Saturday, 15 July 2017

प्रकृति से अप्रतिम संवादशीलता और गहन तादात्म्य



समीक्षा-डॉ.अभिज्ञात
पुस्तक का नामः प्रकृति राग/ लेखक : मानिक बच्छावत

 प्रकाशक : समकालीन सृजन, 20 बालमुकुंद रोड, कोलकाता-700007/मूल्यः 150/-

लगभग साठ वर्षों से सतत रचनाशील वरिष्ठ साहित्यकार मानिक बच्छावत की प्रकृति से घनी आत्मीयता की रचनाओं का साक्ष्य उनका काव्य-संग्रह 'प्रकृति राग' है। उनकी प्रकृति पर लिखी कविताओं का चयन पीयूषकांति राय ने किया है। मानिक जी का प्रकृति के प्रति मैत्री भाव रहा है, जिससे वे लगातार संवादशील रहे हैं। उसके द्वंद्व को समझते हैं और उससे अपनी मानसिक ऊर्जा व संवेदनशीलता भी ग्रहण करते हैं। ऐसे दौर में जबकि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के बचाव की चिन्ता की जा रही है, ये रचनाएं उस मनोभूमि का निर्माण करती हैं, जहां प्रकृति का साहचर्य सुखद, विस्मयकारी और आह्लादकारी है। प्रकृति से मनुष्य के रिश्ते की पड़ताल इन कविताओं में है। कहना न होगा कि मानिक जी प्रकृति प्रेम से भी अपनी रचनात्मक खूराक प्राप्त करते हैं और ये रचनाएं उस ऋण का स्वीकार भी हैं।
इन रचनाओं में प्रकृति को उजाड़ने की साजिशों की ओर भी उन्होंने इशारा किया है। 'पहाड़ों पर आग कविता' में उन्होंने लिखा है-'सब कुछ खाक होता/दिखा/नंगे होते दिखे पहाड़/पहाड़ों पर न होंगे/पेड़ न फूल न फल/न घास घसियारे/न पशु न पक्षी/आस-पास क्यारियों में/बस खाली ज़मीन होगी/उस पर उठने लगेंगे/मकान दुकान/कारखाने/पहाड़ों पर लगी है आग/ या लगायी गयी है आग।' यह जो 'लगायी गयी है' का ज़िक्र है वही बताता है कि कवि का प्रकृति के प्रति कैसा अनुराग है तथा प्रकृति का संकट कितना गहरा है। एक ओर प्रकृति के बचाने की नारेबाजी है, दूसरी ओर मनुष्य की स्वार्थपरता प्रकृति की नैसर्गिक सुषमा को तहस- नहस करने में जुटी हुई है।
ऐसा नहीं है कि उनकी कविताओं में केवल तार्किकता है, बल्कि वे प्रकृति से गहन साहचर्य रखने वालों पर भी रीझते हैं-'वन कन्या कविता में वे लिखते हैं-'उसके पास/फुलदानी के/पुष्प नहीं/जूड़े में/पूरे वन की श्री है/उसे कृत्रिम प्रसाधनों की/ कोई ज़रूरत नहीं/अंग अंग में/ नैसर्गिंक महक है।' वन के पंछी के प्रति भी उनका अनुराग कम नहीं-'बस्तर की मैना' कविता की बानगी यूं है-'उसका बदन/रेशम की तरह/चमक रहा था/पक्षियों का अंतर्ज्ञान/नहीं बदला है/न मंद हुआ है/न बंद हुआ है/बदले हैं मनुष्य/जो उनके संकेतों को/ पढ़ नहीं पाते।' इस कविता में मनुष्य के प्रकृति से अलग-थलग पड़ जाने की टीस व्यक्त होती है।
प्रकृति की उपेक्षा और दुर्दशा से कवि दुःखी और चिन्तित है-'रेत की नदी' कविता में वे कहते हैं-'वर्षों से पड़ी हूं/अछूती/पीतवर्णी/दर्दीले मरुस्थल की/छाती पर पसरी/स्वर्ण झरी/मर्म भरी/परी-सी लेटी/निर्वसना/पीताभ रेत कणों की/ झर-झर कन्था/अपने निष्कासन के/दुख की परत कथा/सहती रही व्योम का ताप।'
प्रकृति की तमाम हलचलें उनके इस संग्रह में पूरी गरिमा के साथ उपस्थित हैं-'पका धान' कविता का एक अंश यूं है-'धरती के बेटों का/मन खुश है/अभी-अभी जो धान पका है/जीवन में जैसे मान पका है/और उमंगें नाच रही हैं/पके धान पर।' इन कविताओं में एक आंतरिक छंद है, जो भाषा को और नम करता है और उन भावों तक पहुंचने में और सुगम्यता प्रदान करता है।

Friday, 17 March 2017

एक नये सौंदर्य की सृष्टि करती कविताएं

-डॉ.अभिज्ञात
पुस्तक एक दिन अचानक
लेखक-जितेन्द्र जितांशु
प्रकाशक-सदीनामा प्रकाशन, एच-5. गवर्नमेंट क्वार्टर्स, बजबज, कोलकाता-700137
मूल्य-30 रुपये


जितेन्द्र जितांशु का दूसरा कविता संग्रह है एक दिन अचानक। पहला संग्रह कबूतर काफी अरसा पहले 1975 में आया था। तब से उनकी कविता काफी आगे बढी है और उन्होंने विचार और संवेदना के नये धरातल की लगातार तलाश की है। उनकी कविता में जहां एक ओर जूझारूपन है वहीं एक बेफिक्री और मस्ती भी है, जो एक नये तरह का सम्मोहन रचती है। शब्दों और आशय की नयी गति और नयी लय उनके नये संग्रह की विशेषता है। गंभीर बातें वे बड़ी आसानी से कह जाती हैं जिसमें कई जगह तुक बैठती तो कहीं टूटती है..लेकिन यह टूटन, यह लापरवाही एक सौंदर्य की सृष्टि करती है। ये प्यार क्या है कविता में वे लिखते हैं-
इंकार भी इकरार भी
धिक्कार भी तकरार भी
किस्से कहानी नज़्म कविता गीत
थिरकते चित्र, कितने रंग, कितने संग, कितने गीत
कट के गिरा तो पता चला धार क्या है
ये प्यार क्या है
सुखी को सोने न दे
दुखी को रोने न दे
हर एक युग में जीत
कैसा ज़िन्दगी का गीत
कितनी सभ्यताएं, बनीं बिगड़ीं दौड़ते रथ
ज़िन्दगी के आख़िरी क्षण तक खुला पथ
मोक्ष क्या है..धर्म क्या संसार क्या है
ये प्यार क्या है
सुखी को सोने न दे
दुखी को रोने न दे।
जितेन्द्र जितांशु संवादधर्मी कवि हैं। वे हर समस्या का निदान संघर्ष से नहीं बल्कि संवाद से खोजने के हिमायती रहे हैं। बिना संवाद के की गयी कोई भी कार्यवाही समस्या को जहां की तहां रखना ही साबित होगा, चाहे जिसनी पुरानी बात हो उसका समाधान संवाद से ही सम्भव है..एक दिन अचानक शीर्षक कविता में वे कहते है-
आ ही गया प्रश्न
क्या तुम भी मानते हो
क्या तुम जानते हो
कितनी ज़रूरत है सभ्यताओं के बीच संवाद की
एक दिन अचानक
कविता की धार
शब्दों की गूंज
तितली के पंख
पसीने की गंध
मिलेंगे म्यूज़ियम में
हमारे इन्तजार में।
इस संग्रह की कविता में आज के मनुष्य की इच्छा, आकांक्षा, स्वप्न और उलाहने सब कुछ हैं। कवि के लिए तो उनकी कविताएं उनके लिए उनका दर्शन और धर्म तक हैजीते रहने के प्रमुख कारणों में से एक। इन संवादधर्मी कविताओं के बीच जहां तहां अभिव्यक्ति का एक टटकापन है, जो हमें दुखद विस्मय में डाल देता है-
मौन होते जा रहे पुर्जे सृजन के
कौन सा बारूद बरसेगा गगन से
इस सृजन की सार्वभौमिकता, सरलता नि:स्वार्थ
साथ रहना है समझ के साथ।
कवि को सिर्फ साथ नहीं चाहिए बल्कि समझ के साथ साथ चाहिए।
नववर्ष की शाम कविता में जितेन्द्र जितांशु ईदगाह कहानी को नये संदर्भ में रचते हुए कहते हैं कि बच्चे हामिद को अपनी दादी के लिए अब मेले से चिमटा नहीं खरीदना है, जिनसे वह रोटी सेंकते हाथों को जलने से बचा सके बल्कि उसे अब एक जिस्ता काग़ज और कलम चाहिए, जिससे वह अपनी दादी को हर मुश्किल से बचा सके।



Wednesday, 18 March 2015

लघु नाटिका-मुक्ति

मुक्ति

लघु नाटिका

-डॉ.अभिज्ञात

पात्र-

1-महिला सामाजिक कार्यकर्ता
2-सामाजिक कार्यकर्ता का सहायक
3-शिकारी
4-महिला जज
5-पुलिस
6-फारेस्ट आफिसर


दृश्य- एक
(परदा उठता है। झील का दृश्य। सर्दी का मौसम। मध्य एशिया के साइबेरिया से अपने तमाम दोस्तों के साथ उड़कर आया एक ग्रे हंस बल्लभपुर की झील के पास बैठा है। गोली चलने की आवाज़ आती है। हंस कराह कर गिर पड़ता है। झाड़ियों के पीछे से निकलकर एक शिकारी सामने आता है। वह पक्षी को छूकर देखता है। )
शिकारी-चलो बेहोश हो रहा है। एकदम टारगेट पर दाई ओर लगी है यह विशेष गोली। इसे ले चलते हैं। जल्दी ही यह ठीक हो जायेगा फिर बेच दिया जायेगा यह विदेशी बाज़ार में। अच्छी खासी रकम मिलेगी। कितने सुन्दर होते हैं कम्बख्त ये मध्य एशिया के साइबेरियन ग्रे हंस। अपने तमाम दोस्तों के साथ यह हर सर्दी में उड़कर आते हैं। यहां की झीलों में डेरा डालते हैं। यहां अंडे देते हैं। यहीं पर उन्हें सेते हैं। इनके चूजे धीरे-धीरे उड़ना सीखते हैं। और जब सर्दियां ख़त्म हो जाती है वे अपने परिवार और दोस्तों के साथ उड़ जाते हैं। अपने मूल स्थान की ओर।
(शिकारी हंस को गोद में उठाता है और उसे लेकर आगे बढ़ता है कि एक महिला वहां आ पहुंचती है।)
महिला-खबरदार। वहीं रुक जाओ। भागे तो मारे जाओगे। हमारे साथी चारों ओर खड़े हैं। हमारी एनजीओ को बहुत दिन से खबर थी कि तुम लोग इन विदेशी मेहमानों को बेहोशी की गोलियां मारकर अपने कब्जे में ले लेते हो और उनकी तस्करी दूसरे देशों में करते हो। आज रंगे हाथ पकड़े गये। अरे, रामप्रसाद आओ इधर आओ। पकड़ो इसे और ले चलते हैं थाने। और इस हंस को वन विभाग के अस्पताल।
 (एक आदमी आता है और शिकारी की कालर पकड़ कर ले जाता है और महिला हंस को अपनी गोद में लेकर जाती है।)

दृश्य- दो
(अदालत का दृश्य। एक महिला जज कुर्सी पर बैठी है। कटघरे में एनजीओ की महिला कायकर्ता खड़ी है।)
जज-तो शांति देवी। आप बताइए कि उस दिन क्या हुआ था।
कार्यकर्ता-मैं झील के पास से गुज़र रही है थी। मैंने गोली की आवाज़ सुनी। मैं घटनास्थल पर पहुंची तो मैंने पाया कि यह ग्रे हंस बेहोश पड़ा है जिसे एक व्यक्ति उठाकर ले जाने की कोशिश कर रहा है। मुझे लगा कि यह शिकारी है और गोली उसी ने मारी है इसलिए मैंने उसे थाने में दे दिया। और उस पर मुकदमा दायर कर दिया।
जज-तो क्या आप दावे के साथ नहीं कह सकती हैं कि हंस के पास जो व्यक्ति था गोली उसी ने मारी थी।
कार्यकर्ता-जी हां। मुझे बाद में अपनी गलती का एहसास हुआ कि मैंने एक निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी है। इसलिए मैं यह मुकदमा वापस लेती हूं और अपनी गलती है लिए अदालत से माफी मांगती हूं।
जज-ध्यान रखे अइन्दा ऐसी गलती न हो। वरना आपको सज़ा हो सकती है।
कार्यकर्ता-जी अब से ऐसा नहीं होगा। आपका शुक्रिया।
जज-वन विभाग को आदेश दिया जाता है कि चूंकि ग्रे हंस अब स्वस्थ हो चुका है इसलिए उसे आज शाम रिहा कर दिया जाये। अदालत की कार्यवाई समाप्त होती है।

