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Sunday, 1 September 2019

उदित वाणी में डॉ.अभिज्ञात का समकालीन पत्रकारिता पर इंटरव्यू


पत्रकार अब हाशिए पर हैं और सम्पादक कंटेंट व कांटेक्ट मैनेजरः डॉ.अभिज्ञात
पंजाब के जालंधर व अमृतसर में अमर उजाला, इंदौर में वेब दुनिया डॉट काम, जमशेदपुर में 2003 में दैनिक जागरण में पत्रकारिता करने के बाद गत 16 वर्षों से सन्मार्ग, कोलकाता में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार डॉ.हृदय नारायण सिंह साहित्य की दुनिया में अभिज्ञात के नाम से जाने जाते हैं। कविता, कहानी व उपन्यास विधाओं में उनकी एक दर्जन क़िताबें प्रकाशित हैं। वर्तमान पत्रकारिता को लेकर प्रस्तुत है विनय पूर्ति से उनकी संक्षिप्त बातचीत 
सवाल : 1. समकालीन हिन्दी पत्रकारिता (प्रिंट) का भविष्य क्या है?
प्रिंट मीडिया इन दिनों विभिन्न चुनौतियों से घिर गया है। इलैक्ट्रानिक मीडिया ने उसकी आवश्यकता और तेवर को बुरी तरह से प्रभावित किया है। लगतार खबरें उगलने वाले संचार माध्यमों के बरक्स इसकी ज़रूरत को लेकर ही कई लोग प्रिंट मीडिया की आसन्न मौत की मातमपूर्सी में लग गये हैं तो कई ने महंगे हुए न्यूज़प्रिंट पेपर की बढ़ती क़ीमत और छिनते जा रहे विज्ञापनों का हवाला दिया है। वेबसाइट, सोशल मीडिया एवं कुकुरमुत्ता और भोंपू टीवी चैनलों की अंधी दौड़ में प्रिंट मीडिया अपनी ठसक कब तक बरकरार रख पायेगा यह चिन्तनीय है। जिन लोगों ने अपनी युवावस्था में प्रिंट मीडिया को प्रमुख समाचार माध्यम के तौर पर अपनाया था वह पीढ़ी तो इससे विरत नहीं होगी किन्तु इलैक्ट्रानिक मीडिया के विकास के बीच पढ़ना- लिखना और दुनिया को समझना शुरू करने वाली पीढ़ी प्रिंट मीडिया को ढोयेगी या नहीं कहना मुश्किल है। प्रिंट मीडिया को अपना स्थान सुरक्षित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना होगा क्योंकि वह मुख्य मीडिया नहीं रह जायेगा यह तय है। हां, यह बाद दीगर है कि विश्वसनीयता के मामले में वह अब भी शीर्ष पर है और बाद में भी शीर्ष पर ही रहेगा। वह एक नयी केटेगरी होगी मीडिया और साहित्य के बीच की। तुरत- फुरत की प्रतिक्रियाओं व अपुष्ट खबरों के बीच विश्वसनीय, खोजी और घटनाक्रमों को दिशानिर्देश देने वाली सामग्री व विवेक ही उसे बचायेगा। प्रिंट मीडिया को आंखों देखी पत्रकारिता भर से ही संतोष नहीं करना होगा क्योंकि उसका प्लेटफार्म इलैक्ट्रानिक मीडिया है। प्रिंट मीडिया को विवेकदृष्टि से संचालित होना होगा..आंखों देखी के खोट को उजागर करना होगा, परदे के पीछे क्या है यह बताना होगा। प्रिंट मीडिया में अपढ़ पत्रकारों से काम नहीं चलेगा। मूल्य से जुड़े जुझारू लोग जुड़ेगे तभी बचेगा। उसे फिर सोदेश्य पत्रकारिता से अपना सम्बंध जोड़ना होगा।
2. क्या प्रिंट मीडिया निष्पक्ष नजर आ रहा है?
