवार की सुबह 10 बजे हम बैठे थे। हम दोनों किसी हद तक एक दूसरे से अपरिचित थे। उन्होंने औपचारिक तौर पर बातचीत शुरू की थी, जिसे मैंने थोड़ी गंभीर कर दी किन्तु उन्होंने उसे भी इंन्ज्वाय किया।
उन्होंने ही बताया ढाई दशक से अधिक हो गये उन्हें बाग्ला फिल्म इंडस्ट्री में। उन्होंने इस दौरान लगभग साठ फिल्मों और कुछ धारावाहिकों में अभिनय किया है। वे शुरू से खलनायक की भूमिका अदा करते चले आ रहे हैं। वे मानते
हैं कि नायक की तुलना में खलनायक की भूमिका में अभिनय की गुंजाइश ज्यादा होती है। पहले की तुलना में खलयनाकों के चरित्र में अन्तर आया है। अब पहले के दौर जैसे बड़ी बड़ी मुछों वाले, भारी भरकम डील डौल वाले खलनायक नहीं होते। अब तो मासूम और एकदम भला आदमी दिखने वाले खलनायक अधिक होते हैं। उन्होंने मेरे प्रश्न के व्यंग्य को समझते हुए हंसते हुए कहा कि यह सही है कि वास्तविक जीवन में सभ्य, सुसंस्कृति लगने वाले खलनायकों की संख्या बढ़ी है। इस प्रकार अभिनेताओं को भी अपने तौर तरीकों में वक्त के हिसाब से बदलाव लाना पड़ता है।
बांग्ला फिल्मों के पहले वाले रोमांटिक व आदर्शवादी चरित्र वाले कथानकों में परिवर्तन को उन्होंने समाज के परिवर्तनों से जोड़ा और इस बात की स्वीकार किया कि भव्य हिन्दी फिल्मों की नकल पर जो बांग्ला कामर्शिलय फिल्में बन रही हैं उन पर हंसा जा सकता है, क्योंकि हिन्दी के बजट की तुलना बांग्ला फिल्मों के बजट से नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि कम से कम चालीस लाख से लेकर दो-ढाई करोड़ के बजट वाली ज्यादातर फिल्में होती हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी नहीं, बल्कि इन दिनों तेलुगू फिल्मों से बांग्ला फिल्मों की थीम उड़ायी जाती है और किसी तेलुगू फिल्म को देखकर निर्माता कहते हैं कि वैसी बांग्ला फिल्म बना दी जाये। थोड़ी बहुत फेर बदल के साथ यह काम धड़ल्ले से हो रहा है। इस प्रकार मौलिक नहीं किसी हद तक पुनर्निमाण का कार्य जोर शोर से चल रहा है। हैरत तो यह है कि ऐसी फिल्में कमा भी रही हैं। कोई मौलिकता के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता। लगभग बनी बनायी स्क्रिप्ट में थोड़ा बहुत स्थानीय टच देकर काम आसानी से हो जाता है।
थोड़ी देर में उसी जगह सेट तैयार था और समीर दा ने कलाकारों को उनके हिसाब से सीन समझा दिया और शुटिंग शुरू हो गयी। सबको अपने डॉयलाग तो मेकअप से पहले ही मिल गये थे।

Tuesday, 17 January 2012

काव्यानुवाद की समस्याओं पर जम कर हुई चर्चा

कोलकाताः महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ओर से नलिनी मोहन सान्याल के 150 वें जन्म वर्ष के उपलक्ष्य में शुक्रवार 13 जनवरी 2012 को 'काव्यानुवाद की समस्याएं' विषय पर आयोजित सेमिनार को सम्बोधित करते हुए कवि, अनुवादक एवं प्रगतिशील वसुधा के सम्पादक राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि अपने देश में अनुवाद का काम उस तरह होता है जैसे कोई पुरानी फिल्म के गीत को याद कर बाथरूम में गुनगुनाने की कोशिश करता है, जबकि इस काम को काफी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भारत में अनुवाद के इतिहास की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दाराशिकोह ने काफी पहले उपनिषदों का अनुवाद करवाया था वह सांस्कृतिक अनुष्ठान था जबकि अंग्रजों ने फोर्ट विलिमय के माध्यम से अनुवाद का जो कार्य शुरू किया वह उपनिवेश की महत्वकांक्षी आवश्यकताएं थीं। हमारा देश जैसी सांस्कृतिक विभिन्नताओ में जीता है वहां अनुवाद नैसर्गिक प्रक्रिया है। साहित्य का अनुवाद टीका या भाष्य नहीं होता। वह सांस्कृतिक प्रक्रिया का अंग होता है। सोवियत रूस की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक समय था जब उस देश ने अपने देश के तमाम साहित्य को दुनिया भर में प्रचारित प्रसारित करने के लिए व्यापक पैमाने पर अनुवाद करवाया था। अनुवाद के लक्ष्य कई बार भिन्न प्रकार के होते हैं।
कवि, गद्यकार औ अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर चुके ओम भारती ने कहा कि कविता का अनुवाद किसी अन्य भाषा में हो ही नहीं सकता। वह मूल कविता की व्याख्या, पुनर्वव्याख्या होता है। शाब्दिक अर्थ बोध होता है। अनुवादक उसमें अपना आंशिक योगदान करेगा ही, जबकि मूल को मूल रहने देना एक बड़ी चुनौती होती है। अनुवादक अपने को इससे कैसे रोके यह बड़ी बात है। मूल भाषा के कवि की अभिव्यक्ति को उसी रूप में अक्ष्क्षुण रखना प्रायः संभव नहीं हो पाता। अनुवाद दरअसल प्रभावी ढंग का अंतरभाषिक संवाद होता है। अनुवाद के क्षेत्र में उन्होंने धर्मवीर भारती के संपादन में प्रकाशित विदेशी कवियों की कविताओं के अनुवाद के संकलन देशांतर का उल्लेख किया और उसे मील का पत्थर बताया। उन्होंने देशांतर की दूधनाथ सिंह लिखित और आलोचना में प्रकाशित समीक्षा को भी अनुवाद की समस्याओं को समझने और अनुवाद की संभावना को परखने के लिए लिहाज से महत्वपूर्ण करार दिया और उसे बीजमंत्र माना।
गायक, कवि एवं अनुवादक मृत्युजंय कुमार सिंह ने कहा कि एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद केवल शब्दानुवाद और भावानुवाद भर नहीं होता बल्कि उसके सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को भी अभिव्यक्त करना होता है। उन्होंने हिन्दी की समृद्धि की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी में उसकी बोलियों और अन्य भारतीय भाषाओं से हेलमेल और संस्कृत से सम्बद्धता के कारण जितने पर्यायवादी शब्द हैं दूसरी किसी भाषा में नहीं। नीलकंठ और कल्पतरू जैसे शब्दों का अंग्रेजी में अनुवाद बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि छंदबद्ध कविता के अनुवाद में इस बात भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि अनुवाद की गयी भाषा में भी छंद होता ताकि वह मूल भाव के करीब पहुंचे।
कवि प्रताप राव कदम ने कहा कि बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा था कि उनके वचनों को वे अपने अपने क्षेत्र की भाषा में प्रचारित प्रसारित करें जिससे अनुवाद की प्रक्रिया ने गति पकड़ी। उन्होंने कहा कि कवि को ही दूसरी भाषा की कविता का अनुवाद करना चाहिए। उन्होंने कहा कि गीतांजलि का हालांक रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वयं अंग्रेजी अनुवाद किया था किन्तु उनके मूल्य बांग्ला कविताओं की बात कछ और है।
विख्यात बांग्ला साहित्यकार नवारुण भट्टाचार्य ने कहा कि अनुवाद मनुष्य को आपस में जोड़ने की सबसे सशक्त सांस्कृतिक प्रक्रिया है। यह काम होते रहना चाहिए इसके दोष तक ही जाकर ठहरें। मनुष्य के संवाद की शक्ति अनुवाद से बढ़ती है। शुद्धता पर जोर नहीं होना चाहिए। साहित्यकार व सन्मार्ग के उपसमाचार सम्पादक डॉ.अभिज्ञात ने कहा कि अच्छी कविता एक अर्थ प्रायः नहीं होती। कई बार किसी कविता का ठीक-ठीक एक अर्थ निकाल पाना ही मुश्किल हो जाता है, मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता उसका उदाहरण है। ऐसे में कविताओं के एकदम ठीक ठाक अनुवाद की बात सोचना कठिन है। एक ही कविता का जब उसी भाषा के लोग अलग अलग अर्थ निकालते हैं तो फिर दूसरी भाषा में उसके अनुवाद का क्या हाल होगा। कविता के अनुवाद में परफेक्शन की गुंजाइश कम होती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं कवयित्री एवं अनुवादिका डॉ.चंद्रकला पाण्डेय ने कहा कि अनुवाद में सांस्कृतिक संदर्भों की चर्चा अवश्य की जानी चाहिए। उसका बिना अनुवाद कार्य अधूरा है क्योंकि एक भाषा के रीति रिवाज दूसरी भाषा से जुड़े लोगों के रीति रिवाज से अलग होते हैं ऐसे में रचना के मूल कथ्य के अनदेखे रह जाने का खतरा होता है। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के कोलकाता केन्द्र के प्रभारी डॉ.कृपाशंकर चौबे ने किया।

Monday, 21 November 2011

पश्चिम का सांस्कृतिक आतंक है नोबेल पुरस्कार-केदारनाथ सिंह


कवि केदारनाथ सिंह से डॉ. अभिज्ञात की बातचीत
'क्यों और क्यों हम नोबेल पुरस्कार को इतना महत्व देते हैं। मुझे तो कभी-कभी वह पश्चिम के सांस्कृतिक आतंक की तरह लगता है।' यह कहना है कवि केदारनाथ सिंह का। वे हाल ही में साहित्य अकादमी के कार्यक्रम में शिरकत करने कोलकाता आये थे। इसमें उन्हें अकादमी की 'महत्तर सदस्यता' प्रदान की गयी, जो अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है। प्रस्तुत है की गयी लम्बी बातचीत का एक अंश:
प्रश्न: रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद नोबेल साहित्य पुरस्कार के लिए भारत में आप किसे योग्य मानते हैं और हिन्दी के किसी लेखक के लिए क्या संभावना देखते हैं?
उत्तर: कुछ दिन पहले ही मैं चीन गया था। वहां बीजिंग लेखक संघ के अध्यक्ष ने अपनी बातचीत में यह सवाल उठाया था कि हम नोबेल पुरस्कार को इतना महत्व क्यों दें। इस पर मैं उनसे सहमत हूं। पूर्व के प्रतिमान अपने हैं और हमें अपने साहित्य को उसी के आलोक में देखना चाहिए। यदि विश्व स्तर पर साहित्य की श्रेणी बनानी भी हो तो उसके पैमाने अलग-अलग होने चाहिए। अब तक जो राजनीति में 'लुक ईस्ट' की बात कही जा रही है, कही तो किसी और संदर्भ में जा रही है किन्तु साहित्य के क्षेत्र में भी यह बात मुझे आज आवश्यक व अर्थपूर्ण लगती है।
भारतीय साहित्यकारों को नोबेल दिये जाने की संभावना की बात की जाये तो इसके योग्य कई हिन्दी लेखक हैं और हो गये हैं। हिन्दी की बात करें तो प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद तथा निराला इसके हकदार हो सकते थे। हिन्दी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं में भी कई लेखक हैं जो अपने लेखन की वजह से इसके योग्य माने जा सकते हैं।
प्रश्न: आप जीवन के उत्सव के कवि कहलाना पसंद करेंगे या जीवन की आपदा की अभिव्यक्ति का, क्योंकि ये दोनों ही तत्व आपकी कविता में पूरी शिद्दत से उभर कर आये हैं?
उत्तर: मैं अपने को मूलत: जीवन राग का कवि मानता हूं, जिसमें जीवन का उत्सव भी शामिल है और आने वाली आपदा से संघर्ष भी। वैसे हर सार्थक कवि जीवन राग का कवि ही होता है। मेरे गुरु त्रिलोचन की कविता की एक पंक्ति है-'जीवन मिला है यह, रतन मिला है यह।' ऐसी पंक्तियां जीने की प्रेरणा देती हैं। जीवन मेरी नजर में एक सेलिब्रेशन है। कविता यही तो करती है कि मनुष्य की जिजीविषा को बनाये रखे।
प्रश्न-आपके यहां मनुष्य का संकट और प्रकृति का संकट दोनों समान रूप से विद्यमान है, आप स्वयं किसे अधिक तरजीह देते हैं?
उत्तर: मनुष्य का संकट और प्रकृति का संकट अलग-अलग नहीं है क्योंकि जीवन मूल रूप से प्रकृति ही है। यानी जो इसके विपरीत है वह विकृति है। मैं इस विभाजन को बहुत अर्थवान नहीं मानता। मेरे लिए दोनों एक है।
प्रश्न: साहित्य में अपने या दूसरे किसी के निजी जीवन की अभिव्यक्ति किस स्तर पर होनी चाहिए?
उत्तर: निजी जीवन और साहित्य में अन्तर है पर निजी जीवन सामान्यीकृत होकर साहित्य में आता है। प्रेम में कविता महत्वपूर्ण तत्व रहा है पर जब वह कविता में आता है तो केवल व्यक्तिगत प्रेम नहीं रह जाता। यदि रह जाता है तो साधारणीकरण नहीं होता। साहित्य की यही तो विशेषता है कि वह निजता व सार्वजनीन के बीच की दीवार को ढहा देता है।
प्रश्न: आपके मन में कभी आत्मकथा लिखने का खयाल आया?
उत्तर: नहीं। लेकिन एक इच्छा मेरे मन में बहुत दिनों से पल रही है कि जिस परिवेश में मैं जीता रहा, चाहे गांव हो या शहर, उस परिवेश की कथा लिखूं। 'कथा माने 'फिक्शन' नहीं। मैंने जैसा देखा है वैसा। यह बहुत दिनों से सोच रहा हूं और शायद कभी कर सकूं। इसके लिए गद्य मुझे बार-बार खींचता है। अक्सर लगता है कि हमारा समय गद्य में सार्थक ढंग से उतर पाता है। कविता की तिर्यक पद्धति के विपरीत होती है गद्य की पद्धति। गद्य जीवन को सीधे-सीधे आईना देता है। यही उसकी ताकत है।
प्रश्न: अपने देश में वामपंथी राजनीति के विफल होने के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर: वामपंथी आंदोलन हमारे यहां ही नहीं पूरी दुनिया में किसी हद तक छिन्न-भिन्न हुआ है लेकिन खत्म हुआ है यह नहीं कहूंगा। पश्चिम में 'इतिहास का अन्तÓ कहकर जिस मुहावरे को उछाला गया था वह भी पुराना पड़ गया है। वामपंथी सत्ता और माक्र्सवाद दोनों अभिन्न नहीं हैं। माक्र्सवाद की सारवस्तु में एक ऐसी सच्चाई है, एक ऐसी गहरी मानवीय सच्चाई कि उसकी सार्थकता लम्बे समय तक रहेगी। माक्र्सवाद लौट-लौट कर कई शक्लों में बार-बार मनुष्य जीवन के साथ किसी न किसी रूप में जुड़ता रहेगा। इस तरह उसकी नियति को प्रभावित करता रहेगा।
प्रश्न: साहित्यकारों के पास इन दिनों विचारधारा का संकट है और वे समाज को दिशा दे पाने में असमर्थ हैं, तो उसकी वजहें क्या हैं?
उत्तर: आज की नियामक शक्ति राजनीति है। साहित्य तो केवल चेतना के निर्माण में योगदान देता है और उसका हिस्सा विचारधारा भी होती है। सम्पूर्ण विचारधारा चेतना का स्थानापन्न नहीं है। साहित्य के व्यापक अनुभव के बाद मैं जो देखता हूं उसके आधार पर कह रहा हूं कि साहित्य आज भी मनुष्य की चेतना के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका लगातार निभा रहा है। अन्तर यही है कि राजनीति के इतिहास की तरह साहित्य का इतिहास सतह पर दिखायी नहीं पड़ता। वह गहराई में जाकर अपना काम करता है। मनुष्य जीवन के सारभूत अंश को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है।
प्रश्न: हाल ही में क्या पढ़ा और उसमें क्या अच्छा या बुरा लगा?
उत्तर : इधर पढ़ी गयी जिस पुस्तक ने आंदोलित किया है वह है एक दलित आत्मकथा -मुर्दहिया। यह डॉ.तुलसीराम की कृति है, जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और स्वयं आजमगढ़ के एक छोटे से गांव में पैदा होने वाले विद्वान हैं। यह आत्मकथा बेबाक ढंग से डायरेक्ट चोट करने वाली भाषा में लिखी गयी है। उसकी भाषा धीरे-धीरे आपको अपने विश्वास में ले लेगी। यह आपको भीतर तक हिला देती है। इधर जो कुछ लिखा गया है उसकी एक उपलब्धि यह कृति भी है।
प्रश्न: क्या आप पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं?
उत्तर: पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करता। बुद्ध में करता हूं। बौद्ध धर्म बहुत आकृष्ट करता है पर जातक कथाएं लोक-कल्पना की तरह लगती हैं और उसे उसी रूप में देखता हूं।
प्रश्न: अपने लिखे में से कौन सी रचना से अधिक संतोष है और क्यों?
उत्तर: साहित्यकार को अपनी कृतियों से पूर्ण संतुष्टि शायद एक कल्पना है। लेखक अपनी कृतियों से कभी संतुष्ट नहीं होता। आंद्रे जीद ने कहीं लिखा है कि मैं अपनी हर कृति के अन्त में एक और वाक्य जोडऩा चाहता हूं वह ये कि- 'मैं जो कुछ कहना चाहता था वह नहीं कह पाया।'
प्रश्न: अण्णा हजारे और जेपी में से कौन अधिक पसंद है और आपको दोनों में बुनियादी फर्क क्या लगता है?
उत्तर: अण्णा हजारे के आंदोलन पर कोई टिप्पणी करना मैं जरूरी नहीं समझता। जेपी से अण्णा की तुलना नहीं हो सकती। जेपी का व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। उनके आंदोलन ने भारतीय राजनीति को बहुत दूर तक प्रभावित किया। यह प्रभाव किस-किस रूप में पड़ा यह अलग विचार का मुद्दा है।