दृश्य- तीन
(डाइनिंग टेबल के पास फारेस्ट आफिसर, थानेदार, शिकारी एवं एनजीओ महिला कार्यकर्ता खड़े हैं।)
शिकारी-मैडम आपने मुझे बचाने का जो वादा कल किया था आपने उसे पूरा किया। वरना मेरी जेल तो पक्की थी। आपके लिए जो तोहफा मैंने आपके घर भिजवाया था आशा है पसंद आया होगा।
महिला कार्यकर्ता-आप समझदार हैं।
थानेदार-भई हमें भी तो धन्यवाद तो। मामले को रफा-दफा करने में हमारी भी भूमिका कम नहीं।
शिकारी-यह भी कोई कहने की बात है। और फारेस्ट आफिसर साहब आप का गिफ्ट भी ठीक था न।
फारेस्ट आफिसर-हां जी हां। आपकी गिफ्ट लाजबाब है।
शिकारी-तो हंस साहब को आपने मुक्त कर दिया न।
फारेस्ट आफिसर-एकदम आजाद। ये रहे हंस साहब। हमारे खानसामा ने इन्हें हमारे लिये खास तौर पर बनाया है एकदम लाजबाब। आओ दोस्तो खाओ और हंस की आत्मा की शांति की दुआ मांगो। उन्हें मिल गयी है मुक्ति।
सब एक साथ-मुक्ति....। (सभी मिलकर जोर जोर से हंसते हैं-) मुक्ति हा हा हा हा मुक्ति...
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Tuesday, 24 February 2015

पत्रकारिता को नयी भाषा व संवेदना के नये धरातल दिये प्रभाष जी ने

(कम्प्यूटर खंगाने के दौरान यह पुराना लेख मिल गया)

-अभिज्ञात

जिन कुछेक लोगों ने हिन्दी पत्रकारिता की विश्लेषणात्मक क्षमता और उसकी रीति-नीति का निरन्तर विस्तार, आविष्कार और परिमार्जन किया उनमें प्रभाष जोशी का नाम प्रमुखता से लिया जायेगा। धार और संवेदना की जैसी जुगलबंदी उनकी भाषा में दिखायी देती है वह हिन्दी पत्रकारिता में विरल होती जा रही है वरना पत्रकारिता की भाषा का इकहरापन चिन्ताजनक है। भाषा का छंद नारों से नहीं नीयत से आता है यह प्रभाष जी जैसों के लेखों से ही जाना जा सकता है। उनके श्कागद कारेश् शृंखला के आलेख न तो कभी पुराने पड़ने हैं और ना ही वे कभी अप्रासंगिक होंगे क्योंकि उनमें देश दुनिया का जनमानस लगातार अपनी टोह में लगा हुआ दिखायी देता है। हमारी घनीभूत चिन्ताओं की शक्ल क्या है ही उनमें नहीं दिखायी देती बल्कि यह भी कि उसके निहितार्थ क्या हैं या भी समझाने का महती प्रयत्न दिखायी देता है। मामूली और आम बातें, घटनाएं और लोग उनके आलेखों में आकर जो रूपाकार ग्रहण करते थे वह उन्हें एक सार्थक बहस का बेहद जरूरी हिस्सा बना देता था। मैं अक्सर समय के अभाव में उनका आलेख प्रकाशन के दिन नहीं भी पढ़ पाता था तो कई दिनों तक पुराने अखबार को रखे रहता था कि उनका आलेख पढ़ लूं तो फिर अखबार को रद्दी समूह के कागजों में डालूं। अक्सर उनके आलेख उन मुद्दों पर भी रहते तो ज्वलंत प्रश्नों से मुठभेड़ लेते थे उन आलेखों में उनकी खरी नीयत बोलती थी और साफगोई उसमें नया पैनापन देती थी। मुझे क्रिकेट में तो कभी दिलचस्पी नहीं रही फिर भी कभी कभार क्रिकेट पर लिखे लेखों को भी पढ़ने की कोशिश करता। क्रिकेट पर तो हिन्दी में शायद उनके जैसा दूसरा टिप्पणीकार न होगा।
मैंने कभी सोचा न था कि पत्रकार बनूंगा फिर भी अनायास ही पत्रकारिता से शौकिया जुड़ गया जनसत्ता कोलकाता से और स्ट्रिंगर बन गया.। उन दिनों मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय से केदारनाथ सिंह पर पीएचडी के लिए शोध कर रहा था और अपने नानाजी के ठेकेदारी के कामकाज में हाथ बंटाता था। पेशे के तौर पर पारिवारिक स्तर पर तय हो चुका था कि नौकरी नहीं कारोबार करना है। उन्हीं दिनों दो एक बार प्रभाष जी को कुछ करीब से देखने का अवसर मिला। ऐसी दो एक सभाओं की कवरेज करने भी गया जिनमें प्रभाष जी वक्ता थे। उनमें एक सभा वह भी है जिसमें पं.विष्णुकान्त शास्त्री कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। उस समय वे संभवतः भाजपा के लोकसभा सांसद भी थे। यह तो नहीं याद है कि सभा का मुख्य विषय क्या है किन्तु प्रभाष जी एनरान पर बोले थे और तत्कालीन भाजपा नीत सरकार की एनरान के मुद्दे पर भूमिका की जम कर मलामत की थी। अध्यक्षीय भाषण में विष्णुकान्त जी ने उनकी बातों का जवाब दिया था और उनके तर्कों को दरकिनार कर दिया था। ऐसा लगा था कि प्रभाष जी के तर्क कुछ कमजोर पड़ गये हैं। विष्णुकान्त जी अध्यक्षीय भाषण देकर सभा की समाप्ति की घोषणा भी कर दी। लेकिन प्रभाष जी विष्णुकान्त जी के तर्कों का फिर से जवाब देने से चूकना नहीं चाहते थे। वे लपक कर फिर माइक के पास पहुंच गये और कहा कि मुझे यह अनुशासन पता है कि अध्यक्षीय भाषण के बाद फिर वक्तव्य नहीं दिया जाता है लेकिन इस अनुशासन से बढ़कर भी कुछ बातें हैं जिसके कारण मैं फिर बोलना चाहूंगा और विष्णुकान्त जी या अन्य किसी और की सहमति की प्रतीक्षा किये बिना ही उन्होंने बची खुची कसर निकाल ली और फिर मंच से उतर कर तेजी से अपनी कार की ओर बढ़े। इधर, कई भाजपा कार्यकर्ताओं को प्रभाष जी का वक्तव्य नागवार लगा और वे उन्हें घेरने का प्रयास करने लगे। वे जब तक कार में बैठते चारों ओर से भाजपा कार्यकर्ताओं ने घेर लिया था और उन्हें अपशब्द भी कहने पर उतारू थे वह तो भी भीड़ का रुख देखकर विष्णुकान्त जी वहां पहुंचे और किसी प्रकार यह कहकर लोगों को गाड़ी के आगे से हटाया कि प्रभाष जी पत्रकार हैं और पत्रकारों को कुछ भी कहने की आजादी होती है, उन्हें कहने दीजिए। आप लोग संयम बरते।
दूसरी एक घटना मुझे याद है जो प्रभाष जी के अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति उनके रवैये को स्पष्ट करती है। वह घटना है एक साहित्यक समारोह की है। उसमें प्रख्यात ललित निबन्धकार डॉ.कृष्ण बिहारी मिश्र प्रधान वक्ता थे। मंच से उन्होंने जनसत्ता की भाषा नीति की जमकर आलोचना की थी और नाम लेकर कहा था कि प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार अपने आपको कबीर बनते हैं और भाषा से खिलवाड़ कर रहे हैं। पता नहीं पत्रकार किस हेकड़ी में रहते हैं। इस वक्तव्य में कुछेक हर्फ इधर उधर हो सकते हैं मगर लब्बोलुबाब यही था। उल्लेखनीय यह है कि वहां मंच पर प्रभाष जी नहीं थे वरना वे उसका जवाब स्वयं देते। मेरी ड्यटी इस कार्यक्रम की रिपोर्टिंग की लगी थी। मैंने जो रिपोर्ट लिखी थी उसमें मैंने इंट्रो ही प्रभाष जी के भाषा सम्बंधी रुझान पर कृष्णबिहारी जी की आपत्ति को बनाया था। मामला संवेदनशील होने के कारण डेस्क ने रिपोर्ट की कापी कोलकाता के स्थानीय सम्पादक श्री श्याम आचार्य तक पहुंचायी और उन्होंने उसे दिल्ली फैक्स किया ताकि उसके प्रकाशन के सम्बंध में प्रभाष जी की राय ली जा सके। और राय हां में थी। वह रिपोर्ट उसी प्रकार प्रकाशित हुई। सचमुच प्रभाष जी ने पत्रकारिता की भाषा को जनभाषा के करीब लाने का न सिर्फ प्रयास किया बल्कि भाषा की शास्त्रीयता की दुहाई देने वालों से इस मोर्चे पर लोहा भी लिया जिसकी यह घटना उदाहरण है।
प्रभाष जी के मालवा अंचल और कुमार गंधर्व पर कई लेख जब तक पढ़ने का मौका मिलता रहा था। जब मैं अमर उजाला, जालंधर से वेबदुनिया डाट काम में कार्यभार संभलाने के लिए इंदौर गया तो इंदौर से पहले ही वह स्टेशन देवास मिला जिसके बारे में मैं पर्याप्त पढ़ चुका था और इंदौर भी मुझे इसलिए भी पहले से परिचित और मोहक लगा। प्रभाष जी के आलेख में वह शक्ति है जो अर्थ ही नहीं पूरी संवेदना को पाठक तक पहुंचाती है। एक ही संस्थान होने के कारण कुछेक बार मुझे वेबदुनिया कार्यालय से नयी दुनिया कार्यालय जाने का मौका मिला था तो वहां भी प्रभाष जी की चर्चा सुनी थी जहां से उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। वेबदुनिया कार्यालय में भी अक्सर राजेन्द्र माथुर, शरद जोशी आदि के साथ चर्चा होती थी, जिनसे नई दुनिया का प्रगाढ़ रिश्ता था। इन चर्चाओं ने मुझे उनका फैन बना दिया था। पत्रकारिता के तुरतफुरत के भाषिक और प्रतिक्रियाशील व्यवहार को नयी ऊंचाई और दिशा देने में प्रभाष जी के योगदान को मैं नमन करता हूं।

Thursday, 26 June 2014

हमारे जीवन में उत्सव का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है

 