अब जबकि टीवी चैनल मीडिया के बदले किस एक पक्ष का प्रवक्ता हो जायें तो निष्पक्षता तो प्रभावित होगी ही। वे तटस्थ नहीं रहते। वे जिस तरह से सवाल उठाते हैं उसमें ही उनकी पक्षधरता स्पष्ट नज़र आती है। जबकि प्रिंट मीडिया में इस अनुशासन पर बड़ा ज़ोर रहा है कि ख़बरें लिखते समय पत्रकार का नज़रिया या पक्षधरता नहीं दिखनी चाहिए। यदि किसी पर कोई आरोप लगे हैं तो उसका पक्ष भी समाचार में होना चाहिए। लेकिन टीवी चैनलों में खबरों की जिस तरह प्रस्तुति होती है उसमें पक्षधरता अतिरिक्त उत्साह में दिखती है और कहना न होगा कि इससे प्रिंट मीडिया भी परोक्ष तौर पर निर्देशित होता है। प्रलोभन व दमन के बीच झूलते अखबार किसी का मुखपत्र हो जायें यह स्वाभाविक है। ऐसे में अपने पाठकों का होकर और उनका विश्वास अर्जित कर ही प्रिंट मीडिया अपने को उबार सकता है। प्रिंट मीडिया को क्लोन बनने से बचने की भी ज़रूरत है। आम तौर पर जो ख़बरें आती हैं उसके प्रकाशन के कुछ अघोषित मानदंड हैं, जिनसे अखबार का कलेवर तय होता है और हम पाते हैं कि अगले दिन प्रकाशित होने वाले अखबारों में एक सी खबरें फ्रंट पेज पर होती हैं और लगभग उनकी भाषा और लहजा भी। कई बार तो सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख भी क्योंकि सेंडिकेट राइटिंग का दौर चल रहा है। फीचर एजेंसी की सेवाओं भी इस संकट को और गहरा करती हैं और वे पृष्ठ भी कई बार एक ही सामग्री से लैस होते हैं। एक सी खबरें एक सी प्रस्तुति के बीच प्रिंट मीडिया अपना कितने दिन तक बचाव करेगा। जाहिर है कि जो बड़े मीडिया हाउस हैं, वे छोटों को निगल जायेंगे। दूसरे यह कि निष्पक्षता कभी समाज में एक मूल्य हुआ करती थी। अब बदलते संदर्भों में वह मूल्य क्षरित हो चुके हैं। अब पक्षधरता का दौर है और आप किसके साथ खड़ें हैं स्पष्ट कीजिए। आप जिसके साथ हैं, वही आप हैं। दुर्भाग्य से इस प्रवृत्ति का शिकार प्रिंट मीडिया भी हो रहा है। राजनीति में तो कभी एक दूसरे को गाली-गलौज करने वाले मौका पाकर गलबहियां करने लग जाते हैं। पार्टी बदलते ही तमाम मामलों में अभियुक्त रहे नेता दूध के धुले हो जाते हैं किन्तु मीडिया ऐसा नहीं कर सकता। उसे दूरगामी लक्ष्य तय करके ही चलना होता है। खबरों की प्रस्तुति में प्रिंट मीडिया को तटस्थ ही रहना चाहिए। प्रिंट मीडिया को अपना नजरिया अपने सम्पादकीय लेखों के जरिये ही व्यक्त करना चाहिए।
3. कस्बाई और नागरीय पत्रकारों की चुनौतियां क्या हैं?
कस्बाई पत्रकारिता को स्थानीय मुद्दे प्रभावित करते हैं लेकिन उनकी अनुगूंज दूर तक जाती है। यदि कस्बाई मुद्दे को संजीदगी से उठाया जाये को वह केन्द्रीय मुद्दा बन जाता है। उन्नाव बलात्कार कांड इसका पुख्ता उदाहरण है। कहना न होगा कि कस्बों को पत्रकारिता इसलिए कठिन है कि पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं। और आर्थिक विपन्नता भी उन्हें ग्रसती है। उन पर आसानी से दबाव डाला जाता रहा है और खबरों का स्वरूप दबाव के कारण वह नहीं रह जाता, जो था। कस्बों में खबरें लिखी कम जाती हैं दबाई अधिक जाती हैं। नागरीय पत्रकारों के सामने होड़ का संकट है। दबाव के कारण अपुष्ट खबरें भी देनी पड़ जाती हैं। नागरीय पत्रकारों के लिए विश्वस्त सूत्र बहुत बड़ा फैक्टर हैं। जोड़- तोड़ के बगैर खबरें ब्रेक करना मुश्किल है। अंदरखाने तक पैठ यूं ही नहीं बन जाती उसके लिए शीर्ष अधिकारियों व नेताओं का भरोसमंद बनना पड़ता है। ऐसे में तटस्थता नहीं रह जाती। ऐसा न करें तो प्रेस कांफ्रेंस, प्रेस ब्रीफिंग और प्रेस रिलीज की ही पत्रकारिता होगी। नागरीय पत्रकारों को कई बार किसी नेता से अप्रिय सवाल पूछने पर नौकरी से हाथ धोना भी पड़ सकता है। जिस तरह अर्थव्यवस्था बैठ रही है पत्रकारों को मीडिया संस्थान के हर तरह के हुक्म का पालन करने को तैयार रहना पड़ रहा है, वरना इस्तीफे का विकल्प तो है ही।
4. देश के वर्तमान माहौल में क्या पत्रकारिता निरपेक्ष नज़र आती है?
