<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902</id><updated>2012-02-11T09:53:01.905-08:00</updated><category term='संगीत'/><category term='काव्यानुवाद की समस्या'/><category term='डॉ.अभिज्ञात'/><category term='शमशेर बहादुर सिंह'/><category term='साक्षात्कार'/><category term='चांदनी रात का घाट'/><category term='जन्म शती वर्ष'/><category term='दिमाग़ में घोंसले'/><category term='भाषा का क्रियोलीकरण'/><category term='अमर्त्य सेन'/><category term='हारिल'/><category term='जूलियन असांज'/><category term='तहलका'/><category term='भूख धान और चिड़िया'/><category term='हिन्दी दिवस पर कुछ यक्ष प्रश्न'/><category term='कवि'/><category term='मंगल प्रकाशन'/><category term='इन्फोसिस'/><category term='नागार्जुन'/><category term='हितेन्द्र पटेल'/><category term='रवीन्द्रनाथ'/><category term='नारायण मूर्ति'/><category term='समीक्षा'/><category term='हैकर'/><category term='पत्रकारिता'/><category term='कुरजां संदेश'/><category term='तुम जो सचमुच भारत भाग्य विधाता हो'/><category term='अभिज्ञात'/><category term='सन्मार्ग'/><category term='अनुपमा बसुमतारी'/><category term='स्वाधीन'/><category term='दिनकर कुमार'/><category term='विकीलीक्स'/><category term='उस्ताद अब्दुल राशिद खान'/><category term='न्याय का स्वरूप'/><category term='अज्ञेय'/><category term='विजय शर्मा'/><category term='केदारनाथ सिंह'/><category term='विजय बहादुर सिंह'/><category term='मीडिया'/><title type='text'>तत्काल एक्सप्रेस</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>109</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-1249953323112514457</id><published>2012-01-17T10:03:00.000-08:00</published><updated>2012-01-19T10:15:52.598-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='काव्यानुवाद की समस्या'/><title type='text'>काव्यानुवाद की समस्याओं पर जम कर हुई चर्चा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-WXHIjodQ5lU/TxW5mVcSr5I/AAAAAAAABOo/3zI0JYwWXVI/s1600/anuwad-sangoshi.JPG"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 200px; height: 96px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-WXHIjodQ5lU/TxW5mVcSr5I/AAAAAAAABOo/3zI0JYwWXVI/s200/anuwad-sangoshi.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5698664971749207954" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कोलकाताः&lt;/span&gt; महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ओर से नलिनी मोहन सान्याल के 150 वें जन्म वर्ष के उपलक्ष्य में शुक्रवार 13 जनवरी 2012 को 'काव्यानुवाद की समस्याएं' विषय पर आयोजित सेमिनार को सम्बोधित करते हुए कवि, अनुवादक एवं प्रगतिशील वसुधा के सम्पादक &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;राजेन्द्र शर्मा&lt;/span&gt; ने कहा कि अपने देश में अनुवाद का काम उस &lt;span&gt;&lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; होता है जैसे कोई पुरानी फिल्म के गीत को याद कर बाथरूम में गुनगुनाने की कोशिश करता है, जबकि इस काम को काफी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भारत में अनुवाद के इतिहास की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दाराशिकोह ने काफी पहले उपनिषदों का अनुवाद करवाया था वह सां&lt;span&gt;&lt;span&gt;स्कृतिक&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; अनुष्ठान था जबकि अंग्रजों ने फोर्ट विलिमय के माध्यम से अनुवाद का जो कार्य शुरू किया वह उपनिवेश की महत्वकांक्षी आवश्यकताएं थीं। हमारा देश जैसी सांस्कृतिक विभिन्नताओ में जीता है वहां अनुवाद नैसर्गिक प्रक्रिया है। साहित्य का अनुवाद टीका या भाष्य नहीं होता। वह सांस्कृतिक प्रक्रिया का अंग होता है। सोवियत रूस की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक समय था जब उस देश ने अपने देश के तमाम साहित्य को दुनिया भर में प्रचारित प्रसारित करने के लिए व्यापक पैमाने पर अनुवाद करवाया था। अनुवाद के लक्ष्य कई बार भिन्न प्रकार के होते हैं।&lt;br /&gt;कवि, गद्यकार औ&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-SkYH_3C8P6k/TxW5RqBgS1I/AAAAAAAABOc/H4VVNmfbg1Y/s1600/anuwad.JPG"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 200px; height: 76px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-SkYH_3C8P6k/TxW5RqBgS1I/AAAAAAAABOc/H4VVNmfbg1Y/s200/anuwad.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5698664616496745298" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;र&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर चुके &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;ओम भारती&lt;/span&gt; ने कहा कि कविता का अनुवाद किसी अन्य भाषा में हो &lt;span&gt;&lt;span&gt;ही&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; नहीं सकता। वह मूल कविता की व्याख्या, पुनर्वव्याख्या होता है। शाब्दिक &lt;span&gt;&lt;span&gt;अर्थ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; बोध होता है। अनुवादक उसमें अपना आंशिक योगदान करेगा ही, जबकि मूल को मूल रहने देना एक बड़ी चुनौती होती है। अनुवादक अपने को इससे कैसे रोके यह बड़ी बात है। मूल भाषा के कवि की अभिव्यक्ति को उसी रूप में अक्ष्क्षुण रखना प्रायः संभव नहीं हो पाता। अनुवाद दरअसल प्रभावी ढंग का अंतरभाषिक संवाद होता है। अनुवाद के क्षेत्र में उन्होंने धर्मवीर भारती के संपादन में प्रकाशित विदेशी कवियों की कविताओं के अनुवाद के संकलन देशांतर का उल्लेख किया और उसे मील का पत्थर बताया। उन्होंने देशांतर की दूधनाथ सिंह लिखित और आलोचना में प्रकाशित समीक्षा को भी अनुवाद की समस्याओं को समझने और अनुवाद की संभावना को परखने के लिए लिहाज से महत्वपूर्ण करार दिया और उसे बीजमंत्र माना।&lt;br /&gt;गायक, कवि एवं अनुवादक &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मृत्युजंय कुमार सिंह&lt;/span&gt; ने कहा कि एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद केवल शब्दानुवाद और भावानुवाद भर नहीं होता बल्कि उसके सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को भी अभिव्यक्त करना होता है। उन्होंने हिन्दी की समृद्धि की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी में उसकी बोलियों और अन्य भारतीय भाषाओं से हेलमेल और संस्कृत से सम्बद्धता के कारण जितने पर्यायवादी शब्द हैं दूसरी किसी भाषा में नहीं। नीलकंठ और कल्पतरू जैसे शब्दों का अंग्रेजी में अनुवाद बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि छंदबद्ध कविता के अनुवाद में इस बात भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि अनुवाद की गयी भाषा में भी छंद होता ताकि वह मूल भाव के करीब पहुंचे।&lt;br /&gt;कवि &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्रताप राव कदम&lt;/span&gt; ने कहा कि बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा था कि उनके वचनों को वे अपने अपने क्षेत्र की भाषा में प्रचारित प्रसारित करें जिससे अनुवाद की प्रक्रिया ने गति पकड़ी। उन्होंने कहा कि कवि को ही दूसरी भाषा की कविता का अनुवाद करना चाहिए। उन्होंने कहा कि गीतांजलि का हालांक रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वयं अंग्रेजी अनुवाद किया था किन्तु उनके मूल्य बांग्ला कविताओं की बात कछ और है।&lt;br /&gt;विख्यात बांग्ला साहित्यकार &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नवारुण भट्टाचार्य&lt;/span&gt; ने कहा कि अनुवाद मनुष्य को आपस में जोड़ने की सबसे सशक्त सांस्कृतिक प्रक्रिया है। यह काम होते रहना चाहिए इसके दोष तक ही जाकर ठहरें। मनुष्य के संवाद की शक्ति अनुवाद से बढ़ती है। शुद्धता पर जोर नहीं होना चाहिए। साहित्यकार व सन्मार्ग के उपसमाचार सम्पादक &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;डॉ.अभिज्ञात&lt;/span&gt; ने कहा कि अच्छी कविता एक अर्थ प्रायः नहीं होती। कई बार किसी कविता का ठीक-ठीक एक अर्थ निकाल पाना ही मुश्किल हो जाता है, मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता उसका उदाहरण है। ऐसे में कविताओं के एकदम ठीक ठाक अनुवाद की बात सोचना कठिन है। एक ही कविता का जब उसी भाषा के लोग अलग अलग अर्थ निकालते हैं तो फिर दूसरी भाषा में उसके अनुवाद का क्या हाल होगा। कविता के अनुवाद में परफेक्शन की गुंजाइश कम होती है।&lt;br /&gt;कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं कवयित्री एवं अनुवादिका&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; डॉ.चंद्रकला पाण्डेय &lt;/span&gt;ने कहा कि अनुवाद में सांस्कृतिक संदर्भों की चर्चा अवश्य की जानी चाहिए। उसका बिना अनुवाद कार्य अधूरा है क्योंकि एक भाषा के रीति रिवाज दूसरी भाषा से जुड़े लोगों के रीति रिवाज से अलग होते हैं ऐसे में रचना के मूल कथ्य के अनदेखे रह जाने का खतरा होता है। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के कोलकाता केन्द्र के प्रभारी &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;डॉ.कृपाशंकर चौबे&lt;/span&gt; ने किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-1249953323112514457?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/1249953323112514457/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1249953323112514457'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1249953323112514457'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='काव्यानुवाद की समस्याओं पर जम कर हुई चर्चा'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-WXHIjodQ5lU/TxW5mVcSr5I/AAAAAAAABOo/3zI0JYwWXVI/s72-c/anuwad-sangoshi.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-1849061440139235719</id><published>2011-11-21T10:45:00.000-08:00</published><updated>2011-11-21T10:58:43.091-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='केदारनाथ सिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अभिज्ञात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साक्षात्कार'/><title type='text'>पश्चिम का सांस्कृतिक आतंक है नोबेल पुरस्कार-केदारनाथ सिंह</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-0ZixoL83DS8/TsqfRtYcSDI/AAAAAAAABJs/hrB8HX8Fuug/s1600/OK-KEDARJI.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 150px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-0ZixoL83DS8/TsqfRtYcSDI/AAAAAAAABJs/hrB8HX8Fuug/s200/OK-KEDARJI.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5677525406842636338" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कवि केदारनाथ सिंह से डॉ. अभिज्ञात की बातचीत&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;'क्यों और क्यों हम नोबेल पुरस्कार को इतना महत्व देते हैं। मुझे तो कभी-कभी वह पश्चिम के सांस्कृतिक आतंक की तरह लगता है।' यह कहना है कवि केदारनाथ सिंह का। वे हाल ही में साहित्य अकादमी के कार्यक्रम में शिरकत करने कोलकाता आये थे। इसमें उन्हें अकादमी की 'महत्तर सदस्यता' प्रदान की गयी, जो अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है। प्रस्तुत है  की गयी लम्बी बातचीत का एक अंश:&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;प्रश्न: रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद नोबेल &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;साहित्य&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt; पुरस्कार के लिए भारत में आप किसे योग्य मानते हैं और हिन्दी के किसी लेखक के लिए क्या संभावना देखते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: कुछ दिन पहले ही मैं चीन गया था। वहां बीजिंग लेखक संघ के अध्यक्ष ने अपनी बातचीत में यह सवाल उठाया था कि हम नोबेल पुरस्कार को इतना महत्व क्यों दें। इस पर मैं उनसे सहमत हूं। पूर्व के प्रतिमान अपने हैं और हमें अपने साहित्य को उसी के आलोक में देखना चाहिए। यदि विश्व स्तर पर साहित्य की श्रेणी बनानी भी हो तो उसके पैमाने अलग-अलग होने चाहिए। अब तक जो राजनीति में 'लुक ईस्ट' की बात कही जा रही है, कही तो किसी और संदर्भ में जा रही है किन्तु साहित्य के क्षेत्र में भी यह बात मुझे आज आवश्यक व अर्थपूर्ण लगती है।&lt;br /&gt;भारतीय साहित्यकारों को नोबेल दिये जाने की संभावना की बात की जाये तो इसके योग्य कई हिन्दी लेखक हैं और हो गये हैं। हिन्दी की बात करें तो प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद तथा निराला इसके हकदार हो सकते थे। हिन्दी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं में भी कई लेखक हैं जो अपने लेखन की वजह से इसके योग्य माने जा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;प्रश्न: आप जीवन के उत्सव के कवि कहलाना पसंद करेंगे या जीवन की आपदा की अभिव्यक्ति का, क्योंकि ये दोनों ही तत्व आपकी कविता में पूरी शिद्दत से उभर कर आये हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: मैं अपने को मूलत: जीवन राग का कवि मानता हूं, जिसमें जीवन का उत्सव भी शामिल है और आने वाली आपदा से संघर्ष भी। वैसे हर सार्थक कवि जीवन राग का कवि ही होता है। मेरे गुरु त्रिलोचन की कविता की एक पंक्ति है-'जीवन मिला है यह, रतन मिला है यह।' ऐसी पंक्तियां जीने की प्रेरणा देती हैं। जीवन मेरी नजर में एक सेलिब्रेशन है। कविता यही तो करती है कि मनुष्य की जिजीविषा को बनाये रखे।