प्रख्यात कथाकार, उपन्यासकार एवं यात्रा वृत्तान्तकार डॉ.कुसुम खेमानी से 

डॉ.अभिज्ञात की बातचीत

प्रश्न-साहित्य सृजन की शुरुआत कैसे हुई? प्रेरणा कैसे मिली? उस दौर में किन लेखकों को जानती थीं या किसका लिखा पढ़ती थीं?
उत्तर-इस प्रश्न का उत्तर मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है और इसकी सीधी-सी वजह यह है कि मैंने न कभी यह जाना, न कभी माना कि मैं लेखिका हूँ या अच्छा लिख सकती हूँ। हाँ, किताबें पढऩे का बेहद शौक बचपन से ही रहा। यहाँ तक कि वे रिसाले जो एक आठ वर्षीय लड़की के लिए भारी माने जाते, उन्हें भी मैं चुपके से ताक से उतार कर पढ़ लिया करती थी। लिखने की शुरुआत की उम्र इतनी कम थी कि हँसी आ सकती है। मैं जब तीसरी-चौथी कक्षा में पढ़ रही थी, उस व$क्त एक दैनिक अखबार में बहस चली थी विषय था 'प्रणय या परिणय', मैं उसमें अंशु जैन के छद्म नाम से बराबर लिखती थी। एक दिन घरवालों को इसका पता चल गया। उन्होंने खूब मजाक उड़ाया, उसी दिन से लिखना ठप्प हो गया।
वैसे मैं बाद में भी कुछ ना कुछ लिखती रहती थी। दिनमान, धर्मयुग, कादम्बिनी में एकाधिक आलेख छपे भी थे, लेकिन लेखन का क्रम टूटने का कोई $खास दु:ख नहीं है, क्योंकि मैं नियति को मानती हूँ और मेरा विश्वास है कि मैं अब जो लिखूँगी वह पहले के लिखे से बेहतर होगा। मेरे लिखे के छपने की शुरुआत का श्रेय पूर्णत: श्री रवीन्द्र कालिया को है, जिन्होंने मुझे लिखने की हिम्मत दी और मुझसे लगातार वागर्थ में लिखवाया।
प्रश्न-किनका लिखा पढ़ा है?
उत्तर-पूछिए किसे नहीं पढ़ा? छोटी उम्र से ही किताबों का शौक होने के कारण मारवाड़ी घर के सारे पैसे किताबों में ही लगते थे। किताबें पढऩे का यह हाल था कि एम.ए का इम्तहान केवल बाहरी किताबों के बल पर फस्र्ट क्लास में पास कर लिया। सोलह साल की उम्र में ही कई लेखकों को करीब से देखा। ससुराल में बच्चन, नीरज, बैरागी आदि का का$फी आना-जाना था और सत्रह-अठारह तक तो मैं सीताराम जी सेकसरिया के प्रभाव क्षेत्र में आ गयी थी इसीलिए अधिकतर समाज सुधारकों, राजनीतिज्ञों और लेखकों से मिलना-जुलना होता ही रहता था। मुझे लेखक ही प्रिय हैं
और मैं उन सभी की श्रद्धा करती हूँ। बीस की उम्र के बाद मेरे प्रिय रचनाकार रहे अज्ञेय, कुंवरनारायण, भवानी प्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती, कृष्णा सोबती, धूमिल, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,  केदारनाथ ङ्क्षसंह, मनोहर श्याम जोशी, इस्मत चुगतई, कुरतुल-एन-हैदर, राही मासूम रजा और विनोद कुमार शुक्ल ढेरों हैं पर जिनके नाम अभी याद नहीं आ रहे हैं।
प्रश्न-साहित्य में दृष्टि, विचार और अनुभव की परिपक्वता हासिल करने के बाद प्रवेश करने वाले मनोहर श्याम जोशी आदि के साथ आपका नाम लिया जा सकता है? विलम्ब से इस क्षेत्र में प्रवेश के क्या कारण रहे? इससे क्या खोया और क्या पाया?
उत्तर-आपका यह प्रश्न बहुत ही भारी है। हकीकत यह है कि शायद मुझमें  अब भी काफी बचपना है। और हे देवता! कहाँ प्रात: स्मरणीय मनोहर श्याम जोशी और कहाँ मैं? भाई, उनकी तो कलम क्या थी संगतराश की नोकीली छेनी थी, जो हर शब्द को छील-तराश कर चमका देती थी और मैं तो अभी लिखना सीख रही हूँ। अपने लेखन से मैंने क्या खोया है यह तो पता नहीं, पर अभी जो पहचान बनी है, वह बहुत ही प्यारी है।
प्रश्न-परवर्ती काल में क्या लिखने की वजह बदली..लेखन के उद्देश्य में क्या कोई बदलाव आया?
उत्तर-पहले मैं जो मन में आया वह लिख देती थी, पर अब मन करता है, कुछ ऐसा लिखूँ जो जीवन को अर्थ दे। मेरी कहानियों में भी यह अन्तध्र्वनि छिपी रहती है और मेरे पात्र भी अन्तत: बुराई को नकार कर अच्छाई को ही अपनाते हुए दिखते हैं।
प्रश्न-आपके लेखन की ऊर्जा का उत्स क्या है? सोद्देश्य लेखन और स्वांत: सुखाय में से आपका पथ कौन सा है?
उत्तर-मेरे पाठकों का प्रेम ही मेरी ऊर्जा का उत्स और अन्तिम सत्य है। जानबूझ कर कैसे लिखा जाता है.. यह मैं नहीं जानती। लेकिन मन में कोई भव आने पर या कुछ अच्छी-बुरी घटना देख कर एक मानसिक उद्वेग होता है, जिसे कागज पर उतार देने के बाद हल्कापन महसूस करती हूँ। ऐसे लिखे भाव हर बार ही कोई आकार ले लें यह $जरूरी नहीं लेकिन उन्हीं में से कई बार किसी कहानी या किसी आलेख की संरचना हो जाती है।
प्रश्न-साहित्य में प्रतिबद्धता शब्द प्रचलित और प्रतिष्ठित है.. खास तौर पर वामपंथी रुझान वाले लेखकों में, आप अपने लिए इससे क्या अर्थग्रहण करती हैं?
उत्तर-मेरी प्रतिबद्धता सिर्फ एक भाव के प्रति है  और वह है : प्रेम। मैं अपने जीवन का मूल, मध्य और अन्त सब प्रेममय रखना चाहती हूँ। चँूकि मेरे पात्र अधिकतर 'सच्चे' हैं इसलिए मेरी प्रतिबद्धता और सम्मान बेमानी है। मुझे तो जैसा वे कहते हैं, करना पड़ता है! अत: 'इज्म' और 'वाद' स्वत: ही मेरे लेखन का हिस्सा बन जाते हैं।
प्रश्न-आपके साहित्य में पूँजी, सम्पन्नता और समृद्धि का एक मानवीय चेहरा दिखायी देता है, जो हिन्दी सहित्य में प्रचलित ढर्रे से अलग ही नहीं, बल्कि विपरीत है। जो वर्ग शोषक के तौर पर साहित्य में स्थापित था आपने उसकी उदारता, करुणा और परोपकार पर फोकस किया है.. इसमें आपको झिझक नहीं हुई.. आलोचकों का कोई खौफ महसूस नहीं किया.. रिजेक्ट कर दिये जाने की चिन्ता पास नहीं फटकी?
उत्तर-दरअस्ल यह मेरे पात्रों का काम है, मेरा नहीं। और चूँकि मेरे सारे पात्र मेरे अनुभव से उपजते हैं इसलिए वे उस मिट्टी और खाद का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उनकी अ$ज्म में पिन्हा है। मेरे हितैषियों ने मुझे सुझाया भी;  नारी विमर्श पर, दलितों पर, फलां पर, ढिमका पर, लिखो.. पर मैं अक्षम थी। जो सत्य मैंने भोगा नहीं उसे कैसे लिखूँ? मेरा मानना है कि मनुष्य हर जगह मनुष्य है! न तो आभिजात्य वर्ग के ही सारे लोग बुरे होते हैं और ना ही अन्य वर्गों के सब भले! मैं समझ नहीं पाती कि मुझे सच्चाई से क्यों डरना चाहिए? फिर भी यदि कोई व्यक्ति विशेष या वर्ग, मुझसे नाराज है तो मा$फी चाहती हूँ पर मैं अवश हूँ।
प्रश्न-साहित्य में आपके रोल मॉडल कौन हैं.. किसका लिखा आपको अधिक पसंद है.. किसके जैसा लिखना चाहती हैं.. कौन -सी कृतियाँ पसन्द हैं.. देशी-विदेशी.. हिन्दी.. अन्य किसी भाषा का..।
उत्तर-कई हैं, फिर भी कृष्णा सोबती, अज्ञेय, कुंवर नारायण, इस्मत चुगताई, भीष्मू साहनी, मंटो, राही मासूम रजा, मनोहर श्याम जोशी, भवानी प्रसाद मिश्र आदि मुझे बेहद पसन्द हैं। मैं कई नये लेखकों को भी पढ़ती रहती हूँ और मुझे उनके लेखन का ताजापन और जमीनी हकीकत से जड़ाव लुभाता है। अमिताभ घोष, विक्रम सेठ, आर.के.नारायण, वी.एस.नायपॉल, अरुन्धति रॉय, आशापूर्णा देवी, जीवनानंद, सुनील गंगोपाध्याय, विमल मित्र, टॉलस्टाय, शेक्सपीयर, चेखव, बॉलजॉक, गैब्रियल मार्खेज आदि... पर क्या चाहने मात्र से मैं इनमें से किसी के भी जैसा लिख सकती हूँ? इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने जैसा ही लिखूँ..चाहे वह एकदम साधारण ही हो।
प्रश्न-विचार और संवेदना, शिल्प और कथ्य में से किसे अधिक तरजीह देती है..?
उत्तर-वैसे तो ये चारों ही किसी भी रचना के स्तम्भ हैं पर मैं संवेदना और कथ्य को ज्यादा अहमियत देना चाहती हूँ। कितना दे पाती हूँ! यह तो पाठक ही जानें...।
प्रश्न-महिला लेखक के प्रति आपका क्या नजरिया है, आप अपने को जोड़कर देखतीं हैं या उसको कोई महत्त्व नहीं देतीं..
उत्तर-क्या आप अभी भी महिला और पुरुष लेखक की गलियों में भटक रहे हैं? मुझे तो न पुरुष से चिढ़ है न महिला से। हाँ, मेरे चाहनेवालों का मानना है कि मैं स्त्रियों की विशेष पक्षधर हूँ। दरअस्ल मैं 'अद्र्धनारीश्वर' की भक्त हूँ। मुझे पुरुष में प्रेम और ममता और स्त्री में कर्मठता और जुझारूपन प्रिय है। मैं इन्हेें ही अपने जीवन का दर्शन भी मानती हूँ।
प्रश्न-आपके उपन्यास और कहानियों में नारी पात्रों को नयी गरिमा मिली है और उनकी समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ रेखांकित किया गया है.. इसके सम्बन्ध में आप अलग से कुछ कहना चाहेंगी..
उत्तर-यदि ऐसा है तो बहुत ही अच्छा हुआ है। ह$जारों सालों से अग्नि में जलती नारी को कभी तो.. कोई तो.. ठंडे जल की गंगा से सराबोर करता! मैं नाची$ज तो ऐसा क्या कर पायी होऊँगी.. पर मुझे लग रहा है कि इन दिनों स्त्रियों को समझने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि इन दिनों स्त्री ने भी स्वयं को सिद्ध किया है, पर बहुतेरे पुरुषों ने भी उन्हें मान-सम्मान, गरिमा और बराबरी का दर्जा दिया है। स्वाभाविक है यह बदलाव साहित्य में भी प्रतिबिम्बित होगा ही। अलग से न कहकर मैं सि$र्फ यह दोहराना चाहूँगी कि जैसा महसूस करती हूँ वैसा लिखती हूँ। यह स्वीकार करते हुए भी कि मुझे स्त्री सर्वदा लुटी-पिटी लगती है। मेरी दो-चार कहानियों की स्त्रियाँ बहुत ही भौतिकवादी, कर्कश और और उच्छृंखल भी हैं.. पर यह तका$जा उनके चरित्र का था, इसलिए उन्हें उसी तरह व्यक्त करना पड़ा।
प्रश्न-आपने कई देशों की यात्राएँ की हैं जिन पर आपकी पुस्तक भी आयी है, किन्तु दुनिया की तमाम अच्छी चीजों की चर्चा के दौरान आप अपने देश की चर्चा करने से नहीं रोक पाती हैं.. यह कई बार कसक के रूप में व्यक्त हुआ है... यह तटस्थ लेखन तो हुआ नहीं.. तुलना के दौरान आपने अपने देश के मूल्यों, प्राकृतिक सौन्दर्य और कलाकृतियों को अधिक महिमामंडित किया है..
उत्तर-आपको यह भ्रांति हुई है या हो सकता है यह मेरे लेखन की कमजोरी हो! प्रथमत:, तो मेरे यात्रा वृत्तान्त की पुस्तक का नाम है 'कहानियाँ सुनाती यात्राएँ' है अर्थात् वे देश जैसे मेरे मन में उगे। इसलिए $जरूरी तो नहीं है कि मैं एकदम रूखेपन से वहाँ के हवा-पानी और बारिश के आँकड़ पेश करती रहती। रिपोर्ताज और वृत्तान्त में कुछ तो अन्तर होना ही चाहिए! जहाँ तक मेरा ख्याल है मैंने अपने वर्णनों में कोई बेईमानी नहीं की है। यदि कश्मीर में कोई विदेशी सैलानी मुझसे यह कहे कि स्विट्जरलैंड कश्मीर के पासंग भी नहीं है... तो मेरे हृदय में कसक नहीं उठेगी? मैं यदि रोम की 'पियेता' के साथ रो सकती हूँ , तो इस बात पर भी दु:खी होने का ह$क है मेरा कि दूर क्यों कलकत्ते के ही इंडियन म्यूजियम में विशाल और विराट मूर्तियाँ यों ही पड़ी हैं। यदि हम मनुष्य हैं, तो राग-विराग, दु:ख-कष्ट से मुक्त कैसे हो सकते हैं? क्या हमें इस बात पर शर्म नहीं आनी चाहिए कि हम हमारे प्राकृतिक संसाधनों और हजारों वर्षों की ऐतिहासिक धरोहरों से बेखबर रहते हैं? यह तो खैर मनाइये कि मैं कोई पुरातत्त्विद् या इतिहासकार नहीं, वर्ना रात से सुबह हो जाती और हमारे देश की एक मूर्ति की भी पूरी व्याख्या पूरी तरह नहीं कर पाती! मेरी कोशिश रही है कि मैं अधिक से अधिक सच लिख पाऊँ वर्ना स्विट्जरलैंड, डर्बन, वैंकयूवर, रोम आदि पर वृत्तान्त पाठकों को इतने प्रिय कैसे हुए?
प्रश्न-आपने कहानी, उपन्यास एवं यात्रा वृत्तान्त इन तीन विधाओं में लिखा है.. आपका मन किसमें रमता है..? अपनी मूल रचनाविधा किसे मानती हैं?
उत्तर-हालाँकि उपन्यास की बजाय कहानी लिखना अधिक कठिन है, क्योंकि कहानी का $फलक छोटा होता है, पर पता नहीं क्यों इन दिनों मेरा अधिक रुझान कहानी की ओर हो रहा है। परिणामस्वरूप हंस, नया ज्ञानोदय, कथादेश, पाखी, परिकथा और वागर्थ में मेरी कहानियाँ छप रही हैं। चित्रा जीजी (मुद्गल) के आदेश से एक उपन्यास राजस्थानी पृष्ठभूमि पर लिखना शुरू किया है, पर कहानियों के पात्र भूत की तरह मुझसे चिमटे रहते हैं। अब जब उनसे निजात मिलेगी तभी कहानी के अलावा कुछ और लिख पाऊँगी।
प्रश्न-लेखन की भावी योजनाएँ क्या हैं?
उत्तर-जिसने आज तक सारा काम देर से और बिना योजना के किया है, वह भला अब क्या सोचेगा? क्या योजना बनायेगा? सब कुछ मन के हवाले हैं, वह जिधर बहेगा उसके साथ बहना होगा।
प्रश्न-आपकी रचनाशीलता में परिपक्वता के साथ-साथ एक युवता भी है.. उसे बचाये रखने के लिए आपने क्या यत्न किये हैं?
उत्तर-क्या कोई चाह कर परिपक्व या नासमझ बन सकता है? क्या कोई जान लगाकर भी युवता को बचा सकता है? ययाति को भी अपने बेटे की जवानी उधार माँगनी पड़ी थी क्योंकि ध्रुव सत्य है कि जवानी कभी लौटती नहीं! फिर मैं क्या कोई आकाश से उतरा अजूबा हूँ जो एक मुट्ठी में जवानी और एक में समय को बन्द रख सकती हूँ? मेरा ख्याल है मेरी नासमझी भरी भरी बातें ही आपको मेरी युवता का परिचायक लगी होंगी। वैसे न तो मैं लाओत्से हूँ! और ना ही बुद्ध।
प्रश्न-इस समय कौन-सी चुनौतियाँ हैं जिनसे इस समय के रचनाकार को टकराना चाहिए.. जिससे टकराये बिना रचनाशीलता के मूलधर्म से पलायन कहा जाएगा?
उत्तर-मेरी समझ से आज के दिन की सबसे बड़ी विडम्बना है-लालच। विज्ञान ने अपने अनेकानेक भौतिक प्रकारों से सामग्रियों का ऐसा अम्बार लगा दिया है कि मनुष्य उस आडम्बर में कहीं खो गया है। सुबह से शाम सिर्फ दौडना! उन्हें पाना! भोगना! और नष्ट करना! बस उसने अपनी जीवन-पद्धति यही बना ली है। उसकी भोगसामग्री की सूची दिनोंदिन लम्बी होती जा रही है और सब कुछ भोगते हुए भी उसे कहीं भी रस नहीं मिलता। हमारे जीवन से 'आस्वाद' शब्द मिट गया है। अपनी लम्बी फेहरिश्त पर 'टिक' लगाता हुआ वह अन्त में थक कर खत्म हो जाता है।
यह गहन विषय है इस पर मैं तो क्या $खाक लिख पाऊँगी पर मेरी हार्दिक इच्छा है कि बढि़या रचनाकारों को इस अदृश्य दौड़ से मानवमात्र को बचाना चाहिए और अपने लेखन से उनकी तन्द्रा भंग करनी चाहिए। सात्विक जीवन के खूबसूरत पहलुओं का लय भरा वर्णन कर, उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे अपने पाठकों को समझा पायें कि 'देखो! देने में कितना आनन्द है।'
प्रश्न-प्रेमचन्द ने साहित्य को समाज के आगे चलने वाली मशाल कहा था.. आज साहित्य के लिए लोगों को जीवन में कितनी जगह बची है.. साहित्यकार हाशिए पर क्यों हैं?
उत्तर-साहित्य की तो छोडि़ये! पर जरा यह तो बताइये आज के लोगों को कौन सी ची$ज में आनन्द आता है? आज हमारे जीवन में उत्सव का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है और अब ऐसे उखड़े-पुखड़े समय में किसे फुर्सत है कि वह यह देखे कि कौन हाशिए पर है, कौन नहीं? मुझे नहीं पता आप हाशिये का इस्तेमाल किस सन्दर्भ में कर रहे हैं, पर शायद थोड़ा बहुत यह पता है कि हर दूसरा आदमी, पहले को धकिया कर हाशिये पर डालना चाहता है। अब ऐसे घटाटोप में तो वे ही नक्षत्र की तरह चमक कर ऊपर उठ पाएँगे, जो अपना सर्वस्व उलीच कर अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ेंगे।
प्रश्न-अंग्रेजी के लेखक साहित्य से पर्याप्त कमा रहे हैं और वे लगभग फुलटाइमर हैं, जबकि हिन्दी का लेखक साहित्य के बल पर अपना परिवार नहीं चला सकता.. उसके क्या कारण हैं?
उत्तर-क्या अंगे्रजी के सारे लेखक मजे में हैं या सिर्फ वे 'बेस्ट सेलर! जो कूद-फांद कर किस तरह सुर्खियों में आ गये हैं। मेरे हिसाब से भारत में भी बहुतेरे प्रकाशन संस्थान हैं, जो खूब कमा रहे हैं, तो फिर कमी कहाँ है! हमें  इसे खोजना चाहिए। आ$िखर वह कड़ी कौन सी है? जो बड़े-बड़े लेखकों तक को उनका प्राप्य नहीं देती?
प्रश्न-भारतीय भाषा परिषद की महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी होने के कारण देश भर के तमाम लेखकों के सम्पर्क में आप बराबर रही हैं, किनके व्यक्तित्व से आप प्रभावित हुईं। किस-किस ने आपके रचनात्मक व्यक्तित्व को बनने में मदद की। किसने आपके जीवन की दशा और दिशा को निर्देशित किया?
उत्तर-बड़े लोगों से मिलना-जुलना एक बात है और उनसे गढ़ा जाना कुछ और। मैंने ऐसा कौन सा तीर मार लिया है, जो मुझे कोई द्रोणाचार्य मिल जाते? जहाँ तक व्यक्तियों से प्रभावित होने का सवाल है मेरे लिए विष्णुकांत जी शास्त्री, दद्दा (भवानी प्रसाद मिश्र), अज्ञेय जी और कृष्णा सोबती बेजोड़ हैं। वैसे मेरा मैं दावा है कि मैं आज तक किसी बुरे आदमी से नहीं मिली। प्रत्येक लेखक की अपनी बानगी, अपनी मिठास, अपना सादापन और अपना वैशिष्ट्य होता है, जो मुझे प्रभावित ही नहीं सम्मोहित कर लेता है।
प्रश्न-साहित्य से समाज में क्या और कितना बदलाव लाया जा सकता है?
उत्तर-मेरा मानना है कि साहित्य ही वह औजार है जो समाज को बदल सकता है। मुझे बचपन से आजतक अपने पिताजी (97 वर्ष) के सुनाये हुए अनेक प्रेरक प्रसंग याद आते हैं जिसने मेरे जीवन में जो भी अच्छा है, उसे रचा है। वे दर्शन की बारीक सूक्तियों को उर्दू, संस्कृत, हिन्दी, हरियाणवी, ब्रज आदि अनेकानेक भाषाओं के दोहे, साखी, शेर, सोरठा में यों कह देते हैं कि हम कुछ भी करने से पहले रुक कर उसके सही या गलत पर विचार करने लगते हैं। इसका एक छोटा सा उदाहरण है कि 'प्रत्येक तानाशाह सबसे पहले देश के साहित्यकारों को कुचलता है, क्योंकि वह जानता है कि साहित्य के पलटवार को वह नहीं झेल पाएगा।'
प्रश्न-साहित्य के अलावा आपकी दिलचस्पी के क्षेत्र क्या हैं और उनसे आप किस प्रकार जुड़ी हैं?
उत्तर-मैंने अपने समय का एक हिस्सा उन संस्थाओं को दे रखा है जिन्हें मेरी आवश्यकता है। मैं एक लम्बे अर्से तक मदर टेरेसा के कार्यों से भी जुड़ी रही। एक समय ऐसा था जब मैं सुबह दस बजे से शाम तक विभिन्न संस्थाओं में का ही काम करती रहती थी.. पर अब मैं शारीरिक रूप से, मानसिक और आर्थिक रूप से तो कई संस्थाओं का काम करती हूँ, पर उन चल निकली संस्थाओं में अनावश्यक ही अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराती। एक लाइन में कहा जा सकता है कि मेरी दिलचस्पी झाँकावाले, झलनी वाले, खोंचेवाले, मर्सीउीज सवार काले चोगे में, अपढ़ वृद्धा, बच्चों में सबसे अधिक है। मैं राह चलते सबसे मुस्कुराकर बोलती-बतियाती रहती हूँ! और शायद मैं उनकी मुस्कुराहटें लेकर अपने आनन्द में इतना इजाफा कर लेती हूँ कि सदा मुस्कुराती रहती हूँ।