पत्रकारिता क्या देश के वर्तमान माहौल में कोई निरपेक्ष नहीं रह पायेगा। अब असहमति मूल्य नहीं रह गयी है। विरोध अब किसी न किसी साजिश के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। यह दौर संवाद नहीं जयकारे का है। सौभाग्य से हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी शैशवावस्था में ही आंदोलनकारियों का संगसाथ पाया और वह बड़े मूल्यों से जुड़ी। लोगों में सचेतनता पैदा करना और देशभक्ति की भावना को भरना उसका उद्देश्य था। इसलिए उस समय के प्रखर साहित्यकार व आंदोलनकारी पत्रकारिता से जुड़े। अब पत्रकारिता के मूल्य बदल गये हैं। मार्केटिंग हावी हो गयी है। अब मीडिया ने पीआर को ही अपनी भूमिका मान ली है। मीडिया अब शुद्ध रूप से व्यवसाय बनता जा रहा है। कहने को तो वह उदात्त मूल्यों से जुड़ा हुआ है, किन्तु वह एक आड़ भर है। अन्य व्यवसाय से जुड़े लोगों ने इसे भी अपना एक व्यवसाय बना लिया है। पत्रकार भले मुगालते में रहें कि वे कोई बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, किन्तु उसका संचालक समाचार पत्र को एक व्यवसायिक प्रतिष्ठान ही मानता है। ऐसे में निरपेक्षता का प्रश्न बेमानी है। पत्रकार हाशिए पर रहकर चुपचाप सार्थक काम करते हैं, जितना भी बन पड़ता है। और सम्पादक कंटेंट और कांटेक्ट मैनेजर बन चुके हैं। प्रिंट मीडिया में एक संकट भाषा को लेकर भी है। ऐसी भाषा कम लिखी जा रही है जो पाठक को बांध ले। कभी प्रभाष जोशी के लम्बे लम्बे लेखों को हम पढ़ते थे और आनंदित व मोहित होते थे। भले उनके लिखे विषयों में हमारी दिलचस्पी न हो। हम उनके लेखों से जीना भी सीखते थे और संघर्ष करना भी। जीवन के मूल्य भी। अखबार केवल सूचना नहीं देते। जीवन में सकारात्मक सोच भी दे सकते हैं। वह भूमिका कम होती जा रही है।
5. जमशेदपुर में पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति और भविष्य का स्कोप
जमशेदपुर में पत्रकारिता में झारखंड के आदिवासी समुदाय के संघर्ष और उनकी समस्याओं को उजागर करने व उनके अधिकारों के संरक्षण को स्वर देने की  चुनौती है दूसरी ओर आधुनिक शिक्षित कामकाजी वर्ग और व्यवसायिक गतिविधियां हैं। दोनों का तालमेल बैठना आम बात है। जिन दिनों झारखंड के तीन शहरों से दैनिक जागरण लांच करने की तैयारी चल रही थी मैं वर्ष 2003 में जमशेदपुर में फ़ीचर डेस्क प्रभारी बनकर पहुंचा था। मैंने महसूस किया था कि एक गहरी समझ व जनहित के प्रति संवेदनशील रुख की पत्रकारिता जमेशपुर व झारखंड की पत्रकारिता के लिए आवश्यक है। क्योंकि यहां दो विपरीत ध्रुव हैं जिन्हें साधना कठिन चुनौती है। मैंने तमाम साहित्यकारों का सहयोग लिया। बार-बार उनके घर गया। उनकी रुचियों को जाना व उन्हें प्रेरित किया कि वे साहित्येतर विषयों पर लिखें। आज की पत्रकारिता की एक चुनौती यह है कि साहित्येतर विषयों पर साहित्यकार नहीं लिखते हैं। कविता, कहानी व साहित्यिक विषयों पर आलोचना उनके केन्द्र में हैं। लेकिन उनसे बार -बार तकादा कर साहित्येतर विषयों पर लिखवाया जाये तो वे पत्रकारों से अच्छा लिख सकते हैं। क्योंकि साहित्यकारों की चिन्ताएं समष्टिगत होती हैं। वे साहित्य पर लिखते हुए भी व्यापक सरोकारों से जुड़े होते हैं। प्रिंट मीडिया की पत्रकारिता का भविष्य ऐसे लोगों के बूते सुरक्षित किया जा सकता है। धर्मयुग में धर्मवीर भारतीय ने ऐसा किया था। उन्होंने विष्णुकांत शास्त्री से रिपोर्ताज लिखवाये थे। मुझे याद है जमशेदपुर के प्रख्यात कथाकार जयनंदन जी ने वहां की नदियों पर जो लिखा था, वह एक बेहतरीन रिपोर्ताज का उदाहरण बन सकता है। मुझे नहीं लगता कि जमेशपुर का कोई भी साहित्यकार ऐसा होगा जो उन दिनों दैनिक जागरण से न जुड़ा हो। आर्थिक मसलों पर मैंने अर्थशास्त्र के प्रोफेसरों से और नाट्य समीक्षाएं वरिष्ठ रंगकर्मियों से लिखवायी थी।





 


Tuesday, 24 February 2015

पत्रकारिता को नयी भाषा व संवेदना के नये धरातल दिये प्रभाष जी ने

(

-अभिज्ञात