Monday, 7 November 2011

आज के नैतिक सवालों से मुठभेड़ करता उपन्यास



समीक्षा
साभारःसन्मार्ग, 6 नवम्बर 2011
पुस्तक का नाम: हारिल/लेखक-हितेन्द्र पटेल/ अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद-2010005(उप्र)/मूल्य-सौ रुपये।

हितेन्द्र पटेल का पहला उपन्यास 'हारिल' अपने रचना-शिल्प, कथन और कहने की भंगिमा की उत्कृष्टता के कारण पाठकों पर अपना प्रभाव छोडऩे में कामयाब है। इस कृति में लेखक की जो बात मुझे खास तौर पर रेखांकित करने योग्य लगी, वह है रचना में शब्दों के प्रयोग की सीमा का भान। अतिकथन अच्छी-अच्छी कृतियों के प्रभाव को क्षीण कर देता है। खास तौर पर किसी के पहले उपन्यास में यह खतरे बहुत होते हैं, जिससे यह कृति बची हुई है। घटनाक्रम के ब्यौरों को उन्होंने इतने संतुलित ढंग से रखा है कि वे पाठकों को अनावश्यक कहीं नहीं लगते। यही बात कथा प्रसंगों के निर्वाह में भी कही जा सकती है, बल्कि इस मामले में तो वे और चुस्त-दुरुस्त हैं। वे घटनाओं को उसी मोड़ पर लाकर खत्म कर देते हैं, जहां से कई दिशाएं दिखायी देती हैं और पाठक के पास बस यही विकल्प बचता है कि वह कथासूत्र को अपनी कल्पना के आधार पर मनचाही परिणति तक ले जाये। लेखक का काम वहीं खत्म हो जाता है, जहां वह पाठक का अपनी कथावस्तु के साथ तादात्म्य स्थापित करवा दे। वे घटनाओं को वहां छोड़ते हैं, जहां उनका निहितार्थ है। यह सामान्य पाठकों को पहले-पहल तो आधी-अधूरी कृति का एहसास दिलाता है किन्तु आगे क्या हुआ होगा कि प्यास जगाकर छोड़ देना किसी रचनाकार के वैशिष्ट्य के तौर पर देखना अधिक समीचीन लगता है। यह रचना स्वभाव और कहने का अंदाज कम ही लेखकों के पास है।
हारिल उपन्यास में नैतिक मूल्यों के ह्नास की बात जिस सादगी से उठायी गयी है, वह इस रचना की उपलब्धि है क्योंकि वह उसकी अर्थवत्ता को अनेकार्थता तक ले जाने में सहायक है। लम्बे-चौड़े भाषण, बड़े-बड़े दावे और आक्रांत करने वाली मुद्रा यहां नहीं है। यहां वेधक कटाक्ष हैं, जो हमें अपनी परिपाटी का हिस्सा हो चले समझौतों के प्रति सचेत करते हैं। किस चतुराई और उदात्तता से पूंजी लोगों को अपना गुलाम बनाती है, उसकी गहरी शिनाख्त इस कृति में मिलेगी। प्रकृति, दर्शन, विचार, इतिहास, प्रेम, पूंजीवाद का धूर्त चेहरा इसमें रह- रह कर अपने अपने अलग-अलग रूपों में सामने आता है और हमें चमत्कृत, मोहित और आक्रांत करता है। यह आभास होता है कि यह कृति एक लम्बी तैयारी के साथ लिखी गयी है किन्तु हर शब्द मितव्ययिता के साथ खर्च हुए हैं। एक एक शब्द जरूरी और वाजिब।
एक फ्रीलांसर पत्रकार की यह दास्तान उसके एक पुराने मित्र, मित्र की पत्नी, मित्र की साली और मित्र के पत्नी के प्रेमी के इर्द-गिर्द घूमती है लेकिन इसके बीच वह एकाएक जटिल शहरी सम्बंधों से दूर प्रकृति के करीब पहाड़ पर चला जाता है ताकि अपने भीतर की आवाज को सुन सके। वहां कुछ ऐसे लोग और एक ऐसी दुनिया से उसका साबका होता है, जहां से जीने के नये अर्थ उसे मिलते हैं। बदली हुई जीवन दृष्टि के साथ जब वह तीन माह बाद वह अपनी पुरानी दुनिया में लौटता है तो एक बदली हुई दुनिया उसके सामने होती है। बदली हुई परिस्थितियों का सामना वह जिस प्रकार करता है, क्या वह सही है, उपन्यास के खत्म होने के बाद भी पाठक के पास सवाल बचा रह जाता है, जो नैतिक भी है और टाला जाने वाला भी नहीं है। आज की नैतिकता से मुठभेड़ के लिए यह उपन्यास अलग से जाना जायेगा। पाठक को भी इस उपन्यास से गुजरने के बाद चीजों को अपने देखने-समझने के नजरिये में बदलाव महसूस हो सकता है।


Tuesday, 31 May 2011

सौ के पार, सुरों की बहार


साभारः कुरजां संदेश, , प्रवेशांक-मार्च अगस्त 2011
सम्पादकीय सलाहकार-ईशमधु तलवार/ सम्पादक-प्रेमचंद गांधी, ई-10, गांधीनगर, जयपुर-302015, मूल्य-100/-
हिन्दुस्तानी संगीत के ग्वालियर घराने को जिन्होंने नयी ऊंचाइयां दी हैं उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है उस्ताद अब्दुल राशिद खान का। तानसेन की 24 वीं पीढ़ी के इस गायक ने उम्र की बंदिशों को धता बताते हुए एक सौ दो बसंत ही नहीं देखे बल्कि वे इस उम्र में बंदिशें लिखते और उनकी धुन तैयार करते हैं और मंचों पर अपनी गायकी के फन का लोहा भी मनवा लेते हैं। इस उम्र में भी न तो उनकी आवाज़ पर उम्र ने अपनी कोई छाप छोड़ी है और ना ही होशोहवास पर। शरीर की झुर्रियां, सफेद लखदख बाल अलबत्ता उनकी उम्र की गवाही देते हैं लेकिन इस बात का प्रमाण भी देते हैं कि वे उम्र की सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं।
उनके जीवन इस बात की मिसाल है कि उम्र से कोई बूढ़ा नहीं होता। और सौ की उम्र भी कुछेक असमर्थताएं जरूरत पैदा करती है लेकिन हर तरह से लाचार नहीं बनाती। वे अब भी संगीत के साधकों को रोजाना संगीत की चार-पांच घंटे तालीम देते हैं और वे मानते हैं कि इस दरम्यान उनका अपना रियाज़ भी होता चलता है। उनका उच्चारण अब भी बिल्कुल साफ है और आवाज़ बुलंद, जो ग्वालियर घराने की गायकी की विशिष्ट पहचान है।
ग्वालियर घराने की गायकी की विशेषता बताते हुए वे कहते हैं ग्वालियर घराने की गायकी में शब्दावली की स्पष्टता पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। दूसरी विशेषता है खुली आवाज़। वे बताते हैं यह विशेषताएं मुझे भी विरासत में मिली हैं। मैं भी अपने पूर्वजों की तरह ध्रुपद धमार गाता था। लेकिन जब ध्रुपद लुप्त होने लगा तो खयाल की ओर आ गया। मैं ध्रुपद धमार गाता हूं, खयाल, ठुमरी, टप्पा, दादरा भी।
लम्बी उम्र के सम्बंध में पूछने पर वे कहते हैं इसमें मेरा अपना कोई योगदान नहीं है। मैं एक सामान्य दिनचर्चा में ही जीता हूं। मेरे परिवार में लोगों ने अमूमन लम्बी उम्र पायी है। मेरे वालिद ने 92 साल की उम्र पायी थी, मेरे दादा 104 के थे, परदादा 107 के। मेरी भाभी 110 तक गयीं। यह ईश्वरीय देन है। हमारी सांसों का रखवाला अल्लाह है।
उस्ताद खुद ही बंदिशें लिखते हैं और उन्हें रागों में ढालते हैं। जैसी की शास्त्रीय संगीत की परिपाटी है उन्होंने भी ब्रजभाषा में ही अपनी बंदिशें लिखी हैं जिनमें से हज़ार बंदिशों को उन्हीं की आवाज़ में संगीत रिसर्च एकेडमी ने रिकार्ड किया है। कुछ बंदिशों को बीबीसी लंदन ने भी रिकार्ड किया है। उन्होंने अपनी बंदिशों को नाम दिया है रसन पिया।
उन्होंने बताया कि मेरे पूर्वजों में से मेरे परदादा उस्ताद चांद खान ने चार लाख बंदिशें लिखीं तैयार की थीं, इसलिए यह मेरे परिवार में नया काम नहीं है। मैं बचपन में रचता और उन्हें सुनाया करते, फिर उन्होंने ही हमारा नाम रख दिया—रसन और कहा कि बंदिशों में डाला करो लेकिन शब्द ऐसे हों कि राग का चेहरा ही सामने आ जाये।
नया काम किया है मेरे पौत्र ने। तानसेन के बाद हमारे वंश में पीढ़ी दर पीढ़ी गवैये ही पैदा हुए पर मेरे पौत्र अपवाद है। मेरा बेटा रईस खान भी गाता है किन्तु मेरा पौत्र बिलाल खान का तबले की ओर रुझान है पर हमने ऐतराज़ नहीं किया।
गुरु शिष्य की परम्परा का ज़िक्र छिड़ने पर उन्होंने बताया कि हमारे खानदान में किसी को बाहर से संगीत सीखने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। हमारी वंश परम्परा में यह इल्म सीना ब सीना आया। ये हुआ कि बेटा हमेशा बाप से अच्छा हो और अच्छा न हो तो बराबर तो हो..।
पहले की महफिलों में संगीत सुनने वाले संगीत के जानकार होते थे। रियासतों में वास्तविक कद्रदानों की महफिल में गायन होता था। कोई गवैया ग़लत गाता था तो वहीं उसी वक्त़ रोक कर कहा जाता था ऐसे नहीं ऐसे। लेकिन अब तो म्यूज़िक कन्फ्रेंस होते हैं गाने वाला गा लेता तो लोग तालियां बजाकर छुट्टी पा लेते हैं कोई ग़लती पर उंगली नहीं रखता। सीखने का ढर्रा यह निकल आया है कि किसी का कैसेटे या सीडी लगा लिया। खीसने की ज़रूरत नहीं। उसी की नकल उतार ली और गाने बैठ गये।
पिछली यादों में खाते हुए उस्ताद कहते हैं कि भारतीय संगीत के अंग्रेज़ भी कायल थे। नेहरू जी ने अपने एक भाषण में कहा था कि हिन्दुस्तान से अंग्रेज़ बहुत कुछ ले गये लेकिन संगीत नहीं ले जा पाये। जिस आदमी को संगीत से लगाव नहीं वह बगैर दुम का पशु होता है।
संगीत रिसर्च अकादमी से अपने सम्बंधों के बारे में वे कहते हैं मैं यहां बीस साल से हूं। देश में यही एक संस्थान है जहां गुरु-शिष्य परम्परा चल रही है। होनहार लोगों को यह एकादमी अपना शिष्य बनाती है और यहीं रहकर जब तक वह योग्य नहीं बन जाता संगीत सिखाया जाता है। यहां तो डायरेक्टर हैं रवि माथुर वे गुणियों के कद्रदान हैं। वरना मैं तो उत्तर प्रदेशे के रायबरेली के सलोन का रहने वाला हूं। सलोन पहले कस्बा हुआ करता था अब तो शहर जैसा हो गया है। अपने घर का रास्ता पहचानना मुश्किल होता जा रहा है। वहीं के दरगाह शरीफ में मैंने गुरुमंत्र लिया और हाजी हाफिज मौलाना हजरत शाह मोहम्मद नईम ? साहब सलोनी की दुआ से मैं कुछ भी हूं, हूं।
वे कहते हैं मेरे वालिद को लगता था कि मैं गा बजा नहीं पाऊंगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मेरी संगीत का तालीम बाईस साल चली।
अपने शिष्यों में जिन्हें वे जिक्र लायक समझते हैं वे हैं शुभमय भट्टाचार्य, पम्पा बनर्जी, पियाली मलाकार, रूपाली कुलकर्णी और डॉ.हेमराज चंदेल।
तानसेन की अपनी खानदानी परम्परा के बारे में पूछने पर वे बताते हैं कि तानसेन किसी का नाम नहीं बल्कि उपाधि है जो अकबर बादशाह ने दी थी। वाकया हूं है कि ग्वालियर के राजा राम गौड़ थे। वहीं के थे मकरंद पाण्डेय जो हजरत गौस ग्वालियरी की पड़ी सेवा करते थे। पाण्डेय जी की कई गायें थीं सो वे हजरत को दूध मुफ्त में रोज पहुंचा दिया करते थे। एक रोज हजरत ने पूछा पाण्डेय तुमने बहुत सेवा की बोलो मुझसे क्या चाहते हो?
पाण्डेय जी की उम्र हो गयी थी 72 के आसपास। उन्होंने कहा बाबा सब कुछ है मेरे पास पर संतानहीन हूं। हजरत ने दुआ की और बाबा को संतान हुई। सात बरस बीते। बाबा ने एक दिन पूछा सब खैरियत तो है, पाण्डेय जी ने कहा बाबा, औलाद तो हुई लेकिन वह बोलता ही नहीं है। बाबा उस समय फल खा रहे थे वही जूठा फल बच्चे को पकड़ा दिया और बच्चे ने जो पहला शब्द कहा वह था बाबा।
पाण्डेय जी पहले तो खुश हुए फिर कहा आपने इसे अपना जूठा खिला दिया अब आप ही इसे अपने पास रखो। बालक उन्हीं के पास रहने लगा। उसे मुसलमान बनाया गया नाम रखा गया-अली खां। वह ज़माना बाबा हरिदास स्वामी का था, जो वृंदावन में रहते थे। एक बार वे यहां हजरत गौस ग्वालियरी से मिलने आये। बालक को देखा तो कहा इसे हमें दे दीजिए हम इसे संगीत सिखायेंगे। बालक अली खां उनके साथ कई बरस रहे। संगीत की परम्परागत तालीम ली। जब पारंगत हो गये तो उनसे कहा गया कि अपनी विद्या को दुनिया में फैलाओ। फिर लौट आये। वे रीवां नरेश की गोविन्दगढ़ रियासत में मुलाजिम हुए। उस समय बादशाह अकबर संगीत के प्रेमी थे। वे एक बार रीवां नरेश के यहां आये तो उन्होंने उनका गाना सुना और उन्हें रीवां नरेश से मांग लिया। बादशाह अकबर ने उन्हें तानसेन की टाइटल दी और उन्हें अपना नवां वजीर बनाया। तानसेन के चार बेटे हुए-रहीम सेन, सूरत सेन, तानतरंग और बिलासखान। उस्ताद अब्लुल राशिद खान बताते हैं हमारे वंश का सिलसिला सूरत सेन से चला।
सूरत सेन के चार बेटे थे-कमाल रंग, जमाल सेन, अहमद शाह और रुस्तम खान। उस समय प्रतापगढ़ रियासत में कोई गायक नहीं था। राजा की बुआ ग्वालियर में ब्याही थीं। राजा कालाकांकर वहां से चारों गवैयों को अपने यहां ले आये। जिनमें से दो मानिकपुर के राजा ताजसुख हुसैन के यहां चले गये। जब रियासतें खत्म हुई तो बाकी दो भी मानिकपुर से बी मिल सलौन आ गये। हमारी परम्परा सलोन से जुड़ गयी। सलोन रायबरेली जिले में है। वे कहते हैं कि रायबरेली जिला सोनिया गांधी का क्षेत्र है मैं जल्द ही उनसे मिलूंगा और गुजारिश करूंगा का सलोन में एक संगीत विद्यालय बनाने का इन्तज़ाम वे करवायें।
उस्ताद कहते हैं इस प्रकार मेरा पितृपक्ष हिन्दू और मातृपक्ष मुसलमान है। एक साझी विरासत हमारी है। यह पूछने पर कि संगीत से उन्हें क्या मिला, कहते हैं मेरे लिए तो यह अल्लाह को महसूस करने का यह मार्ग है।