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;प्रश्न-आपके यहां मनुष्य का संकट और प्रकृति का संकट दोनों समान रूप से विद्यमान है, आप स्वयं किसे अधिक तरजीह देते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: मनुष्य का संकट और प्रकृति का संकट अलग-अलग नहीं है क्योंकि जीवन मूल रूप से प्रकृति ही है। यानी जो इसके विपरीत है वह विकृति है। मैं इस विभाजन को बहुत अर्थवान नहीं मानता। मेरे लिए दोनों एक है।&lt;br /&gt;प्रश्न: साहित्य में अपने या दूसरे किसी के निजी जीवन की अभिव्यक्ति किस स्तर पर होनी चाहिए?&lt;br /&gt;उत्तर: निजी जीवन और साहित्य में अन्तर है पर निजी जीवन सामान्यीकृत होकर साहित्य में आता है। प्रेम में कविता महत्वपूर्ण तत्व रहा है पर जब वह कविता में आता है तो केवल व्यक्तिगत प्रेम नहीं रह जाता। यदि रह जाता है तो साधारणीकरण नहीं होता। साहित्य की यही तो विशेषता है कि वह निजता व सार्वजनीन के बीच की दीवार को ढहा देता है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;प्रश्न: आपके मन में कभी आत्मकथा लिखने का खयाल आया?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: नहीं। लेकिन एक इच्छा मेरे मन में बहुत दिनों से पल रही है कि जिस परिवेश में मैं जीता रहा, चाहे गांव हो या शहर, उस परिवेश की कथा लिखूं। 'कथा माने 'फिक्शन' नहीं। मैंने जैसा देखा है वैसा। यह बहुत दिनों से सोच रहा हूं और शायद कभी कर सकूं। इसके लिए गद्य मुझे बार-बार खींचता है। अक्सर लगता है कि हमारा समय गद्य में सार्थक ढंग से उतर पाता है। कविता की तिर्यक पद्धति के विपरीत होती है गद्य की पद्धति। गद्य जीवन को सीधे-सीधे आईना देता है। यही उसकी ताकत है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;प्रश्न: अपने देश में वामपंथी राजनीति के विफल होने के क्या कारण हो सकते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: वामपंथी आंदोलन हमारे यहां ही नहीं पूरी दुनिया में किसी हद तक छिन्न-भिन्न हुआ है लेकिन खत्म हुआ है यह नहीं कहूंगा। पश्चिम में 'इतिहास का अन्तÓ कहकर जिस मुहावरे को उछाला गया था वह भी पुराना पड़ गया है। वामपंथी सत्ता और माक्र्सवाद दोनों अभिन्न नहीं हैं। माक्र्सवाद की सारवस्तु में एक ऐसी सच्चाई है, एक ऐसी गहरी मानवीय सच्चाई कि उसकी सार्थकता लम्बे समय तक रहेगी। माक्र्सवाद लौट-लौट कर कई शक्लों में बार-बार मनुष्य जीवन के साथ किसी न किसी रूप में जुड़ता रहेगा। इस तरह उसकी नियति को प्रभावित करता रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt;प्रश्न: साहित्यकारों के पास इन दिनों विचारधारा का संकट है और वे समाज को दिशा दे पाने में असमर्थ हैं, तो उसकी वजहें क्या हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: आज की नियामक शक्ति राजनीति है। साहित्य तो केवल चेतना के निर्माण में योगदान देता है और उसका हिस्सा विचारधारा भी होती है। सम्पूर्ण विचारधारा चेतना का स्थानापन्न नहीं है। साहित्य के व्यापक अनुभव के बाद मैं जो देखता हूं उसके आधार पर कह रहा हूं कि साहित्य आज भी मनुष्य की चेतना के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका लगातार निभा रहा है। अन्तर यही है कि राजनीति के इतिहास की तरह साहित्य का इतिहास सतह पर दिखायी नहीं पड़ता। वह गहराई में जाकर अपना काम करता है। मनुष्य जीवन के सारभूत अंश को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;प्रश्न: हाल ही में क्या पढ़ा और उसमें क्या अच्छा या बुरा लगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर : इधर पढ़ी गयी जिस पुस्तक ने आंदोलित किया है वह है एक दलित आत्मकथा -मुर्दहिया। यह डॉ.तुलसीराम की कृति है, जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और स्वयं आजमगढ़ के एक छोटे से गांव में पैदा होने वाले विद्वान हैं। यह आत्मकथा बेबाक ढंग से डायरेक्ट चोट करने वाली भाषा में लिखी गयी है। उसकी भाषा धीरे-धीरे आपको अपने विश्वास में ले लेगी। यह आपको भीतर तक हिला देती है। इधर जो कुछ लिखा गया है उसकी एक उपलब्धि यह कृति भी है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;प्रश्न: क्या आप पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करता। बुद्ध में करता हूं। बौद्ध धर्म बहुत आकृष्ट करता है पर जातक कथाएं लोक-कल्पना की तरह लगती हैं और उसे उसी रूप में देखता हूं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;प्रश्न: अपने लिखे में से कौन सी रचना से अधिक संतोष है और क्यों?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: साहित्यकार को अपनी कृतियों से पूर्ण संतुष्टि शायद एक कल्पना है। लेखक अपनी कृतियों से कभी संतुष्ट नहीं होता। आंद्रे जीद ने कहीं लिखा है कि मैं अपनी हर कृति के अन्त में एक और वाक्य जोडऩा चाहता हूं वह ये कि- 'मैं जो कुछ कहना चाहता था वह नहीं कह पाया।'&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;प्रश्न: अण्णा हजारे और जेपी में से कौन अधिक पसंद है और आपको दोनों में बुनियादी फर्क क्या लगता है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: अण्णा हजारे के आंदोलन पर कोई टिप्पणी करना मैं जरूरी नहीं समझता। जेपी से अण्णा की तुलना नहीं हो सकती। जेपी का व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। उनके आंदोलन ने भारतीय राजनीति को बहुत दूर तक प्रभावित किया। यह प्रभाव किस-किस रूप में पड़ा यह अलग विचार का मुद्दा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-1849061440139235719?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/1849061440139235719/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/11/blog-post_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1849061440139235719'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1849061440139235719'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/11/blog-post_21.html' title='पश्चिम का सांस्कृतिक आतंक है नोबेल पुरस्कार-केदारनाथ सिंह'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-0ZixoL83DS8/TsqfRtYcSDI/AAAAAAAABJs/hrB8HX8Fuug/s72-c/OK-KEDARJI.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-5675112425031083083</id><published>2011-11-07T23:18:00.001-08:00</published><updated>2011-11-29T10:15:51.388-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अभिज्ञात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हारिल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हितेन्द्र पटेल'/><title type='text'>आज के नैतिक सवालों से मुठभेड़ करता उपन्यास</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-RPGXHWNJEXU/TtUhJ3nbiXI/AAAAAAAABKc/ZVGq635843A/s1600/HARIL.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 169px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-RPGXHWNJEXU/TtUhJ3nbiXI/AAAAAAAABKc/ZVGq635843A/s200/HARIL.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5680482958429620594" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-KY7fe1R6x5w/TroHSi2p6LI/AAAAAAAABH4/qw0yAElC-UY/s1600/Haaril%2BPB.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 128px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-KY7fe1R6x5w/TroHSi2p6LI/AAAAAAAABH4/qw0yAElC-UY/s200/Haaril%2BPB.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5672854695801645234" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;समीक्षा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;साभारःसन्मार्ग, 6 नवम्बर 2011&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;पुस्तक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;नाम&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;हारिल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;/&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;लेखक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;हितेन्द्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;पटेल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;/ &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;अंतिका&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;प्रकाशन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;सी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;-56/&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;यूजीएफ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;-4, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;शालीमार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;गार्डन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;एक्सटेंशन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;-2, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;गाजियाबाद&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;-2010005(&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;उप्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;)/&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;मूल्य&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;सौ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;रुपये।&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;हितेन्द्र पटेल का पहला उपन्यास 'हारिल' अपने रचना-शिल्प, कथन और कहने की भंगिमा की उत्कृष्टता के कारण पाठकों पर अपना प्रभाव छोडऩे में कामयाब है। इस कृति में लेखक की जो बात मुझे खास तौर पर रेखांकित करने योग्य लगी, वह है रचना में शब्दों के प्रयोग की सीमा का भान। अतिकथन अच्छी-अच्छी कृतियों के प्रभाव को क्षीण कर देता है। खास तौर पर किसी के पहले उपन्यास में यह खतरे बहुत होते हैं, जिससे यह कृति बची हुई है। घटनाक्रम के ब्यौरों को उन्होंने इतने संतुलित ढंग से रखा है कि वे पाठकों को अनावश्यक कहीं नहीं लगते। यही बात कथा प्रसंगों के निर्वाह में भी कही जा सकती है, बल्कि इस मामले में तो वे और चुस्त-दुरुस्त हैं। वे घटनाओं को उसी मोड़ पर लाकर खत्म कर देते हैं, जहां से कई दिशाएं दिखायी देती हैं और पाठक के पास बस यही विकल्प बचता है कि वह कथासूत्र को अपनी कल्पना के आधार पर मनचाही परिणति तक ले जाये। लेखक का काम वहीं खत्म हो जाता है, जहां वह पाठक का अपनी कथावस्तु के साथ तादात्म्य स्थापित करवा दे। वे घटनाओं को वहां छोड़ते हैं, जहां उनका निहितार्थ है। यह सामान्य पाठकों को पहले-पहल तो आधी-अधूरी कृति का एहसास दिलाता है किन्तु आगे क्या हुआ होगा कि प्यास जगाकर छोड़ देना किसी रचनाकार के वैशिष्ट्य के तौर पर देखना अधिक समीचीन लगता है। यह रचना स्वभाव और कहने का अंदाज कम ही लेखकों के पास है।&lt;br /&gt;हारिल उपन्यास में नैतिक मूल्यों के ह्नास की बात जिस सादगी से उठायी गयी है, वह इस रचना की उपलब्धि है क्योंकि वह उसकी अर्थवत्ता को अनेकार्थता तक ले जाने में सहायक है। लम्बे-चौड़े भाषण, बड़े-बड़े दावे और आक्रांत करने वाली मुद्रा यहां नहीं है। यहां वेधक कटाक्ष हैं, जो हमें अपनी परिपाटी का हिस्सा हो चले समझौतों के प्रति सचेत करते हैं। किस चतुराई और उदात्तता से पूंजी लोगों को अपना गुलाम बनाती है, उसकी गहरी शिनाख्त इस कृति में मिलेगी। प्रकृति, दर्शन, विचार, इतिहास, प्रेम, पूंजीवाद का धूर्त चेहरा इसमें रह- रह कर अपने अपने अलग-अलग रूपों में सामने आता है और हमें चमत्कृत, मोहित और आक्रांत करता है। यह आभास होता है कि यह कृति एक लम्बी तैयारी के साथ लिखी गयी है किन्तु हर शब्द मितव्ययिता के साथ खर्च हुए हैं। एक एक शब्द जरूरी और वाजिब।&lt;br /&gt;एक फ्रीलांसर पत्रकार की यह दास्तान उसके एक पुराने मित्र, मित्र की पत्नी, मित्र की साली और मित्र के पत्नी के प्रेमी के इर्द-गिर्द घूमती है लेकिन इसके बीच वह एकाएक जटिल शहरी सम्बंधों से दूर प्रकृति के करीब पहाड़ पर चला जाता है ताकि अपने भीतर की आवाज को सुन सके। वहां कुछ ऐसे लोग और एक ऐसी दुनिया से उसका साबका होता है, जहां से जीने के नये अर्थ उसे मिलते हैं। बदली हुई जीवन दृष्टि के साथ जब वह तीन माह बाद वह अपनी पुरानी दुनिया में लौटता है तो एक बदली हुई दुनिया उसके सामने होती है। बदली हुई परिस्थितियों का सामना वह जिस प्रकार करता है, क्या वह सही है, उपन्यास के खत्म होने के बाद भी पाठक के पास सवाल बचा रह जाता है, जो नैतिक भी है और टाला जाने वाला भी नहीं है। आज की नैतिकता से मुठभेड़ के लिए यह उपन्यास अलग से जाना जायेगा। पाठक को भी इस उपन्यास से गुजरने के बाद चीजों को अपने देखने-समझने के नजरिये में बदलाव महसूस हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-5675112425031083083?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/5675112425031083083/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/11/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5675112425031083083'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5675112425031083083'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='आज के नैतिक सवालों से मुठभेड़ करता उपन्यास'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-RPGXHWNJEXU/TtUhJ3nbiXI/AAAAAAAABKc/ZVGq635843A/s72-c/HARIL.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-3732397176828039402</id><published>2011-07-17T01:43:00.000-07:00</published><updated>2011-07-17T01:45:22.906-07:00</updated><title type='text'>शमशेर, अज्ञेय व नागार्जुन पर महत्वपूर्ण ग्रंथ</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-bPoaSWM4gSQ/TiKg4VE_ZSI/AAAAAAAABEE/HUEUyjocLtY/s1600/sanmarg-samiksha.