जिन कुछेक लोगों ने हिन्दी पत्रकारिता की विश्लेषणात्मक क्षमता और उसकी रीति-नीति का निरन्तर विस्तार, आविष्कार और परिमार्जन किया उनमें प्रभाष जोशी का नाम प्रमुखता से लिया जायेगा। धार और संवेदना की जैसी जुगलबंदी उनकी भाषा में दिखायी देती है वह हिन्दी पत्रकारिता में विरल होती जा रही है वरना पत्रकारिता की भाषा का इकहरापन चिन्ताजनक है। भाषा का छंद नारों से नहीं नीयत से आता है यह प्रभाष जी जैसों के लेखों से ही जाना जा सकता है। उनके श्कागद कारेश् शृंखला के आलेख न तो कभी पुराने पड़ने हैं और ना ही वे कभी अप्रासंगिक होंगे क्योंकि उनमें देश दुनिया का जनमानस लगातार अपनी टोह में लगा हुआ दिखायी देता है। हमारी घनीभूत चिन्ताओं की शक्ल क्या है ही उनमें नहीं दिखायी देती बल्कि यह भी कि उसके निहितार्थ क्या हैं या भी समझाने का महती प्रयत्न दिखायी देता है। मामूली और आम बातें, घटनाएं और लोग उनके आलेखों में आकर जो रूपाकार ग्रहण करते थे वह उन्हें एक सार्थक बहस का बेहद जरूरी हिस्सा बना देता था। मैं अक्सर समय के अभाव में उनका आलेख प्रकाशन के दिन नहीं भी पढ़ पाता था तो कई दिनों तक पुराने अखबार को रखे रहता था कि उनका आलेख पढ़ लूं तो फिर अखबार को रद्दी समूह के कागजों में डालूं। अक्सर उनके आलेख उन मुद्दों पर भी रहते तो ज्वलंत प्रश्नों से मुठभेड़ लेते थे उन आलेखों में उनकी खरी नीयत बोलती थी और साफगोई उसमें नया पैनापन देती थी। मुझे क्रिकेट में तो कभी दिलचस्पी नहीं रही फिर भी कभी कभार क्रिकेट पर लिखे लेखों को भी पढ़ने की कोशिश करता। क्रिकेट पर तो हिन्दी में शायद उनके जैसा दूसरा टिप्पणीकार न होगा।
मैंने कभी सोचा न था कि पत्रकार बनूंगा फिर भी अनायास ही पत्रकारिता से शौकिया जुड़ गया जनसत्ता कोलकाता से और स्ट्रिंगर बन गया.। उन दिनों मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय से केदारनाथ सिंह पर पीएचडी के लिए शोध कर रहा था और अपने नानाजी के ठेकेदारी के कामकाज में हाथ बंटाता था। पेशे के तौर पर पारिवारिक स्तर पर तय हो चुका था कि नौकरी नहीं कारोबार करना है। उन्हीं दिनों दो एक बार प्रभाष जी को कुछ करीब से देखने का अवसर मिला। ऐसी दो एक सभाओं की कवरेज करने भी गया जिनमें प्रभाष जी वक्ता थे। उनमें एक सभा वह भी है जिसमें पं.विष्णुकान्त शास्त्री कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। उस समय वे संभवतः भाजपा के लोकसभा सांसद भी थे। यह तो नहीं याद है कि सभा का मुख्य विषय क्या है किन्तु प्रभाष जी एनरान पर बोले थे और तत्कालीन भाजपा नीत सरकार की एनरान के मुद्दे पर भूमिका की जम कर मलामत की थी। अध्यक्षीय भाषण में विष्णुकान्त जी ने उनकी बातों का जवाब दिया था और उनके तर्कों को दरकिनार कर दिया था। ऐसा लगा था कि प्रभाष जी के तर्क कुछ कमजोर पड़ गये हैं। विष्णुकान्त जी अध्यक्षीय भाषण देकर सभा की समाप्ति की घोषणा भी कर दी। लेकिन प्रभाष जी विष्णुकान्त जी के तर्कों का फिर से जवाब देने से चूकना नहीं चाहते थे। वे लपक कर फिर माइक के पास पहुंच गये और कहा कि मुझे यह अनुशासन पता है कि अध्यक्षीय भाषण के बाद फिर वक्तव्य नहीं दिया जाता है लेकिन इस अनुशासन से बढ़कर भी कुछ बातें हैं जिसके कारण मैं फिर बोलना चाहूंगा और विष्णुकान्त जी या अन्य किसी और की सहमति की प्रतीक्षा किये बिना ही उन्होंने बची खुची कसर निकाल ली और फिर मंच से उतर कर तेजी से अपनी कार की ओर बढ़े। इधर, कई भाजपा कार्यकर्ताओं को प्रभाष जी का वक्तव्य नागवार लगा और वे उन्हें घेरने का प्रयास करने लगे। वे जब तक कार में बैठते चारों ओर से भाजपा कार्यकर्ताओं ने घेर लिया था और उन्हें अपशब्द भी कहने पर उतारू थे वह तो भी भीड़ का रुख देखकर विष्णुकान्त जी वहां पहुंचे और किसी प्रकार यह कहकर लोगों को गाड़ी के आगे से हटाया कि प्रभाष जी पत्रकार हैं और पत्रकारों को कुछ भी कहने की आजादी होती है, उन्हें कहने दीजिए। आप लोग संयम बरते।