Saturday, 24 May 2014

अब चुनौती मजबूत विपक्ष की


-डॉ.अभिज्ञात
लोकतंत्र के असली दुर्दिन तब शुरू नहींं होते जब सरकार कमजोर होती है बल्कि असली दुर्दिन वे होते हैं जब वह सशक्त होती है। सरकार की निरंकुशता का लगातार खतरा बना रहता है। हालिया लोकसभा चुनावों में जनता ने भाजपा को भरपूर शक्तियां प्रदान कर दी हैं इसलिए चुनौतियों की विकरालता भी बढ़ी है। यह चुनौतियां क्षीण विपक्ष के कारण पैदा हुई हैं। भाजपा की 282 सीटों के बरअक्स दूसरे नम्बर पर रही कांग्रेस को महज 44 सीटें ही जीत पायीं। तीसरे स्थान पर जयललिता की पार्टी अन्नाद्रमुक रही जिसे 37 सीटें मिलीं मिली हैं। चौथे स्थान पर  34 सीटों वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस है। विपक्ष का दारोमदार इन्हीं लोगों पर है। आेडिशा के बीजू जनता दल आठ सीटें जीतकर कुल 20 सीटों के साथ पांचवें स्थान पर हैं।
हमारे यहां जो पद्धति है इससे यही लगता है कि विपक्ष की स्थिति सोचनीय है। जबकि इसे
31 बनाम 69 के रूप में भी देखा जा सकता है। चुनाव के निष्कर्ष निकालने के पैमाने बदले की जरूरत है। देखना यह पड़ेगा कि 31 प्रतिशत मत 69 प्रतिशत पर कैसे भारी पड़ रहा है। यह कौन सा लाजिक है जिसके आधार पर यह कहा जा रहा है कि देश में विपक्ष नहीं है। जनादेश का मतलब यह नहीं है आपको विपुल मत मिले हैं। 31 का आंकड़ा न तो संतोषजनक है और ना ही करिश्माई। इतने प्रतिशत अंक वाले परीक्षा में पास नहीं माने जाते। सबसे बेहतर ही संतोषजनक होने का पैमाना नहीं हो सकता। हालांकि यह तथ्य है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आजादी के बाद पहली बार केंद्र में किसी गैर कांग्रेसी दल को स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने का जनादेश मिला। यह इस पार्टी की उपलब्धि है। दूसरे यह कि कांग्रेस के नेतृत्व में नरसिम्हा राव ने 1991 में विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करके केंद्र में सरकार चलाने का जो प्रयोग शुरू किया था वह ढाई दशक में चला और क्षेत्रीय दलों को केंद्र की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता खोला जिसे मोदी लहर ने बंद कर एक नये युग की शुरुआत है। ढाई दशक के घटनाक्रम ने देश के बता दिया कि गंठबंधन का एक नाम शठबंधन हो सकता है। सौदेबाजी ने लोकतंत्र को कलंकित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी। भ्रष्टाचार के कई मामलों की जड़ गठबंधन सरकार के दबाव हैं।
बहरहाल देखना यह कि संसद में विपक्ष को मजबूत बनाने के लिए गैरभाजपाई क्या रणनीति अपनाते हैं। अगर लोकसभा अध्यक्ष नियमों में छूट देते हुए संप्रग को एक इकाई की मान्यता देते हैं कि नहीं। जिसके सांसदों की संख्या 56 है। वरना कांग्रेस के पास केवल 44 सीटें हैं, जबकि मुख्य विपक्षी दल की मान्यता प्राप्त करने के लिए किसी पार्टी के पास 543 सदस्यीय लोकसभा में कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सेदारी यानी 55 सदस्य होनी चाहिए। कांग्रेस यदि इस जिम्मेदारी से कतराती है तो अन्नाद्रमुक और तृणमूल कांग्रेस विपक्ष के नेता पद का दावा करने के लिए साथ आ सकते हैं जिनके सीटों की संख्या क्रमश: 37 और 34 है। देश की निगाह विपक्ष पर रहेगी क्योंकि वही संसद में उनके हितों की आवाज बुलंद करेगा।
खास तौर पर कांग्रेक उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लोकसभा में विपक्ष के नेता पद की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। जबकि वे और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी इससे कतरा रही हैं और कमलनाथ का नाम इसके लिए आगे किये जाने के कयास लगाये जा रहे हैं। कांग्रेस मनमोहन सिंह सरकार के दोनों पारी की उपलब्धियों की जोरशोर से चुनाव प्रचार में चर्चा न कर पहले ही अपना जनाधार खो चुकी है उसे और गलतियों से बचना चाहिए। राहुल गांधी को आगे बढ़ाने के लिए मनमोहन की अनदेखी करना आवश्यक नहीं था। अब राहुल के पास एक महत्वपूर्ण दायित्व लेने का अवसर हो सकता है, जिससे उनके तेवर में एक नयी धार आयेगी।
24 मई को कांग्रेस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को एक बार फिर अपने संसदीय दल का नेता चुना है। इस अवसर पर पारित प्रस्ताव में कहा गया कि पार्टी संसद में सभी धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील ताकतों व रणनीतियों का प्रभावशाली ढंग से परस्पर समन्वय करेंगी ताकि एकजुट विपक्ष तैयार हो सके। पार्टी समान विचारधारा वाली अन्य पार्टियों को को आश्वस्त किया है कि इस संबंध में वह अपना पूरा सहयोग करेगी। कांग्रेस आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने को दृढ़संकल्प है। कांग्रेस यह देखना चाहती है कि लंबित विधेयकों को लेकर नयी सरकार क्या रुख अपनाती है। यह नहीं भूलना होगा कि भले लोकसभा में पार्टी व विपक्ष की क्षमता कम हो लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस अभी भी सबसे बड़ी पार्टी है। सोनिया ने सतर्क किया है कि 'विपक्ष में रहने का मतलब है कि अधिक नियमित उपस्थिति हो, सदन के भीतर अधिक समय बिताया जाये और विषयों का अधिक अध्ययन किया जाये। इसका मतलब हुआ कि अधिक सवाल किये जायें, अधिक मुद्दे उठाये जायें, अधिक चर्चाएं शुरू की जायें और हमेशा सतर्क प्रहरी की तरह रहा जाये।