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 59px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-bPoaSWM4gSQ/TiKg4VE_ZSI/AAAAAAAABEE/HUEUyjocLtY/s200/sanmarg-samiksha.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5630239373757736226" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://epaper.sanmarg.in/PUBLICATIONS/SM/SM/2011/07/17/index.shtml?ArtId=001_019&amp;amp;Search=Y"&gt;sanmarg-17/07/2011&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-3732397176828039402?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/3732397176828039402/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/3732397176828039402'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/3732397176828039402'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='शमशेर, अज्ञेय व नागार्जुन पर महत्वपूर्ण ग्रंथ'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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src="http://4.bp.blogspot.com/-dyBIeKwzY_k/TeTGR8yKbEI/AAAAAAAABCo/rl3UdQa28ZY/s200/kurja.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5612829047287082050" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span&gt;साभारः&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कुरजां संदेश&lt;/span&gt;, , प्रवेशांक-मार्च अगस्त 2011&lt;br /&gt;सम्पादकीय सलाहकार-ईशमधु तलवार/ सम्पादक-प्रेमचंद गांधी, ई-10, गांधीनगर, जयपुर-302015, मूल्य-100/-&lt;/blockquote&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;हि&lt;/span&gt;न्दुस्तानी&lt;/span&gt; संगीत के ग्वालियर घराने को जिन्होंने नयी ऊंचाइयां दी हैं उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है उस्ताद अब्दुल राशिद खान का। तानसेन की 24 वीं पीढ़ी के इस गायक ने उम्र की बंदिशों को धता बताते हुए एक सौ दो बसंत ही नहीं देखे बल्कि वे इस उम्र में बंदिशें लिखते और उनकी धुन तैयार करते हैं और मंचों पर अपनी गायकी के फन का लोहा भी मनवा लेते हैं। इस उम्र में भी न तो उनकी आवाज़ पर उम्र ने अपनी कोई छाप छोड़ी है और ना ही होशोहवास पर। शरीर की झुर्रियां, सफेद लखदख बाल अलबत्ता उनकी उम्र की गवाही देते हैं लेकिन इस बात का प्रमाण भी देते हैं कि वे उम्र की सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं।&lt;br /&gt;उनके जीवन इस बात की मिसाल है कि उम्र से कोई बूढ़ा नहीं होता। और सौ की उम्र भी कुछेक असमर्थताएं जरूरत पैदा करती है लेकिन हर तरह से लाचार नहीं बनाती। वे अब भी संगीत के साधकों को रोजाना संगीत की चार-पांच घंटे ता&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-QXm1oNaOFy0/TeTFNagrEVI/AAAAAAAABCg/PFx61GvD4bY/s1600/rashid%2Bcopy.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-QXm1oNaOFy0/TeTFNagrEVI/AAAAAAAABCg/PFx61GvD4bY/s200/rashid%2Bcopy.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5612827869855813970" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;लीम&lt;/span&gt; देते हैं और वे मानते हैं कि इस दरम्यान उनका अपना रियाज़ भी होता चलता है। उनका उच्चारण अब भी बिल्कुल साफ है और आवाज़ बुलंद, जो ग्वालियर घराने की गायकी की विशिष्ट पहचान है।&lt;br /&gt;ग्वालियर घराने की गायकी की विशेषता बताते हुए वे कहते हैं ग्वालियर घराने की गायकी में शब्दावली की स्पष्टता पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। दूसरी विशेषता है खुली आवाज़। वे बताते हैं यह विशेषताएं मुझे भी विरासत में मिली हैं। मैं भी अपने पूर्वजों की तरह ध्रुपद धमार गाता था। लेकिन जब ध्रुपद लुप्त होने लगा तो खयाल की ओर आ गया। मैं ध्रुपद धमार गाता हूं, खयाल, ठुमरी, टप्पा, दादरा भी।&lt;br /&gt;लम्बी उम्र के सम्बंध में पूछने पर वे कहते हैं इसमें मेरा अपना कोई योगदान नहीं है। मैं एक सामान्य दिनचर्चा में ही जीता हूं। मेरे परिवार में लोगों ने अमूमन लम्बी उम्र पायी है। मेरे वालिद ने 92 साल की उम्र पायी थी,  मेरे दादा 104 के थे, परदादा 107 के। मेरी भाभी 110 तक गयीं। यह ईश्वरीय देन है। हमारी सांसों का रखवाला अल्लाह है।&lt;br /&gt;उस्ताद खुद ही बंदिशें लिखते हैं और उन्हें रागों में ढालते हैं। जैसी की शास्त्रीय संगीत की परिपाटी है उन्होंने भी ब्रजभाषा में ही अपनी बंदिशें लिखी हैं जिनमें से हज़ार बंदिशों को उन्हीं की आवाज़ में संगीत रिसर्च एकेडमी ने रिकार्ड किया है। कुछ बंदिशों को बीबीसी लंदन ने भी रिकार्ड किया है। उन्होंने अपनी बंदिशों को नाम दिया है रसन पिया।&lt;br /&gt;उन्होंने बताया कि मेरे पूर्वजों में से मेरे परदादा उस्ताद चांद खान ने चार लाख बंदिशें लिखीं तैयार की थीं, इसलिए यह मेरे परिवार में नया काम नहीं है। मैं बचपन में रचता और उन्हें सुनाया करते, फिर उन्होंने ही हमारा नाम रख दिया—रसन और कहा कि बंदिशों में डाला करो लेकिन शब्द ऐसे हों कि राग का चेहरा ही सामने आ जाये।&lt;br /&gt;नया काम किया है मेरे पौत्र ने। तानसेन के बाद हमारे वंश में पीढ़ी दर पीढ़ी गवैये ही पैदा हुए पर मेरे पौत्र अपवाद है। मेरा बेटा रईस खान भी गाता है किन्तु मेरा पौत्र बिलाल खान का तबले की ओर रुझान है पर हमने ऐतराज़ नहीं किया।&lt;br /&gt;गुरु शिष्य की परम्परा का ज़िक्र छिड़ने पर उन्होंने बताया कि हमारे खानदान में किसी को बाहर से संगीत सीखने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। हमारी वंश परम्परा में यह इल्म सीना ब सीना आया। ये हुआ कि बेटा हमेशा बाप से अच्छा हो और अच्छा न हो तो बराबर तो हो..।&lt;br /&gt;पहले की महफिलों में संगीत सुनने वाले संगीत के जानकार होते थे। रियासतों में वास्तविक कद्रदानों की महफिल में गायन होता था। कोई गवैया ग़लत गाता था तो वहीं उसी वक्त़ रोक कर कहा जाता था ऐसे नहीं ऐसे। लेकिन अब तो म्यूज़िक कन्फ्रेंस होते हैं गाने वाला गा लेता तो लोग तालियां बजाकर छुट्टी पा लेते हैं कोई ग़लती पर उंगली नहीं रखता। सीखने का ढर्रा यह निकल आया है कि किसी का कैसेटे या सीडी लगा लिया। खीसने की ज़रूरत नहीं। उसी की नकल उतार ली और गाने बैठ गये।&lt;br /&gt;पिछली यादों में खाते हुए उस्ताद कहते हैं कि भारतीय संगीत के अंग्रेज़ भी कायल थे। नेहरू जी ने अपने एक भाषण में कहा था कि हिन्दुस्तान से अंग्रेज़ बहुत कुछ ले गये लेकिन संगीत नहीं ले जा पाये। जिस आदमी को संगीत से लगाव नहीं वह बगैर दुम का पशु होता है।&lt;br /&gt;संगीत रिसर्च अकादमी से अपने सम्बंधों के बारे में वे कहते हैं मैं यहां बीस साल से हूं। देश में यही एक संस्थान है जहां गुरु-शिष्य परम्परा चल रही है। होनहार लोगों को यह एकादमी अपना शिष्य बनाती है और यहीं रहकर जब तक वह योग्य नहीं बन जाता संगीत सिखाया जाता है। यहां तो डायरेक्टर हैं रवि माथुर वे गुणियों के कद्रदान हैं। वरना मैं तो उत्तर प्रदेशे के रायबरेली के सलोन का रहने वाला हूं। सलोन पहले कस्बा हुआ करता था अब तो शहर जैसा हो गया है। अपने घर का रास्ता पहचानना मुश्किल होता जा रहा है। वहीं के दरगाह शरीफ में मैंने गुरुमंत्र लिया और हाजी हाफिज मौलाना हजरत शाह मोहम्मद नईम ? साहब सलोनी की दुआ से मैं कुछ भी हूं, हूं।&lt;br /&gt;वे कहते हैं मेरे वालिद को लगता था कि मैं गा बजा नहीं पाऊंगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मेरी संगीत का तालीम बाईस साल चली।&lt;br /&gt;अपने शिष्यों में जिन्हें वे जिक्र लायक समझते हैं वे हैं शुभमय भट्टाचार्य, पम्पा बनर्जी, पियाली मलाकार, रूपाली कुलकर्णी और डॉ.हेमराज चंदेल।&lt;br /&gt;तानसेन की अपनी खानदानी परम्परा के बारे में पूछने पर वे बताते हैं कि तानसेन किसी का नाम नहीं बल्कि उपाधि है जो अकबर बादशाह ने दी थी। वाकया हूं है कि ग्वालियर के राजा राम गौड़ थे। वहीं के थे मकरंद पाण्डेय जो हजरत गौस ग्वालियरी की पड़ी सेवा करते थे। पाण्डेय जी की कई गायें थीं सो वे हजरत को दूध मुफ्त में रोज पहुंचा दिया करते थे। एक रोज हजरत ने पूछा पाण्डेय तुमने बहुत सेवा की बोलो मुझसे क्या चाहते हो?&lt;br /&gt;पाण्डेय जी की उम्र हो गयी थी 72 के आसपास। उन्होंने कहा बाबा सब कुछ है मेरे पास पर संतानहीन हूं। हजरत ने दुआ की और बाबा को संतान हुई। सात बरस बीते। बाबा ने एक दिन पूछा सब खैरियत तो है, पाण्डेय जी ने कहा बाबा, औलाद तो हुई लेकिन वह बोलता ही नहीं है। बाबा उस समय फल खा रहे थे वही जूठा फल बच्चे को पकड़ा दिया और बच्चे ने जो पहला शब्द कहा वह था बाबा।&lt;br /&gt;पाण्डेय जी पहले तो खुश हुए फिर कहा आपने इसे अपना जूठा खिला दिया अब आप ही इसे अपने पास रखो। बालक उन्हीं के पास रहने लगा। उसे मुसलमान बनाया गया नाम रखा गया-अली खां। वह ज़माना बाबा हरिदास स्वामी का था, जो वृंदावन में रहते थे। एक बार वे यहां हजरत गौस ग्वालियरी से मिलने आये। बालक को देखा तो कहा इसे हमें दे दीजिए हम इसे संगीत सिखायेंगे। बालक अली खां उनके साथ कई बरस रहे। संगीत की परम्परागत तालीम ली। जब पारंगत हो गये तो उनसे कहा गया कि अपनी विद्या को दुनिया में फैलाओ। फिर लौट आये। वे रीवां नरेश की गोविन्दगढ़ रियासत में मुलाजिम हुए। उस समय बादशाह अकबर संगीत के प्रेमी थे। वे एक बार रीवां नरेश के यहां आये तो उन्होंने उनका गाना सुना और उन्हें रीवां नरेश से मांग लिया। बादशाह अकबर ने उन्हें तानसेन की टाइटल दी और उन्हें अपना नवां वजीर बनाया। तानसेन के चार बेटे हुए-रहीम सेन, सूरत सेन, तानतरंग और बिलासखान। उस्ताद अब्लुल राशिद खान बताते हैं हमारे वंश का सिलसिला सूरत सेन से चला।&lt;br /&gt;सूरत सेन के चार बेटे थे-कमाल रंग, जमाल सेन, अहमद शाह और रुस्तम खान। उस समय प्रतापगढ़ रियासत में कोई गायक नहीं था। राजा की बुआ ग्वालियर में ब्याही थीं। राजा कालाकांकर वहां से चारों गवैयों को अपने यहां ले आये। जिनमें से दो मानिकपुर के राजा ताजसुख हुसैन के यहां चले गये। जब रियासतें खत्म हुई तो बाकी दो भी मानिकपुर से बी मिल सलौन आ गये। हमारी परम्परा सलोन से जुड़ गयी। सलोन रायबरेली जिले में है। वे कहते हैं कि रायबरेली जिला सोनिया गांधी का क्षेत्र है मैं जल्द ही उनसे मिलूंगा और गुजारिश करूंगा का सलोन में एक संगीत विद्यालय बनाने का इन्तज़ाम वे करवायें।&lt;br /&gt;उस्ताद कहते हैं इस प्रकार मेरा पितृपक्ष हिन्दू और मातृपक्ष मुसलमान है। एक साझी विरासत हमारी है। यह पूछने पर कि संगीत से उन्हें क्या मिला, कहते हैं  मेरे लिए तो यह अल्लाह को महसूस करने का यह मार्ग है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-7621459162239825996?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/7621459162239825996/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/05/blog-post_31.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/7621459162239825996'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/7621459162239825996'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/05/blog-post_31.html' title='सौ के पार, सुरों की बहार'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-dyBIeKwzY_k/TeTGR8yKbEI/AAAAAAAABCo/rl3UdQa28ZY/s72-c/kurja.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-511479614210186352</id><published>2011-05-27T23:48:00.001-07:00</published><updated>2011-05-27T23:51:16.660-07:00</updated><title type='text'>विवेकानंद के जीवन के कुछ और आयाम</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-qP_Of6oOp2o/TeCbXCIVhMI/AAAAAAAABCQ/UZmKK7Cd_Go/s1600/TUP30Apr2011-61.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 89px; height: 118px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-qP_Of6oOp2o/TeCbXCIVhMI/AAAAAAAABCQ/UZmKK7Cd_Go/s200/TUP30Apr2011-61.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5611655955714770114" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-x_mAXtxfMbk/TeCbTOEpQnI/AAAAAAAABCI/06wj59IbzsU/s1600/vivekanand-jiwan-ke-anjane-sach.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 133px; height: 199px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-x_mAXtxfMbk/TeCbTOEpQnI/AAAAAAAABCI/06wj59IbzsU/s200/vivekanand-jiwan-ke-anjane-sach.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5611655890201035378" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तहलका ३० अप्रैल 2011&lt;br /&gt;पुस्तक समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;विवेकानंदः जीवन के अनजाने सच/लेखक-शंकर/प्रकाशक-पेंगुइन बुक्स इंडिया, यात्रा बुक्स, 203 आशादीप, 9 हेली रोड,  नयी दिल्ली-110001, मूल्य-199/-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;स्वामी विवेकानन्द के जीवन के कई आयाम अब तक अनुद्घाटित हैं। उनके प्रकाशित पत्रों और सैकड़ों पुस्तकों से उनके दर्शन व जीवन को समझने में सहूलियत होती है फिर भी उनके जीवन के कई कोने ऐसे हैं जिन पर रोशनी नहीं पड़ी है और जिनके उजागर होने से उनको देखने समझने के हमारे नजरिये में परिवर्तन होता है। ख्यातिलब्ध बंगला साहित्यकार शंकर ने उन पर लम्बे अरसे तक शोध करने और लगभग दो सौ पुस्तकों से अपनी बात को पुष्ट करने का प्रमाण जुटाने के बाद 'विवेकानंद: जीवन के अनजाने सच’ पुस्तक लिखी है। इसमें उन्होंने विवेकानंद को जिस रूप में पेश किया है वह उन्हें बहुत करीब से समझने में हमारी मदद करता है। विवेकानंद के व्यक्तित्व के उस ताने-बाने को उन्होंने परखने की कोशिश की है जिनसे उनका व्यक्तित्व न सिर्फ बनता है बल्कि निखरता है। इस पुस्तक में उन्होंने उन्हें एक महामानव के जीवन संघर्ष की उन स्थितियों को ही नहीं उजागर किया है जो उनके विकास में सहायक हुआ है बल्कि उन विसंगतियों की भी चर्चा की है जो उनके संन्यासी जीवन के विकास में बाधक बनती दिखायी देती हैं।