दूसरी एक घटना मुझे याद है जो प्रभाष जी के अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति उनके रवैये को स्पष्ट करती है। वह घटना है एक साहित्यक समारोह की है। उसमें प्रख्यात ललित निबन्धकार डॉ.कृष्ण बिहारी मिश्र प्रधान वक्ता थे। मंच से उन्होंने जनसत्ता की भाषा नीति की जमकर आलोचना की थी और नाम लेकर कहा था कि प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार अपने आपको कबीर बनते हैं और भाषा से खिलवाड़ कर रहे हैं। पता नहीं पत्रकार किस हेकड़ी में रहते हैं। इस वक्तव्य में कुछेक हर्फ इधर उधर हो सकते हैं मगर लब्बोलुबाब यही था। उल्लेखनीय यह है कि वहां मंच पर प्रभाष जी नहीं थे वरना वे उसका जवाब स्वयं देते। मेरी ड्यटी इस कार्यक्रम की रिपोर्टिंग की लगी थी। मैंने जो रिपोर्ट लिखी थी उसमें मैंने इंट्रो ही प्रभाष जी के भाषा सम्बंधी रुझान पर कृष्णबिहारी जी की आपत्ति को बनाया था। मामला संवेदनशील होने के कारण डेस्क ने रिपोर्ट की कापी कोलकाता के स्थानीय सम्पादक श्री श्याम आचार्य तक पहुंचायी और उन्होंने उसे दिल्ली फैक्स किया ताकि उसके प्रकाशन के सम्बंध में प्रभाष जी की राय ली जा सके। और राय हां में थी। वह रिपोर्ट उसी प्रकार प्रकाशित हुई। सचमुच प्रभाष जी ने पत्रकारिता की भाषा को जनभाषा के करीब लाने का न सिर्फ प्रयास किया बल्कि भाषा की शास्त्रीयता की दुहाई देने वालों से इस मोर्चे पर लोहा भी लिया जिसकी यह घटना उदाहरण है।
प्रभाष जी के मालवा अंचल और कुमार गंधर्व पर कई लेख जब तक पढ़ने का मौका मिलता रहा था। जब मैं अमर उजाला, जालंधर से वेबदुनिया डाट काम में कार्यभार संभलाने के लिए इंदौर गया तो इंदौर से पहले ही वह स्टेशन देवास मिला जिसके बारे में मैं पर्याप्त पढ़ चुका था और इंदौर भी मुझे इसलिए भी पहले से परिचित और मोहक लगा। प्रभाष जी के आलेख में वह शक्ति है जो अर्थ ही नहीं पूरी संवेदना को पाठक तक पहुंचाती है। एक ही संस्थान होने के कारण कुछेक बार मुझे वेबदुनिया कार्यालय से नयी दुनिया कार्यालय जाने का मौका मिला था तो वहां भी प्रभाष जी की चर्चा सुनी थी जहां से उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। वेबदुनिया कार्यालय में भी अक्सर राजेन्द्र माथुर, शरद जोशी आदि के साथ चर्चा होती थी, जिनसे नई दुनिया का प्रगाढ़ रिश्ता था। इन चर्चाओं ने मुझे उनका फैन बना दिया था। पत्रकारिता के तुरतफुरत के भाषिक और प्रतिक्रियाशील व्यवहार को नयी ऊंचाई और दिशा देने में प्रभाष जी के योगदान को मैं नमन करता हूं।

Friday, 1 February 2013

उन्नतिशील भारत की पतनशील पत्रकारिता

देश आर्थिक उन्नति कर रहा है ऐसे में रोजगार के नये क्षेत्र विकसित हो रहे हैं। जीवन शैली बदल रही है। उदारीकरण के दौर में हर देश दूसरे देश में अपने लिए सम्भावनाएं तलाशता है तो जो अपने साथ विज्ञापन भी ले आता है। और यह वह प्राणवायु है जिससे देश की पत्रकारिता फलफूल रही है। यह हमारे जमीन से जुड़े मुद्दों के बल पर जीवित नहीं है। उसे खाद पानी हवा उन व्यापारियों से मिल रही है जो अपने लिए संभावना तलाश रहे हैं। यह व्यापारी अपने उत्पाद के साथ उसके इस्तेमाल का विमर्श भी ले आता है। उसकी भाषा संवेदनशील, मानवीय और जनहितकारी तो होती है जीवन को जीने के नये तरीके भी सीखाती है। इस नयी जीवन शैली में उत्पादों की खपत के लिए नयी संभावना होती है। यह मूल्य पर टिकी पत्रकारिता को बढ़ावा नहीं देती वह उत्पाद की खपत के लिए नये मूल्य गढ़ती है। वह आवश्यतानुसार यूज एंड थ्रो की हिमायत भी कर सकती है और प्राचीन वस्तुओं की गुणवत्ता का बखान भी। कभी वह वस्तु को महत्व देती है तो कभी स्टाइल को। कभी नित नये पर जोर देती है तो कभी टिकाऊपन पर।
विज्ञापनों के लिए मुफीद माहौल तैयार करने के लिए लेख लिखे और लिखवाये जा रहे हैं। विज्ञापनों को ध्यान में रखकर पृष्ठ काले गोरे किये जा रहे हैं। मूल्यों की दुहाई देने वाला जनसत्ता अखबार भी रंगीन विज्ञापन मिलने पर अपना पेज रंगीन कर लेता है बाकी समय में मूल्यों की बात करके ब्लैक एंड व्हाइट परोसता रहता है। वह यह नहीं कहता है कि साहब हम तो अमुक पेज ब्लैक ही छापते हैं रंगीन विज्ञापन के लिए हमारे यहां जगह नहीं है।
सारे के सारे अखबार विज्ञापनों की अधिकता के कारण पृष्ठ बढ़ा देते हैं। वे जूते का विज्ञापन भी जैकेट के रूप में फ्रंट पेज के पहले लगा सकते हैं या सीधे फ्रंट पेज पर प्रकाशित कर सकते हैं। उत्पाद का विज्ञापन सिर चढ़कर बोलता है।