Friday, 27 May 2011

विवेकानंद के जीवन के कुछ और आयाम



तहलका ३० अप्रैल 2011
पुस्तक समीक्षा
विवेकानंदः जीवन के अनजाने सच/लेखक-शंकर/प्रकाशक-पेंगुइन बुक्स इंडिया, यात्रा बुक्स, 203 आशादीप, 9 हेली रोड, नयी दिल्ली-110001, मूल्य-199/-
स्वामी विवेकानन्द के जीवन के कई आयाम अब तक अनुद्घाटित हैं। उनके प्रकाशित पत्रों और सैकड़ों पुस्तकों से उनके दर्शन व जीवन को समझने में सहूलियत होती है फिर भी उनके जीवन के कई कोने ऐसे हैं जिन पर रोशनी नहीं पड़ी है और जिनके उजागर होने से उनको देखने समझने के हमारे नजरिये में परिवर्तन होता है। ख्यातिलब्ध बंगला साहित्यकार शंकर ने उन पर लम्बे अरसे तक शोध करने और लगभग दो सौ पुस्तकों से अपनी बात को पुष्ट करने का प्रमाण जुटाने के बाद 'विवेकानंद: जीवन के अनजाने सच’ पुस्तक लिखी है। इसमें उन्होंने विवेकानंद को जिस रूप में पेश किया है वह उन्हें बहुत करीब से समझने में हमारी मदद करता है। विवेकानंद के व्यक्तित्व के उस ताने-बाने को उन्होंने परखने की कोशिश की है जिनसे उनका व्यक्तित्व न सिर्फ बनता है बल्कि निखरता है। इस पुस्तक में उन्होंने उन्हें एक महामानव के जीवन संघर्ष की उन स्थितियों को ही नहीं उजागर किया है जो उनके विकास में सहायक हुआ है बल्कि उन विसंगतियों की भी चर्चा की है जो उनके संन्यासी जीवन के विकास में बाधक बनती दिखायी देती हैं।
शंकर ने विवेकानन्द के जीवन के ऐसे प्रसंगों को इसमें प्रस्तुत किया है जिनकी या तो चर्चा बहुत कम हुई है या फिर हुई भी है तो उसके पूरे मर्म को समझने में वह अपर्याप्त रही। यह अनायास नहीं है कि उन्होंने इस पुस्तक का नाम ही 'जीवन के अनजाने सच' इसलिए रखा क्योंकि वे उन्हीं प्रसंगों पर अधिक जोर दिया है और उस विषय पर उन्होंने गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है जिनके आधार पर विवेकानन्द की बहुमुखी प्रतिभा पर भी प्रकाश पड़ा है। इस पुस्तक के बिना यह जानना मुश्किल था कि उन्होंने जितना वेदों का प्रचार किया उससे कम प्रचार भारतीय व्यंजनों का नहीं किया। 'सम्राट-संन्यासी सूपकार' अध्याय में शंकर ने लिखा है कि वे न सिर्फ तरह-तरह के व्यंजनों को खाने के बेहद शौकीन थे बल्कि पाक कला में भी उन्हें विशेष महारथ हासिल थी। विदेशों में भी कई बार अपने करीबी लोगों को घर जाकर खुद खाना बनाकर खिलाया भोजन प्रसंग में विवेकानंद के चाय व आइसक्रीम के प्रति लगाव की विशेष चर्चा है। शंकर कहते हैं-'स्वामी जी जिनके भी घर में मेहमान बनते थे, उन लोगों को अपना भी एकाध व्यंजन पकाकर खिलाने को उत्सुक रहते थे।' शंकर इस अध्याय में कहते हैं-'उत्तरी कैलिफोर्निया के रसोईघर में शेफ यानी रसोइया विवेकानंद। बेहद अद्भुत दृश्य होता था। खाना पकाते-पकाते स्वामी जी दर्शन पर बात करते रहते थे। गीता के अठारहवें अध्याय से उद्धरण देते रहते थे।' विवेकानंद के लिए वेद-उपनिषद का प्रचार प्रसार, मानवता के कल्याण की बातें और व्यंजनों की रेसिपी में कोई फर्क नहीं था। यहां यह भी गौरतलब है कि उनका खान पान शाकाहार तक ही सीमित नहीं था।
इस पुस्तक में जो प्रमुख स्वर उभरा है वह है अपनी मां के प्रति उनका अगाध प्रेम। मां से उनका सम्बंध अंत तक बना रहा और वे इस बात के प्रति भी चिन्तित रहे कि उनकी मौत के बाद उनकी मां की देखभाल और भरण-पोषण ठीक से हो। इस पुस्तक में उनकी पैतृक सम्पत्ति के लेकर चलने वाले लम्बे मुकदमे का भी विस्तार से जिक्र है जिसके कारण उनके परिवार को गरीबी के दिन देखने पड़े और जिन्हें सुलझाने का उन्होंने भरसक किया। अदालत से मुकदमे का समाधान न होते देख उन्होंने छह हजार रुपये देकर अपनी चाची से पैतृक घर का हिस्सा खरीद लिया जिसके लिए उन्हें मठ के फंड से पांच हजार रुपये उधार लेने पड़े। खेतड़ी महाराज से वे पत्र में गुजारिश करते हैं-'मेरी मां के लिए आप जो हर महीने सौ रुपये भेजते हैं, हो सके तो उसे स्थायी रखें। मेरी मौत के बाद भी यह मदद उन तक पहुंचती रहे।'
शंकर के विवेकानंद की उन तमाम बीमारियों का जिक्र किया है जिनसे वे लगातार घिरे रहे। वे अनिद्रा के भी शिकार थे। यह देखकर हैरत होती है कि जिस व्यक्ति को इतनी सारी बीमारियां थीं उसने कैसे दर्शन के क्षेत्र में महती योगदान दिया और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक बनायी। खेतड़ी के राजा अजीत सिंह की चर्चा जिस तरह से शंकर ने की है उससे स्पष्ट है कि विवेकानंद को विदेश भेजने का इन्तजाम उन्होंने ही किया था। विवेकानंद ने इसे खुलेआम स्वीकार किया था कि अगर खेतड़ी के राजा से परिचय न होता तो जो कुछ मामूली सा मैं भारत की उन्नति के लिए कर पाया हूं, वह मेरे लिए असंभव था। पुस्तक का बंगला से अनुवाद सुशील गुप्ता ने किया है।

Sunday, 8 May 2011

'मीडिया को अपनी विश्वसनीयता की रक्षा स्वयं करनी होगी

कोलकाता: सदीनामा की ओर से 'मीडिया का समाज और साहित्य पर प्रभावÓ विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन शनिवार की शाम जीवनानंद सभागार, नंदन में किया गया। इसमें वक्ताओं ने मीडिया के व्यवसायीकरण पर चिन्ता जताई और पेड न्यूज जैसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता पर बल दिया। वक्ताओं का कहना था कि मीडिया लोगों के घर में अपनी पैठ बना चुका है और वह मनुष्य के जीवन के हर मामले को निर्देशित करने की ताकत रखता है इसलिए उसका दिशाहीन होना खतरनाक है। मीडिया को अपनी विश्वसनीयता और जनपक्षधरता की रक्षा स्वयं करनी होगी। कोई बाहर दबाव या दिशानिर्देश इस मामले में उतने प्रभावी नहीं होंगे, जितनी स्वयं उसकी नैतिक जिम्मेदारी होगी। लोकतंत्र में मीडिया की शक्ति तभी बढ़ेगी जब वह भरोसेमंद होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ.इकबाल जावेद ने की। वक्ता थे रतनलाल शाह, प्रो.ललित झा, डॉ.अभिज्ञात, अभीक चटर्जी एवं राजेन्द्र केडिया। कार्यक्रम का संचालन जितेन्द्र जितांशु ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रभाकर चतुर्वेदी ने किया।
डॉ.इकबाल जावेद ने कहा कि इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों ने जहां रचनात्मक कार्य किये हैं वहीं उसका दुरुपयोग भी धड़ल्ले से हो रहा है। वह यदि अण्णा हजारे के पक्ष में व्यापक समर्थन जुटा सकता है तो किसी शक्तिशाली मुल्क के इशारे पर तहरीर चौक में लोगों को अपनी ही सरकार को बेदखल करने के लिए उकसा भी सकता है। उन्होंने कहा कि मीडिया आज पावरफुल हो गया है और पावरफुल होने के कारण करप्ट भी। राजेन्द्र केडिया ने कहा कि मीडिया झूठे सपने बेचता है। वह लोगों की सोच पर ऐसा हावी होता है कि वह अपने ढंग से एक नयी संस्कृति तैयार करने लगा है। टीवी धारावाहिक यह काम बखूबी करते हैं। अभीक चटर्जी ने कहा कि मीडिया डेमोक्रेटिक डिक्टेटरशिप करता है। लोगोंं को पता नहीं चलता कि वह किस सूक्ष्म तरीके से लोगों को वहीं हांक कर ले जाता है जहां वह ले जाना चाहता है। पूरी मीडिया को आम तौर पर कुछ शक्तिशाली लोग नियंत्रित करते हैं और मीडिया के जरिये लोगों को। प्रो.ललित झा ने कहा कि यह सूचना विस्फोट का युग है। सूचनाओं को किसी खास उद्देश्य से प्लांट किया जाता है लोगों के दिलोदिमाग पर उसे हावी कर दिया जाता है। मीडिया तकनीक से ताकत बन गया है। जिस विश्वग्राम को मीडिया की उपलब्धि के तौर पर पेश किया जाता है वह कंसेप्ट बहुत पहले से हमारे उपनिषदों में मौजूद है। उन्होंने कहा कि मीडिया ने ऐसी स्थितियां पैदा की हैं कि स्त्री उपभोग की वस्तु बन गयी है। वह पुरुषवादी नजरिये से स्वयं को टीवी पर पेश करती है। डॉ.अभिज्ञात ने कहा कि मीडिया को साजिश के तहत बदनाम किया जा रहा है क्योंकि लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया चौथे स्तम्भ का काम करता है। ऐसे में उसके कद का बढ़ जाना बाकी स्तम्भों के लिए चुनौती है। आज मीडिया चाहे तो किसी सरकार को गिरा दे या किसी की सरकार बना दे। ऐसे में जबकि लोकतंत्र के अन्य पायों में खामियां आ गयी हैं राजनीति नहीं चाहती कि उसे चुनौती देने वाली सत्ता मीडिया निष्कलंकित रहे। मीडिया को अपनी विश्वसनीयता और जनपक्षधरता की रक्षा स्वयं करनी होगी। लोकतंत्र में मीडिया की शक्ति तभी बढ़ेगी जब वह भरोसेमंद होगा। उन्होंने कहा कि बिना मीडिया के आज समाजिक परिवर्तन की कल्पना नहीं की जा सकती और आज का मनुष्य बगैर मीडिया के एक दिन संतोषजनक ढंग से एक दिन नहीं बिता सकता। इसके पूर्व सदीनामा-उन्नयन सम्मान 2011 का सत्र था जिसमें हिन्दी, उर्दू, बंगला एवं अंग्रेजी भाषाओं में बीए की परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं को पुरस्कृत किया गया।