Saturday, 17 May 2014

बंगाल में लाल लगभग बेदखल, ममता का जादू कायम

-डॉ.अभिज्ञात 
कोलकाता -देश भर में चली मोदी लहर से पश्चिम बंगाल भी अछूता नहीं रहा किन्तु यह असर लाल दुर्ग के ध्वांसावशेष पर पड़ा और ममता बनर्जी अपराजेय रहीं। उनके नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उसने पिछले लोकसभा चुनाव में 19 सीटें हासिल की थी इस बार उसे 34 सीटें मिली हैं। वामपंथी सीटों पर कब्जा करते हुए राज्य से लगभग बेदखल कर दिया। वे अपना जनाधार बचाने में कामयाब रहीं और राज्य में हुए सारधा घोटालों में अपनी पार्टी की संलिप्तता का नाम उछाले जाने और मामले की सीबीआई जांच का सामना करने जा रही ममता ने बंगाल की राजनीति के ढर्रे को को ही बदल कर रख दिया है। चुनावी नतीजे इस बात का संकेत दे रहे हैं आने वाले समय में भले कांग्रेस की स्थिति कमोबेश जस की तस बनी रही है और उसे केवल चार सीटें मिलीं, किन्तु यहां अब भाजपा भी राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करायेगी तथा वामदलों का स्थान तृणमूल लेने जा रही है। वामदल 15 सीटों से सिमट कर दो पर आ गये। माकपा को केवल दो सीट मिली उसके अन्य दलों को सिफर हाथ लगा। राज्य के अल्पसंख्यकों की सरपरस्त के तौर पर ममता ने अपनी छवि बना ली है और मुस्लिम वोट बैंक पर अपना हक समझने वाले वामदलों से उसने यह हथिया लिया है। देश भर में चली रही मोदी लहर से किसी हद तक तृणमूल के चुनावी नतीजे अप्रभावित रहे तो इसलिए कि अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण उनके पक्ष में हुआ। उन्होंने अपने तेवर व गतिविधियों से यह साबित किया है कि वे साम्प्रदायिक ताकतों को रोकने वाली एक जुझारू नेता भी हैं और आने वाले समय में वे राष्ट्रीय स्तर अपनी इस छवि का विस्तार करेंगी, जो अब तक वामदलों की थी। हिन्दीभाषियों को बंगाल में गेस्ट बताने वाली ममता ने चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में अपनी गलती को सुधार लिया था और लगातार हिन्दीभाषियों को अपना बताने मेंं जुटी रहीं, जिसका उन्हें लाभ पहुंचा। वामपंथियों ने ऐसा नहींं किया था और ममता ने भी ऐसा पहली बार किया जिसका उन्हें लाभ मिलता रहेगा। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अपनी तीखी टिप्पणियों के जरिये भी उन्होंने यह संदेश दिया है। यहां यह भी गौरतलब है कि राज्य में भाजपा के वोटों का प्रतिशत बढ़ा है।
तृणमूल की उपलब्धियों में पूर्व रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के नेता दिनेश त्रिवेदी की बैरकपुर लोकसभा सीट पर माकपा की सुभासिनी अली से 1,01,373 वोटों जीत को विशेष तौर पर उल्लेखनीय माना जा सकता है क्योंकि उनके रिश्ते कुछ अरसा पहले ममता से खटासभरे हो गये थे। त्रिवेदी ने अपनी सीट बरकरार रखी है। चुनावी नतीजों में कांग्रेस की दीपा दासमुंशी अपने पति प्रियरंजन दासमुंशी की परम्परागत सीट से हार गयी हैं। इस चुनाव में ममता ने फिल्म व ग्लैमर की दुनिया से जुड़ी हस्तियों शताब्दी राय, देव, मुनमुन सेन, संध्या राय, तापस पाल को पार्टी प्रत्याशी बनाया था जिस पर खुद उनकी पार्टी में किसी हद तक असंतोष था किन्तु चुनावी नतीजों ने यह साबित कर दिया कि वे सही थीं।
राज्य की दो सीटों पर भाजपा को अच्छी बढ़त मिली और आसनसोल से पाश्र्व गायक बाबुल सुप्रियो और दार्जिलिंग से एसएस आहलुवालिया ने जीत हासिल की है। भाजपा को इस बार एक सीट का फायदा हुआ। राज्य के भाजपा प्रमुख राहुल सिन्हा का मानना है कि तृणमूल विरोधी वोटों का कांग्रेस, भाजपा व वाम में बंटवारा हुआ जिसके कारण तृणमूल मजबूत दिखायी दे रही है, अगले चुनाव तक तृणमूल विरोधी वोटों भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण होगा।
वामदलों की बंगाल से बेदखली का कारण भले उसके नेता बूथ दखल रीगिंग बता रहे हों किन्तु इसमें केवल आंशिक सच्च्चाई है। विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में तृणमूल से अपनी शर्मनाक पराजय के बाद भी वामदलों आत्मालोचना के लिए तैयार नहीं दिखायी दिये। सांगठनिक स्तर पर जो भी बदलाव हुए वह लीपापोती और धड़ाबंदी के स्तपर ही हुआ और ना ही सिद्धांतों में किसी आमूलचूल परिवर्तन की बात उन्होंंने की इसलिए तृणमूल से असंतुष्ट लोगों को लिए भी लोग वामपंथियों को राजनीतिक विकल्प बनने योग्य नहीं मानते हैं, इसलिए यथास्थिति बनी रहेगी या नये राजनीतिक विकल्पों को तलाश की जायेगी।

Thursday, 6 February 2014

Wednesday, 15 January 2014

साहित्य की आलोचना पूरी सभ्यता की आलोचना है

प्रख्यात आलोचक एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. शंभुनाथ से डॉ. अभिज्ञात की बातचीत 

प्रश्न: सृजनात्मक विधाएं अर्थात कविता, कहानी, उपन्यास आदि की तुलना में आलोचना विधा में सृजनात्मकता की गुंजाइश होती है, ऐसे में रचनात्मक संतोष जैसी मन:स्थिति होती है या नहीं?

उत्तर : मुझे लगता है कि आलोचना और रचना के बीच कोई दीवार खड़ी करना बुद्धिमत्ता का चिह्न नहीं है। हर रचनात्मकता में आलोचना छिपी रहती है। इसी प्रकार हर आलोचना में रचनात्मकता मौजूद होती है। इसलिए मुझे कभी नहीं लगा कि आलोचक के रूप में मुझे कभी रचनात्मकता सम्बंधी असंतोष हुआ हो। यह धारणा ही गलत है कि आलोचना रचना नहीं है। आलोचक भी कल्पना करता है। आलोचक के पास भी विजन होता है। आलोचक भी उसी समय और समाज का सामना करता है जिसका किसी अन्य विधा का रचनाकार सामना करता है। 
प्रश्न: फिर भी आम धारणा यह प्रचलित है कि आलोचना चूंकि किसी रचना पर आधारित होती है इसलिए वह उपजीव्य है। किसी अन्य रचना पर आधारित है..
उत्तर: यह उनके बारे में सच हो सकता है जो पुस्तक समीक्षक हैं। पर आलोचक का अर्थ बड़ा है। हालांकि आज आलोचना का अर्थ सिकुड़ा है। आज आलोचना का अर्थ है निंदा या चाटुकारिता करना। एक तरह का मैनेजमेंट का मामला हो गया है। विरोध न भी करना हो तो भी बात लाभ लोभ को तोल कर होती है। चाहे कोई पद मिला हो, पुरस्कार मिला हो या मिलने की गुंजाइश तो सराहना होती है, यदि ऐसी कोई गुंजाइश न हो तो निंदा होती है। आलोचना का एक तरह से अर्थ है क्रिटिकल एप्रीसिएशन, प्रशंसा करते हैं और आलोचनात्मक भी रहते हैं। सिर्फ आलोचनात्मकता ही पर्याप्त नहीं है। 
प्रश्न: आप ने आलोचना विधा में अरसे तक जम कर काम किया है..लेकिन जो रचनाकार अपनी विधाएं बदलते रहते हैं उनके प्रति आपका क्या नजरिया है?
उत्तर: एक जमाना था जब लेखक एक साथ बहुत सी विधाओं में लिखते थे। प्रसाद, निराला, अज्ञेय ये ऐसे रचनाकार थे जो एक साथ कई विधाओं में लिखते थे। वह एक तरह से बहुज्ञता का युग था। पर आज विशेषज्ञता का युग है। अब तो कई है वह सिर्फ कवि जो कहानीकार है सिर्फ कहानीकार है। आलोचक है तो आम तौर पर सिर्फ आलोचक है। फिर भी यह लेखक की अपनी स्वतंत्रता का मामला है कि वह एक या विभिन्न विधाओं में लिखे।
प्रश्न: साहित्यिक आलोचना अपने समाज की आलोचना से किस प्रकार भिन्न है। क्या समाज से कटकर साहित्य की स्वतंत्र आलोचना संभव है?
उत्तर: साहित्यिक रचनाएं भी समाज से पैदा होती हैं। रचना और आलोचना दोनों समाज से दूर नहीं रह सकती। जो सम्बंध रचना और आलोचना का है वही समाज और साहित्य का है। इसलिए रचना और आलोचना का समाज से समय और सभ्यता से गहरा नाता है। आलोचना है कुछ पुस्तकों की दुनिया तक सीमित नहीं है। वो एक तरह से पूरी सभ्यता की आलोचना है। यदि वह नहीं तो आलोचना एक ढंग से मुकम्मल नहीं हुई है। कुछ रचनाकार यह चाहते हैं कि वे क्रिकेट की पिच पर खेलें पर आलोचक बैठकर के टिप्पणी करे। भाई आलोचक की तो इच्छा होती है पिच पर खेलने की उसे भी तो खेलने दीजिए..
प्रश्न: वामपंथी आंदोलनों के क्षीण होने के राष्ट्रीय कारण क्या हैं? इनके लिए कौन जिम्मेदार है? 
उत्तर: नब्बे साल का कम्युनिस्ट आंदोलन धरा का धरा रह गया और एक साल की बनी आम आदमी पार्टी ने अपना रंग दिखा दिया। मुझे लगता है कि इसके मूल में यह है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवादी द्वंद्वात्मक व्यक्तिवाद में बदल गया और इसे वामपंथियों को सोचना चाहिए कि वे कहां चूके हैं। उनके विचार और आचरण में कहां फर्क है। कहां उन्हें नयी स्थितियों के बारे में फिर से विचार करना होगा। क्यूंकि आज अमरीकी साम्राज्यवाद या पूंजीवाद या बड़े-बड़े शब्दों के आधार पर जनता को इकट्ठा नहीं किया जा सकता। आज जनता को बिजली, पानी, रसोई गैस, औरत पर अत्याचार, किसान, पर्यावरण जैसे मुद्दों को रखकर ही इकट्ठा किया जा सकता है और उनके भीतर से ही साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खिलाफ चेतना पैदा की जा सकती है।
प्रश्न: वामपंथी आंदोलन सैद्धांतिक ज्यादा हो गया था व्यवहारिक कम..
उत्तर: भटकाव तो दोनों जगह आये..चाहे वह सैद्धांतिक स्तर और आचरण के स्तर पर, इसलिए वामपंथी शिविर में आत्मालोचना की बहुत अधिक। माक्र्सवादियों ने आधी ताकत तो अपने ही साथियों को खाने चबाने में खपा दी..खत्म कर दी..यही पूरे देश का परिदृश्य है वरना नब्बे साल का वामपंथी आंदोलन हाशिए पर क्यों होता?
प्रश्न: व्यावहारिक तौर पर साहित्यकार वामपंथी आंदोलन में भी मशाल नहीं थे बल्कि राजनीति करने वालों द्वारा हांके जाने वाले लोग थे इससे आप कहां तक सहमत हैं?
उत्तर: प्रेमचंद ने कहा है कि साहित्य राजनीतिक के आगे रहने वाली मशाल है। जब भी साहित्यकार बाजार तंत्र और संकीर्ण राजनीति का शिकार होता है वह अच्छा साहित्य नहीं दे पाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि साहित्यकार कम से कम दो चीजों से मुक्त रहे एक तो लोभ और भय से। लोभ और भय से मुक्त हुए बिना साहित्यकार अच्छी रचना नहीं कर सकता। ये ऐसी चीजें है जो कई जगहों पर रचनाकार को चुप रहने पर मजबूर करती हैं। साहित्यकार को तो निर्भीकता से अपनी बात कहनी होगी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से ऊपर उठकर। तभी उसका साहित्य जनता को संवेदित कर पायेगा।
प्रश्न: मौजूदा साहित्यिक समय को क्या नाम दिया जा सकता है? जनवादी लेखन का पराभव तो साफ दिखायी दे रहा है.. यह जो उसके बाद का रचना समय है मेरा प्रश्न उसी को लेकर है?
उत्तर : मुझे लगता है विचार का कभी पराभव नहीं होता वह जीवन में बचा होता है और साहित्य में भी। 19वीं-20वीं सदी जो है वह राष्ट्रीय जागरण का समय था। हमारा देश इस समय किसी न किसी तरह के केन्द्रवाद का बुरी तरह शिकार है। इसलिए आम नागरिक के अंदर केन्द्रवाद से घनघोर असंतोष है। जितनी केन्द्रवादी ताकते वे किंकर्तव्य विमूढ़ हैं। देश की जितनी राष्ट्रीय पार्टियां हैं वे किंकर्तव्य विमूढ़ हैं और जो स्थानीय पार्टियां हैं वो ज्यादा असर दिखा रही है। राष्ट्र एक तरह से जाति धर्म क्षेत्रीयता भाषा के आधार पर विघटन के कगार पर है इसलिए वर्तमान दौर में सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय पुनर्जागरण की है वर्तमान समय राष्ट्रीय पुनर्जागरण का है। दलित, स्त्री, किसान और आदिवासी राष्ट्र बना रहे हैं। पहले ऊपर से राष्ट्र बना था अब ये नीचे से राष्ट्र बना रहे हैं। वैश्वीकरण का मुकाबला बिना राष्ट्रीय पुनर्जागरण से संभव नहीं। वैश्वीकरण ने बाजार में तो एकता स्थापित कर दी है पर समाज को विभक्त कर दिया है। इसमें नीचे दबे कुचले वंचित लोगों की आवाज असरदार होगी। इससे नीचे से बनता हुआ जो राष्ट्र है, जो नीचे से उभरता राष्ट्रीय पुनर्जागरण है वही चुनौती देगा। 
प्रश्न: कई कवि इधर कथाकार हो गये हैं..., उसके क्या कारण आपको लगते हैं.. इस समय को क्या कथासमय को तौर पर रेखांकित किया जा सकता है। 
उत्तर : यह सही है कि इस समय पाठक उपन्यास की ओर अधिक आकृष्ट है। खासकर अंग्रेजी में उपन्यास का सितारा बुलंद है। अंग्रेजी उपन्यासकारों को बड़े बड़े पुरस्कार दिये जा रहे हैं। और एक तरह से उपन्यास साहित्य की केन्द्रीय विधा स्थापित है। आम पाठक उपन्यास पढ़ते हैं। यह इसका चिह्न कि समाज में किसी न किसी रूप में साहित्य की महत्ता बची हुई है। जीवन को बड़े कोण से जहां देखा जा रहा है वे चीजें पाठक चाहते हैं। वे अब खुदरा अनुभव की चीजें नहीं चाहते। पर यह है कि एक संकट है कि बाजार ने उपन्यास विधा का अपहरण कर लिया है इसलिए बहुत से राजनीतिक खेल उपन्यास विधा में चल रहे हैं। इस समय इतिहास को केन्द्र में रखकर उपन्यास लिखे जा रहे हैं ऐसे उपन्यास में इतिहास और कथा की ऐसी खिचड़ी पक रही है कि इतिहास का दुरुपयोग ज्यादा हो रहा है। वे इतिहास ही नहीं मिथकों से भी खेल रहे हैं। शिव पर तीन खंडों में जो उपन्यास आये लाखों प्रतियां बिकीं उसमें मिथकों का दुरुपयोग हुआ है। ये कृतियां साहित्यिक कम हैं, व्यवसायिक ज्यादा। कविता आज भी एक गैर-व्यावसायिक विधा है। वह बाजार में खरीदी बेची नहीं जा सकती। कविता भी कम बड़ी आवाज नहीं है..कविता में सच्ची आवाज होने की संभावना ज्यादा है। उसकी जगह समाज में बाजार में उसके लिए जगह नहीं है।
प्रश्न: आलोचक के तौर पर आपके रोलमॉडल कौन रहे हैं..आरंभ में किन लेखकों से प्रभावित रहे और अब किसे पढऩे योग्य पाते हैं।
उत्तर: मैं हिन्दी से दो साहित्यकारों से ज्यादा प्रभावित हुआ एक हैं प्रेमचंद दूसरे रामविलास शर्मा। बीसवीं सदी के पूर्वाद्र्ध में जो स्थान प्रेमचंद का है उत्तराद्र्ध में वही स्थान रामविलास शर्मा का है। मैं बेहिचक कह सकता हूं कि मेरे लिए आलोचना में कोई रोलमॉडल है तो वे रामविलास शर्मा हैं। सच्चा व सादा जीवन जिया। भय से मुक्त रहे। एक आलोचक को इससे ज्यादा और क्या चाहिए?
प्रश्न: एक शिक्षक के तौर पर अपनी भूमिका में आपने क्या पाया और क्या दिया?
उत्तर: मुझे लगता है कि एक शिक्षक के रूप में आरंभिक दशकों में विश्वविद्यालय में पढ़ाकर जो सुख मिला वह इधर के वर्षों में दुर्लभ है। इन दिनों विश्वविद्यालय में शिक्षा का वैसा वातावरण नहीं है। मुझे तो कुछ वर्षों में इधर लगा ही नहीं कि में विश्वविद्यालय में कुछ पढ़ा रहा हूं। अब साहित्य पढऩे का वह बड़ा मकसद नहीं रह गया है। अभी भी अच्छे विद्यार्थी हैं पर वे कम होते जा रहे हैं। साहित्य पढऩे का मतलब यह होना चाहिए कि हम कुछ अधिक मनुष्य होना चाहते हैं। अपनी संवेदना और ज्ञान का विस्तार करना चाहते हैं। इस समय रटकर तैयार की गयी चीजें विद्यार्थी की संवेदना और ज्ञान का कितना विस्तार करेंगी। लोग ज्ञान बहुत प्राप्त कर रहे हैं पर भावशून्य होते जा रहे हैं। आज ऐसे कई लोग हैं जो 'ज्ञानसमुद्र हैं पर भावकूप हैं।' फिर भी मुझे विश्वविद्यालय से प्रेम है। मेरा यहां लम्बा जीवन बीता।
प्रश्न: युवा रचनाकारों में क्या नया दिखायी दे रहा है। आप के युवा रचनाकारों के सामने क्या चुनौतियां हैं?
उत्तर : यह गहरे संतोष की बात है कि अब युवा रचनाकार पहले की तुलना में अधिक क्षेत्रों से निकल कर आ रहे हैं। पहले की तुलना में विविध समुदायों से निकल कर आ रहे हैं। एक बड़ी दुनिया बनी है रचनाकारों की। ये साहित्य को लेकर गंभीरता से काम कर रहे हैं।
प्रश्न: साहित्य जगत को आपने क्या दिया और क्या पाया?
उत्तर: साहित्य से पाया लांछना, अपमान, वंचना यही सब ज्यादा मिला..पर इस शहर में मुझे असीम स्नेह और सम्मान मिला। मेरे विद्यार्थियों ने मुझे बहुत आदर दिया।
मैंने साहित्य को क्या दिया यह तो नहीं कह सकता पर कोशिश जरूर की। मैं जब आगरा में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का निदेशक था, मैंने देश भर में हिन्दी के लिए जो काम करना संभव था, वो सब किया। शब्दकोष, सप्तकोष, विश्वकोष, लोकसाहित्य वगैरह की परियोजनाएं वहां शुरू कीं। अभी लिख रहा हूं पर क्या दे पा रहा हूं मुझे पता नहीं।
प्रश्न: सरकारी संस्थान में काम काम में तो बाधाएं आती होंगी..
उत्तर: केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा एक बीहड़ जगह थी। मेरे खिलाफ बड़े बढ़े षड्यंत्र चले। मेरा यह तरीका था कि शेर के मुंह से बचना हो तो उसकी सवारी करो। इसी तरीके से मैंने वहां 3 साल तक जमकर काम किया और लोग मुझे याद करते हैं।

