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Monday, 13 September 2010

हिन्दी दिवस पर कुछ यक्ष प्रश्न

प्रकाशितः देशबंधु, दैनिक 11, Sep, 2011, Sunday













Sanmarg-19/9/2010

हिन्दी के बारे में यह मातम मनाने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है कि उसकी गरिमा को उन शब्दों से ठेस पहुंच रही है जो मूलतः हिन्दी के हैं ही नहीं। वे अंग्रेज़ी, मराठी, बंगला, पंजाबी या दूसरी भारतीय या विदेशी भाषाओं से आयातित हैं। दूसरी भाषाओं के मेल-जोल से जो भाषा बन रही है वह भ्रष्ट है और उससे हिन्दी के मूल स्वरूप को क्षति पहुंचेगी। इधर जोर शोर से कहा जा रहा है कि अब तो भाषा प्रयोग में आ रही है वह हिंग्लिश है हिन्दी या इंग्लिश नहीं। इस स्थिति से दुखी होने की बजाय हमें यह समझना चाहिए कि जिस किसी भाषा में बदलाव दिखायी दे वही जीवन्त भाषा है। भाषा में परिवर्तन का विरोध उसकी जीवंतता का विरोध है। जो भाषा जितनी परिवर्तनशील है समझें कि वह उतनी ही जीवन्त है। यह प्रवाह ही है जो वास्तविक ऊर्जा का स्रोत होता है।
हिन्दी को अगर ख़तरा है तो हिन्दी को बचाने की सुपारी लेने वालों से। वे जो उसके व्याकरण को लेकर चिन्तित हैं वे उसे जड़ बनाने पर तुले हुए हैं। हिन्दी की पूजा करने वाले, हिन्दी को भजने वाले चाहते हैं कि हिन्दी पर चढ़ावा चढ़ता रहे और वे उसकी आरती के थाल के चढ़ावे पर खाते कमाते रहें। भाषा में कोई नयी प्रयोग हुआ नहीं कि हायतौबा मचाते हैं। दीवार पर लगे पोस्टरों, नेमप्लेट, विजिटिंग कार्ड, अखबार की खबरों, विज्ञापनों हर कहीं हिन्दी को शुद्ध रूप में देखना चाहते हैं और रोते-बिसुरते रहते कि हिन्दी तो गयी। जबकि अशुद्ध बोलना, लिखना और उसका व्यापक इस्तेमाल यह बताता है कि हिन्दी का प्रयोग वे लोग कर रहे हैं जिनका हिन्दी पर न तो व्यापक अधिकार न अध्ययन न ही वह उनकी भाषा है। इस तरह के प्रयोग आम लोगों के प्रयोग है और उन्हें यह करने देना चाहिए। हिन्दी का हव्वा खड़ा करके हिन्दी को लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता। हिन्दी को हिन्दी अधिकारियों और हिन्दी के शिक्षकों ने जितना लोकप्रिय नहीं किया है उससे अधिक लोकप्रिय फिल्मों और उसके गीतों ने किया है। आम प्रचलन ही हिन्दी को विकसित करेगा। लोगों को हिन्दी गलत बोलने दें गलत लिखने दें। आते आते भाषा उन्हें आ ही जायेगी और शुद्ध नहीं भी आयी तो कोई बात नहीं। भाषा का विस्तार तो हुआ। यह बहुत है।