Monday, 25 April 2011

विमर्श और सपनों के ताने बाने से बुनी कविताएं

समीक्षा
साभार-सन्मार्ग, 24 अप्रैल 2012
भूख धान और चिड़िया/ लेखक-स्वाधीन/प्रकाशक-मंगल प्रकाशन, दिल्ली


Tuesday, 21 December 2010

विकीलीक्सः सेंधमारों और हैकरों को हीरो न बनाये मीडिया


विकीलीक्स के कारनामों ने मीडिया को एक गहरी दुविधा में ढकेल दिया है। उसके खुलासों के आगे दुनिया की सारी खबरें फीकी और लगभग सारहीन नज़र आ रही हैं। सनसनी परोसने वालों की विकीलीक्स ने हवा निकाल दी है। सबसे पहले, सबसे आगे, सिर्फ़ हमारे पास जैसे नारों का रंग उतर गया है। एकाएक दुनियाभर का मीडिया संसार जूलियन असांज द्वारा विकीलीक्स डाट ओआरजी वेबसाइट परपरोसी हुई जूठन पर आश्रित हो गया है। इसे सूचनाओं का विस्फोट माना जा रहा है। कई पत्रकार असांज को अपना अगुवा मानने से नहीं हिचक रहे हैं तो कुछ ने उसे नायक मान लिया है। कुछ और उसी की राह पर चलने के लिए बेचैन हैं। कुछ फर्जी विकीलीक्स के खुलासे भी इस बीच सामने आये हैं। इस तरह विकीलीक्स मार्का खुलासों का एक बूम आ गया है।
इंटरनेट पर सूचनाओं का अबाध प्रवाह की दुनिया में यह पहली बड़ी दुर्घटना है। ऐसी दुर्घटना तो होनी ही थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब अनसेंसर्ड सूचना परोसना नहीं है। मीडिया का काम केवल खुलासा करना नहीं है। मीडिया यदि व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत करता है तो उसका आशय अबाध अभिव्यक्ति से नहीं है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्बंध नैतिकता से भी है। हम किसी हैकर को मीडिया का नायक नहीं मान सकते। गुप्त सूचनाओं को खुलासा भर कर देना पत्रकारिता का धर्म कदापि नहीं है और ना ही यह कोई ऐसा गुण है जिस पर कोई वारी-वारी जाये। कूटनीति की बहुत सी मजबूरियां होती हैं और हर देश में बहुत सी बातें होती हैं जो न सिर्फ दूसरे देश से बल्कि स्वयं अपने भी देश के लोगों से गोपनीय रखनी होती हैं। आवश्यकता पड़ने पर कई गोपनीय बातों को उजागर करने के पूर्व उसके सार्वजनिक होने के प्रभावों पर भी विचार किया जाता है।
विसीलीक्स ने जो गुप्त सूचनाओं पर सेंधमारी की है वह अमरीकी को पूरी दुनिया की निगाह में गिराने के लिए काफी है।यही नहीं इससे उसके अपने मित्र राष्ट्रों से सम्बंध खराब होने का खतरा मंडरा रहा है। आर्थिक मंदी का शिकार इस देश की हालत इन खुलासों से और खराब हो सकती है। कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अपने अपने स्तर और अपनी औकात के अनुसार किन्ही कारगुजारियों को अंजाम देने की कोशिश न करता होगा। कमजोर से कमजोर देश भी शक्तिशाली बनने की कोशिश करता है और जिनसे वह संधि करता है अपने फायदे की पहले चिन्ता करता है। हर देश का अपना खुफिया तंत्र होता है और उसकी एजेंसियां देश की कूटनीतिक कार्रवाइयों को अंजाम देती रहती है। अमरीका के गोपनीय केबल संदेशों का खुलासा करके विकीलीक्स ने उसकी पोल खोल दी। और एक हैकर दुनिया का नायक बन गया। ऐसे लोगो का नायक जो अमरीकी की शक्ति के आगे नत हैं, उनसे आगे निकलना चाहते हैं, उसके सताये हुए हैं। अब अमरीका इंटरनेट की अबाध स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहा है तो यह स्वाभाविक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती राष्ट्र का अंकुश के पक्ष में रवैया चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए क्योंकि वह नैतिकता से स्खलित वैचारिक स्वतंत्रता के खिलाफ जो सही है। हमारा देश भारत को भी ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि हम भी मानते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्बंध नैतिकता से है और उसकी प्रभावोत्पादता से भी। किन्हीं गोपनीय सूचनाओं को उजागर करना कोई बड़ी सूचना क्रांति नहीं है। हमारे यहां सूचना प्राप्त करने का कानून है और कई गोपनीय दस्तावेजों से सम्बंध में एक सुनिश्चित प्रक्रिया से जानकारी प्राप्त की जा सकती है लेकिन उन जानकारियों में हर तरह की जानकारियों तक पहुंच नहीं बनती क्योंकि सरकार ने कुछ मामलों को जनहित और देशहित में उपलब्ध नहीं कराने का निर्णय लिया है।
असांज की खुफियागिरी के तर्ज पर यदि आज की पत्रकारिता चली तो जासूसों की तो निकल पड़ेगी। मुझे यह जानकारी नहीं है कि कितने अखबार अपने यहां जासूसों की नियुक्ति किये हुए हैं। हाल में मीडिया द्वारा स्ट्रिंग आपरेशनों की जानकारी तो है किन्तु उसमें भी किसी ने किसी रूप में जनहित और नैतिकता के प्रश्न जुड़े होते हैं।
अमरीका के खिलाफ खड़ी शक्तियों को लाभ पहुंचाने की गरज से गोपनीय दस्तावेजों के खुलासे के कारण जल्द ही उन लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी बाधित होगी जो किन्हीं नैतिक मूल्यों की लड़ाई इंटरनेट के जरिए लड़ रहे थे। यह भय है कि सस्ता, सुलभ और कारगर हथियार आम लोगों के हाथ से न निकल जाये। स्वाभाविक है कि जो देश इंटरनेट पर आ रही खबरों और विचारों के खुलेपन से अपने देश को बचाना चाहते थे वे लाभान्वित होंगे। ऐसे भी मुल्क हैं जहां अपने ही देश की विसंगतियों को अपने ही देश में अपने ही लोगों द्वारा अभिव्यक्ति करने पर जेल में डाल दिया जाता है, वहां इंटरनेट जैसे शक्तिशाली माध्यम सिरदर्द बना हुआ है। उन्हें इंटरनेट पर भावी पाबंदियों का लाभ मिलेगा।
दरअसल इंटरनेट मीडिया के विस्तार के साथ ही उस पर सीमित अंकुश का तंत्र विकसित किया जाना चाहिए था तथा सूचनाओं के प्रसार की नैतिकता का विकास भी होना चाहिए था। इंटरनेट के दुरुपयोग के खिलाफ कारगर कानून भी बनने चाहिए थे जो नहीं हुआ और उसका नतीजा सामने है। विकीलीक्स को आज भले मीडिया तरजीह दे रहा हो किन्तु यह मीडिया के विनाश का कारण बन जायेगा। एक हैकर के कारनामों से भले ही किसी को लाभ हो मीडिया को चाहिए कि वह उसकी निन्दा करे और उसे नायक न बनने दे। कल को किसी देश के आम नागरिकों के बैंक खातों से लेकर तमाम गोपनीय जानकारियों को रातोंरात लीक कर कोई दुनिया को चौंका कर नायक बनने की कोशिश करेगा तो आप क्या करेंगे।
वर्तमान घटना को अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले को रूप में देखा जाना चाहिए। यह किसी राष्ट्र की निजता पर आतंकी हमला है। और इससे जश्न मनाने वाले यह न भूलें कि उनकी निजता भी महफूज नहीं रह जायेगी। कोई भी उपलब्धि तभी उपलब्धि है जो उसे प्राप्त करने के साधन नैतिक हों। यदि गोपनीय सूचनाएं सेंधमारी या हैकिंग करके हासिल की गयी हैं किन्हीं मान्य तरीकों से नहीं तो उन सूचनाओं से चाहे जितने बेहतर नतीजे निकाल लें वह किसी भी प्रकार से मनुष्य जाति के लिए हितकारी नहीं होंगे।
असांज का जीवन कोई आदर्श जीवन नहीं रहा है। कंप्यूर हैक करने की अपनी एक कोशिश के दौरान वह पकड़ा गया था। फिर भी उसने अपना काम और कंप्यूटर के क्षेत्र में अनुसंधान जारी रखा। उसका दावा है कि अपने स्रोतों को सुरक्षित रखने के लिए उसने अलग-अलग देशों से काम किया। अपने संसाधनों और टीमों को भी हम अलग-अलग जगह ले गया ताकि कानूनी रुप से सुरक्षित रह सके। वह आज तक न कोई केस हारा है न ही अपने किसी स्रोत को खोया है।
उल्लेखनीय है कि विकीलीक्स की शुरुआत 2006 में हुई। असांज ने कंप्यूटर कोडिंग के कुछ सिद्धहस्त लोगों को अपने साथ जोड़ा। उनका मक़सद था एक ऐसी वेबसाइट बनाना जो उन दस्तावेज़ों को जारी करे जो कंप्यूटर हैक कर पाए गए हैं। भले यह कहा जा रहा है कि यह असांज के व्यक्तिगत प्रयासों को परिणाम है लेकिन इसमें किन्हीं देशों की बड़ी शक्तियों का हाथ होने की आशंका से इनकार नहीं किया जाना।
विकीलीक्स खुलासों के आधार पर राजनीतिक और सामाजिक अध्ययन के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध हुई है इसमें कोई दो राय नहीं। उसके खुलासों से किसी देश की नीति और कूटनीति में कितना अन्तर है यह अध्ययन का विषय हो सकता है। नैतिकता की कितनी परतें होती हैं उसके रेशे रेशे को इन खुलासों ने जगजाहिर कर दिया है। लेकिन कोई भी उपलब्धि किस कीमत पर मिली है बिना इसका मूल्यांकन किये बिना हम नहीं रह सकते। दूसरे किसी भी बात के खुलासे के उद्देश्यों को जब तक सामने न रखा जाये हम यह नहीं कह सकते कि भला हुआ या बुरा। उद्देश्य की स्पष्टता के अभाव में केवल खुलासे का थ्रिल पैदा करना या अपनी हैकर प्रतिभा का प्रदर्शन मेरे खयाल से कोई महान कार्य नहीं है।

Sunday, 5 December 2010

भाषा का क्रियोलीकरण और अखबारों की भूमिका

सन्मार्ग-6/12/2010







'भाषा का क्रियोलीकरण और अखबारों की भूमिका' विषय पर अपनी भाषा संस्था ने अपने दसवें स्थापना दिवस पर संगोष्ठी 4 दिसम्बर 2010 को आयोजित की। यह भारतीय भाषा परिषद के सभागार में अपराह्न 3.30 बजे शुरू हुई जिसकी अध्यक्षता ललित निबंधकार एवं पत्रकारिता पर ग्रंथ लिखने वाले डॉ.कृष्णबिहारी मिश्र ने की। विषय प्रवर्तन संस्था के महासचिव डॉ. ऋषिकेश राय ने किया और क्रियोल तथा क्रियोलीकरण के अर्थ से लोगों को परिचित कराया। कार्यक्रम का संचालन डॉ.विवेक कुमार सिंह ने किया और धन्यवाद ज्ञापन किया डॉ.वसुमति डागा ने। वक्ता थे ताजा टीवी छपते छपते दैनिक के मालिक सम्पादक विश्वंभर नेवर, जनसंसार साप्ताहिक के सम्पादक गीतेश शर्मा, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के रीडर डॉ. आलोक पाण्डेय तथा सन्मार्ग दैनिक के वरिष्ठ उपसम्पादक डॉ.अभिज्ञात ।