Friday, 10 January 2014

यदि कुछ अच्छा लगता है तो यह बड़ी बात है-केदारनाथ सिंह

कोलकाता : 'आज तब कि हर ओर निराशा और हताशा कि स्थिति है और तमाम दिशाओं में तोड़-फोड़ मची है ऐसे में यदि कुछ अच्छा लगता है तो बड़ी बात है। निर्मला तोदी का कविता संग्रह 'अच्छा लगता है' बहुत सी सकारात्मक बातों व आश्वस्ति की किरण के साथ उपस्थित है। इसमें आशा के अंखुए हैं, जो इस बात के द्योतक है कि वे अपने अगले काव्य संग्रह में बहुत कुछ महत्वपूर्ण जोड़ेंगी।' यह कहना है प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह का। वे निर्मला तोदी के काव्य संग्रह का लोकार्पण करने के बाद सभा को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि किसी छठे सातवें दशक में बांग्ला कवि सुभाष मुखोपाध्याय ने लिखा था 'मुझे अच्छा नहीं लगता'। कई दशक बाद जब कोई कवि कहता है अच्छा लगता है तो यह नयी बात है। चलो कुछ तो सकारात्मक है, जो जीवन को नयी ऊर्जा देता है। 
आलोचक और कलकत्ता विश्वविद्यालय को प्रोफेसर डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि निर्मला जी की कविता में उनके भीतर एक और स्त्री के होने का अनुभव है। यह वह स्त्री है, जो घर परिवार के बीच रहते हुए और उसे सजाते-संवारते हुए भी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की तलाश में है। स्त्री की अपनी आवाज का होना एक बड़ी बात है, जो उनकी कविता को अर्थवान बनाता है। किसी स्त्री को कविता लिखना अच्छा लगे तो यह इस बात का संकेत है कि उसमें स्वतंत्र व्यक्तित्व का बनना प्रारंभ हो गया है। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से नंदन परिसर के जीवनानंद सभागार में शुक्रवार की शाम आयोजित इस समारोह में कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका डॉ.सोमा बंद्योपाध्याय, पत्रकार डॉ.अभिज्ञात, स्काटिश चर्च कालेज की प्राध्यापिका प्रो.गीता दूबे, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ.जय कौशल ने संग्रह की कविताओं पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन युवा कवि निशांत ने किया। इस अवसर पर बालकिशन तोदी ने निर्मला तोदी का सम्मान किया। धन्यवाद ज्ञापन किशन तोदी ने किया।

Wednesday, 8 January 2014

इच्छाएं

कविता-सुतपा सेनगुप्ता

बांग्ला से हिन्दी अनुवाद-डॉ.अभिज्ञात

किनारे लगने के लिए तट चाहिए, दो हाथों को शक्ति चाहिए चैतन्यबाहु के लिए
समुद्र का गर्जन चाहिए, आकाश से लड़कर उसे नीचे उतारने के लिए
हवा में तैरता मेघ चाहिए, चाहिए वर्षा और आंधी के बीच बिजली की आंखमिचौली
खेल चाहिए, संयम का कोलाहल और पीछे चाहिए एक विपणन बाक्स
पड़े रहने के लिए चाहिए खुले फीते, नट बोल्ट और गोदाम
यह सब इकट्ठा करके दौडऩे के पहले उलट जाना चाहिए
बांसुरी की तान चाहिए और बसंत के उद्यान की हवा

पतझड़ के पत्तों की हंसी चाहिए एक बार आग के लिए
आने जाने वाली शाम के लिए चाहिए चीनी में लिपटा विष
विष चाहिए औषधि के पात्र में
चुम्बन चाहिए वृद्धावास की झुॢरयों के झरने के किनारे
गोद में झुका सिर चाहिए
गोद भरने के लिए चाहिए एक अनाथ बच्चा
पसीना चाहिए, कपड़ा चाहिए, ओढऩा चाहिए, विधवा का परिधान चाहिए
और चाहिए कम्बल का सूत
चाहिए साधुओं का संग, गृह का परित्याग
ईश्वर के इर्द-गिर्द चाहते हैं रोना और हंसना
प्रेमी के रक्तिम नैन चाहिए चाहिए
चाहिए उसके होठों का आधार
चाहिए लगंड़ा-लूला जगन्नाथ
और चाहिए काम से कातर युवक
चाहिए प्रह्लाद, जगन्नाथ चाहिए
चाहिए छात्र, एक पागल की डायरी.. जिसे किशोर छात्र पढ़ सकें


बीच से टूटे सेब के बीज का कण चाहिए, इंद्रियों की खुल चुकी रस्सी
समूह गणित तत्व, तस्वीह माला में गुंथा एक क्षण को श्वास रुद्ध करने वाला जादू
खुले इस्पात की भ्रांति चाहिए एक बार अंतत: एक बार गिरकर उठने से पहले
फेंकने से पहले उसके लिए आंख इन हाथों को अंकित करके जाना चाहता हूं
परिचित गंध चाहिए, फर्श के बीच देखते ही कमल के फूल खिलने चाहिए
होली चाहिए, पूर्णिमा चाहिए, ढोल करताल बचाकर दूसरोंं को चिढ़ाने गीत चाहिए
जैसे दिल से दिल मिल जाने पर आवाज आती है गुननन गुनगुन गुनगुन
विपत्त्ती के संकेत तोड़कर बचना चाहिए
नर्म हथेली पर चाहिए ताजा खोई


समझना और जानना है
कितनी रातों तक पार करना होगा इस जमुना का जल
जल का भी आधार चाहिए, रंग भी चाहिए
ये ना होता तो एक ढंग से किंवदंती चाहिए
कृष्णकान्हा राधे राधे का कलरव चाहिए
धूल चाहिए, अमृत चाहिए, पलाश के पत्र चाहिए
टूटी हुई कलसी के बाद, जिधर देखना नहीं, उधर देखना चाहती हूं
जन्मांध की गाली चाहिए
निरुपाय किशोर का उत्तरीय फट जाना चाहिए
उसको बोने लायक मिट्टी चाहिए
बिल्ली की नाखूनों जैसे तीक्ष्ण और चौड़े पंजों जैसा समय और कालबिन्दु चाहिए

चाहिए शहर से सस्ता छाते जैसा एक गुच्छा काव्य से उपेक्षित
दिमाग खराब कर दे ऐसा कहानी, असंख्य कांसफूलों से भरी लम्बी-लम्बी रेल लाइनों का निमंत्रण
चाहिए अपू और यौनहीन नारियों के दुर्गामंडप के सामने स्तुति
चाहिए चाहिए आवाज को बंद करने के लिए भात, रोटी, कपड़ा और मकान
चाहिए मंड़ई के पास थोड़ी जगह धूप और प्रेम प्रेमिकाओं के आलिंगन के लिए
चाहिए अवैध संतान का अहंकार, चाहिए जरी के बदले असली सोना
चाहिए सोना सोना सोने के लिए पागलपन की हद तक दीवानगी
चाहते हैं डेस्डिमोना की तरह मौत