हिन्दी को बढ़ावा दिया है जो व्यापार करते हैं। उन्हें हिन्दीभाषी प्रदेशों में अपना माल बेचना है तो उत्पाद की प्रशंसा, उत्पाद की जानकारी हिन्दी में देनी है। वे हिन्दी अख़बारों में विज्ञापन देते हैं जिससे हिन्दी के अखबार फल-फूल रहे हैं। हिन्दी के टीवी कार्यक्रमों में विज्ञापन देते हैं तो मनोरंजन उद्योग बढ़ रहा है। ये अखबार, ये टीवी चैनल सिर्फ़ विज्ञापन परोस कर ज़िन्दा नहीं रह सकते। उन्हें जनत के दुखदर्द से जुड़ना पड़ता है। इसके बिना जनता उन्हें नहीं अपनायेगी फिर विज्ञापन भी उन तक नहीं पहुंचेगे। इसलिए अखबारों व टीवी की यह मज़बूरी है कि वे यदि विज्ञापन को जनता तक पहुंचाना चाहते हैं तो जनता की आवाज़ बनें, उनकी पसंद का खयाल रखें, उन्हें वह दें जो वह चाहती है। उन्हं यदि मुनाफा कमाना है तो जनदर्दी बनना ही होगा। मज़बूरी में जनदर्दी नेता ही नहीं बनते धंधेबाज भी बनते हैं। मतलब यह कि उपयोगिता किसी भाषा के विकास की तर को तीव्र करती है और प्रगति के लिए रदस पहुंचाती है। हिन्दी का उपयोग आप बढ़ा दें तो उसका महत्व अपने आप बढ़ जायेगा। हिन्दी में रोज़गार बढ़ेगा, व्यापार बढ़ेगा तो रुतबा अपने आप बढ़ेगा। आप बस हिन्दी पर भरोसा की किजिए, हिन्दी का सम्मान कीजिए वह आपको सम्मान दिलायेगी। हिन्दी को अपनाकर हिन्दी की सामूहिक शक्ति को बढ़ायें। यह सामूहिक शक्ति ही बड़ी बात है। इसलिए हम विभिन्न भाषाओं वाले देश में अपनी-अपनी भाषा बोलते रहें पर सामूहिक शक्ति का परिचायक हिन्दी को बनायें और उसे भी मज़बूती दें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक अरब से अधिक लोगों की जुबान हिन्दी बने, उनकी अस्मिता और उनके सम्मान की प्रतीक बने तो देंखे हिन्दी का जादू। दुनिया के सिर चढ़कर बोलेगा।
-अंग्रेजी के जो शब्द आम जनता के प्रचलन में आ गये हैं उनके लिए हिन्दी के नये शब्दों को गढ़ने का काम बंद होना चाहिए। बल्कि उन्हें हिन्दी में प्रयोग के लिए बढ़ावा देना चाहिए। लोगों की हिचक दूर करना चाहिए कि वे अंग्रेजी के शब्द का हिन्दी में प्रयोग धड़ल्ले से करें। इतना करें कि वह ऐसा रचबस जाये कि वह हिन्दी का ही लगने लगे। हिन्दी का विकास चाहते हैं तो नये शब्द गढ़ने बंद कीजिए और दूसरी भाषा के शब्दों को हिन्दी के स्वभाव के अनुरूप अपना लीजिए। समस्या खत्म हो जायेगी। हिन्दी को मेल मिलाप की भाषा बनने से एकदम गुरेज नहीं है।
हिन्दी को खतरा उन लोगों से भी है जो चाहते हैं कि हिन्दी की बोलियों का विकास रुक जाये। वे यदि भाषा का दर्जा पाने की कोशिश करती हैं तो उन्हें लगने लगता है कि हिन्दी का क्या होगा? हिन्दी कैसे रहेगी। यदि उसकी बोलियां स्वतंत्र भाषा हो गयीं तो फिर हिन्दी का क्या रह जायेगा। उन्हें लगता है कि भोजपुरी, राजस्थानी, अवधी, ब्राजभाषा, मगही यदि भाषा बन गयी तो हिन्दी कमज़ोर हो जायेगी। वे यह भी मानते हैं कि मैथिली जैसी भाषा की स्वतंत्र पहचान मिलने से हिन्दी कमज़ोर हुई है। तात्पर्य यह कि उनका मानना है कि हिन्दी का वर्चस्व इसलिए है कि हिन्दी इसलिए प्रमुख भाषा बनी हुई है क्योंकि कई बोलियों को स्वतंत्र भाषा का दर्जा नहीं मिला है। यदि उन्हें भी भाषा का दर्जा मिल गया तो कोई हिन्दी का नामलेवा नहीं रह जायेगा। इसी आधार पर कुछ मासूम