कुछ तथ्य
क्रियोल भाषा क्या है?
एक क्रियोल या खिचड़ी भाषा, वो स्थिर भाषा होती है जिसका प्रादुर्भाव विभिन्न भाषाओं के मिश्रण से होता है। आमतौर पर एक क्रियोल भाषा के शब्द मूल भाषाओं से सहार्थी होते हैं, लेकिन कई बार मूल भाषा और खिचड़ी भाषा के शब्दों में ध्वन्यात्मक और अर्थ संबंधी एक स्पष्ट परिवर्तन देखा जा सकता है। अब इस बात की आशंका जतायी जा रही है कि हिन्दी का हिंग्लिश बनाना एक तरह से उसका क्रियोलीकरण करना है। और कांट्रा-ग्रेजुअलिज्म के हथकंडों से, बाद में उसे डि-क्रियोल किया जायेगा। डिक्रियोल करने का अर्थ, उसे पूरी तरह अँग्रेज़ी के द्वारा विस्थापित कर देना।
भारत और क्रियोलीकरण
भारत में नगालैंड की 18 बोलियों को मिला कर जो सम्पर्क भाषा बनायी गयी है उसे नगमीज कहते हैं। वह अपने देश की हाल ही में बनी क्रियोल भाषा है जिसकी लिपि रोमन है। कोंकणी को भी रोमन लिपि में लिखे जाने की निर्णय लिया गया है। वहां पुर्जगीज और कोंकणी भाषा का क्रियोल है। गुयाना में 43 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते हैं वहां देवनागरी की जगह रोमन लिपि को चलाया गया है।
कहां बोली जाती है क्रियोल भाषा
हैतियाई क्रियोल भाषा, हैती में तकरीबन पूरी जनसंख्या ८० लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। इसके अलावा बहामास, क्यूबा, कनाडा, केमन द्वीप-समूह, डोमिनिकन गणराज्य, फ्रेंच गुयाना, गुआदेलूप, प्युर्तो रिको और संयुक्त राज्य अमेरिका में बसे करीबन दस लाख प्रवासी लोगों द्वारा बोली जाती है। यह भाषा दुनिया में सर्वाधिक प्रचलित क्रियोल भाषा है।
हिन्दी का हिंग्लिश बनाना उसका वैसा ही क्रियोलीकरण है, जैसा पहले फ्रांस या इंगलैंड का उपनिवेश रह चुके कैरेबियाई देशों भाषाएं हैं।
डॉ.अभिज्ञात का मतः
भारत जैसे देश में क्रियोलीकरण का हव्वा खड़ा किया जा रहा है और वस्तुस्थिति को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जा रहा है। हिन्दी अख़बारों में लाइफ स्टाइल या यूथ प्लस के नाम पर फ़ीचर सप्लीमेंट दिये जा रहे हैं उनमें हिंगलिश अर्थात हिन्दी अंग्रेजी की खिचड़ी भाषा दी जा रही है तो इसका मतलब इस बात नहीं निकाला जाना चाहिए कि अख़बार उसी भाषा की दिशा में बढ़ रहा है या यह अंग्रेजी के साम्राज्यवाद का बढ़ावा देने के लिए किसी षड़यंत्र के तहत किया जा रहा है। यह उस युवा पीढ़ी को हिन्दी अख़बार से जोड़ने का उपक्रम है जो हिन्दी भाषी परिवारों में अंग्रेजी पढ़ने वाले युवा हैं। हिन्दी अख़बार दरअसल किसी घर में व्यक्ति विशेष के लिए नहीं आते। दैनिक हिन्दी अखबार पूरे परिवार द्वारा पढ़ा जाता है जिसमें हर आयु व रुचि के लोग होते हैं। यदि उसमें गंभीर समाचार होते हैं तो विश्लेषण परक लेख भी होते हैं। उसी तरह किसी सप्लीमेंट में लतीफे और कविताएं भी होती हैं और कहानिया तथा
सुडोकू भी। पकवान की विधि भी होती है और राशिफल भी। शेयर के रेट भी होते हैं। बच्चों के लिए रंग भरने के लिए चित्र भी होते हैं। अब यदि युवा पीढ़ी के लिए अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी का सप्लीमेंट युवाओं के टेस्ट को ध्यान में रखकर निकलने लगा तो हाय तौबा मच गयी। और कहा जा रहा है कि साहब यह तो हिन्दी का क्रियोलीकरण किया जा रहा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि एक मिथ्या 'यूथ-कल्चर' बनाया जा रहा है जिनका कुल मकसद अंग्रेजी भाषा तथा जीवन शैली को उन्माद की तरह उनसे जोड़ा जाये जिसमें भाषा, भूषा और भोजन के स्तर पर वह अंग्रेजी के नये उपनिवेश के शिकंजे में आ जाये। वह परम्परच्युत हो जाये और अपनी-अपनी मातृभाषा को न केवल हेय समझने लगे। इससे पूरी की पूरी युवा पीढ़ी से उसकी भाषा छीन ली जायेगी। हिन्दी का हिंग्लिश बनाना उसका वैसा ही क्रियोलीकरण है, जैसा पहले फ्रांस या इंगलैंड का उपनिवेश रह चुके कैरेबियाई देशों की भाषाएं हैं।

यहां यह गौरतलब है कि जिन देशों में जिन स्थितियों में भाषाओं का क्रियोलीकरण संभव है वैसे हालत फिलवक्त भारत के नहीं हैं। यह भी सही है बाजार के कारण दो भाषाओं के बीच के आदान-प्रदान से भाषा का जो क्रियोलीकरण होता है उसकी जड़ें गहरी नहीं होतीं उस भाषा में साहित्य संस्कृति जैसे मुद्दों पर विचार संभव नहीं। किन्तु यह नहीं भूलना होगा कि भारत में ऊर्दू भाषा फारसी खड़ी बोली के क्रियोल का ही उदाहरण है। और किन्हीं अर्थों में अपनी यह हिन्दी भी खड़ी बोली, भोजपुरी, ब्रजभाषा अवधी जैसी बोलियां का क्रियोल हैं। भारत में विभिन्न भाषाओं और धर्मों के लोग रहते हैं उनके बीच के सांस्कृतिक आदान प्रदान में दरअसल क्रियोल ही है। हमारा देश क्रियोलीकरण की शक्ति का परिचायक है।
हमारे बीच क्रियोलीकरण के मुद्दे विद्वेषपूर्ण ढंग से प्रचारित करने की साजिश क्यों और किससे इशारे पर की जा रही है इस पर भी गौर करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार के उदाहरण देकर क्रियोलीकरण की प्रक्रिया को समझाया जा रहा उससे यह प्रवृत्ति जोर पकड़ेगी की हमें अपनी भाषा और संस्कृति में दूसरी भाषा व संस्कृति के दरवाज़े बंद कर लेने हैं या उन्हें खोज खोज कर बाहर का रास्ता दिखाकर शुद्धिकरण करना है तो पूरा देश सांस्कृतिक वैमनस्य में जलने लगेगा। इस आग लगाने की साजिश से भी सावधान रहने की ज़रूरत है। यह गौरतलब है कि क्रियोलीकरण से सजग करने वाले हमारे हितैषियों का मुख्य लक्ष्य भारतीय भाषाओं का अंग्रेजी के साथ क्रियोलीकरण के खिलाफ है। जब क्रियोलीकरण खतरनाक है तो चाहे जिसके किसी के बीच हो वह समान रूप से खतरनाक होगा ऐसा क्यों नहीं कहा जा रहा है। उसका कारण साजिशकर्ता शक्तियों के अपने हित हैं। ये साजिशकर्ता हमें यह याद दिलाना नहीं भूलते कि हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत ही अंग्रेजी को भारत से खदेड़ने की प्रतिबद्धता से हुई थी। वे यह भूल जाते हैं कि उसे समय हमारा देश अंग्रेजी शासन का गुलाम था और अंग्रेजी हम पर हुकूमत करने वालों की भाषा थी इसलिए हुक्मरानों की भाषा का तिरस्कार भी हुक्मरान का तिरस्कार था। वरना अंग्रेजी भाषा से किसी का क्या विरोध होता और क्यों होता। किन्तु आज स्वतंत्र भारत में हम पर हुकूमत करने वालों की भाषा नहीं है बल्कि वह मित्र राष्ट्र की भाषा है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हाल ही भारत दौरा किया है और हमारे मैत्रिपूर्ण सम्बंध और गहराये हैं जो परमाणु समझौते से शुरू हुए थे। भारत और अमरीकी की बढ़ती करीबी एक ऐसे देश को खल रही है जो भारत के समान ही विश्व की उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा रहा है। भारत और चीन दोनों के पास बाजार की विपुल संभावनाएं हैं और विश्व के सर्वशक्तिमान देश स्वयं अमरीका ने स्वीकार किया है कि आने वाले दिनों में चीन और भारत की ऐसे देश हैं जिनसे उसे कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में अमरीका की भारत के साथ करीबी चीन की अपनी कूटनीति के विरोध में जाती है और जवाब में वह हमारे पड़ोसी शत्रुराष्ट्र पाकिस्तान के साथ अपनी करीबी बढ़ाता रहता है। यह स्वाभाविक है कि वह ऐसी चालें चले जिससे भारत के लोग अमरीका से भड़कें।
हाल की ओमाबा की यात्रा के बाद आर्थिक लेन देन और व्यापार की बढ़ती सम्भावनाएं दोनों देशों को सांस्कृतिक स्तर पर भी करीब लायेंगी। ऐसे में अंग्रेजी और रोमन लिपि के प्रति भारतीय लोगों के मन में आशंका के बीज रोपने की साजिश चीन करें तो इसमे कोई हैरत नहीं। इससे एक पंथ दो काज संभव है एक रोमन लिपि के प्रति विद्वेष की भावना पैदा कर दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक करीबी की संभावनाओं को क्षीण करना दूसरे आवश्यकनासुर भारत को भाषाई और सांस्कृतिक वैमनस्य की आग में झोंककर उसकी आंतरिक शक्ति को विखंडित करना। भारत चूंकि साझी संस्कृति का देश है इसलिए सांस्कृतिक अलगाव और संकीर्णता उसके विकास को आसानी से अवरुद्ध कर सकता है। अभी तो भाषा के क्रियोलीणकर का खतरा दिखाया जा रहा है बाद में सांस्कृतिक क्रियोलीकरण तक बात पहुंचेगी और साजिश के तहत इस बात की गणना करायी जाने लगेगी कि भारत की किस भाषा में भारत की ही किस भाषा के कितने शब्द हैं और इससे कैसे एक भारतीय मूल भाषा भाषा ने दूसरी भाऱतीय मूल भाषा को विकृत किया है। हमारी शक्तियों को हमारी विकृति की संज्ञा दी जाने लगेगी और हमारे अवचेतन में उसे बैठा दिया जायेगा। इसलिए दोस्तो यह समझने की जरूरत है कि कहीं चोर दरवाज़े से हमारे को तोड़ने की साजिश तो नहीं रची जा रही है। पहला हमला चौथे स्तम्भ पर किया गया है। और जो देश को तोड़ने वाली ताकतों की शिनाख्त करता है उस मीडिया पर ही अपना निशाना साधा गया है ताकि वह बचाव मुद्रा में रहे और उसे भाषा व संस्कृति की चिन्ता करने वाले प्रबुद्ध वर्ग का भी समर्थन प्राप्त हो सके। प्रबुद्ध वर्ग को यह समझाना बहुत आसान है कि अखबार भाषाई विकृति फैला रहे हैं। लेकिन आरोप लगाने वालों को इरादे कितने संगीन हैं इस पर भी बौद्धिक लोगों को गौर करना पड़ेगा वरना वह दिन दूर नहीं जब क्रियोलीकरण का खतरा दिखाकर देश को परस्पर वैमनस्य की आग में झोंक दिया जायेगा।