प्रिंट मीडिया में इस बात को ध्यान में रखकर भी खबरें छपती है कि इसमें इसके मालिकों के हितसाधक कौन हैं। खबरों को मालिक के हित के नजरिये से बड़ा छोटा किया जाता है, पृष्ठ और स्थान का निर्धारण होता है। कई बार खबर छापनी भी है या नहीं इस पर भी विचार किया जाता है। कई बार छपने पर कीमत मिलती है तो कई बार किसी खबर के नहीं छपने पर उससे भी अधिक वसूली हो जाती है।
राजनीतिक सम्बंधों को चुस्त दुरुस्त करने भी इस दौर की पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण कार्य है। सत्ता के गलियारे में अपनी पैठ बनाकर अपना और अपने हितचिन्तकों के काम निकलवाने से इन्हें कतई गुरेज नहीं। इसके चलते पत्रकारों को तरह तरह एक असाइनमेंट करने पड़ते हैं। आप अपनी विचारधारा अपने पास रखिये अखबार के मालिकों के सत्ता विमर्श से तालमेल बिठाकर चलिए, यही आपको यश और तरक्की देगा।
धर्म एक बड़ी दुकान है और जिसमें सोने-चांदी की सतत वर्षा होती रहती है। किसी किसी मंदिर की त्रैमासिक आय ही डेढ़ दो अबर रुपये की होती है। इसलिए धर्मिक खबरें किसी हद तक पेड न्यूज ही होती हैं। धार्मिक आयोजनों के लम्बे चौड़े विज्ञापनों के एवज में उसकी कवरेज कराई जाती है, यह किस प्रकार से पेड न्यूज से अलग है। विज्ञापन के बदले समाचार का कवरेज किस प्रकार निष्पक्ष पत्रकारिता है। देश मंदिरों में एक एक त्योहार में डेढ़ दो अरब रुपये तक का चढ़ावा और दान आता है, ऐसे में किस प्रकार से कह सकते हैं कि धर्म की खबरें जनरुचि को ही ध्यान में रखकर प्रकाशित होती हैं।
विज्ञापनों के प्रकाशन में कई ऐसे अखबार हैं जो यह प्रकाशित कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं कि विज्ञापनों की विश्वसनीयता से उनका कोई वास्ता नहीं है। भले लोग उसके विज्ञापनों को पढ़कर ठगे जायें। फैंडशिप से लेकर मालिश करने वाले विज्ञापनों को प्रकाशित करने के बाद कोई अखबार किस प्रकार नैतिकता की बात कर सकता है।
मिशन की पत्रकारिता की बात गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। वैकल्पिक पत्रकारिता के रूप में लिटिल मैगजीन की बातें भी बहुत विश्वसनीय नहीं रह गयी हैं। लघु -पत्रकारिता विशेषांक पत्रकारिता की दुकान में तब्दील हो चुकी है और तीन से पांच सौ पृष्ठ की यह पत्रिका यह सोचने को विïïवश करती है कि इसे फाइनेंस कहां से मिला है। उनमें विमर्श चलाने वाले कौन लोग हैं और जिनके हित साधने में यह पत्रिका साथ दे रही है। कौन सा देश अपने किसी उद्देश्य के लिए दूसरे देश में किस विमर्श को संचालित कर रहा है यह शोध का दिलचस्प विषय हो सकता है। स्थानीय खबरों के नाम पर लोगों के जीवन की छोटी-छोटी चीज़ों को उनकी अस्मिता बनाकर पेश किया जा रहा है। फिर उनका इस्तेमाल उपद्रव कराने के काम में हो रहा है।
युवाओं के हाथ में पहले विचार और फिर हथियार थमा कर देश की व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने वाले लोग ही तो उनके सिर पर गांधी टोपियों का फाइनेंस नहीं कर रहे हैं। जो काम हिंसा के जरिए करा रहे थे कहीं उन्होंने वही काम अहिंसा के जरिये तो कराना शुरू नहीं कर दिया है। जैसे मानवाधिकारों का हनन करने व हिंसक घटनाओं को अंजाम देने वाले अपने गुर्गों के पकड़े जाने पर उन्हें बचाने के लिए मानवाधिकारों के रुदालियों को फाइनेंस करते हैं।
हमें यह भी देखना होगा कि हिन्दी की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए बोलियों को भषा बनवाने की कोई सुपारी तो नहीं दे रहा। जिन बोलियों में अभी अखबार तक नहीं निकाला जिससे यह प्रमाणित हो कि वह सामान्य मसलों पर लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्त भी कर पा रही है या नहीं या फिर उसे चाहने वाले उसे व्यवस्थित तौर पर एक भाषा के तौर पर स्वीकार भी कर पा रहे हैं या नहीं, वे भी भाषा बनने की दौड़ में शामिल हैं। क्या सरकारी वजीफे से भाषाएं बननी और विकसित होती हैं। या फिर सरकारी संरक्षण से बोली को भाषा का दर्जा उसके कुछ लोगों को उसकी पुरोहिती सौंपने के ध्येय तक सीमित होगी। क्या भाषाओं को उससे बोलने वाले ही नहीं बल्कि लिखने, पढ़ने और उसमें जीने वाले लोग बचाते हैं।