&lt;br /&gt;शंकर ने विवेकानन्द के जीवन के ऐसे प्रसंगों को इसमें प्रस्तुत किया है जिनकी या तो चर्चा बहुत कम हुई है या फिर हुई भी है तो उसके पूरे मर्म को समझने में वह अपर्याप्त रही। यह अनायास नहीं है कि उन्होंने इस पुस्तक का नाम ही 'जीवन के अनजाने सच' इसलिए रखा क्योंकि वे उन्हीं प्रसंगों पर अधिक जोर दिया है और उस विषय पर उन्होंने गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है जिनके आधार पर विवेकानन्द की बहुमुखी प्रतिभा पर भी प्रकाश पड़ा है। इस पुस्तक के बिना यह जानना मुश्किल था कि उन्होंने जितना वेदों का प्रचार किया उससे कम प्रचार भारतीय व्यंजनों का नहीं किया। 'सम्राट-संन्यासी सूपकार' अध्याय में शंकर ने लिखा है कि वे न सिर्फ तरह-तरह के व्यंजनों को खाने के बेहद शौकीन थे बल्कि पाक कला में भी उन्हें विशेष महारथ हासिल थी। विदेशों में भी कई बार अपने करीबी लोगों को घर जाकर खुद खाना बनाकर खिलाया भोजन प्रसंग में विवेकानंद के चाय व आइसक्रीम के प्रति लगाव की विशेष चर्चा है। शंकर कहते हैं-'स्वामी जी जिनके भी घर में मेहमान बनते थे, उन लोगों को अपना भी एकाध व्यंजन पकाकर खिलाने को उत्सुक रहते थे।' शंकर इस अध्याय में कहते हैं-'उत्तरी कैलिफोर्निया के रसोईघर में शेफ यानी रसोइया विवेकानंद। बेहद अद्भुत दृश्य होता था। खाना पकाते-पकाते स्वामी जी दर्शन पर बात करते रहते थे। गीता के अठारहवें अध्याय से उद्धरण देते रहते थे।' विवेकानंद के लिए वेद-उपनिषद का प्रचार प्रसार, मानवता के कल्याण की बातें और व्यंजनों की रेसिपी में कोई फर्क नहीं था। यहां यह भी गौरतलब है कि उनका खान पान शाकाहार तक ही सीमित नहीं था।&lt;br /&gt;इस पुस्तक में जो प्रमुख स्वर उभरा है वह है अपनी मां के प्रति उनका अगाध प्रेम। मां से उनका सम्बंध अंत तक बना रहा और वे इस बात के प्रति भी चिन्तित रहे कि उनकी मौत के बाद उनकी मां की देखभाल और भरण-पोषण ठीक से हो। इस पुस्तक में उनकी पैतृक सम्पत्ति के लेकर चलने वाले लम्बे मुकदमे का भी विस्तार से जिक्र है जिसके कारण उनके परिवार को गरीबी के दिन देखने पड़े और जिन्हें सुलझाने का उन्होंने भरसक किया। अदालत से मुकदमे का समाधान न होते देख उन्होंने छह हजार रुपये देकर अपनी चाची से पैतृक घर का हिस्सा खरीद लिया जिसके लिए उन्हें मठ के फंड से पांच हजार रुपये उधार लेने पड़े। खेतड़ी महाराज से वे पत्र में गुजारिश करते हैं-'मेरी मां के लिए आप जो हर महीने सौ रुपये भेजते हैं, हो सके तो उसे स्थायी रखें। मेरी मौत के बाद भी यह मदद उन तक पहुंचती रहे।'&lt;br /&gt;शंकर के विवेकानंद की उन तमाम बीमारियों का जिक्र किया है जिनसे वे लगातार घिरे रहे। वे अनिद्रा के भी शिकार थे। यह देखकर हैरत होती है कि जिस व्यक्ति को इतनी सारी बीमारियां थीं उसने कैसे दर्शन के क्षेत्र में महती योगदान दिया और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक बनायी। खेतड़ी के राजा अजीत सिंह की चर्चा जिस तरह से शंकर ने की है उससे स्पष्ट है कि विवेकानंद को विदेश भेजने का इन्तजाम उन्होंने ही किया था। विवेकानंद ने इसे खुलेआम स्वीकार किया था कि अगर खेतड़ी के राजा से परिचय न होता तो जो कुछ मामूली सा मैं भारत की उन्नति के लिए कर पाया हूं, वह मेरे लिए असंभव था। पुस्तक का बंगला से अनुवाद सुशील गुप्ता ने किया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-511479614210186352?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/511479614210186352/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/511479614210186352'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/511479614210186352'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html' title='विवेकानंद के जीवन के कुछ और आयाम'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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उतने प्रभावी नहीं होंगे, जितनी स्वयं उसकी नैतिक जिम्मेदारी होगी। लोकतंत्र में मीडिया की शक्ति तभी बढ़ेगी जब वह भरोसेमंद होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ.इकबाल जावेद ने की। वक्ता थे रतनलाल शाह, प्रो.ललित झा, डॉ.अभिज्ञात, अभीक चटर्जी एवं राजेन्द्र केडिया। कार्यक्रम का संचालन जितेन्द्र जितांशु ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रभाकर चतुर्वेदी ने किया।&lt;br /&gt;डॉ.इकबाल जावेद ने कहा कि इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों ने जहां रचनात्मक कार्य किये हैं वहीं उसका दुरुपयोग भी धड़ल्ले से हो रहा है। वह यदि अण्णा हजारे के पक्ष में व्यापक समर्थन जुटा सकता है तो किसी शक्तिशाली मुल्क के इशारे पर तहरीर चौक में लोगों को अपनी ही सरकार को बेदखल करने के लिए उकसा भी सकता है। उन्होंने कहा कि मीडिया आज पावरफुल हो गया है और पावरफुल होने के कारण करप्ट भी। राजेन्द्र केडिया ने कहा कि मीडिया झूठे सपने बेचता है। वह लोगों की सोच पर ऐसा हावी होता है कि वह अपने ढंग से एक नयी संस्कृति तैयार करने लगा है। टीवी धारावाहिक यह काम बखूबी करते हैं। अभीक चटर्जी ने कहा कि मीडिया डेमोक्रेटिक डिक्टेटरशिप करता है। लोगोंं को पता नहीं चलता कि वह किस सूक्ष्म तरीके से लोगों को वहीं हांक कर ले जाता है जहां वह ले जाना चाहता है। पूरी मीडिया को आम तौर पर कुछ शक्तिशाली लोग नियंत्रित करते हैं और मीडिया के जरिये लोगों को। प्रो.ललित झा ने कहा कि यह सूचना विस्फोट का युग है। सूचनाओं को किसी खास उद्देश्य से प्लांट किया जाता है लोगों के दिलोदिमाग पर उसे हावी कर दिया जाता है। मीडिया तकनीक से ताकत बन गया है। जिस विश्वग्राम को मीडिया की उपलब्धि के तौर पर पेश किया जाता है वह कंसेप्ट बहुत पहले से हमारे उपनिषदों में मौजूद है। उन्होंने कहा कि मीडिया ने ऐसी स्थितियां पैदा की हैं कि स्त्री उपभोग की वस्तु बन गयी है। वह पुरुषवादी नजरिये से स्वयं को टीवी पर पेश करती है। डॉ.अभिज्ञात ने कहा कि मीडिया को साजिश के तहत बदनाम किया जा रहा है क्योंकि लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया चौथे स्तम्भ का काम करता है। ऐसे में उसके कद का बढ़ जाना बाकी स्तम्भों के लिए चुनौती है। आज मीडिया चाहे तो किसी सरकार को गिरा दे या किसी की सरकार बना दे। ऐसे में जबकि लोकतंत्र के अन्य पायों में खामियां आ गयी हैं राजनीति नहीं चाहती कि उसे चुनौती देने वाली सत्ता मीडिया निष्कलंकित रहे। मीडिया को अपनी विश्वसनीयता और जनपक्षधरता की रक्षा स्वयं करनी होगी। लोकतंत्र में मीडिया की शक्ति तभी बढ़ेगी जब वह भरोसेमंद होगा। उन्होंने कहा कि बिना मीडिया के आज समाजिक परिवर्तन की कल्पना नहीं की जा सकती और आज का मनुष्य बगैर मीडिया के एक दिन संतोषजनक ढंग से एक दिन नहीं बिता सकता।  इसके पूर्व सदीनामा-उन्नयन सम्मान 2011 का सत्र था जिसमें हिन्दी, उर्दू, बंगला एवं अंग्रेजी भाषाओं में बीए की परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं को पुरस्कृत किया गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-2708444437695107188?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/2708444437695107188/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2708444437695107188'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2708444437695107188'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='&apos;मीडिया को अपनी विश्वसनीयता की रक्षा स्वयं करनी होगी'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' 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href="http://3.bp.blogspot.com/-wiZ4wrPFmYQ/TbUf28iU60I/AAAAAAAAA8c/WrG3n71RogU/s1600/samiksha-sanmarg.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 44px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-wiZ4wrPFmYQ/TbUf28iU60I/AAAAAAAAA8c/WrG3n71RogU/s200/samiksha-sanmarg.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5599416740528581442" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;साभार-सन्मार्ग, 24  अप्रैल 2012&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;भूख धान और चिड़िया/ लेखक-स्वाधीन/प्रकाशक-मंगल प्रकाशन, दिल्ली&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.sanmarg.in/PUBLICATIONS/SM/SM/2011/04/24/INDEX.SHTML"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-1886204521321832212?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/1886204521321832212/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/04/sanmarg-24-april-2012.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1886204521321832212'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1886204521321832212'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/04/sanmarg-24-april-2012.html' title='विमर्श और सपनों के ताने बाने से बुनी कविताएं'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-wiZ4wrPFmYQ/TbUf28iU60I/AAAAAAAAA8c/WrG3n71RogU/s72-c/samiksha-sanmarg.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-6529975389507039463</id><published>2011-01-02T00:24:00.000-08:00</published><updated>2011-01-02T00:27:43.390-08:00</updated><title type='text'>छबिनाथ मिश्र की कविता  यात्रा</title><content type='html'>सन्मार्ग-२/२/2010&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TSA2e10WjrI/AAAAAAAAA4g/dB8vFMkPFkg/s1600/02_01_2011_196_040_003.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 140px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TSA2e10WjrI/AAAAAAAAA4g/dB8vFMkPFkg/s200/02_01_2011_196_040_003.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5557501843645828786" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TSA2e5YGPYI/AAAAAAAAA4Y/bzjSSKuFCiU/s1600/02_01_2011_196_040.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 178px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TSA2e5YGPYI/AAAAAAAAA4Y/bzjSSKuFCiU/s200/02_01_2011_196_040.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5557501844601060738" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-6529975389507039463?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/6529975389507039463/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6529975389507039463'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6529975389507039463'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='छबिनाथ मिश्र की कविता  यात्रा'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TSA2e10WjrI/AAAAAAAAA4g/dB8vFMkPFkg/s72-c/02_01_2011_196_040_003.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-2592796932190168414</id><published>2010-12-21T11:25:00.000-08:00</published><updated>2010-12-21T11:34:30.571-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकीलीक्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हैकर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जूलियन असांज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डॉ.अभिज्ञात'/><title type='text'>विकीलीक्सः सेंधमारों और हैकरों को हीरो न बनाये मीडिया</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TREASaHsqCI/AAAAAAAAA4M/DVmRVOYplRk/s1600/ulian_assange.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 167px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TREASaHsqCI/AAAAAAAAA4M/DVmRVOYplRk/s200/ulian_assange.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5553220131773786146" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;विकीलीक्स के कारनामों ने मीडिया को एक गहरी दुविधा में ढकेल दिया है। उसके खुलासों के आगे दुनिया की सारी खबरें फीकी और लगभग सारहीन नज़र आ रही हैं। सनसनी परोसने वालों की विकीलीक्स ने हवा निकाल दी है। सबसे पहले, सबसे आगे, सिर्फ़ हमारे पास जैसे नारों का रंग उतर गया है। एकाएक दुनियाभर का मीडिया संसार जूलियन असांज द्वारा विकीलीक्स डाट ओआरजी वेबसाइट परपरोसी हुई जूठन पर आश्रित हो गया है। इसे सूचनाओं का विस्फोट माना जा रहा है। कई पत्रकार असांज को अपना अगुवा मानने से नहीं हिचक रहे हैं तो कुछ ने उसे नायक मान लिया है। कुछ और उसी की राह पर चलने के लिए बेचैन हैं। कुछ फर्जी विकीलीक्स के खुलासे भी इस बीच सामने आये हैं। इस तरह विकीलीक्स मार्का खुलासों का एक बूम आ गया है।&lt;br /&gt;इंटरनेट पर सूचनाओं का अबाध प्रवाह की दुनिया में यह पहली बड़ी दुर्घटना है। ऐसी दुर्घटना तो होनी ही थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब अनसेंसर्ड सूचना परोसना नहीं है। मीडिया का काम केवल खुलासा करना नहीं है। मीडिया यदि व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत करता है तो उसका आशय अबाध अभिव्यक्ति से नहीं है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्बंध नैतिकता से भी है। हम किसी हैकर को मीडिया का नायक नहीं मान सकते। गुप्त सूचनाओं को खुलासा भर कर देना पत्रकारिता का धर्म कदापि नहीं है और ना ही यह कोई ऐसा गुण है जिस पर कोई वारी-वारी जाये। कूटनीति की बहुत सी मजबूरियां होती हैं और हर देश में बहुत सी बातें होती हैं जो न सिर्फ दूसरे देश से बल्कि स्वयं अपने भी देश के लोगों से गोपनीय रखनी होती हैं। आवश्यकता पड़ने पर कई गोपनीय बातों को उजागर करने के पूर्व उसके सार्वजनिक होने के प्रभावों पर भी विचार किया जाता है।