इस प्रकार क्रियोल भाषा का संकट वहां का संकट है जहां प्रवासी लोग रहते हैं। वह भी वे प्रवासी जो अपनी जड़ों से किसी हद तक कट चुके हों। और दो या विभिन्न भाषा से जुड़े लोगों का लगातार सम्पर्क बनता है।
इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को हम मुगलकालीन परिस्थियों में देखते हैं तो पाते हैं कि फारसी और खड़ी बोली हिन्दी के क्रियोल से हमारे यहां दो नयी भाषाओं ने जन्म लिया। फारसी व्याकरण व शब्दों व खड़ी बोली से उर्दू बनी और खड़ी बोली और संस्कृत व्याकरण से हिन्दी। कहना न होगा कि आज की जो हिन्दी है वह किसी हद तक क्रियोल ही है। जिसमें भोजपुरी, मगही, ब्रज भाषा, राजस्थानी, हरियाणवी आदि के शब्द मिले हुए हैं और मराठी, गुजराती, पंजाबी आदि के भी कई शब्द हैं।
यहां देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने वाले हिन्दी भाषी लोग वहां की भाषा के शब्दों को भी हिन्दी में समाहित कर लेते हैं। और हिन्दी के शब्द वहां की भाषा को दे देते हैं। यहां कई बंगला के शब्दों को हम धड़ल्ले से हिन्दी में भी प्रयोग कर लेते हैं। साहित्य की दुनिया में भले ऐसे प्रयोग कम हों लेकिन बोलचाल वाले इससे कतई परहेज नहीं करते। बंगला वाले भी हमारी भोजपुरी के शब्दों के अपनाते हैं। हमारा देश मिली जुली संस्कृतियों और कई भाषाओं का देश है। और यहां की भाषा पर दूसरी भाषाएं भी स्वाभाविक तौर पर प्रभाव डाल सकती हैं तो इसे हम अपनी खूबी मानते हैं।
ध्यान रहे कि क्रियोल के बहाने भाषा के नाम पर फसाद की तैयारी चल रही है। क्या हम भाषा के नाम पर सिरे से फसाद को तैयार हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज हम यह कहकर विरोध शुरू करें कि अंग्रेजी के शब्द हिन्दी को भ्रष्ट कर रहे हैं और कल कहें कि हमारी हिन्दी को बंगला भ्रष्ट कर रही है और बंगला कहे कि हमारे शब्दों को हिन्दी डस रही है। यदि हम अंग्रेजी के प्रयोग को उसका साम्राज्यवादी ढर्रा कहेंगे तो कल को हिन्दी पर भी हमारे देश की दूसरी भाषाएं ऐसा आरोप लगा सकती हैं। भाषाओं पर बांध बनाकर ऊर्जा पैदा नहीं की जा सकती। भाषा प्रवाह का नाम है। प्रयोग ही भाषा को जीवंतता प्रदान करता है। भाषा अपने पाठक खोकर अपना शुद्ध रूप भले बचा ले लेकिन जो भाषा को अपनी अस्मिता का प्रश्न नहीं मानते बल्कि स्वयं की अभिव्यक्ति का साधन मानते हैं वे आवश्यकता के अनुसार भाषा को बदलेंगे तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता। क्या हम चाहकर भी आज पत्र लेखन को बचा पाये। नहीं। टेलीफोन के प्रचार प्रसार ने उसे खतरे में डाल दिया है। ईमेल और एसएमएस ने इसमें योगदान किया। हम खतों को बचाने के लिए लोगों के हाथ से टेलिफोन, ईमेल, एसएमएस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। जो इनसे बचेंगे वे स्वयं दरकिनार कर दिये जायेंगे।
पाण्डुलिपियां खतरे में हैं। आज लेखक सीधे कम्प्यूटर पर लिख रहे हैं। वह सुविधाजनक हो गया है। अब हाथ से लिखने में दिक्कत हो रही है। हस्ताक्षर के अलावा लिखित प्रयोग कम ही बचे हैं। हस्तलिपियां खतरे में हैं। शिलालेखों और ताम्रपत्रों पर लेखन जैसे खत्म हो गया संभव हैं आज लिखने का ढर्रा भी लुप्त हो जाये। अभिव्यक्ति के तरीके बदलेंगे। भाषा बदलेगी। अंदाज बदलेगा। तालमेल बिठाना होगा। क्रियोल की समस्या प्रवासी समुदायों की समस्या है। हमारे देश में यदि विभिन्न भाषाओं के लोग आयेंगे हमारा सम्पर्क होता तो भाषा का क्रियोलीकरण संभव है। हम दूसरे देश में जायेंगे तो यही होगा। यह मुल्क प्रवासी नहीं होने जा रहा। हमारी जड़ें गहरी हैं। दूसरे देश की समस्या को अपने यहां लागू करने का कोई अर्थ नहीं है।
मिश्रित भाषा में कुछ सफे अखबार दे रहे हैं कुछ पत्रिकाएं भी संभव है आयें। लेकिन वे गहरे सरोकारों वाली पत्रिकाएं नहीं हैं। वे लाइफ स्टाइल से जुड़ी होती हैं या उन बच्चों युवाओं को सम्बोधित होती हैं तो अंग्रेजी पढ़े लिखे हैं। कोई अखबार हर तरह के पाठक को बांधे रखना चाहता है या जुड़ना चाहता है तो इसके लिए इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं। यह प्रयोग बहुत सफल नहीं होंगे क्योंकि क्रियोल भाषा के लिए दोनों भाषाओं की जानकारी आवश्यक है। लेकिन प्रयोग का होना गलत नहीं है। कोई अखबार लतीफे भी छापता है तो वह पूरा अखबार लतीफा नहीं बनाना चाहता। विविधता अखबार में होती है होनी भी चाहिए।
यह शिगूफा हिन्दी में कहां से आया
यह इंदौरियन्स की करतूत है। 14 सितम्बर 2010 को हिन्दी दिवस के अवसर पर सबसे पहले विरोध का श्रीगणेश किया इन्दौर के बुद्धिजीवियों ने। समाजवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी, कथाकार चित्रकार प्रभु जोशी एंड कम्पनी ने यह हव्वा खड़ा किया है। उसका कोई मतलब नहीं है। अखबार की कापियां जलाने से बदलाव नहीं आने जा रहा है।
चीन की मंदारिन भाषा के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अधिक बोली जाने वाली हिन्दी भाषा को खत्म करने की कोशिशें कोई कर ले। इससे कुछ होना नहीं है।
'क्रियोलीकरण' एक ऐसी युक्ति है, जिसके जरिये धीरे-धीरे खामोशी से भाषा का ऐसे खत्म किया जाता है कि उसके बोलने वाले को पता ही नहीं लगता है कि यह सामान्य और सहज प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुनियोजित षडयंत्र है।
यह कहना गलत है कि उसके पीछे अंग्रेजी भाषा का साम्राज्यवादी एजेण्डा है। अंग्रेजी तो भारत में हिन्दी और भारतीय भाषाओं की जूतियां उठाने आ रही है। अंग्रेजी जानने वालों यहां धंधा करना है तो ग्राहक की भाषा में बात करनी होगी। अंग्रेजी बोलकर वे अपना माल नहीं बेच पायेंगे। ओबामा आये थे हमारे यहां अपने लोगों के लिए काम मांगने। वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। चीन और भारत के आगे पानी भरेगी अंग्रेजी रानी। हिन्दी में अग्रेजी शब्द आने से हमें चिन्ता नहीं है। हिन्दी सब हजम कर जायेगी। हिन्दी ने अंग्रेजी को अपनी शर्तों पर अपनाया है और अपनायेगी। वे हमारी हिन्दी का खराब करेंगे हम उनकी अंग्रेजी को लालू की स्टाइल में बोलउसकी ऐसा तैसी कर देंगे। हिन्दलिश से न डरे। अर्ध शिक्षित व नव धनाढ्यों की चाल लड़खड़ाती ही है। इनसे किसी को खतरा नहीं होता। ऐसे लोग आते जाते रहते हैं। ये दिखावटी लोग सब कुछ होने के फेर में कुछ नहीं होते और किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करते। बाजार के लिए ये लोग सबसे मुफीद होते हैं इन्हें बाजार दूहता है। बाजार से न डरें। बाजार से तरक्की होती है। जिसका बाजार नहीं रहता वह लुप्त हो जाता है चाहे वह कोई सम्पदा हो।
देश में 14 सितम्बर 2010 को हिन्दी दिवस के अवसर पर सबसे पहले विरोध का श्रीगणेश किया इन्दौर के बुद्धिजीवियों समाजवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी और कवि तपन भट्टाचार्य, प्रभु जोशी, जीवन सिंह ठाकुर, प्रकाश कांत शामिल हुए। इनका कहना है-'भूमण्डलीकरण के सबसे बड़े हथियार 'अंग्रेजी के नवसाम्राज्यवाद' का स्वागत जितने अधिक उत्साह से हमारे प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने किया, उसके पहले तमाम भारतीय भाषाओं, जिन्हें अंग्रेज नॉन-स्टेडर्ण्ड और वर्नाकुलर लैंग्विज कह के निरादृत करते थे-उनको नष्ट करने की खामोशी से की गई साजिश का नाम है - भाषा का 'क्रियोलीकरण' जिसके अंतर्गत हिन्दी में 'शामिल शब्दावलि' की आड़ में अंग्रेजी के शब्दों की धीरे-धीरे इतनी तादाद बढ़ाई जा रही थी कि वह हिन्दी न रह कर 'हिंग्लिश' होने लगी। 'क्रियोलीकरण' की प्रक्रिया का पहला चरण होता है, मूल भाषा के शब्दों का धीरे-धीरे अंग्रेजी के शब्दों से विस्थापन। हिन्दी के दैनंदिन शब्दों को बहुत तेजी से हटाकर उनके स्थान पर अंग्रेजी के शब्द लाये जा रहे हैं। मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेण्ट्स/ माता-पिता की जगह पेरेण्ट्स/ अध्यापक की जगह टीचर्स/ विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी/ परीक्षा की जगह एक्झाम/ अवसर की जगह अपार्चुनिटी/ प्रवेश की जगह इण्ट्रेन्स/ संस्थान की जगह इंस्टीटयूशन/ चौराहे की जगह स्क्वायर रविवार-सोमवार की जगह सण्डे-मण्डे/ भारत की जगह इण्डिया। इसके साथ ही साथ पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिन्दी की बजाय अंग्रेजी के छपना/ जैसे आऊट ऑफ रीच, बियाण्ड एप्रोच, मॉरली लोडेड कमिंग जनरेशन/ डिसीजन मेकिंग/ रिजल्ट ओरियण्टेड प्रोग्राम/हिन्दी को देवनागरी के बजाय रोमन में छापना शुरू कर दीजिये। बीसवीं शताब्दी में सारी अफ्रीकी भाषाओं को अंग्रेजी क सम्राज्यवादी आयोजना के तरह इसी तरह खत्म किया गया और अब बारी भारतीय भाषाओं की है। इसलिए, 'हिन्दी हिंग्लिश', 'बांग्ला', 'बांग्लिश', 'तमिल', 'तमिलिश' की जा रही है। हम यह प्रतिरोध हिन्दी के साथ ही साथ तमाम भारतीय भाषाओं के 'क्रिओलीकरण' के विरूध्द है, जिसमें, गुजराती-मराठी, कन्नड़, उडिय़ा, असममिया, सभी भाषाएँ शामिल हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के धूर्त दलालों के दिशा निर्देश में संसार की इस दूसरी बड़ी बोले जाने वाली भाषा से उसकी लिपि छीन कर, उसे रोमन लिपि थमाने की दिशा में हिन्दी के कई अखबार जुट गए हैं।'
क्या आप इंदौरियंस से सहमत हैं?

Thursday, 18 November 2010

पत्रकारिता की रीढ़ होते हैं सवाल

(एक कालेज में पत्रकारिता की क्लास लेने का आफर मिला। पढ़ाने का कभी न तो सोचा था न अवसर मिला। झिझक थी कि कहीं ऐसा न हो मुद्दे से बहक जाऊं। सो एक खाका तैयार कर लिया। यह बात दीगर है डेढ़ घंटे आसानी से बीत गये यह नोट देखने की जरूरत नहींं पड़ी। वह नोट आपसे शेयर कर रहा हूं।)
सवाल पूछना दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है क्योंकि सही सवाल समस्या के निदान की पहली कड़ी है या कहें कि आधा जवाब है। आदमी की पहचान उसके सवालों से की जा सकती है। और किसी भी समाज के अध्ययन के लिए उस दौर के सवालों को देखा जाना चाहिए कि वह दौर किन सवालों से जूझ रहा था। सवाल ही उस दौर की समस्याओं को नहीं दर्शाता बल्कि यह भी बतलाता है कि लोग उससे जूझने के लिए किन विकल्पों पर विचार कर रहे थे। इसलिए किसी की बौद्धिकता को कुंद करना है तो सवाल की इजाजत न दें। कुछ दिन में प्रश्न उठना बंद हो जायेगा।
पत्रकारिता में सबसे अहम कड़ी होती है सवालों की। क्या, कब, क्यों, कहां, कैसे आदि पांच सवालों पर पत्रकारिता की बुनियाद टिकी हुई है और यह दृढ़ता से माना जाता है कि कोई समाचार यदि इन पांच सवालों से नहीं जूझता है तो उसमें कमी है। हिन्दी पत्रकारिता में इंट्रो में इन पांचों का होना लगभग अनिवार्य माना जाता है। ताकि शुरुआती दो तीन पंक्तियां पढ़कर ही पाठक को संक्षेप में घटना का पता चल जाये। जरूरी पांच प्रश्नों का मामला दरअसल हार्ड न्यूज से जुड़ा हुआ है फिर भी प्रश्नों की उपयोगिता दूसरे आलेखों में कम नहीं है। आज की पत्रकारिता में फीचर या आलेखों का महत्व दिनों दिन बढ़ता जा रहा है जिसमें सवाल प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसमें केवल उन्हीं पांच सवालों से काम नहीं चलता है। इसमें जिस पत्रकार, साक्षात्कारकर्ता या आलेख के लेखक के पास जितने अधिक सवाल होंगे वह उतना ही कामयाब होगा। क्योंकि वस्तुस्थिति और बहुआयामी संभावना से पाठकों को परिचित करना पत्रकारिता के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है।
अधिक सवाल का आशय यहां इस बात से कतई नहीं है कि प्रश्न उलजुलूल हों। प्रश्न का उत्तर देने वाले से गहरा ताल्लुक होना अनिवार्य है या फिर आप जिस मुद्दे पर उसकी प्रतिक्रिया चाहते हैं वह उसे उजागर करने में अपनी भूमिका निभाये।
किसी का साक्षात्कार करने के पूर्व इंटरव्यू देने वाले के अध्ययन, पद, कार्य अनुभव आदि की जानकारी पहले ही प्राप्त कर लेना सहायक होता है ताकि असम्बंध प्रश्न पूछने के बाद झेंप का सामना न करना पड़े। किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से वे सवाल नहीं पूछने चाहिए जो जगजाहिर हों। उनसे नयी योजनाओं के बारे में पूछा जा सकता है। उसने पिछले कार्यों से क्या सीखा यह जाना जा सकता है। बड़े बड़े लोगों की छोटी छोटी बातें भी लोग पढऩा पसंद करते हैं कि इसलिए उनसे मामूली बातें भी पूछी जा सकती हैं बशर्ते असम्बद्ध न हों। यहां यह गौरतलब है कि पहले से तैयार प्रश्नावली किसी हद तक ही इंटरव्यू लेने में सहायक होती है। मिले हुए जवाबों में भी सवाल निकलते हैं जो इस कला को महत्व देगा उसका इंटरव्यू और अच्छा होगा। किसी विशेषीकृत विषय पर प्रश्न पूछते समय इस विषय के प्रचलित शब्दों के अर्थ मालूम होना चाहिए। हर क्षेत्र विशेष में कुछ खास शब्द प्रचलित होते हैं जिनका सामान्य अर्थ निकलने पर गलती हो जाती है। उनके पारिभाषिक अर्थ होते हैं। विषय की गहरी जानकारी न होने पर उन शब्दों से बचना चाहिए। या फिर जानते हैं तो वह बातचीत में अधिक सहायक होते हैं।
विषय पर गहरे प्रश्न ही पूछे जायें ऐसा नहीं है। जिस मीडिया से लिए साक्षात्कार लिया जा रहा है उसकी आवश्यकता को समझते हुए कुछ रोचक सवाल भी पूछे जाने चाहिए ताकि इंटरव्यू पढऩे वाले को वह सरस लगे। किसी के कहे शब्दों को तोड़ मरोड़ कर पेश नहीं करना चाहिए वरना सभी पक्षों के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। यह जरूर है कि आप चाहें तो इंटरव्यू देने वाले को बातों में उलझाकर वह बातें उसी के मुंह से कहलवा लें जिस कहने से वह बचना चाहता है। आपके इंटरव्यू को चॢचत कर दे। ऐसे प्रश्नों के मामूली ढंग से पूछें ताकि उत्तर देने वाला चौकस न हो जाये। इंटरव्यू लेने के पूर्व थोड़ी देर इधर उधर की हल्की फुल्की बातें करें जिससे आपके साथ उत्तर देने वाले का तालमेल बन जाये। यह तालमेल भरा रिश्ता इंटरव्यू के समय काम आयेगा।