चाहती हूं सती की तरह शिव ङ्क्षनंदा सुनकर देहत्याग को तत्पर होना
चाहती हूं मीरा के भजनों के प्रति आसक्ति
चाहती हूं क्लियोपेट्रा होना
चाहिए कैस्बियंका के अंतिम विश्वास से भरा प्राणों को दग्ध करने वाला आश्र्चय का एक जहाज
चाहिए जहाज, पृथ्वी, नीलग्रह, विश्वदेश
चाहिए एक जहाज प्रेम के लिए, छोटा एक कोलाज जो ठहरा हुआ हो
एक दो बूंद दुख
आंखों की कुछ पलकें
जूही के फूल के श्वांस की तरह
एक दो बार
कांप उठना
चाहती हूं।

कैसा है कबीर का जादू

समीक्षा
-डॉ.अभिज्ञात
कहै कबीर मैं पूरा पाया/लेखक-ओशो/ प्रकाशक-डायमंड पाकेट बुक्स प्रा.लि., 10-30, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-2,नयी दिल्ली-20/मूल्य-250 रुपये 
'कहै कबीर मैं पूरा पाया' कबीर वाणी पर ओशो के प्रवचनों का संग्रह है। इसमें श्रोताओं की कई जिज्ञासाओं का समाधान भी उन्होंने किया है। जनभाषा में कबीर ने सीधे-सरल हृदय से जो कुछ कहा उसे समझने में आज की जटिल होती दुनिया में कई दुश्वारियां हैं। उनके कहे के मर्म को समझने में आज के कई विद्वान तक भूल कर बैठते हैं या फिर उस सच तक नहीं पहुंच पाते जहां कबीर इशारा करते हैं। यह पुस्तक इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि कबीर के कथ्य के अभिप्रेय तक पहुंचने में पाठकों की मदद करती है। कबीर को ओशो की निगाह से देखने पर वे उलझनें और गुत्थियां दूर होती हैं जिनमें उलझ कर पाठक रह जाते हैं। यह पुस्तक कबीर के दर्शन की गहराई तक पहुंचने में हमारी सहायता करती है। ओशो ने कबीर के क्रांतिकारी विचारों को नये आलोक में पेश किया है तथा उनके विचारों की प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया है। ओशो ने उनके बारे में कहा है कि 'टेढ़ी मेढ़ी बात कबीर को पसंद नहीं। इसलिए उनके रास्ते का नाम है: सहज-योग।' कबीर के विचारों की मौलिकता पर रीझते हुए ओशो कहते हैं-'कबीर के वचन अनूठे हैं; जूठे जरा भी नहीं।' संतों के बीच कबीर के स्थान का निर्धारण करते हुए वे कहते हैं-'संतों में कबीर के मुकाबले कोई और नहीं। सभी संत प्यारे और सुंदर हैं। सभी संत अद्भुत हैं; मगर कबीर अद्भुतों में भी अद्भुत हैं; बेजोड़ हैं।' ओशो का दावा है कि 'जो एक बार कबीर के प्रेम में पड़ गया, फिर उसे कोई और संत न जंचेगा। और अगर जंचेगा भी तो इसलिए कि कबीर की भी भनक सुनाई पड़ेगी।'
सांस्कृतिक समन्वय और धार्मिक सद्भाव के लिहाज से कबीर पर ओशो की व्याख्या बेहद प्रासंगिक है। वे कहते हैं-'कबीर में हिन्दू और मुसलमान संस्कृतियां जिस तरह तालमेल खा गयीं, इतना तालमेल तुम्हें गंगा और यमुना में भी प्रयाग में नहीं मिलेगा। दोनों का जल अलग-अलग मालूम होता है। कबीर में जल जरा भी अलग-अलग नहीं मालूम होता।..वहां कुरान और वेद ऐसे खो गये कि रेखा भी नहीं छूटी।' ओशो की नजर से हम यह जान पाते हैं कि 'कबीर में ऐसा जादू है कि तुम्हें वहां पहुंचा दे.उस मूल स्रोत पर..जहां से सब आया है, और जहां एक दिन सब लीन हो जाता है।'

Tuesday, 24 December 2013

गृहस्थ जीवन की संवेदनात्मक सृजनशीलता

पुस्तक समीक्षा
-डॉ.अभिज्ञात
पुस्तक का नाम-अच्छा लगता है/रचनाकार-निर्मला तोदी/प्रकाशक-नयी किताब, 1/11829 पंचशील गार्डन, प्रथम तल, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032/मूल्य-195 रुपये 

एक स्त्री के जीवन से जुड़ी रोजमर्रा की तमाम बातों और उसके सरोकारों की सहज, सरल और सच्ची अभिव्यक्ति निर्मला तोदी के पहले काव्य संग्रह 'अच्छा लगता है' में हुई है। उनके यहां कुछ भी मामूली नहीं है। हर चीज गहरी अर्थवत्ता और लगभग आध्यात्मिक उत्कर्ष लिए हुए है। संग्रह में अधिकांश छोटी-छोटी कविताएं हैं लेकिन वे अपने आप में एक पूरी बात को उसके वास्तविक परिप्रेक्ष्य में कहने मेंं पूरी तरह सक्षम हैं। मिथकथन न सिर्फ उनका काव्य स्वभाव है बल्कि उनके रचाव का एक कौशल भी है। उनकी रचनाओं में संकेत अधिक हैं और ये संकेत ही उनकी कविताओं के फलक का अधिकाधिक विस्तार करते हैं। ऐसी ही एक कविता है जीवन संघर्ष-'कमरे में/एक ऑक्सीजन सिलेण्डर लगा है उसके/बालकनी में एक एक्ट्रा पड़ा हुआ है/कभी-कभी/ ऐसा भी होता है/पूरी पृथ्वी का ऑक्सीजन कम पड़ जाता है।'
उनके लिए कविता क्या है, उसका उत्स क्या है और उनका रचनात्मक संघर्ष क्या है इस बात पर एक सार्थक टिप्पणी उन्हीं की एक कविता 'मेरे शब्द' है, हालांकि वह पुस्तक के अनुक्रम में न तो पहली कविता है न आखिरी-'मेरे विचार/आले में चाभियों के गुच्छे के नीचे/ दबे पड़े हैं/मेरी यादें/स्टोररूम के संदूक में धरी हैं/मेरे अनुभव/बरनियों के तेल-मसाले में डूबे हैं/मेरे शब्द/सोफा पर कुशनों के साथ बिखरे हैं/मैं इन्हें/पहचानने से भी इनकार करती हूं/जबकि मैं जानता हूं/ये हैं/एक कहानी/ एक कविता/एक संस्मरण/मैंने इन्हें बिखेर कर/दबा कर रखा है/मैं सजाने से डरती हूं।' यह कविता तमाम रचनारत महिलाओं की आवाज भी है, जो हर हाल में घर-परिवार के दायरे से मुक्त नहीं हैं। जिनके स्वतंत्र व्यक्तित्व पर गृहस्थी की जिम्मेदारियों की छाप है। उनकी यह बात उनकी एक अन्य कविता 'सबसे पहले वह एक गृहणी है' में भी व्यक्त हुई है। 'मेरी रसोई' कविता में वे लिखती हैं-'चायपत्ती व चीनी का डब्बा/मेरे स्पर्श से मेरी मन:स्थिति को भांप लेते हैं।' निर्मला जी कविता में चयन पर विशेष जोर देती है और यह चयन सार्थकता से ओत प्रोत है। 'जन्म दिन' कविता में वे लिखती हैं-'आज के दिन/मैं नहीं कहती/आपको दुनिया भर की खुशियां मिलें/मैं चाहती हूं/जो खुशियां आप पाना चाहते हैं/आपको जरूर मिलें/आज के दिन यह भी नहीं कहूंगी/आप सौ साल जीएं/आप जितना जीएं/जिन्दगी को भरपूर जीएं।' यहां जो जिन्दगी से भरपूर जीवन उल्लेख है उसका एक विस्तृत प्रारूप भी उनकी एक अन्य कविता 'छाता' में है। वे अपने लिए भरपूर जीना किसे मानती हैं, और यहीं उनका कवि अपनी तमाम विशेषताओं के साथ पाठक के समक्ष आता है। उसकी बानगी देखें-'धरती के रेशे में पानी ही पानी/मैं भी रेशा रेशा भीगना चाहता हूं......तुम देखना मैं एक दिन छाता बन जाऊंगी/ उनकी तरह।' मां, पिता, बच्चों पर लिखी उनकी कविताएं भी हमारी संवेदना को गहराई तक छूती हैं। इस प्रकार गृहस्थ जीवन की संवेदनात्मक सृजनशीलता के लिए लिहाज से उनकी कविताएं स्मरणीय हैं। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने इनकी कविताओं के बारे में ठीक ही लिखा है कि सहजता इस संग्रह की कविताओं की सबसे बड़ी खासियत है। 

Sunday, 22 December 2013

कविता और दर्शन के मूल्य तत्व प्रेम और दुख हैं-शंभुनाथ


कोलकाता :'यदि कोई अपने लिए कविता लिखता है तो वह सार्वजनीन भी हो जायेगी, लेकिन जो दूसरों के लिए ही लिखता है वह कई बार ठीक- ठाक कविता लिख ही नहीं पाता। इसलिए कविता की विश्वसनीयता कवि के अपने दुख-सुख से जुडऩे से भी सम्बंधित है। कविता का स्वभाव ऐसा है कि वह एक के दुख को दूसरे के दुख से जोड़ती है।' यह बात कही आलोचक एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ.शंभुनाथ ने। वे शनिवार की शाम मुकुंद अपार्टमेंट, बालीगंज में आयोजित एक कवि गोष्ठी को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि चाहे व कविता हो या दर्शन, उनका सम्बंध मूल तौर पर दो ही चीजों से है-एक है प्रेम, दूसरा है दुख। इन दोनों के निजी अनुभव की अभिव्यक्ति भी निजी नहीं रह जाती, यह व्यापक समुदाय से जोड़ती है। गोष्ठी में डॉ.गीता दूबे, राज्यवर्धन, डॉ.अभिज्ञात, विमलेश त्रिपाठी, निर्मला तोदी, रितेश पांडेय, निशांत, जीवन सिंह, जयप्रकाश एवं विजय गौड़ ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

Wednesday, 18 December 2013

'बैंकों की हिंदी या द्विभाषिक पत्रिकाएं : कितनी औपचारिक, कितनी गंभीर' पर राजभाषा सम्मेलन

राजभाषा सम्मेलन की तस्वीरें















कोलकाता : बैंक ऑफ इंडिया की ओर से कोलकाता के पार्क होटल में 'बैंकों की हिंदी या द्विभाषिक पत्रिकाएं : कितनी औपचारिक, कितनी गंभीर' पर राजभाषा सम्मेलन का आयोजन सोमवार 16 दिसम्बर को किया। सम्मेलन की अध्यक्षता  बैंक ऑफ इंडिया के कार्यपालक निदेशक बी.पी शर्मा ने किया। मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ पत्रकार-लेखक डॉ.अभिज्ञात। सम्मेलन में बैंक ऑफ इंडिया, प्रधान कार्यालय के महाप्रबंधक एस.सी अरोड़ा, आरबीआई के महाप्रबंधक जीएन रथ तथा राष्टïरीयकृत बैंकों के उच्च अधिकारियों ने भाग लिया। आरबीआई के महाप्रबंधक जी. एन रथ कहा कि बैंकों द्वारा हिंदी पत्रिकाओं के प्रकाशन में कितनी भी कठिनाई क्यों न हो पर उनका प्रकाशन अवश्य जारी रखना है तथा भविष्य की चुनौतियों के लिए भी उन्हें तैयार रखना है।
सम्मेलन के आरंभ में अनिल भल्ला, महाप्रबंधक, एन. बी. जी (पूर्व), बैंक ऑफ इंडिया ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा हिंदी के विकास में अहिंदीभाषी विद्वानों व कोलकाता शहर की भूमिका को रेखांकित किया। सम्मेलन को आर. डी वशिष्ठï (इलाहाबाद बैंक), एस. एस यादव (यूनियन बैंक), के. के गुप्ता (आईओबी), सरताज मो. शकील (संपादक, तारांगण, बीओई), मित्तल (विजया बैंक) जे. के भल्ला (सेंट्रल बैंक), प्रदीप चतुर्वेदी (यूको बैंक), साइबा पात्र (सचिव, बैंक, नराकास, कोलकाता) व स्वरूप चक्रवर्ती (संपादक, एक्जिम पत्रिका) ने संबोधित किया।कार्यक्रम में सहभागिता के लिए एल. एम कुलेठा, मुख्य प्रबंधक, बैंक ऑफ इंडिया ने सभी प्रतिभागियों व श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया।

Tuesday, 26 November 2013

शुभकामनाओं से लैस कविताएं


पुस्तक समीक्षा
पुस्तक का नाम: धरती अधखिला फूल है/

लेखक: एकान्त श्रीवास्तव/ प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन,
 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, 
नयी दिल्ली-110002/मूल्य:250 रुपये