&lt;br /&gt;विसीलीक्स ने जो गुप्त सूचनाओं पर सेंधमारी की है वह अमरीकी को पूरी दुनिया की निगाह में गिराने के लिए काफी है।यही नहीं इससे उसके अपने मित्र राष्ट्रों से सम्बंध खराब होने का खतरा मंडरा रहा है। आर्थिक मंदी का शिकार इस देश की हालत इन खुलासों से और खराब हो सकती है। कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अपने अपने स्तर और अपनी औकात के अनुसार किन्ही कारगुजारियों को अंजाम देने की कोशिश न करता होगा। कमजोर से कमजोर देश भी शक्तिशाली बनने की कोशिश करता है और जिनसे वह संधि करता है अपने फायदे की पहले चिन्ता करता है। हर देश का अपना खुफिया तंत्र होता है और उसकी एजेंसियां देश की कूटनीतिक कार्रवाइयों को अंजाम देती रहती है। अमरीका के गोपनीय केबल संदेशों का खुलासा करके विकीलीक्स ने उसकी पोल खोल दी। और एक हैकर दुनिया का नायक बन गया। ऐसे लोगो का नायक जो अमरीकी की शक्ति के आगे नत हैं,  उनसे आगे निकलना चाहते हैं, उसके सताये हुए हैं। अब अमरीका इंटरनेट की अबाध स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहा है तो यह स्वाभाविक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती राष्ट्र का अंकुश के पक्ष में रवैया चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए क्योंकि वह नैतिकता से स्खलित वैचारिक स्वतंत्रता के खिलाफ जो सही है। हमारा देश भारत को भी ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि हम भी मानते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्बंध नैतिकता से है और उसकी प्रभावोत्पादता से भी। किन्हीं गोपनीय सूचनाओं को उजागर करना कोई बड़ी सूचना क्रांति नहीं है। हमारे यहां सूचना प्राप्त करने का कानून है और कई गोपनीय दस्तावेजों से सम्बंध में एक सुनिश्चित प्रक्रिया से जानकारी प्राप्त की जा सकती है लेकिन उन जानकारियों में हर तरह की जानकारियों तक पहुंच नहीं बनती क्योंकि सरकार ने कुछ मामलों को जनहित और देशहित में उपलब्ध नहीं कराने का निर्णय लिया है।&lt;br /&gt;असांज की खुफियागिरी के तर्ज पर यदि आज की पत्रकारिता चली तो जासूसों की तो निकल पड़ेगी। मुझे यह जानकारी नहीं है कि कितने अखबार अपने यहां जासूसों की नियुक्ति किये हुए हैं। हाल में मीडिया द्वारा स्ट्रिंग आपरेशनों की जानकारी तो है किन्तु उसमें भी किसी ने किसी रूप में जनहित और नैतिकता के प्रश्न जुड़े होते हैं।&lt;br /&gt;अमरीका के खिलाफ खड़ी शक्तियों को लाभ पहुंचाने की गरज से गोपनीय दस्तावेजों के खुलासे के कारण जल्द ही उन लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी बाधित होगी जो किन्हीं नैतिक मूल्यों की लड़ाई इंटरनेट के जरिए लड़ रहे थे। यह भय है कि सस्ता, सुलभ और कारगर हथियार आम लोगों के हाथ से न निकल जाये। स्वाभाविक है कि जो देश इंटरनेट पर आ रही खबरों और विचारों के खुलेपन से अपने देश को बचाना चाहते थे वे लाभान्वित होंगे। ऐसे भी मुल्क हैं जहां अपने ही देश की विसंगतियों को अपने ही देश में अपने ही लोगों द्वारा अभिव्यक्ति करने पर जेल में डाल दिया जाता है, वहां इंटरनेट जैसे शक्तिशाली माध्यम सिरदर्द बना हुआ है। उन्हें इंटरनेट पर भावी पाबंदियों का लाभ मिलेगा।&lt;br /&gt;दरअसल इंटरनेट मीडिया के विस्तार के साथ ही उस पर सीमित अंकुश का तंत्र विकसित किया जाना चाहिए था तथा सूचनाओं के प्रसार की नैतिकता का विकास भी होना चाहिए था। इंटरनेट के दुरुपयोग के खिलाफ कारगर कानून भी बनने चाहिए थे जो नहीं हुआ और उसका नतीजा सामने है। विकीलीक्स को आज भले मीडिया तरजीह दे रहा हो किन्तु यह मीडिया के विनाश का कारण बन जायेगा। एक हैकर के कारनामों से भले ही किसी को लाभ हो मीडिया को चाहिए कि वह उसकी निन्दा करे और उसे नायक न बनने दे। कल को किसी देश के आम नागरिकों के बैंक खातों से लेकर तमाम गोपनीय जानकारियों को रातोंरात लीक कर कोई दुनिया को चौंका कर नायक बनने की कोशिश करेगा तो आप क्या करेंगे।&lt;br /&gt;वर्तमान घटना को अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले को रूप में देखा जाना चाहिए। यह किसी राष्ट्र की निजता पर आतंकी हमला है। और इससे जश्न मनाने वाले यह न भूलें कि उनकी निजता भी महफूज नहीं रह जायेगी। कोई भी उपलब्धि तभी उपलब्धि है जो उसे प्राप्त करने के साधन नैतिक हों। यदि गोपनीय सूचनाएं सेंधमारी या हैकिंग करके हासिल की गयी हैं किन्हीं मान्य तरीकों से नहीं तो उन सूचनाओं से चाहे जितने बेहतर नतीजे निकाल लें वह किसी भी प्रकार से मनुष्य जाति के लिए हितकारी नहीं होंगे।&lt;br /&gt;असांज का जीवन कोई आदर्श जीवन नहीं रहा है। कंप्यूर हैक करने की अपनी एक कोशिश के दौरान वह पकड़ा गया था। फिर भी उसने अपना काम और कंप्यूटर के क्षेत्र में अनुसंधान जारी रखा। उसका दावा है कि अपने स्रोतों को सुरक्षित रखने के लिए उसने अलग-अलग देशों से काम किया। अपने संसाधनों और टीमों को भी हम अलग-अलग जगह ले गया ताकि कानूनी रुप से सुरक्षित रह सके। वह आज तक न कोई केस हारा है न ही अपने किसी स्रोत को खोया है।&lt;br /&gt;उल्लेखनीय है कि विकीलीक्स की शुरुआत 2006 में हुई। असांज ने कंप्यूटर कोडिंग के कुछ सिद्धहस्त लोगों को अपने साथ जोड़ा। उनका मक़सद था एक ऐसी वेबसाइट बनाना जो उन दस्तावेज़ों को जारी करे जो कंप्यूटर हैक कर पाए गए हैं। भले यह कहा जा रहा है कि यह असांज के व्यक्तिगत प्रयासों को परिणाम है लेकिन इसमें किन्हीं देशों की बड़ी शक्तियों का हाथ होने की आशंका से इनकार नहीं किया जाना।&lt;br /&gt;विकीलीक्स खुलासों के आधार पर राजनीतिक और सामाजिक अध्ययन के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध हुई है इसमें कोई दो राय नहीं। उसके खुलासों से किसी देश की नीति और कूटनीति में कितना अन्तर है यह अध्ययन का विषय हो सकता है। नैतिकता की कितनी परतें होती हैं उसके रेशे रेशे को इन खुलासों ने जगजाहिर कर दिया है। लेकिन कोई भी उपलब्धि किस कीमत पर मिली है बिना इसका मूल्यांकन किये बिना हम नहीं रह सकते। दूसरे किसी भी बात के खुलासे के उद्देश्यों को जब तक सामने न रखा जाये हम यह नहीं कह सकते कि भला हुआ या बुरा। उद्देश्य की स्पष्टता के अभाव में केवल खुलासे का थ्रिल पैदा करना या अपनी हैकर प्रतिभा का प्रदर्शन मेरे खयाल से कोई महान कार्य नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-2592796932190168414?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/2592796932190168414/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/12/blog-post_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2592796932190168414'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2592796932190168414'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/12/blog-post_21.html' title='विकीलीक्सः सेंधमारों और हैकरों को हीरो न बनाये मीडिया'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TREASaHsqCI/AAAAAAAAA4M/DVmRVOYplRk/s72-c/ulian_assange.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-1412467362134051812</id><published>2010-12-05T11:30:00.001-08:00</published><updated>2010-12-06T11:37:38.742-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भाषा का क्रियोलीकरण'/><title type='text'>भाषा का क्रियोलीकरण और अखबारों की भूमिका</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TP06T-lsHdI/AAAAAAAAA38/palTcX8Ct_E/s1600/sanmarg.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 200px; height: 146px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TP06T-lsHdI/AAAAAAAAA38/palTcX8Ct_E/s200/sanmarg.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5547654430883323346" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;सन्मार्ग-6/12/2010&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TPvp1d2c2bI/AAAAAAAAA30/tfehBqpILAg/s1600/2.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 200px; height: 94px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TPvp1d2c2bI/AAAAAAAAA30/tfehBqpILAg/s200/2.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5547284470792247730" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TPvpJjH01CI/AAAAAAAAA3s/s8kDoobP-PE/s1600/1.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 200px; height: 96px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TPvpJjH01CI/AAAAAAAAA3s/s8kDoobP-PE/s200/1.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5547283716293055522" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span&gt;भाषा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;क्रियोलीकरण&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अखबारों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;भूमिका&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;' &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;विषय&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अपनी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;भाषा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;संस्था&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अपने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;दसवें&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;स्थापना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;दिवस&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;संगोष्ठी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; 4 &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;दिसम्बर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; 2010  &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;आयोजित&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;की।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;यह&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;भारतीय&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;भाषा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;परिषद&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभागार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अपराह्न&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; 3.30 &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;बजे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;शुरू&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;जिसकी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अध्यक्षता&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ललित&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;निबंधकार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;एवं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;पत्रकारिता&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ग्रंथ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;लिखने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;वाले&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;डॉ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;.&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कृष्णबिहारी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;मिश्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;की।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;विषय&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;प्रवर्तन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;संस्था&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;महासचिव&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;डॉ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ऋषिकेश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;राय&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;किया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;क्रियोल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;तथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;क्रियोलीकरण&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अर्थ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;लोगों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;परिचित&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कराया।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कार्यक्रम&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;संचालन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;डॉ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;.&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;विवेक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कुमार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सिंह&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;किया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;धन्यवाद&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ज्ञापन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;किया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;डॉ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;.&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;वसुमति&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;डागा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ने।