Friday, 8 October 2010

दिल को छूती उदासी

sanmarg 10/10/2010


चांदनी रात का घाट/लेखिका-अनुपमा बसुमतारी/असमिया से हिन्दी अनुवाद-दिनकर कुमार/प्रकाशक-बुक फैक्ट्री, पूर्वांचल प्रिंट्स, उलुबाड़ी, गुवाहाटी/मूल्य-100 रुपये।
समकालीन असमिया कविता को जो लोग नया रूपाकार देने में जुटे हैं उनमें एक महत्वपूर्ण नाम अनुपमा बसुमतारी का भी है। असम की आंचलिक विशिष्टताओं को, उसके वैभव और सौन्दर्य के साथ अपनी कविताओं में उन्होंने व्यक्त किया है। इनमें कवयित्री के निजी संदर्भ भी शामिल हैं जिसके कारण इस संग्रह की कविताएं एक ऐसे अनुभव जगत का साबका पाठकों से कराती हैं जो सम्मोहक भी और विश्वसनीय भी। कैंसर से पीडित बहन, पिता, दादी, तेजी ग्रोवर इन कविताओं में निजी संदर्भों और बिम्बों के साथ उपस्थित हैं और एक अनाम व्यक्ति जिसकी चाहत इन कविताओं में बार- बार झांकती है और जिसके बिछोह के कारण एक अकेलापन भी इन कविताओं में है, जो पाठक को उदास करता रहता है। एक कविता में उसकी बानगी देखें-'मैं अब सागर से अधिक मरुभूमि को चाहती हूं/ चांदनी से अधिक चाहती हूं धूप में दमक रहे बालू के स्तूप को/रोशनी से अधिक अंधेरा और आनंद से अधिक विषाद।' इन कविताओं में समुद्र और नदी की लगातार उपस्थिति है और उदासी और कविता की गहराई को और गहरा करते हैं। यह कविताएं पाठक के मन में अपनी एक खास जगह बनाने में कामयाब हैं।
नारी अस्मिता से जुड़े सवालों के कारण यह कविताओं को वैचारिक स्तर भी हमें प्रभावित उद्वेलित करती हैं।
अनुपमा की छह कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं तथा दो दशकों के अपने लेखकीय जीवन में तमाम पत्र पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। यह पुस्तक उनकी प्रतिनिधि रचनाओं का एक ऐसा संकलन है जिसमें उनकी काव्य प्रतिभा की समग्रता का एहसास कराता है। कवयित्री के लिए कविता अमृत स्वर है।
इन कविताओं का अनुवाद दिनकर कुमार ने किया है, जो स्वयं एक समर्थ रचनाकार हैं साथ ही साथ असमिया से हिन्दी के एक विख्यात अनुवादक भी हैं। उन्होंने लगभग चालीस पुस्तकों का अनुवाद किया है। इस संग्रह के अनुवाद में उन्होंने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि कविताएं अर्थ को तो व्यक्त करें पर असम की मिट्टी की खुशबू भी उसमें बची रहे। साथ ही वह कहने का अन्दाज भी जो किसी कवि को दूसरे अलग और विशिष्ट बनाता है।

Thursday, 23 September 2010

युवाओं को दायित्वबोध के प्रति जाग्रत करती कविता



तुम जो सचमुच भारत भाग्य विधाता हो/लेखक-विजय बहादुर सिंह/प्रकाशक-सदीनामा प्रकाशन, एच-5, गवर्नमेंट क्वार्टर्स, बजबज, कोलकाता-700137/मूल्य-70 रुपये

प्रख्यात आलोचक-कवि विजय बहादुर सिंह की लम्बी कविता पुस्तक 'तुम जो सचमुच भारत भाग्य विधाता हो' हिन्दी कविता की एक विलक्षण कविता है जिसमें अपने देश की तल्ख स्थितियों की बेबाक अभिव्यक्त है। इस कविता में जहां व्यंग्य और कटाक्ष हैं वहीं आह्वान भी स्थितियों को बदलने का। अपनी अभिव्यक्त शैली और कहन के अन्दाज के कारण यह कविता जहां धूमिल की कविताओं के करीब है वहीं चिन्ताओं के कारण वह मुक्तिबोध की 'अंधेरे मेंÓ की काव्य विरासत को आगे बढ़ाती है। रमेश कुंतल मेघ इसे राजकमल चौधरी की मुक्तिप्रसंग, राजीव सक्सेना की आत्मनिर्वासन के विरुद्ध तथा धूमिल की पटकथा कविता के क्रम की एक कड़ी के रूप में देखते हैं।
इस कविता में जहां अपनी विरासत से जुड़े राम, कृष्ण हैं वहीं विरासत को बचाने की चिन्ता में जीने- मरने वाले गांधी जी, मंगल पाण्डे, बिस्मिल, भगत सिंह जैसे लोगों के अवदान को याद करते हुए उनसे हालत में बदलने की शक्ति अॢजत करने का आह्वान है। युवाओं के प्रति जो आस्था इस कविता में व्यक्त की गयी है वह आकृष्ट करती है। यह कविता उन्हें झकझोरती है और उनके दायित्व का उन्हें बोध कराती है-'किसी पल चाहकर देखना/ पाओगे कि कोई न कोई चिनगारी/तुम्हारी अपनी ही राख में दबी पड़ी है/तुम्हारी चेतना की लाश/ तुम्हारे अपने ही बेसुध अस्तित्व के पास कहीं गड़ी है।'
आधुनिक भारत की निर्माण का स्वप्न भी इसमें है और इस स्वप्न को पूरा करने में बाधक बनी शक्तियों पर हमला भी। मौजूदा राष्ट्रीय चरित्र के पतन का दंश इसमें बार बार उभर कर आया है।
यह कविता 'वागर्थÓ के जनवरी 2010 के अंक में सम्पादकीय के तौर पर प्रकाशित हुई थी। जिस पर देश भर में व्यापक प्रतिक्रिया हुई और कई नामचीन लेखकों ने लिखित प्रतिक्रियाएं भी दीं। उनमें से इस पुस्तक में कमल किशोर गोयनका, रमेश कुंतल मेघ, गिरिराज किशोर, शशिप्रकाश चौधरी, महावीर अग्रवाल की प्रतिक्रियाएं भी प्रकाशित हैं, जिसके आलोक में इन कविताओं का पढऩा इसके अर्थ और व्याप्ति को नया संदर्भ देता है। कमल किशोर गोयनका ने तो इस कविता को आत्मा से निकला हुआ शंखनाद बताया है। इस कविता से प्रभावित होकर चांस पत्रिका के सम्पादक सुरेन्द्र कुमार सिंह ने एक और कविता लिखी है, वह भी इसमें संकलित है।
यह अनायास नहीं है कि कई भारतीय भाषाओं में इस कविता का अनुवाद हुआ है जिसमें से बंगला, मराठी, उडिय़ा, डोगरी, पंजाबी, नेपाली और उर्दू में अनुवाद इस संग्रह में प्रकाशित किया गया है। इस प्रकार एक ही रचना का विविध भाषाओं में अनुवाद की पुस्तक का प्रकाशित होना भाषाई आदान प्रदान के लिहाज से अनुकरणीय और सराहनीय है। जिसके लिए इसके संकलनकर्ता जितेन्द्र जितांशु बधाई के पात्र हैं।

Monday, 13 September 2010

हिन्दी दिवस पर कुछ यक्ष प्रश्न

प्रकाशितः देशबंधु, दैनिक 11, Sep, 2011, Sunday













Sanmarg-19/9/2010

हिन्दी के बारे में यह मातम मनाने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है कि उसकी गरिमा को उन शब्दों से ठेस पहुंच रही है जो मूलतः हिन्दी के हैं ही नहीं। वे अंग्रेज़ी, मराठी, बंगला, पंजाबी या दूसरी भारतीय या विदेशी भाषाओं से आयातित हैं। दूसरी भाषाओं के मेल-जोल से जो भाषा बन रही है वह भ्रष्ट है और उससे हिन्दी के मूल स्वरूप को क्षति पहुंचेगी। इधर जोर शोर से कहा जा रहा है कि अब तो भाषा प्रयोग में आ रही है वह हिंग्लिश है हिन्दी या इंग्लिश नहीं। इस स्थिति से दुखी होने की बजाय हमें यह समझना चाहिए कि जिस किसी भाषा में बदलाव दिखायी दे वही जीवन्त भाषा है। भाषा में परिवर्तन का विरोध उसकी जीवंतता का विरोध है। जो भाषा जितनी परिवर्तनशील है समझें कि वह उतनी ही जीवन्त है। यह प्रवाह ही है जो वास्तविक ऊर्जा का स्रोत होता है।
हिन्दी को अगर ख़तरा है तो हिन्दी को बचाने की सुपारी लेने वालों से। वे जो उसके व्याकरण को लेकर चिन्तित हैं वे उसे जड़ बनाने पर तुले हुए हैं। हिन्दी की पूजा करने वाले, हिन्दी को भजने वाले चाहते हैं कि हिन्दी पर चढ़ावा चढ़ता रहे और वे उसकी आरती के थाल के चढ़ावे पर खाते कमाते रहें। भाषा में कोई नयी प्रयोग हुआ नहीं कि हायतौबा मचाते हैं। दीवार पर लगे पोस्टरों, नेमप्लेट, विजिटिंग कार्ड, अखबार की खबरों, विज्ञापनों हर कहीं हिन्दी को शुद्ध रूप में देखना चाहते हैं और रोते-बिसुरते रहते कि हिन्दी तो गयी। जबकि अशुद्ध बोलना, लिखना और उसका व्यापक इस्तेमाल यह बताता है कि हिन्दी का प्रयोग वे लोग कर रहे हैं जिनका हिन्दी पर न तो व्यापक अधिकार न अध्ययन न ही वह उनकी भाषा है। इस तरह के प्रयोग आम लोगों के प्रयोग है और उन्हें यह करने देना चाहिए। हिन्दी का हव्वा खड़ा करके हिन्दी को लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता। हिन्दी को हिन्दी अधिकारियों और हिन्दी के शिक्षकों ने जितना लोकप्रिय नहीं किया है उससे अधिक लोकप्रिय फिल्मों और उसके गीतों ने किया है। आम प्रचलन ही हिन्दी को विकसित करेगा। लोगों को हिन्दी गलत बोलने दें गलत लिखने दें। आते आते भाषा उन्हें आ ही जायेगी और शुद्ध नहीं भी आयी तो कोई बात नहीं। भाषा का विस्तार तो हुआ। यह बहुत है।
हिन्दी को बढ़ावा दिया है जो व्यापार करते हैं। उन्हें हिन्दीभाषी प्रदेशों में अपना माल बेचना है तो उत्पाद की प्रशंसा, उत्पाद की जानकारी हिन्दी में देनी है। वे हिन्दी अख़बारों में विज्ञापन देते हैं जिससे हिन्दी के अखबार फल-फूल रहे हैं। हिन्दी के टीवी कार्यक्रमों में विज्ञापन देते हैं तो मनोरंजन उद्योग बढ़ रहा है। ये अखबार, ये टीवी चैनल सिर्फ़ विज्ञापन परोस कर ज़िन्दा नहीं रह सकते। उन्हें जनत के दुखदर्द से जुड़ना पड़ता है। इसके बिना जनता उन्हें नहीं अपनायेगी फिर विज्ञापन भी उन तक नहीं पहुंचेगे। इसलिए अखबारों व टीवी की यह मज़बूरी है कि वे यदि विज्ञापन को जनता तक पहुंचाना चाहते हैं तो जनता की आवाज़ बनें, उनकी पसंद का खयाल रखें, उन्हें वह दें जो वह चाहती है। उन्हं यदि मुनाफा कमाना है तो जनदर्दी बनना ही होगा। मज़बूरी में जनदर्दी नेता ही नहीं बनते धंधेबाज भी बनते हैं। मतलब यह कि उपयोगिता किसी भाषा के विकास की तर को तीव्र करती है और प्रगति के लिए रदस पहुंचाती है। हिन्दी का उपयोग आप बढ़ा दें तो उसका महत्व अपने आप बढ़ जायेगा। हिन्दी में रोज़गार बढ़ेगा, व्यापार बढ़ेगा तो रुतबा अपने आप बढ़ेगा। आप बस हिन्दी पर भरोसा की किजिए, हिन्दी का सम्मान कीजिए वह आपको सम्मान दिलायेगी। हिन्दी को अपनाकर हिन्दी की सामूहिक शक्ति को बढ़ायें। यह सामूहिक शक्ति ही बड़ी बात है। इसलिए हम विभिन्न भाषाओं वाले देश में अपनी-अपनी भाषा बोलते रहें पर सामूहिक शक्ति का परिचायक हिन्दी को बनायें और उसे भी मज़बूती दें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक अरब से अधिक लोगों की जुबान हिन्दी बने, उनकी अस्मिता और उनके सम्मान की प्रतीक बने तो देंखे हिन्दी का जादू। दुनिया के सिर चढ़कर बोलेगा।
-अंग्रेजी के जो शब्द आम जनता के प्रचलन में आ गये हैं उनके लिए हिन्दी के नये शब्दों को गढ़ने का काम बंद होना चाहिए। बल्कि उन्हें हिन्दी में प्रयोग के लिए बढ़ावा देना चाहिए। लोगों की हिचक दूर करना चाहिए कि वे अंग्रेजी के शब्द का हिन्दी में प्रयोग धड़ल्ले से करें। इतना करें कि वह ऐसा रचबस जाये कि वह हिन्दी का ही लगने लगे। हिन्दी का विकास चाहते हैं तो नये शब्द गढ़ने बंद कीजिए और दूसरी भाषा के शब्दों को हिन्दी के स्वभाव के अनुरूप अपना लीजिए। समस्या खत्म हो जायेगी। हिन्दी को मेल मिलाप की भाषा बनने से एकदम गुरेज नहीं है।
हिन्दी को खतरा उन लोगों से भी है जो चाहते हैं कि हिन्दी की बोलियों का विकास रुक जाये। वे यदि भाषा का दर्जा पाने की कोशिश करती हैं तो उन्हें लगने लगता है कि हिन्दी का क्या होगा? हिन्दी कैसे रहेगी। यदि उसकी बोलियां स्वतंत्र भाषा हो गयीं तो फिर हिन्दी का क्या रह जायेगा। उन्हें लगता है कि भोजपुरी, राजस्थानी, अवधी, ब्राजभाषा, मगही यदि भाषा बन गयी तो हिन्दी कमज़ोर हो जायेगी। वे यह भी मानते हैं कि मैथिली जैसी भाषा की स्वतंत्र पहचान मिलने से हिन्दी कमज़ोर हुई है। तात्पर्य यह कि उनका मानना है कि हिन्दी का वर्चस्व इसलिए है कि हिन्दी इसलिए प्रमुख भाषा बनी हुई है क्योंकि कई बोलियों को स्वतंत्र भाषा का दर्जा नहीं मिला है। यदि उन्हें भी भाषा का दर्जा मिल गया तो कोई हिन्दी का नामलेवा नहीं रह जायेगा। इसी आधार पर कुछ मासूम लोग यह दावा तक कर बैठते हैं कि हिन्दी अगले बीस सालों में मर जायेगी क्योंकि हिन्दी की तमाम बोलियां भाषा बन जायेंगी। मैं उन लोगों से विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि हिन्दी की बोलियां भी यदि भाषा बन गयीं तो हिन्दी और मज़बूत होकर उभरेगी। उसका कारण यह है कि हिन्दी की बोली समझी जाने वाली भाषाओं के समर्थन के कारण दक्षिण भारत की भाषाएं या बालियां हिन्दी को अपने से दूर समझती थीं। हिन्दी की बोलियों को स्वतंत्र भाषा बन जाने के बाद दक्षिण की भाषाओं से हिन्दी का विभेदीपूर्ण रवैया खत्म हो जायेगा और वे भी हिन्दी को तटस्थ तौर पर स्वीकार करने लगेंगी। आखिर हमें एकसूत्रता में बांधने के लिए कोई भाषा तो चाहिए ही। और चूंकि भारतीय भाषाओं में हिन्दी को जानने समझने वाले सबसे ज्यादा है स्वाभाविक तौर पर वही सबकी पहली पसंद और प्राथमिकता है। कहना न होगा कि हिन्दी ही भारत में वह भाषा है जिसमें सबसे अधिक प्रांतों की स्मृतियां जुड़ी हैं और सबसे अधिक भारतीय भाषाओं के शब्द उसमें शामिल हैं। हिन्दी हमारी सर्वाधिक साझी स्मृति की भाषा है इसलिए साझी विरासत भी। बोलियों से स्वतंत्र भाषा होने से यह साझी विरासत और मज़बूत होगी। आज की हिन्दी अगर खड़ी बोली का विकास है तो इस अर्थ में वह किसी की भाषा नहीं है और इसलिए वह सबकी भाषा है। उसमें देश की तमाम बोलियों का नवनीत है। दूसरे जो हिन्दी भाषी नहीं हैं वे हिन्दी को क्यों नहीं अपनायेंगे, आख़िर अंग्रेज़ी जिनकी भाषा नहीं है क्या वे उसे पढ़ते-लिखते समझते नहीं हैं और क्या अंग्रेज़ी की जो मज़बूत स्थिति है उसमें गैर अंग्रेजीभाषी लोगों को योगदान नहीं है।
बोलियों के विकास से हिन्दी का महत्व और समझ में आयेगा। यह नहीं भूलना होगा कि रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर महात्मा गांधी तक जिन लोगों ने हिन्दी को भारत की भाषा बनाने की हिमायत की थी वे हिन्दी भाषा नहीं थे। उनका मानना तो बस इतना था कि जिसमें देश के बहुसंख्य लोगों की बात हो उसे ही इस देश की राष्ट्रभाषा की गरिमा प्रदान की जाये। यही लोकतंत्र का तकाजा है। वह सामर्थ्य उन्होंने हिन्दी में देखी थी। उसी में एकसूत्रता की शक्ति पायी थी।
(यह आलेख लेखक के केन्द्रीय संदर्भ पुस्तकालय, कोलकाता की ओर से 14 सितम्बर 2010 को हिन्दी पखवाड़ा के अन्तर्गत आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर दिये गये वक्तव्य का हिस्सा है। इस कार्यक्रम में विशेष अतिथि राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता के निदेशक स्वपन चक्रवर्ती एवं अध्यक्ष केन्द्रीय संदर्भ पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष डॉ.केके कोच्चुकोशी थे। कार्यक्रम का संचालन पुस्तकालय की उप सम्पादक अंचना श्रीवास्तव ने किया।)