नवें दशक में उभरे महत्वपूर्ण कवि एकान्त श्रीवास्तव का नया कविता संग्रह उनके मुहावरों में नयी अर्थवत्ता के साथ उपस्थित हुआ है। यहां आते आते उनकी कविताओं में स्वप्न और आदर्श की रुमानियत यथार्थ से मुठभेड़ के क्रम में पहले से कम हुई है और कविताएं शब्द से इतर अपने संकेतों और कथन के निहितार्थ में केंद्रित हैं। उनकी कविताओं ने वैचारिक प्रतिबद्धता से परे जाकर करुणा, संवेदना और अनुभूति को तरजीह दी है। इस संग्रह की कविताएं धीरे-धीरे मन में गहरे पैठती जाती हैं और उनका समग्र रूपाकार पाठक के मन में एक स्थायी जगह बना लेता है। वे उन बेहद कम कवियों में से हैं जिनका अपना एक स्वतंत्र कवि व्यक्तित्व है। एकाध कविता, कुछ कविताएं या कुछ अधिक कविताएं अच्छी या बहुत अच्छी लिखना दीगर बात है और अपनी कविताओं से पूरे एक काव्य व्यक्तित्व का सृजन दूसरी बात। यह दूसरी बात अर्जित करने की विलक्षणता उनमें है। वे वहां पहुंच चुके हैं जहां से दुनिया की तमाम छोटी-बड़ी घटनाएं, उथल-पुथल और परिवर्तन को एक खास नजरिये से देख सकते हैं और यही नहीं उनका पाठक भी उनके विजन को समझने के बाद देश दुनिया और अपने इर्द गिर्द को देखने की नयी दृष्टि पाते हैं। मेरी नजर में उनकी सबसे बड़ी कामयाबी यही है कि पाठक न सि$र्फ उनकी कविता से प्रभावित हों बल्कि उसका अपना व्यक्तित्व भी कवि के नजरिये प्रभावित हो जायें। वे वस्तु व भाव जगत को नयी उष्मा व चेतना के साथ देखें।
इस संग्रह की कविताएं ऐसी नहीं हैं कि यदि आपके पास बहुत फुरसत हो तो भी पांच सात कविताएं एक साथ पढ़ सकें। दो-तीन-चार कविताओं तक पहुंचते पहुंचते पुस्तक आपके साथ से हट जायेगी। आप उस लोक और अनुभूति की गहराई में उतर चुके होंगे जहां ये कविताएं आपको ले गयी हैं। इसलिए इस संग्रह को पूरा पढऩे के लिए कई दिन और सीटिंग की आवश्यकता पड़ेगी। यह यात्रा सिर्फ शब्दों की नहीं है। आपके सामने कई परिचित-अपरिचित दृश्य व दुनिया के दरवाज़े खुलेंगे और कवि के साथ प्रवेश करने के बाद बेचैन, संवेदित और अपने दुखते-टीसते दिल के साथ लौटेंगे। ये कविताएं माक्र्स नहीं बुद्ध व महाबीर के करीब हैं। इनमें विचार नहीं दर्शन है। संग्रह में शब्द नहीं संकेत की कविताएं हैं। यह दृश्य नहीं दृष्टि है। कंसेप्ट नहीं विजन है। यहां लोकेल सुरक्षित है। ये व्यक्तित्वहीन कविताएं नहीं हैं। एकांत जिस भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े हैं, उसका भूगोल, वानस्पतिक संसार, जीव जंतु, रम्मो-रिवाज सब कुछ उनकी कविताओं का हिस्सा है। कोई कवि अपनी ओढ़ी बिछाई दुनिया को किस प्रकार अपनी कविता का अहम हिस्सा बनाता यह उनसे सीखने लायक है। एक बात इन कविताओं में विशिष्ट है कि ये बेहतर देश दुनिया के लिए सद्भावों,  शुभकामनाओं से लैस कविताएं हैं। आशीष देती और मंगलकामना करती, और कई बार उपदेश मुद्रा में- 'जिनका कोई नहीं है/इस दुनिया में/हवाएं उनका रास्ता काटती हैं/शुभ हों उन सब की यात्राएं/ जिनका रास्ता किसी ने नहीं काटा।' (पृष्ठ-15) कई कविताओं में लोकजीवन के हृदयग्राही दृश्यों, भंगिमाओं व लोकशैली का उपयोग उन्होंने किया है जो अपने टटकेपन से हमारा अतिरिक्त ध्यान खींचती हैं। उसी प्रकार पारिवारिक रिश्तों पर रची गयी कविताएं भी मन को छूती हैं। करेले बेचने आयी बच्चियां, बुनकर की मृत्यु (एक व दो), नमक बेचनेवाले, सोनझर, बाबूलाल और पूरन, आम बेचती स्त्रियां आदि कविताएं एक प्रकार के खास चरित्र को उठाती हैं और उनके जीवन मर्म को एक वृहत्तर आयाम प्रदान करती हैं साथ ही उनके दुख को दर्शन की ऊंचाइयों तक ले जाती हैं। -डॉ. अभिज्ञात 

Wednesday, 30 October 2013

देह और मन का द्वंद्व और यथार्थ

समीक्षा

-डॉ.अभिज्ञात

पुस्तक का नाम: फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे/
लेखिका: ई.एल. जेम्स/ प्रकाशक-डायमंड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि., 10-30, 
ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-2, नयी दिल्ली-110020/
मूल्य-175 रुपये
फिफ्टी शेड्स ट्रॉयोलॉजी ने अपने प्रकाशन के साथ दुनिया भर में धूम मचा दी। यह बेहद पढ़ी जाने वाली पुस्तकों की श्रेणी में आ गयी जिसकी विभिन्न भाषाओं में करोड़ों प्रतियां बिकीं। इस ट्रॉयोलॉजी का पहला भाग है-'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे'। यह साहित्य की एक भोली-भाली व मासूम छात्रा एनस्टेशिया स्टील उर्फ एना एवं सफल उद्यमी क्रिस्टियन ग्रे के सम्बंधों की कहानी पर आधारित है, जिसका तानाबाना दैहिक सम्बंधों और सच्चे आत्मिक प्यार के द्वंद्व से बुना गया है। अपनी पत्रकार मित्र की बीमारी के चलते उसकी ओर से ग्रे का इंटरव्यू लेने वह पहुंचती है और वह ग्रे को अपना दिल दे बैठती है किन्तु ग्रे का व्यक्तित्व सम्मोहक होते हुए भी उसके जीवन के तौरतरीके एना की कल्पना से परे थे। वह दैहिक सम्बंधों के लिए एना को एक सेक्स गुलाम बनाना चाहता है और जबकि एना उसमें सच्चे प्यार की तलाश करती है। लगातार एक तनावपूर्ण स्थितियों में उपन्यास धीमी गति से आगे बढ़ता है। जहां ग्रे क्रमश: मन की भीतरी तहों में उतरा जाता है वहीं एना देह की भाषा को सुनना समझना शुरू करती है। भारतीय पाठकों के लिए यह एक नये विषयवस्तु के आस्वाद का उपन्यास है जिसे न तो वह अधूरा छोड़ सकता है और तीखे यथार्थ की अभिव्यक्ति के कारण ना ही लगातार उसे पढऩे की ताब रख पाता है। इसमें ग्रे का दैहिक सम्बंध लगभग मशीनी प्रक्रिया है और एना का प्यार इन सम्बंधों में रूह की तलाश करता है। यह उपन्यास की सफलता है कि ग्रे क्रमश: एना और एना क्रमश: ग्रे की दिशा में उन्मुख है, जो सम्बंधों को एक नया अर्थ देता है। दैहिक सम्बंधों के मशीनीकरण और प्रेम की वायवीयता के बीच की जगह की तलाश इस उपन्यास की एक खासियत है जिसके लिए पाठक इसे अरसे तक याद रखेंगे। इस उपन्यास में तिक्त और जटिल यथार्थ की अभिव्यक्ति जिस साफगोई से हुई है वह पाठक को स्तंभित ही नहीं आक्रांत भी करती है।
ग्रे के व्यक्तित्व की खामियां उसके स्वभाव की उपज नहीं हैं, बल्कि उसके जीवन के अनुभवों और हालत से निर्मित हैं, जिन पर वह काबू पाने की अनवरत कोशिश वह करता है। अपने स्तर पर वह एक ईमानदार व्यक्ति है और सम्बंधों में पारदर्शिता का हामी है। वह सबके साथ हमेशा यह तय करना चाहता है कि उसे और उससे जुड़े किसी व्यक्ति का आपस में क्या लेना-देना है और दोनों की सीमाएं क्या हैं? क्या करना है और क्या नहीं करना है। उसकी यह आदत जब प्रेम सम्बंधों से टकराती है तो उसकी विसंगतियां उभर कर आती हैं। झकझोर कर रख देने वाली इस ट्रॉयोलॉजी के अन्य दो भाग हैं-फिफ्टी शेड्स डार्कर एवं फिफ्टी शेड्स फ्रीड, जिसे फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे के पाठक अवश्य पढऩा चाहेंगे।

Tuesday, 22 October 2013

गीता के भाष्य में लगा पूरा जीवन


अपनी जिन्दगी की लगभग पूरी ऊर्जा किसी एक ग्रंथ के भाष्य में कोई लगा दे तो उस काम के महत्व का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। डा.मंगल त्रिपाठी ने लगभग चालीस साल गीता के भाष्य को दिये हैं। अपने जीवन की लगभग समस्त ऊर्जा उन्होंने इस काम में झोंक दी है। ऐसा नहीं है कि वे इसमें अकेले लगे हैं बल्कि कमोबेश पांच लोगों की पूरी टीम उनके साथ इस काम में जुटी रही है हालांकि इस लम्बी कालावधि में उनके कुछ साथी अब नहीं रहे।
लगभग छह सौ पृष्ठों का जो भाष्य तैयार किया है वह न सिर्फ चिन्तन से जुड़ा नायाब ग्रंथ है, बल्कि वह कलात्मक संयोजन का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। तीन सौ पृष्ठों में गीता के समस्त श्लोक और उसका मंगल त्रिपाठी द्वारा किया गया भाष्य है बल्कि उनके भाष्य की चित्रात्मक अभिव्यक्ति वाली पेंटिंग की तस्वीरें भी ग्रंथ में हैं। अर्थात 300 पृष्ठ में भाष्य और उतने ही पृष्ठों में चित्र भी।
पुस्तक में लेखन सम्बंधी कार्यों का मूल्य छोड़ कर केवल उसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री पर ही प्रति पुस्तक एक लाख से अधिक का खर्च बैठा है। ग्रंथ का वजन साढ़े सात किलो है। वह एक ऐसे लकड़ी के बाक्स में है जिसे खोलकर ग्रंथ को बाहर निकाले बिना ही पढ़ा जा सकता है। ग्रंथ का नाम हीरे से लिखा है।
हीरे का उपयोग ग्रंथ में किये जाने के औचित्य पर उन्होंने बताया कि मैं मानता हूं कि गीता के श्लोक हीरे से अंकित किये जाने योग्य हैं। अपने सीमित संसाधनों के बावजूद मैंने यह प्रयोग इसलिए किया ताकि गीता के महत्व की ओर लोगों का ध्यान जाये। आज के समय में गीता ही वह ग्रंथ है जो हमें मार्ग दिखला सकता है। कोई व्यक्ति जब ज्ञान मार्ग पर चलता है तो कभी न कभी वह गीता के अर्थ तलाश करने की कोशिश अवश्य करता है क्योंकि  गीता में हर ज्ञान को चुनौती देने वाले तत्व विद्यमान हैं। जिसके ज्ञान की परिधि जितनी है गीता का अर्थ उसे उतना ही मिलता है। गीता ज्ञान को एक प्रवाह के रूप में देखने को विवश करती हैं क्योंकि गीता अर्थ का निरंतर अतिक्रमण करने वाला शास्त्र है।
त्रिपाठी से जब यह पूछा गया कि आज गीता के कई भाष्य विद्यमान हैं, आपको उसमें से कौन सा भाष्य अपने भाष्य के अर्थ के करीब लगता है, तो उनका कहना था गांधी जी और ज्ञानेश्वर का भाष्य मुझे प्रिय है किन्तु मैंने अपने भाष्य अपने तरीके से किया है दूसरे का अनुसरण नहीं। मैं गीता के पास दूसरे भाष्य के रास्ते नहीं गया। मैंने सीधे गीता से अर्थग्रहण को ही अपना पथ चुना। मैं गीता के पास अपना ज्ञान और अर्थ लेकर नहीं गया। मैं गीता के पास गया और जो मिला उसे अर्जित किया।
उन्होंने बताया गीता के मेरे भाष्य की प्रतियां सीमित हैं और वह आम बिक्री के लिए नहीं है। उन्होंने बताया कि मेरे आय के साधन सीमित हैं फिर भी मैं यदि इस कार्य को अंजाम दे पाया तो मैं इसे गीता की अपनी शक्ति ही मानता हूं।
उनका कहना था मैं चाहता हूं कि इसके महत्व को समझा जाये। गीता की प्रस्तुति सर्वोत्तम ढंग से करना ही मेरा मुख्य लक्ष्य है और चूंकि मेरे साधन सीमित हैं मैं यही कर पाऊंगा। कुछ अन्य धर्मग्रंथ में हैं जिनकी कुछ प्रतियां विशिष्ट तौर पर तैयार की गयी हैं तो फिर गीता के विशिष्ट अंदाज में क्यों न पेश किया जाये। उसे जो लोग देखना पढऩा जानना चाहते हैं तो वे राष्ट्रीय पुस्तकालयों में उनकी उपलब्धता का लाभ उठा ही सकते हैं।

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