कवि, गद्यकार औ
गायक, कवि एवं अनुवादक मृत्युजंय कुमार सिंह ने कहा कि एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद केवल शब्दानुवाद और भावानुवाद भर नहीं होता बल्कि उसके सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को भी अभिव्यक्त करना होता है। उन्होंने हिन्दी की समृद्धि की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी में उसकी बोलियों और अन्य भारतीय भाषाओं से हेलमेल और संस्कृत से सम्बद्धता के कारण जितने पर्यायवादी शब्द हैं दूसरी किसी भाषा में नहीं। नीलकंठ और कल्पतरू जैसे शब्दों का अंग्रेजी में अनुवाद बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि छंदबद्ध कविता के अनुवाद में इस बात भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि अनुवाद की गयी भाषा में भी छंद होता ताकि वह मूल भाव के करीब पहुंचे।
कवि प्रताप राव कदम ने कहा कि बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा था कि उनके वचनों को वे अपने अपने क्षेत्र की भाषा में प्रचारित प्रसारित करें जिससे अनुवाद की प्रक्रिया ने गति पकड़ी। उन्होंने कहा कि कवि को ही दूसरी भाषा की कविता का अनुवाद करना चाहिए। उन्होंने कहा कि गीतांजलि का हालांक रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वयं अंग्रेजी अनुवाद किया था किन्तु उनके मूल्य बांग्ला कविताओं की बात कछ और है।
विख्यात बांग्ला साहित्यकार नवारुण भट्टाचार्य ने कहा कि अनुवाद मनुष्य को आपस में जोड़ने की सबसे सशक्त सांस्कृतिक प्रक्रिया है। यह काम होते रहना चाहिए इसके दोष तक ही जाकर ठहरें। मनुष्य के संवाद की शक्ति अनुवाद से बढ़ती है। शुद्धता पर जोर नहीं होना चाहिए। साहित्यकार व सन्मार्ग के उपसमाचार सम्पादक डॉ.अभिज्ञात ने कहा कि अच्छी कविता एक अर्थ प्रायः नहीं होती। कई बार किसी कविता का ठीक-ठीक एक अर्थ निकाल पाना ही मुश्किल हो जाता है, मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता उसका उदाहरण है। ऐसे में कविताओं के एकदम ठीक ठाक अनुवाद की बात सोचना कठिन है। एक ही कविता का जब उसी भाषा के लोग अलग अलग अर्थ निकालते हैं तो फिर दूसरी भाषा में उसके अनुवाद का क्या हाल होगा। कविता के अनुवाद में परफेक्शन की गुंजाइश कम होती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं कवयित्री एवं अनुवादिका डॉ.चंद्रकला पाण्डेय ने कहा कि अनुवाद में सांस्कृतिक संदर्भों की चर्चा अवश्य की जानी चाहिए। उसका बिना अनुवाद कार्य अधूरा है क्योंकि एक भाषा के रीति रिवाज दूसरी भाषा से जुड़े लोगों के रीति रिवाज से अलग होते हैं ऐसे में रचना के मूल कथ्य के अनदेखे रह जाने का खतरा होता है। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के कोलकाता केन्द्र के प्रभारी डॉ.कृपाशंकर चौबे ने किया।
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