लोग यह दावा तक कर बैठते हैं कि हिन्दी अगले बीस सालों में मर जायेगी क्योंकि हिन्दी की तमाम बोलियां भाषा बन जायेंगी। मैं उन लोगों से विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि हिन्दी की बोलियां भी यदि भाषा बन गयीं तो हिन्दी और मज़बूत होकर उभरेगी। उसका कारण यह है कि हिन्दी की बोली समझी जाने वाली भाषाओं के समर्थन के कारण दक्षिण भारत की भाषाएं या बालियां हिन्दी को अपने से दूर समझती थीं। हिन्दी की बोलियों को स्वतंत्र भाषा बन जाने के बाद दक्षिण की भाषाओं से हिन्दी का विभेदीपूर्ण रवैया खत्म हो जायेगा और वे भी हिन्दी को तटस्थ तौर पर स्वीकार करने लगेंगी। आखिर हमें एकसूत्रता में बांधने के लिए कोई भाषा तो चाहिए ही। और चूंकि भारतीय भाषाओं में हिन्दी को जानने समझने वाले सबसे ज्यादा है स्वाभाविक तौर पर वही सबकी पहली पसंद और प्राथमिकता है। कहना न होगा कि हिन्दी ही भारत में वह भाषा है जिसमें सबसे अधिक प्रांतों की स्मृतियां जुड़ी हैं और सबसे अधिक भारतीय भाषाओं के शब्द उसमें शामिल हैं। हिन्दी हमारी सर्वाधिक साझी स्मृति की भाषा है इसलिए साझी विरासत भी। बोलियों से स्वतंत्र भाषा होने से यह साझी विरासत और मज़बूत होगी। आज की हिन्दी अगर खड़ी बोली का विकास है तो इस अर्थ में वह किसी की भाषा नहीं है और इसलिए वह सबकी भाषा है। उसमें देश की तमाम बोलियों का नवनीत है। दूसरे जो हिन्दी भाषी नहीं हैं वे हिन्दी को क्यों नहीं अपनायेंगे, आख़िर अंग्रेज़ी जिनकी भाषा नहीं है क्या वे उसे पढ़ते-लिखते समझते नहीं हैं और क्या अंग्रेज़ी की जो मज़बूत स्थिति है उसमें गैर अंग्रेजीभाषी लोगों को योगदान नहीं है।
बोलियों के विकास से हिन्दी का महत्व और समझ में आयेगा। यह नहीं भूलना होगा कि रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर महात्मा गांधी तक जिन लोगों ने हिन्दी को भारत की भाषा बनाने की हिमायत की थी वे हिन्दी भाषा नहीं थे। उनका मानना तो बस इतना था कि जिसमें देश के बहुसंख्य लोगों की बात हो उसे ही इस देश की राष्ट्रभाषा की गरिमा प्रदान की जाये। यही लोकतंत्र का तकाजा है। वह सामर्थ्य उन्होंने हिन्दी में देखी थी। उसी में एकसूत्रता की शक्ति पायी थी।
(यह आलेख लेखक के केन्द्रीय संदर्भ पुस्तकालय, कोलकाता की ओर से 14 सितम्बर 2010 को हिन्दी पखवाड़ा के अन्तर्गत आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर दिये गये वक्तव्य का हिस्सा है। इस कार्यक्रम में विशेष अतिथि राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता के निदेशक स्वपन चक्रवर्ती एवं अध्यक्ष केन्द्रीय संदर्भ पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष डॉ.केके कोच्चुकोशी थे। कार्यक्रम का संचालन पुस्तकालय की उप सम्पादक अंचना श्रीवास्तव ने किया।)
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