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;वक्ता&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;थे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ताजा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;टीवी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;व&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;छपते&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;छपते&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;दैनिक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;मालिक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;व&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सम्पादक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;विश्वंभर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;नेवर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;जनसंसार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;साप्ताहिक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सम्पादक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;गीतेश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;शर्मा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;,  &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;हैदराबाद&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;केन्द्रीय&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;विश्वविद्यालय&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;हिन्दी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;विभाग&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;रीडर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;डॉ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;आलोक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;पाण्डेय&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;तथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सन्मार्ग&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;दैनिक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;वरिष्ठ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;उपसम्पादक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;डॉ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;.&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अभिज्ञात ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;कुछ तथ्य&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;क्रियोल भाषा क्या है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक क्रियोल या खिचड़ी भाषा, वो स्थिर भाषा होती है जिसका प्रादुर्भाव विभिन्न भाषाओं के मिश्रण से होता है। आमतौर पर एक क्रियोल भाषा के शब्द मूल भाषाओं से सहार्थी होते हैं, लेकिन कई बार मूल भाषा और खिचड़ी भाषा के शब्दों में ध्वन्यात्मक और अर्थ संबंधी एक स्पष्ट परिवर्तन देखा जा सकता है। अब इस बात की आशंका जतायी जा रही है कि हिन्दी का हिंग्लिश बनाना एक तरह से उसका क्रियोलीकरण करना है। और कांट्रा-ग्रेजुअलिज्म के हथकंडों से, बाद में उसे डि-क्रियोल किया जायेगा। डिक्रियोल करने का अर्थ, उसे पूरी तरह अँग्रेज़ी के द्वारा विस्थापित कर देना।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(204, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;भारत और क्रियोलीकरण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भारत में नगालैंड की 18 बोलियों को मिला कर जो सम्पर्क भाषा बनायी गयी है उसे नगमीज कहते हैं। वह अपने देश की हाल ही में बनी क्रियोल भाषा है जिसकी लिपि रोमन है। कोंकणी को भी रोमन लिपि में लिखे जाने की निर्णय लिया गया है। वहां पुर्जगीज और कोंकणी भाषा का क्रियोल है। गुयाना में 43 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते हैं वहां देवनागरी की जगह रोमन लिपि को चलाया गया है।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;कहां बोली जाती है क्रियोल भाषा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हैतियाई क्रियोल भाषा, हैती में तकरीबन पूरी जनसंख्या ८० लाख  लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। इसके अलावा बहामास, क्यूबा, कनाडा, केमन द्वीप-समूह, डोमिनिकन गणराज्य, फ्रेंच गुयाना, गुआदेलूप, प्युर्तो रिको और संयुक्त राज्य अमेरिका में बसे करीबन दस लाख प्रवासी लोगों द्वारा बोली जाती है। यह भाषा दुनिया में सर्वाधिक प्रचलित क्रियोल भाषा है।&lt;br /&gt;हिन्दी का हिंग्लिश बनाना उसका वैसा ही क्रियोलीकरण है, जैसा पहले फ्रांस या इंगलैंड का उपनिवेश रह चुके कैरेबियाई देशों भाषाएं हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;डॉ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;.&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;अभिज्ञात का &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255); font-weight: bold;"&gt;मतः&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भारत जैसे देश में क्रियोलीकरण का हव्वा खड़ा किया जा रहा है और वस्तुस्थिति को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जा रहा है। हिन्दी अख़बारों में लाइफ स्टाइल या यूथ प्लस के नाम पर फ़ीचर सप्लीमेंट दिये जा रहे हैं उनमें हिंगलिश अर्थात हिन्दी अंग्रेजी की खिचड़ी भाषा दी जा रही है तो इसका मतलब इस बात नहीं निकाला जाना चाहिए कि अख़बार उसी भाषा की दिशा में बढ़ रहा है या यह अंग्रेजी के साम्राज्यवाद का बढ़ावा देने के लिए किसी षड़यंत्र के तहत किया जा रहा है। यह उस युवा पीढ़ी को हिन्दी अख़बार से जोड़ने का उपक्रम है जो हिन्दी भाषी परिवारों में अंग्रेजी पढ़ने वाले युवा हैं। हिन्दी अख़बार दरअसल किसी घर में व्यक्ति विशेष के लिए नहीं आते। दैनिक हिन्दी अखबार पूरे परिवार द्वारा पढ़ा जाता है जिसमें हर आयु व रुचि के लोग होते हैं। यदि उसमें गंभीर समाचार होते हैं तो विश्लेषण परक लेख भी होते हैं। उसी तरह किसी सप्लीमेंट में लतीफे और कविताएं भी होती हैं और कहानिया तथा&lt;br /&gt;सुडोकू भी। पकवान की विधि भी होती है और राशिफल भी। शेयर के रेट भी होते हैं। बच्चों के लिए रंग भरने के लिए चित्र भी होते हैं। अब यदि युवा पीढ़ी के लिए अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी का सप्लीमेंट युवाओं के टेस्ट को ध्यान में रखकर निकलने लगा तो हाय तौबा मच गयी। और कहा जा रहा है कि साहब यह तो हिन्दी का क्रियोलीकरण किया जा रहा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि  एक मिथ्या 'यूथ-कल्चर' बनाया जा रहा है जिनका कुल मकसद अंग्रेजी भाषा तथा जीवन शैली को उन्माद की तरह उनसे जोड़ा जाये जिसमें भाषा, भूषा और भोजन के स्तर पर वह अंग्रेजी के नये उपनिवेश के शिकंजे में आ जाये। वह परम्परच्युत हो जाये और अपनी-अपनी मातृभाषा को न केवल हेय समझने लगे। इससे पूरी की पूरी युवा पीढ़ी से उसकी भाषा छीन ली जायेगी। हिन्दी का हिंग्लिश बनाना उसका वैसा ही क्रियोलीकरण है, जैसा पहले फ्रांस या इंगलैंड का उपनिवेश रह चुके कैरेबियाई देशों की भाषाएं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां यह गौरतलब है कि जिन देशों में जिन स्थितियों में भाषाओं का क्रियोलीकरण संभव है वैसे हालत फिलवक्त भारत के नहीं हैं। यह भी सही है बाजार के कारण दो भाषाओं के बीच के आदान-प्रदान से भाषा का जो क्रियोलीकरण होता है उसकी जड़ें गहरी नहीं होतीं उस भाषा में साहित्य संस्कृति जैसे मुद्दों पर विचार संभव नहीं। किन्तु यह नहीं भूलना होगा कि भारत में ऊर्दू भाषा फारसी खड़ी बोली के क्रियोल का ही उदाहरण है। और किन्हीं अर्थों में अपनी यह हिन्दी भी खड़ी बोली, भोजपुरी, ब्रजभाषा अवधी जैसी बोलियां का क्रियोल हैं। भारत में विभिन्न भाषाओं और धर्मों के लोग रहते हैं उनके बीच के सांस्कृतिक आदान प्रदान में दरअसल क्रियोल ही है। हमारा देश क्रियोलीकरण की शक्ति का परिचायक है।&lt;br /&gt;हमारे बीच क्रियोलीकरण के मुद्दे विद्वेषपूर्ण ढंग से प्रचारित करने की साजिश क्यों और किससे इशारे पर की जा रही है इस पर भी गौर करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार के उदाहरण देकर क्रियोलीकरण की प्रक्रिया को समझाया जा रहा उससे यह प्रवृत्ति जोर पकड़ेगी की हमें अपनी भाषा और संस्कृति में दूसरी भाषा व संस्कृति के दरवाज़े बंद कर लेने हैं या उन्हें खोज खोज कर बाहर का रास्ता दिखाकर शुद्धिकरण करना है तो पूरा देश सांस्कृतिक वैमनस्य में जलने लगेगा। इस आग लगाने की साजिश से भी सावधान रहने की ज़रूरत है। यह गौरतलब है कि क्रियोलीकरण से सजग करने वाले हमारे हितैषियों का मुख्य लक्ष्य भारतीय भाषाओं का अंग्रेजी के साथ क्रियोलीकरण के खिलाफ है। जब क्रियोलीकरण खतरनाक है तो चाहे जिसके किसी के बीच हो वह समान रूप से खतरनाक होगा ऐसा क्यों नहीं कहा जा रहा है। उसका कारण साजिशकर्ता शक्तियों के अपने हित हैं। ये साजिशकर्ता हमें यह याद दिलाना नहीं भूलते कि हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत ही अंग्रेजी को भारत से खदेड़ने की प्रतिबद्धता से हुई थी। वे यह भूल जाते हैं कि उसे समय हमारा देश अंग्रेजी शासन का गुलाम था और अंग्रेजी हम पर हुकूमत करने वालों की भाषा थी इसलिए हुक्मरानों की भाषा का तिरस्कार भी हुक्मरान का तिरस्कार था। वरना अंग्रेजी भाषा से किसी का क्या विरोध होता और क्यों होता। किन्तु आज स्वतंत्र भारत में हम पर हुकूमत करने वालों की भाषा नहीं है बल्कि वह मित्र राष्ट्र की भाषा है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हाल ही भारत दौरा किया है और हमारे मैत्रिपूर्ण सम्बंध और गहराये हैं जो परमाणु समझौते से शुरू हुए थे। भारत और अमरीकी की बढ़ती करीबी एक ऐसे देश को खल रही है जो भारत के समान ही विश्व की उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा रहा है। भारत और चीन दोनों के पास बाजार की विपुल संभावनाएं हैं और विश्व के सर्वशक्तिमान देश स्वयं अमरीका ने स्वीकार किया है कि आने वाले दिनों में चीन और भारत की ऐसे देश हैं जिनसे उसे कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में अमरीका की भारत के साथ करीबी चीन की अपनी कूटनीति के विरोध में जाती है और जवाब में वह हमारे पड़ोसी शत्रुराष्ट्र पाकिस्तान के साथ अपनी करीबी बढ़ाता रहता है। यह स्वाभाविक है कि वह ऐसी चालें चले जिससे भारत के लोग अमरीका से भड़कें।&lt;br /&gt;हाल की ओमाबा की यात्रा के बाद आर्थिक लेन देन और व्यापार की बढ़ती सम्भावनाएं दोनों देशों को सांस्कृतिक स्तर पर भी करीब लायेंगी। ऐसे में अंग्रेजी और रोमन लिपि के प्रति भारतीय लोगों के मन में आशंका के बीज रोपने की साजिश चीन करें तो इसमे कोई हैरत नहीं। इससे एक पंथ दो काज संभव है एक रोमन लिपि के प्रति विद्वेष की भावना पैदा कर दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक करीबी की संभावनाओं को क्षीण करना दूसरे आवश्यकनासुर भारत को भाषाई और सांस्कृतिक वैमनस्य की आग में झोंककर उसकी आंतरिक शक्ति को विखंडित करना। भारत चूंकि साझी संस्कृति का देश है इसलिए सांस्कृतिक अलगाव और संकीर्णता उसके विकास को आसानी से अवरुद्ध कर सकता है। अभी तो भाषा के क्रियोलीणकर का खतरा दिखाया जा रहा है बाद में सांस्कृतिक क्रियोलीकरण तक बात पहुंचेगी और साजिश के तहत इस बात की गणना करायी जाने लगेगी कि भारत की किस भाषा में भारत की ही किस भाषा के कितने शब्द हैं और इससे कैसे एक भारतीय मूल भाषा भाषा ने दूसरी भाऱतीय मूल भाषा को विकृत किया है। हमारी शक्तियों को हमारी विकृति की संज्ञा दी जाने लगेगी और हमारे अवचेतन में उसे बैठा दिया जायेगा। इसलिए दोस्तो यह समझने की जरूरत है कि कहीं चोर दरवाज़े से हमारे को तोड़ने की साजिश तो नहीं रची जा रही है। पहला हमला चौथे स्तम्भ पर किया गया है। और जो देश को तोड़ने वाली ताकतों की शिनाख्त करता है उस मीडिया पर ही अपना निशाना साधा गया है ताकि वह बचाव मुद्रा में रहे और उसे भाषा व संस्कृति की चिन्ता करने वाले प्रबुद्ध वर्ग का भी समर्थन प्राप्त हो सके। प्रबुद्ध वर्ग को यह समझाना बहुत आसान है कि अखबार भाषाई विकृति फैला रहे हैं। लेकिन आरोप लगाने वालों को इरादे कितने संगीन हैं इस पर भी बौद्धिक लोगों को गौर करना पड़ेगा वरना वह दिन दूर नहीं जब क्रियोलीकरण का खतरा दिखाकर देश को परस्पर वैमनस्य की आग में झोंक दिया जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार क्रियोल भाषा का संकट वहां का संकट है जहां प्रवासी लोग रहते हैं। वह भी वे प्रवासी जो अपनी जड़ों से किसी हद तक कट चुके हों। और दो या विभिन्न भाषा से जुड़े लोगों का लगातार सम्पर्क बनता है।&lt;br /&gt;इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को हम मुगलकालीन परिस्थियों में देखते हैं तो पाते हैं कि फारसी और खड़ी बोली हिन्दी के क्रियोल से हमारे यहां दो नयी भाषाओं ने जन्म लिया। फारसी व्याकरण व शब्दों व खड़ी बोली से उर्दू बनी और खड़ी बोली और संस्कृत व्याकरण से हिन्दी। कहना न होगा कि आज की जो हिन्दी है वह किसी हद तक क्रियोल ही है। जिसमें भोजपुरी, मगही,  ब्रज भाषा,  राजस्थानी, हरियाणवी आदि के शब्द मिले हुए हैं और मराठी, गुजराती,  पंजाबी आदि के भी कई शब्द हैं।&lt;br /&gt;यहां देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने वाले हिन्दी भाषी लोग वहां की भाषा के शब्दों को भी हिन्दी में समाहित कर लेते हैं। और हिन्दी के शब्द वहां की भाषा को दे देते हैं। यहां कई बंगला के शब्दों को हम धड़ल्ले से हिन्दी में भी प्रयोग कर लेते हैं। साहित्य की दुनिया में भले ऐसे प्रयोग कम हों लेकिन बोलचाल वाले इससे कतई परहेज नहीं करते। बंगला वाले भी हमारी भोजपुरी के शब्दों के अपनाते हैं। हमारा देश मिली जुली संस्कृतियों और कई भाषाओं का देश है। और यहां की भाषा पर दूसरी भाषाएं भी स्वाभाविक तौर पर प्रभाव डाल सकती हैं तो इसे हम अपनी खूबी मानते हैं।