Tuesday, 7 September 2010

तुम्हारी सम्पदा कोई छीन ले इससे अच्छा है परोपकार करो और बांट दो

अर्थ व्यवस्था के नियमों के बाहर होते हैं परोपकार के कामकाज। लेकिन इससे आॢथक असमानता को पाटने में अवश्य कुछ मदद मिल सकती है। बशर्ते परोपकार किसी अंधविश्वास के तहत न किया जा रहा हो। हमारे यहां मंदिरों में अकूत खजाने पड़े हुए हैं और उसका उपभोग निठल्ले करते हैं। इन मंदिरों में चढऩे वाले चढ़ावे अंधविश्वास से प्रेरित होते हैं जो अभिलाषाओं की पूॢत की चाह में पूरी होने पर ऋण के तौर पर चढ़ाये जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी सम्पन्नता और खुशहाली के लिए ईश्वरीय शक्तियों के प्रति आभारी होते हैं और आभार स्वरूप वे दान करते हैं। चाहे वह नगदी हो, आभूषण हो या जमीन। कुछ दान कर्मकांडों की वजह से भयस्वरूप भी लोग करते रहते हैं किन्तु इसके पीछे परोपकार की भावना नहींं होती है और ना ही दान देने वाला यह सोचता है कि हमारी दी गयी दौलत का उपयोग सही तरीके से हो रहा है नहीं। पंडे पुजारी महंतों की चांदी कटती कटती है। मंदिरों में आने वाले चढ़ावों और संचित सम्पदा का परोपकार के कारर्यों मेंं खर्च करने की व्यवस्था की जाये तो इस देश के हजारों लोगों को आसानी से भुखमरी से बचाया जा सकता है।
आॢथक असमानता दूर करने में माक्र्सवाद की थ्योरी है वह किसी हद तक ही कारगर है क्योंकि वह वर्ग संघर्ष पर आधारित है। वह छीनने के नकारात्मक भाव पर टिकी है और उसमें हिंसा मूल अस्त्र है। उसकी विसंगतियां भी सामने आती हैं क्योंकि समानता एक यूटोपिया है। इन विसंगतियों को जार्ज आरवेल ने अपनी किताब एनीमल फार्म में उजागर किया है। परोपकार के सम्बंध में सभी धर्मों की धारणाएं किसी हद तक सकारात्मक हैं जिनमें फेरबदल कर आज की नैतिकताओं से जोड़े जाने की आवश्यकता है।
आॢथक असमानता को मिटाने के लिए जहां माक्र्सवाद पर जोर दिया जाता रहा है वहीं पूंजीवाद ने परोकार के अस्त्र से उस खायी को पाटने की कोशिशें शुरू की हैं। इससे हिंसा वह रूप नहीं दिखायी देगा जो माक्र्सवाद के चलते दिखायी देता है। आॢथक दूरी को पाटने के लिए पूंजीवादी रवैये का विकास वक्त की मांग है। जिसमें बिल गेट्स और वारेन बफे लगे हुए हैं। इसका अनुसरण कर ही माक्र्सवादी रवैये के विकास को रोका जा सकता है। औद्योगिक जगत में बिजनेस एथिक्स का विकास इन्हीं उद्देश्यों से किया जा रहा है। अब वह दिन दूर नहीं जब हर चौथा पूंजीपति परोपकार की बातें करता नजर आयेगा और जमकर माल कमाने वाले समाज सुधार से जुड़े तमाम कार्यक्रमों के सर्वेसर्वा नजर आयेंगे। वह जिनके पास दुनिया की तमाम पूंजी एकत्रित हो रही है गरीबों को भुखमरी से जूझ रहे लोगों के लिए कार्यक्रम भी उन्हीं द्वारा संचालित होंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो बगावत होगी और निशाना वे ही बनेंगे। बेहतर रास्ता है परोपकार का। इसमें भूखों ने छीन लिया से बेहतर है हमने भूखों में बांट दिया। चीन के पूंजीपतियों को अमरीका से यह सबक सीखने से नहीं हिचकना चाहिए। चीन के अरबपति परोपकारी कार्यों के लिए अपनी धन संपदा दान देने के इच्छुक नहीं हैं। दुनिया के दो प्रमुख अरबपतियों बिल गेट्स और वारेन बफे ने इन दिनों दुनिया भर के अमीरों से अपनी संपत्ति का एक हिस्सा परोपकारी कार्यों के लिए दान करने को कह रहे हैं। इसी अभियान के तहत गेट्स और बफे ने चीन के 50 सबसे बड़े अमीरों को 29 सितंबर को बीजिंग में एक रात्रि भोज में शामिल होने का आमंत्रण दिया है। पर ज्यादातर चीनी अरबपतियों ने गेट्स और बफे के साथ इस आयोजन में शामिल होने के आमंत्रण को ठुकरा दिया है। उन्हें आशंका है कि इस मौके पर उनसे अपनी संपत्ति दान करने की प्रतिबद्धता ली जा सकती है। अमरीका में अरबपतियों की संख्या 117 है, वहीं चीन में यह 64 है। गेट्स और बफे की यह जोड़ी अब तक दुनिया के 40 अरबपतियों को अपनी आधी संपत्ति दान करने के लिए भरोसे में ले चुकी है। इस संपत्ति का मूल्य 125 अरब डालर बैठता है।
अपने देश की सर्वोच्च न्यायालय कहती है यदि अनाज को गोदामों में नहीं रख सकते तो गरीबों में बांट दो। ठीक कहा गया है। इससे सरकार का मानवीय चेहरा भी बचा रहेगा। स्ट्रेस मैनेजमेंट के ये आधुनिक गुर हैं इन्हें सीखना ही होगा। यदि किसानों के लिए हुए कर्ज की वसूली में अधिक पैसा खर्च होता है तो उससे अच्छा है उनके कर्ज माफ कर दो। यह मौजूदा सम्प्रग सरकार कर चुकी है। उसे ऐसा करना भी चाहिए।

Thursday, 12 August 2010

सरस रचनात्मक ताजगी की डगर

Sanmarg-22 August 2010


दिमाग़ में घोंसले/उपन्यास/लेखक-विजय शर्मा/ प्रकाशक-अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद-201005/मूल्य-200 रुपये
अपने पहले ही उपन्यास 'दिमाग में घोंसलेÓ के साथ कथाकार विजय शर्मा यह उम्मीद जगाते हैं कि वे इस दिशा में काफी कुछ करने की सामथ्र्य रखते हैं। उनकी किस्सागोई का अन्दाज अलग है और भाषा चुस्त-दुरुस्त। परिदृश्य के डिटेल्स पर वे बहुत ज्यादा ध्यान देते हैं जो पाठकों को बहुत कुछ नया, अचीन्हा और कई बार कुछ नये अंदाज में जाना पहचाना उपलब्ध कराता है लेकिन इसी कारण कारण उपन्यास में कई बार मुख्य-कथन गौण हो जाता है और पाठक यह भूल जाता है कि वह विभिन्न विषयों पर ललित निबंध पढ़ रहा है या उपन्यास। उपन्यासकार को कथा-सूत्रों के निर्वाह पर भी ध्यान देना चाहिए जिसके बिना रचना की शर्त पूरी नहीं होती। पतंग चाहे जितनी उड़े नियंत्रण तभी रह सकता है जब डोर आपके हाथ में हो। कटने के बाद वह कहां गयी इसका श्रेय पतंग उड़ाने वाले को नहीं जायेगा। हालांकि परिदृश्य के विस्तार के बावजूद उपन्यास की पठनीयता में कोई कमी नहीं आती क्योंकि वे जिस विषय को भी उठाते हैं सरसता के साथ उठाते हैं। कई नये स्थलों की जानकारी तो मिलती ही है विभिन्न विचार सरणियों के अन्तर्विरोधों पर भी उनकी बेलाग टिप्पणियां हमें झकझोरती हैं और अपनी दृष्टि को मांजने में मदद करती हैं और उन्हें नयी धार देती हैं।
इस उपन्यास का नायक ब्रजराज है, जो 14 साल कैदी की जिन्दगी गुजारता है। सामाजिक बदलाव चाहने वाले लोगों के बौद्धिक जगत से जुड़े ब्रजराज को संगत के कारण ही बिना किसी जुर्म के जेल हो जाती है और उस पर कई दफाओं के तहत मामला चलता है, जिसमें खून का संगीन मामला भी था। राज्य के खिलाफ युद्ध किस्म के राजनैतिक मामले तो थे ही। उसे संभवत: उसी के साथी कामरेड सूरज ने गिरफ्तार करवाया था। वे दोनों भाकपा, माकपा के शीर्ष नेताओं के चहेते कार्यकर्ता थे। इस उपन्यास में 1971 के बाद के बंगाल का राजनैतिक सामाजिक इतिहास है और उस दौर की स्थितियों का बेलौस वर्णन, जिसमें नक्सलबाड़ी के उभार और सीपीआईएमएल की गतिविधियों के विस्तार और युवाओं की मानसिक स्थिति का विश्लेषण है, जो इसे कथ्य और तथ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाता है किन्तु उपन्यास का 'प्रेम डगरÓ खण्ड ही उनकी औपन्यासिक क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें तथ्य और कथ्य के अलावा कथा-तत्व के रेशे भी हैं जिनके बिना कोई कथानक कथानक नहीं बनता। पूर्वा, गज्जो और विदिशा के साथ नायक ब्रजराज के रोमांस व प्रेम प्रसंग का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली है। हालांकि पूर्वा व गज्जो की ब्रजराज के जीवन में वापसी का इन्तजार पाठक को तो बना रहता है किन्तु उपन्यासकार उसे पता नहीं क्यों भूल जाता है। विजय के यहां यह तीनों स्त्री चरित्र गंध, परिदृश्य व स्वाद के साथ जुड़े हैं, जो पाठक की स्मृति में भी प्रवेश कर जाते हैं और उपन्यासकार विजय शर्मा की नायिकाओं के नाम गुम हो जाते हैं और यह सब उन्हें याद करने में सहायक होते हैं। पूर्वा के साथ काजागर का चन्द्रमा और अजवाइन जुड़ी है। पूर्वा के साथ ब्रजराज अपने सम्बंधों को यूफोरिया कह कर सम्बोधित करता है। उसी के अपने शब्दों में-'हम लगातार एक-दूसर के करीब जाने की कोशिश करते थे, लेकिन बीच का वो फिक्स्ड, अलंघ्य फासला कभी नहीं लांघा गया।' गज्जो से जुड़ी ब्रजराज की स्मृतियों में मठरी और नींबू के अचार की गंध बसी है तो विदिशा नींबू नमक का स्वाद।
उपन्यास के कथा विस्तार के लिहाज से सबसे कमजोर पकड़ के बावजूद एक महत्वपूर्ण खण्ड 'उत्तर कथन' है, जो संभवत: उपन्यास से इतर लेखक का एक आलेख है जिसे एकबारगी पाठक उपन्यास का हिस्सा मानकर पढ़ता जाता है और अन्त में अपने को ठगा हुआ सा पाता है। फिर भी यह खण्ड पठनीयता के लिहाज से आकर्षक है और यहीं विजय शर्मा का रचनात्मक कौशल भी उभर कर आता है कि वे बिना तारतम्य वाले अध्याय को भी उपन्यास में जोड़ दें तो उसे भी अन्त तक पढ़ा जा सकता है। इतना ही नहीं एक वर्चुअल शहर 'अबतकनहींआबादपुर, का उन्होंने इस खण्ड में वर्णन किया है जो काफी दिनों के लिए पाठक के दिलोदिमाग पर अपने स्थापत्य का प्रभाव छोड़ जाता है।