हमें यह भी देखना होगा कि यदि पत्रकारिता को शुद्ध व्यापार मान लिया जाता है तो उसमें काम करने वालों को उनके श्रम, मेधा व सेवा के बदले समुचित सुविधाएं भी मिलतीं। अखबार चलाने वालों का सरकार और व्यवस्था पर ऐसा जबर्दस्त दबाव है कि उसमें काम करने वालों के ही हक मारे जा रहे हैं ऐसे में कैसे दूसरों के हक की आवाज़ बुलंद करेंगे।
यह जरूर है कि मीडिया के सम्बंध में बहुत अच्छी अच्छी बातें प्रचारित प्रसारित हैं जिससे इसके ऐबों पर पर्दा पड़ा रहता है। जिसने रुपये में चपरासी नहीं मिलते उतने में प्रशिक्षु पत्रकार मिल जाते हैं। इसमें काम करने वालों को शुरू में वहम रहता है कि वे किसी बड़े मिशन में लगने जा रहे हैं। दो चार साल बरबाद करने का बाद उन्हें पता चलता है कि उनका एक ही मिशन है मालिक की हित साधना। आप अपने आदर्श अपने पास रखिये। दरअसल यह गड़बड़ी किसी कार्य के पेशा बन जाने की वजह से आयी है। धीरे धीरे अन्य व्यापारों के तौर तरीके पत्रकारिता में भी आम हो गये। अन्य व्यापार करने वाले जब इस पेशे में आते हैं तो वो वैसी ही उम्मीद इस पेशे से करते हैं जो अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों से करते हैं।
हिन्दी व अन्य भाषाई अखबारों के प्रकाशन संख्या या फिर उनके नये नये संस्करणों के प्रकाशन से यह खुशफहमी न पालें कि हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं में अखबारी क्रांति हो गयी है और वे टीवी पर समाचार देखने के बावजूद अखबारों की खबरों को शिद्दत से तलाश रहे हैं इसलिए ये अखबार निकल रहे हैं। यह अखबार पाठकों के लिए नहीं निकल रहे हैं यह उपभोक्ताओं के लिए निकाले जा रहे हैं। खुले बाजार और भूमंडलीकरण के कारण हर देश में दूसरे देश ने अपनी बैठ बनानी शुरू की है सारे देशों की कूटनीति इस पर केन्द्रित है कि हमारे लिए किस देश का बाजार कैसा है। दूसरे देशों में बाजार और उपभोक्ता की तलाश ही अखबारों के प्रसार की जननी है। भारत इसलिए भी एकाएक दुनिया के नक्शे पर महत्वपूर्ण हो उठा है क्योंकि उसके पास एक अच्छा खासा पढ़ा लिखा उपभोक्ता वर्ग है। इस बाजार को ध्यान में रखकर ही दुनिया के अन्य देश भारत से सम्बंध गांठने में लगे हैं। ऐसे में अपने देश के विचारों, नैतिकताओं, वस्तुओं, संस्कृति, साहित्य, कला और वस्तुओं की पैठ भारत के गांव गांव तक पहुंचाने की गरज से अखबार निकल रहे हैं। वे ऐसे अखबारों को विज्ञापन देने के हामी है जिसका नेटवर्क गांव गांव तक हो। जिसमें गांव गांव की खबरें छपती हों और गांव तक उसकी आसान पहुंच हो। बाजार हर घर में घुसना चाहता है इसलिए वह चाहता है कि भारत के अखबार अपनी बोली बानी में गांव गांव तक पहुंचे। इसी शर्त पर उन्हें विज्ञापन मिलेंगे और इसी लालच में अखबारों के लिए स्थानीयता एकाएक महत्वपूर्ण हो उठी। साथ ही यह नारा भी उछाला गया जो लोकल है वही ग्लोबल है। बिना लोकल हुए ग्लोबल नहीं हुआ जा सकता। गांव गांव तक मोबाइल फोन ने पहुंच कर यह बता दिया कि गांव गांव में उपभोक्ता भरे पड़े हैं.. अब अखबार यह आजमा रहे हैं उसके बाद इंटरनेट भी पहुंचेगा..। तो अब भाषाई अखबारों में चार से आठ पेज स्थानीय कस्बों देहात और जिला स्तर की खबरों के लिए होते हैं। भले समाचार न हों पर जगह पहले से तय है कि इतने सफे स्थानीय रंगने हैं। ऐसे में खबरों को बढ़ा चढ़ा कर लिखना, जबरन विस्तार, गढ़ी हुई खबरों से पत्रकारिता का स्तर गिरा है।

Thursday, 18 November 2010

पत्रकारिता की रीढ़ होते हैं सवाल

(एक कालेज में पत्रकारिता की क्लास लेने का आफर मिला। पढ़ाने का कभी न तो सोचा था न अवसर मिला। झिझक थी कि कहीं ऐसा न हो मुद्दे से बहक जाऊं। सो एक खाका तैयार कर लिया। यह बात दीगर है डेढ़ घंटे आसानी से बीत गये यह नोट देखने की जरूरत नहींं पड़ी। वह नोट आपसे शेयर कर रहा हूं।)