&lt;br /&gt;ध्यान रहे कि क्रियोल के बहाने भाषा के नाम पर फसाद की तैयारी चल रही है। क्या हम भाषा के नाम पर सिरे से फसाद को तैयार हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज हम यह कहकर विरोध शुरू करें कि अंग्रेजी के शब्द हिन्दी को भ्रष्ट कर रहे हैं और कल कहें कि हमारी हिन्दी को बंगला भ्रष्ट कर रही है और बंगला कहे कि हमारे शब्दों को हिन्दी डस रही है। यदि हम अंग्रेजी के प्रयोग को उसका साम्राज्यवादी ढर्रा कहेंगे तो कल को हिन्दी पर भी हमारे देश की दूसरी भाषाएं ऐसा आरोप लगा सकती हैं। भाषाओं पर बांध बनाकर ऊर्जा पैदा नहीं की जा सकती। भाषा प्रवाह का नाम है। प्रयोग ही भाषा को जीवंतता प्रदान करता है। भाषा अपने पाठक खोकर अपना शुद्ध रूप भले बचा ले लेकिन जो भाषा को अपनी अस्मिता का प्रश्न नहीं मानते बल्कि स्वयं की अभिव्यक्ति का साधन मानते हैं वे आवश्यकता के अनुसार भाषा को बदलेंगे तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता। क्या हम चाहकर भी आज पत्र लेखन को बचा पाये। नहीं। टेलीफोन के प्रचार प्रसार ने उसे खतरे में डाल दिया है। ईमेल और एसएमएस ने इसमें योगदान किया। हम खतों को बचाने के लिए लोगों के हाथ से टेलिफोन, ईमेल, एसएमएस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। जो इनसे बचेंगे वे स्वयं दरकिनार कर दिये जायेंगे।&lt;br /&gt;पाण्डुलिपियां खतरे में हैं। आज लेखक सीधे कम्प्यूटर पर लिख रहे हैं। वह सुविधाजनक हो गया है। अब हाथ से लिखने में दिक्कत हो रही है। हस्ताक्षर के अलावा लिखित प्रयोग कम ही बचे हैं। हस्तलिपियां खतरे में हैं। शिलालेखों और ताम्रपत्रों पर लेखन जैसे खत्म हो गया संभव हैं आज लिखने का ढर्रा भी लुप्त हो जाये। अभिव्यक्ति के तरीके बदलेंगे। भाषा बदलेगी। अंदाज बदलेगा। तालमेल बिठाना होगा। क्रियोल की समस्या प्रवासी समुदायों की समस्या है। हमारे देश में यदि विभिन्न भाषाओं के लोग आयेंगे हमारा सम्पर्क होता तो भाषा का क्रियोलीकरण संभव है। हम दूसरे देश में जायेंगे तो यही होगा। यह मुल्क प्रवासी नहीं होने जा रहा। हमारी जड़ें गहरी हैं। दूसरे देश की समस्या को अपने यहां लागू करने का कोई अर्थ नहीं है।&lt;br /&gt;मिश्रित भाषा में कुछ सफे अखबार दे रहे हैं कुछ पत्रिकाएं भी संभव है आयें। लेकिन वे गहरे सरोकारों वाली पत्रिकाएं नहीं हैं। वे लाइफ स्टाइल से जुड़ी होती हैं या उन बच्चों युवाओं को सम्बोधित होती हैं तो अंग्रेजी पढ़े लिखे हैं। कोई अखबार हर तरह के पाठक को बांधे रखना चाहता है या जुड़ना चाहता है तो इसके लिए इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं। यह प्रयोग बहुत सफल नहीं होंगे क्योंकि क्रियोल भाषा के लिए दोनों भाषाओं की जानकारी आवश्यक है। लेकिन प्रयोग का होना गलत नहीं है। कोई अखबार लतीफे भी छापता है तो वह पूरा अखबार लतीफा नहीं बनाना चाहता। विविधता अखबार में होती है होनी भी चाहिए।&lt;br /&gt;यह शिगूफा हिन्दी में कहां से आया&lt;br /&gt;यह इंदौरियन्स की करतूत है। 14 सितम्बर 2010 को हिन्दी दिवस के अवसर पर सबसे पहले विरोध का श्रीगणेश किया इन्दौर के बुद्धिजीवियों ने। समाजवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी, कथाकार चित्रकार प्रभु जोशी एंड कम्पनी ने यह हव्वा खड़ा किया है। उसका कोई मतलब नहीं है।  अखबार की कापियां जलाने से बदलाव नहीं आने जा रहा है।&lt;br /&gt;चीन की मंदारिन भाषा के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अधिक बोली जाने वाली हिन्दी भाषा को खत्म करने की कोशिशें कोई कर ले। इससे कुछ होना नहीं है।&lt;br /&gt;'क्रियोलीकरण' एक ऐसी युक्ति है, जिसके जरिये धीरे-धीरे खामोशी से भाषा का ऐसे खत्म किया जाता है कि उसके बोलने वाले को पता ही नहीं लगता है कि यह सामान्य और सहज प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुनियोजित षडयंत्र है।&lt;br /&gt;यह कहना गलत है कि उसके पीछे अंग्रेजी भाषा का साम्राज्यवादी एजेण्डा है। अंग्रेजी तो भारत में हिन्दी और भारतीय भाषाओं की जूतियां उठाने आ रही है। अंग्रेजी जानने वालों यहां धंधा करना है तो ग्राहक की भाषा में बात करनी होगी। अंग्रेजी बोलकर वे अपना माल नहीं बेच पायेंगे। ओबामा आये थे हमारे यहां अपने लोगों के लिए काम मांगने। वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। चीन और भारत के आगे पानी भरेगी अंग्रेजी रानी। हिन्दी में अग्रेजी शब्द आने से हमें चिन्ता नहीं है। हिन्दी सब हजम कर जायेगी। हिन्दी ने अंग्रेजी को अपनी शर्तों पर अपनाया है और अपनायेगी। वे हमारी हिन्दी का खराब करेंगे हम उनकी अंग्रेजी को लालू की स्टाइल में बोलउसकी ऐसा तैसी कर देंगे। हिन्दलिश से न डरे। अर्ध शिक्षित व नव धनाढ्यों की चाल लड़खड़ाती ही है। इनसे किसी को खतरा नहीं होता। ऐसे लोग आते जाते रहते हैं। ये दिखावटी लोग सब कुछ होने के फेर में कुछ नहीं होते और किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करते। बाजार के लिए ये लोग सबसे मुफीद होते हैं इन्हें बाजार दूहता है। बाजार से न डरें। बाजार से तरक्की होती है। जिसका बाजार नहीं रहता वह लुप्त हो जाता है चाहे वह कोई सम्पदा हो।&lt;br /&gt;देश में 14 सितम्बर 2010 को हिन्दी दिवस के अवसर पर सबसे पहले विरोध का श्रीगणेश किया इन्दौर के बुद्धिजीवियों समाजवादी चिंतक अनिल त्रिवेदी और कवि तपन भट्टाचार्य, प्रभु जोशी, जीवन सिंह ठाकुर, प्रकाश कांत शामिल हुए। इनका कहना है-'भूमण्डलीकरण के सबसे बड़े हथियार 'अंग्रेजी के नवसाम्राज्यवाद' का स्वागत जितने अधिक उत्साह से हमारे प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने किया, उसके पहले तमाम भारतीय भाषाओं, जिन्हें अंग्रेज नॉन-स्टेडर्ण्ड और वर्नाकुलर लैंग्विज कह के निरादृत करते थे-उनको नष्ट करने की खामोशी से की गई साजिश का नाम है - भाषा का 'क्रियोलीकरण' जिसके अंतर्गत हिन्दी में 'शामिल शब्दावलि' की आड़ में अंग्रेजी के शब्दों की धीरे-धीरे इतनी तादाद बढ़ाई जा रही थी कि वह हिन्दी न रह कर 'हिंग्लिश' होने लगी। 'क्रियोलीकरण' की प्रक्रिया का पहला चरण होता है, मूल भाषा के शब्दों का धीरे-धीरे अंग्रेजी के शब्दों से विस्थापन। हिन्दी के दैनंदिन शब्दों को बहुत तेजी से हटाकर उनके स्थान पर अंग्रेजी के शब्द लाये जा रहे हैं। मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेण्ट्स/ माता-पिता की जगह पेरेण्ट्स/ अध्यापक की जगह टीचर्स/ विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी/ परीक्षा की जगह एक्झाम/ अवसर की जगह अपार्चुनिटी/ प्रवेश की जगह इण्ट्रेन्स/ संस्थान की जगह इंस्टीटयूशन/ चौराहे की जगह स्क्वायर रविवार-सोमवार की जगह सण्डे-मण्डे/ भारत की जगह इण्डिया। इसके साथ ही साथ पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिन्दी की बजाय अंग्रेजी के छपना/ जैसे आऊट ऑफ रीच, बियाण्ड एप्रोच, मॉरली लोडेड कमिंग जनरेशन/ डिसीजन मेकिंग/ रिजल्ट ओरियण्टेड प्रोग्राम/हिन्दी को देवनागरी के बजाय रोमन में छापना शुरू कर दीजिये। बीसवीं शताब्दी में सारी अफ्रीकी भाषाओं को अंग्रेजी क सम्राज्यवादी आयोजना के तरह इसी तरह खत्म किया गया और अब बारी भारतीय भाषाओं की है। इसलिए, 'हिन्दी हिंग्लिश', 'बांग्ला', 'बांग्लिश', 'तमिल', 'तमिलिश' की जा रही है। हम यह प्रतिरोध हिन्दी के साथ ही साथ तमाम भारतीय भाषाओं के 'क्रिओलीकरण' के विरूध्द है, जिसमें, गुजराती-मराठी, कन्नड़, उडिय़ा, असममिया, सभी भाषाएँ शामिल हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के धूर्त दलालों के दिशा निर्देश में संसार की इस दूसरी बड़ी बोले जाने वाली भाषा से उसकी लिपि छीन कर, उसे रोमन लिपि थमाने की दिशा में हिन्दी के कई अखबार जुट गए हैं।'&lt;br /&gt;क्या आप इंदौरियंस से सहमत हैं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-1412467362134051812?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/1412467362134051812/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/12/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1412467362134051812'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1412467362134051812'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='भाषा का क्रियोलीकरण और अखबारों की भूमिका'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TP06T-lsHdI/AAAAAAAAA38/palTcX8Ct_E/s72-c/sanmarg.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-2171859080512458362</id><published>2010-11-18T06:45:00.000-08:00</published><updated>2010-11-18T06:46:51.063-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पत्रकारिता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डॉ.अभिज्ञात'/><title type='text'>पत्रकारिता की रीढ़ होते हैं सवाल</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(204, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;(एक कालेज में पत्रकारिता की क्लास लेने का आफर मिला। पढ़ाने का कभी न तो सोचा था न अवसर मिला। झिझक थी कि कहीं ऐसा न हो मुद्दे से बहक जाऊं। सो एक खाका तैयार कर लिया। यह बात दीगर है डेढ़ घंटे आसानी से बीत गये यह नोट देखने की जरूरत नहींं पड़ी। वह नोट आपसे शेयर कर रहा हूं।)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सवाल पूछना दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है क्योंकि सही सवाल समस्या के निदान की पहली कड़ी है या कहें कि आधा जवाब है। आदमी की पहचान उसके सवालों से की जा सकती है। और किसी भी समाज के अध्ययन के लिए उस दौर के सवालों को देखा जाना चाहिए कि वह दौर किन सवालों से जूझ रहा था। सवाल ही उस दौर की समस्याओं को नहीं दर्शाता बल्कि यह भी बतलाता है कि लोग उससे जूझने के लिए किन विकल्पों पर विचार कर रहे थे। इसलिए किसी की बौद्धिकता को कुंद करना है तो सवाल की इजाजत न दें। कुछ दिन में प्रश्न उठना बंद हो जायेगा।&lt;br /&gt;पत्रकारिता में सबसे अहम कड़ी होती है सवालों की। क्या, कब, क्यों, कहां, कैसे आदि पांच सवालों पर पत्रकारिता की बुनियाद टिकी हुई है और यह दृढ़ता से माना जाता है कि कोई समाचार यदि इन पांच सवालों से नहीं जूझता है तो उसमें कमी है। हिन्दी पत्रकारिता में इंट्रो में इन पांचों का होना लगभग अनिवार्य माना जाता है। ताकि शुरुआती दो तीन पंक्तियां पढ़कर ही पाठक को संक्षेप में घटना का पता चल जाये। जरूरी पांच प्रश्नों का मामला दरअसल हार्ड न्यूज से जुड़ा हुआ है फिर भी प्रश्नों की उपयोगिता दूसरे आलेखों में कम नहीं है। आज की पत्रकारिता में फीचर या आलेखों का महत्व दिनों दिन बढ़ता जा रहा है जिसमें सवाल प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसमें केवल उन्हीं पांच सवालों से काम नहीं चलता है। इसमें जिस पत्रकार, साक्षात्कारकर्ता या आलेख के लेखक के पास जितने अधिक सवाल होंगे वह उतना ही कामयाब होगा। क्योंकि वस्तुस्थिति और बहुआयामी संभावना से पाठकों को परिचित करना पत्रकारिता के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है।&lt;br /&gt;अधिक सवाल का आशय यहां इस बात से कतई नहीं है कि प्रश्न उलजुलूल हों। प्रश्न का उत्तर देने वाले से गहरा ताल्लुक होना अनिवार्य है या फिर आप जिस मुद्दे पर उसकी प्रतिक्रिया चाहते हैं वह उसे उजागर करने में अपनी भूमिका निभाये।&lt;br /&gt;किसी का साक्षात्कार करने के पूर्व इंटरव्यू देने वाले के अध्ययन, पद, कार्य अनुभव आदि की जानकारी पहले ही प्राप्त कर लेना सहायक होता है ताकि असम्बंध प्रश्न पूछने के बाद झेंप का सामना न करना पड़े। किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से वे सवाल नहीं पूछने चाहिए जो जगजाहिर हों। उनसे नयी योजनाओं के बारे में पूछा जा सकता है। उसने पिछले कार्यों से क्या सीखा यह जाना जा सकता है। बड़े बड़े लोगों की छोटी छोटी बातें भी लोग पढऩा पसंद करते हैं कि इसलिए उनसे मामूली बातें भी पूछी जा सकती हैं बशर्ते असम्बद्ध न हों। यहां यह गौरतलब है कि पहले से तैयार प्रश्नावली किसी हद तक ही इंटरव्यू लेने में सहायक होती है। मिले हुए जवाबों में भी सवाल निकलते हैं जो इस कला को महत्व देगा उसका इंटरव्यू और अच्छा होगा। किसी विशेषीकृत विषय पर प्रश्न पूछते समय इस विषय के प्रचलित शब्दों के अर्थ मालूम होना चाहिए। हर क्षेत्र विशेष में कुछ खास शब्द प्रचलित होते हैं जिनका सामान्य अर्थ निकलने पर गलती हो जाती है। उनके पारिभाषिक अर्थ होते हैं। विषय की गहरी जानकारी न होने पर उन शब्दों से बचना चाहिए। या फिर जानते हैं तो वह बातचीत में अधिक सहायक होते हैं।&lt;br /&gt;विषय पर गहरे प्रश्न ही पूछे जायें ऐसा नहीं है। जिस मीडिया से लिए साक्षात्कार लिया जा रहा है उसकी आवश्यकता को समझते हुए कुछ रोचक सवाल भी पूछे जाने चाहिए ताकि इंटरव्यू पढऩे वाले को वह सरस लगे। किसी के कहे शब्दों को तोड़ मरोड़ कर पेश नहीं करना चाहिए वरना सभी पक्षों के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। यह जरूर है कि आप चाहें तो इंटरव्यू देने वाले को बातों में उलझाकर वह बातें उसी के मुंह से कहलवा लें जिस कहने से वह बचना चाहता है। आपके इंटरव्यू को चॢचत कर दे। ऐसे प्रश्नों के मामूली ढंग से पूछें ताकि उत्तर देने वाला चौकस न हो जाये। इंटरव्यू लेने के पूर्व थोड़ी देर इधर उधर की हल्की फुल्की बातें करें जिससे आपके साथ उत्तर देने वाले का तालमेल बन जाये। यह तालमेल भरा रिश्ता इंटरव्यू के समय काम आयेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-2171859080512458362?