सवाल पूछना दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है क्योंकि सही सवाल समस्या के निदान की पहली कड़ी है या कहें कि आधा जवाब है। आदमी की पहचान उसके सवालों से की जा सकती है। और किसी भी समाज के अध्ययन के लिए उस दौर के सवालों को देखा जाना चाहिए कि वह दौर किन सवालों से जूझ रहा था। सवाल ही उस दौर की समस्याओं को नहीं दर्शाता बल्कि यह भी बतलाता है कि लोग उससे जूझने के लिए किन विकल्पों पर विचार कर रहे थे। इसलिए किसी की बौद्धिकता को कुंद करना है तो सवाल की इजाजत न दें। कुछ दिन में प्रश्न उठना बंद हो जायेगा।
पत्रकारिता में सबसे अहम कड़ी होती है सवालों की। क्या, कब, क्यों, कहां, कैसे आदि पांच सवालों पर पत्रकारिता की बुनियाद टिकी हुई है और यह दृढ़ता से माना जाता है कि कोई समाचार यदि इन पांच सवालों से नहीं जूझता है तो उसमें कमी है। हिन्दी पत्रकारिता में इंट्रो में इन पांचों का होना लगभग अनिवार्य माना जाता है। ताकि शुरुआती दो तीन पंक्तियां पढ़कर ही पाठक को संक्षेप में घटना का पता चल जाये। जरूरी पांच प्रश्नों का मामला दरअसल हार्ड न्यूज से जुड़ा हुआ है फिर भी प्रश्नों की उपयोगिता दूसरे आलेखों में कम नहीं है। आज की पत्रकारिता में फीचर या आलेखों का महत्व दिनों दिन बढ़ता जा रहा है जिसमें सवाल प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसमें केवल उन्हीं पांच सवालों से काम नहीं चलता है। इसमें जिस पत्रकार, साक्षात्कारकर्ता या आलेख के लेखक के पास जितने अधिक सवाल होंगे वह उतना ही कामयाब होगा। क्योंकि वस्तुस्थिति और बहुआयामी संभावना से पाठकों को परिचित करना पत्रकारिता के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है।
अधिक सवाल का आशय यहां इस बात से कतई नहीं है कि प्रश्न उलजुलूल हों। प्रश्न का उत्तर देने वाले से गहरा ताल्लुक होना अनिवार्य है या फिर आप जिस मुद्दे पर उसकी प्रतिक्रिया चाहते हैं वह उसे उजागर करने में अपनी भूमिका निभाये।
किसी का साक्षात्कार करने के पूर्व इंटरव्यू देने वाले के अध्ययन, पद, कार्य अनुभव आदि की जानकारी पहले ही प्राप्त कर लेना सहायक होता है ताकि असम्बंध प्रश्न पूछने के बाद झेंप का सामना न करना पड़े। किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से वे सवाल नहीं पूछने चाहिए जो जगजाहिर हों। उनसे नयी योजनाओं के बारे में पूछा जा सकता है। उसने पिछले कार्यों से क्या सीखा यह जाना जा सकता है। बड़े बड़े लोगों की छोटी छोटी बातें भी लोग पढऩा पसंद करते हैं कि इसलिए उनसे मामूली बातें भी पूछी जा सकती हैं बशर्ते असम्बद्ध न हों। यहां यह गौरतलब है कि पहले से तैयार प्रश्नावली किसी हद तक ही इंटरव्यू लेने में सहायक होती है। मिले हुए जवाबों में भी सवाल निकलते हैं जो इस कला को महत्व देगा उसका इंटरव्यू और अच्छा होगा। किसी विशेषीकृत विषय पर प्रश्न पूछते समय इस विषय के प्रचलित शब्दों के अर्थ मालूम होना चाहिए। हर क्षेत्र विशेष में कुछ खास शब्द प्रचलित होते हैं जिनका सामान्य अर्थ निकलने पर गलती हो जाती है। उनके पारिभाषिक अर्थ होते हैं। विषय की गहरी जानकारी न होने पर उन शब्दों से बचना चाहिए। या फिर जानते हैं तो वह बातचीत में अधिक सहायक होते हैं।
विषय पर गहरे प्रश्न ही पूछे जायें ऐसा नहीं है। जिस मीडिया से लिए साक्षात्कार लिया जा रहा है उसकी आवश्यकता को समझते हुए कुछ रोचक सवाल भी पूछे जाने चाहिए ताकि इंटरव्यू पढऩे वाले को वह सरस लगे। किसी के कहे शब्दों को तोड़ मरोड़ कर पेश नहीं करना चाहिए वरना सभी पक्षों के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। यह जरूर है कि आप चाहें तो इंटरव्यू देने वाले को बातों में उलझाकर वह बातें उसी के मुंह से कहलवा लें जिस कहने से वह बचना चाहता है। आपके इंटरव्यू को चॢचत कर दे। ऐसे प्रश्नों के मामूली ढंग से पूछें ताकि उत्तर देने वाला चौकस न हो जाये। इंटरव्यू लेने के पूर्व थोड़ी देर इधर उधर की हल्की फुल्की बातें करें जिससे आपके साथ उत्तर देने वाले का तालमेल बन जाये। यह तालमेल भरा रिश्ता इंटरव्यू के समय काम आयेगा।
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