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/2171859080512458362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/11/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2171859080512458362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2171859080512458362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='पत्रकारिता की रीढ़ होते हैं सवाल'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-6245890903698476947</id><published>2010-10-08T22:58:00.000-07:00</published><updated>2010-10-10T00:28:58.060-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिनकर कुमार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चांदनी रात का घाट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अभिज्ञात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुपमा बसुमतारी'/><title type='text'>दिल को छूती उदासी</title><content type='html'>sanmarg 10/10/2010&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TLFrIERpNTI/AAAAAAAAA1w/ZXSCtuihVjI/s1600/s.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 170px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TLFrIERpNTI/AAAAAAAAA1w/ZXSCtuihVjI/s200/s.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5526316004091180338" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TLFrHh3gKdI/AAAAAAAAA1o/6C2Fe1CcKEo/s1600/c.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 113px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TLFrHh3gKdI/AAAAAAAAA1o/6C2Fe1CcKEo/s200/c.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5526315994854730194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चांदनी रात का घाट/लेखिका-अनुपमा बसुमतारी/असमिया से हिन्दी अनुवाद-दिनकर कुमार/प्रकाशक-बुक फैक्ट्री, पूर्वांचल प्रिंट्स, उलुबाड़ी, गुवाहाटी/मूल्य-100 रुपये। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;समकालीन असमिया कविता को जो लोग नया रूपाकार देने में जुटे हैं उनमें एक महत्वपूर्ण नाम अनुपमा बसुमतारी का भी है। असम की आंचलिक विशिष्टताओं को, उसके वैभव और सौन्दर्य के साथ अपनी कविताओं में उन्होंने व्यक्त किया है। इनमें कवयित्री के निजी संदर्भ भी शामिल हैं जिसके कारण इस संग्रह की कविताएं एक ऐसे अनुभव जगत का साबका पाठकों से कराती हैं जो सम्मोहक भी और विश्वसनीय भी। कैंसर से पीडित बहन, पिता, दादी, तेजी ग्रोवर इन कविताओं में निजी संदर्भों और बिम्बों के साथ उपस्थित हैं और एक अनाम व्यक्ति जिसकी चाहत इन कविताओं में बार- बार झांकती है और जिसके बिछोह के कारण एक अकेलापन भी इन कविताओं में है, जो पाठक को उदास करता रहता है। एक कविता में उसकी बानगी देखें-'मैं अब सागर से अधिक मरुभूमि को चाहती हूं/ चांदनी से अधिक चाहती हूं धूप में दमक रहे बालू के स्तूप को/रोशनी से अधिक अंधेरा और आनंद से अधिक विषाद।' इन कविताओं में समुद्र और नदी की लगातार उपस्थिति है और उदासी और कविता की गहराई को और गहरा करते हैं। यह कविताएं पाठक के मन में अपनी एक खास जगह बनाने में कामयाब हैं। &lt;br /&gt;नारी अस्मिता से जुड़े सवालों के कारण यह कविताओं को वैचारिक स्तर भी हमें प्रभावित उद्वेलित करती हैं। &lt;br /&gt;अनुपमा की छह कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं तथा दो दशकों के अपने लेखकीय जीवन में तमाम पत्र पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। यह पुस्तक उनकी प्रतिनिधि रचनाओं का एक ऐसा संकलन है जिसमें उनकी काव्य प्रतिभा की समग्रता का एहसास कराता है। कवयित्री के लिए कविता अमृत स्वर है। &lt;br /&gt;इन कविताओं का अनुवाद दिनकर कुमार ने किया है, जो स्वयं एक समर्थ रचनाकार हैं साथ ही साथ असमिया से हिन्दी के एक विख्यात अनुवादक भी हैं। उन्होंने लगभग चालीस पुस्तकों का अनुवाद किया है। इस संग्रह के अनुवाद में उन्होंने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि कविताएं अर्थ को तो व्यक्त करें पर असम की मिट्टी की खुशबू भी उसमें बची रहे। साथ ही वह कहने का अन्दाज भी जो किसी कवि को दूसरे अलग और विशिष्ट बनाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-6245890903698476947?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/6245890903698476947/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6245890903698476947'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6245890903698476947'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='दिल को छूती उदासी'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TLFrIERpNTI/AAAAAAAAA1w/ZXSCtuihVjI/s72-c/s.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-215185515710218490</id><published>2010-09-23T06:55:00.000-07:00</published><updated>2010-09-26T01:19:13.661-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विजय बहादुर सिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तुम जो सचमुच भारत भाग्य विधाता हो'/><title type='text'>युवाओं को दायित्वबोध के प्रति जाग्रत करती कविता</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJ8BvPqt0uI/AAAAAAAAA1g/fA9Om-WE8kE/s1600/san-sami.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 68px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJ8BvPqt0uI/AAAAAAAAA1g/fA9Om-WE8kE/s200/san-sami.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5521133579350692578" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJ8Bu02am1I/AAAAAAAAA1Y/AFmDt2lK12g/s1600/sami-image.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 137px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJ8Bu02am1I/AAAAAAAAA1Y/AFmDt2lK12g/s200/sami-image.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5521133572152007506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तुम जो सचमुच भारत भाग्य विधाता हो/लेखक-विजय बहादुर सिंह/प्रकाशक-सदीनामा प्रकाशन, एच-5, गवर्नमेंट क्वार्टर्स, बजबज, कोलकाता-700137/मूल्य-70 रुपये&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रख्यात आलोचक-कवि विजय बहादुर सिंह की लम्बी कविता पुस्तक 'तुम जो सचमुच भारत भाग्य विधाता हो' हिन्दी कविता की एक विलक्षण कविता है जिसमें अपने देश की तल्ख स्थितियों की बेबाक अभिव्यक्त है। इस कविता में जहां व्यंग्य और कटाक्ष हैं वहीं आह्वान भी स्थितियों को बदलने का। अपनी अभिव्यक्त शैली और कहन के अन्दाज के कारण यह कविता जहां धूमिल की कविताओं के करीब है वहीं चिन्ताओं के कारण वह मुक्तिबोध की 'अंधेरे मेंÓ की काव्य विरासत को आगे बढ़ाती है। रमेश कुंतल मेघ इसे राजकमल चौधरी की मुक्तिप्रसंग, राजीव सक्सेना की आत्मनिर्वासन के विरुद्ध तथा धूमिल की पटकथा कविता के क्रम की एक कड़ी के रूप में देखते हैं। &lt;br /&gt;इस कविता में जहां अपनी विरासत से जुड़े राम, कृष्ण हैं वहीं विरासत को बचाने की चिन्ता में जीने- मरने वाले गांधी जी, मंगल पाण्डे, बिस्मिल, भगत सिंह जैसे लोगों के अवदान को याद करते हुए उनसे हालत में बदलने की शक्ति अॢजत करने का आह्वान है। युवाओं के प्रति जो आस्था इस कविता में व्यक्त की गयी है वह आकृष्ट करती है। यह कविता उन्हें झकझोरती है और उनके दायित्व का उन्हें बोध कराती है-'किसी पल चाहकर देखना/ पाओगे कि कोई न कोई चिनगारी/तुम्हारी अपनी ही राख में दबी पड़ी है/तुम्हारी चेतना की लाश/ तुम्हारे अपने ही बेसुध अस्तित्व के पास कहीं गड़ी है।' &lt;br /&gt;आधुनिक भारत की निर्माण का स्वप्न भी इसमें है और इस स्वप्न को पूरा करने में बाधक बनी शक्तियों पर हमला भी। मौजूदा राष्ट्रीय चरित्र के पतन का दंश इसमें बार बार उभर कर आया है। &lt;br /&gt;यह कविता 'वागर्थÓ के जनवरी 2010 के अंक में सम्पादकीय के तौर पर प्रकाशित हुई थी। जिस पर देश भर में व्यापक प्रतिक्रिया हुई और कई नामचीन लेखकों ने लिखित प्रतिक्रियाएं भी दीं। उनमें से इस पुस्तक में कमल किशोर गोयनका, रमेश कुंतल मेघ, गिरिराज किशोर, शशिप्रकाश चौधरी, महावीर अग्रवाल की प्रतिक्रियाएं भी प्रकाशित हैं, जिसके आलोक में इन कविताओं का पढऩा इसके अर्थ और व्याप्ति को नया संदर्भ देता है। कमल किशोर गोयनका ने तो इस कविता को आत्मा से निकला हुआ शंखनाद बताया है। इस कविता से प्रभावित होकर चांस पत्रिका के सम्पादक सुरेन्द्र कुमार सिंह ने एक और कविता लिखी है, वह भी इसमें संकलित है। &lt;br /&gt;यह अनायास नहीं है कि कई भारतीय भाषाओं में इस कविता का अनुवाद हुआ है जिसमें से बंगला, मराठी, उडिय़ा, डोगरी, पंजाबी, नेपाली और उर्दू में अनुवाद इस संग्रह में प्रकाशित किया गया है। इस प्रकार एक ही रचना का विविध भाषाओं में अनुवाद की पुस्तक का प्रकाशित होना भाषाई आदान प्रदान के लिहाज से अनुकरणीय और सराहनीय है। जिसके लिए इसके संकलनकर्ता जितेन्द्र जितांशु बधाई के पात्र हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-215185515710218490?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/215185515710218490/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/215185515710218490'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/215185515710218490'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html' title='युवाओं को दायित्वबोध के प्रति जाग्रत करती कविता'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJ8BvPqt0uI/AAAAAAAAA1g/fA9Om-WE8kE/s72-c/san-sami.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-1246618117929861986</id><published>2010-09-13T12:30:00.000-07:00</published><updated>2011-11-01T09:47:53.871-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अभिज्ञात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी दिवस पर कुछ यक्ष प्रश्न'/><title type='text'>हिन्दी दिवस पर कुछ यक्ष प्रश्न</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/6235/9/193"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 154px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-glAyH7kt4Ho/TrAftQyLNKI/AAAAAAAABHs/fHw9H2HPHLE/s200/Deshbandhu%252C%2BOnline%2Bnews%2Bportal%252C________%2B____%2B___%2B_____%252C%2B____%2B_______%2B______%2B______%2B____1%2Bcopy.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5670066793319445666" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/6235/9/193"&gt;प्रकाशितः देशबंधु, दैनिक 11, Sep, 2011, Sunday&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJnGu7-UaOI/AAAAAAAAA1Q/ny8iEMYvDrc/s1600/hindi+divas+2.JPG"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 200px; height: 137px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJnGu7-UaOI/AAAAAAAAA1Q/ny8iEMYvDrc/s200/hindi+divas+2.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5519661327994611938" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJnGl9hQV9I/AAAAAAAAA1I/qrb23DDwJEU/s1600/hindi+divas+1.JPG"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 200px; height: 124px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJnGl9hQV9I/AAAAAAAAA1I/qrb23DDwJEU/s200/hindi+divas+1.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5519661173790758866" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://epaper.sanmarg.in/SM/SM/2010/09/19/index.shtml?ArtId=001_022&amp;amp;Search=Y"&gt;Sanmarg-19/9/2010&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJXFS7Q_LMI/AAAAAAAAA0g/h7mB3gpYJTA/s1600/Hindi-Diwas.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 72px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TJXFS7Q_LMI/AAAAAAAAA0g/h7mB3gpYJTA/s200/Hindi-Diwas.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5518533847349669058" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी के बारे में यह मातम मनाने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है कि उसकी गरिमा को उन शब्दों से ठेस पहुंच रही है जो मूलतः हिन्दी के हैं ही नहीं। वे अंग्रेज़ी, मराठी, बंगला, पंजाबी या दूसरी भारतीय या विदेशी भाषाओं से आयातित हैं। दूसरी भाषाओं के मेल-जोल से जो भाषा बन रही है वह भ्रष्ट है और उससे हिन्दी के मूल स्वरूप को क्षति पहुंचेगी। इधर जोर शोर से कहा जा रहा है कि अब तो भाषा प्रयोग में आ रही है वह हिंग्लिश है हिन्दी या इंग्लिश नहीं। इस स्थिति से दुखी होने की बजाय हमें यह समझना चाहिए कि जिस किसी भाषा में बदलाव दिखायी दे वही जीवन्त भाषा है। भाषा में परिवर्तन का विरोध उसकी जीवंतता का विरोध है। जो भाषा जितनी परिवर्तनशील है समझें कि वह उतनी ही जीवन्त है। यह प्रवाह ही है जो वास्तविक ऊर्जा का स्रोत होता है।&lt;br /&gt;हिन्दी को अगर ख़तरा है तो हिन्दी को बचाने की सुपारी लेने वालों से। वे जो उसके व्याकरण को लेकर चिन्तित हैं वे उसे जड़ बनाने पर तुले हुए हैं। हिन्दी की पूजा करने वाले, हिन्दी को भजने वाले चाहते हैं कि हिन्दी पर चढ़ावा चढ़ता रहे और वे उसकी आरती के थाल के चढ़ावे पर खाते कमाते रहें। भाषा में कोई नयी प्रयोग हुआ नहीं कि हायतौबा मचाते हैं। दीवार पर लगे पोस्टरों, नेमप्लेट, विजिटिंग कार्ड, अखबार की खबरों, विज्ञापनों हर कहीं हिन्दी को शुद्ध रूप में देखना चाहते हैं और रोते-बिसुरते रहते कि हिन्दी तो गयी। जबकि अशुद्ध बोलना, लिखना और उसका व्यापक इस्तेमाल यह बताता है कि हिन्दी का प्रयोग वे लोग कर रहे हैं जिनका हिन्दी पर न तो व्यापक अधिकार न अध्ययन न ही वह उनकी भाषा है। इस तरह के प्रयोग आम लोगों के प्रयोग है और उन्हें यह करने देना चाहिए। हिन्दी का हव्वा खड़ा करके हिन्दी को लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता। हिन्दी को हिन्दी अधिकारियों और हिन्दी के शिक्षकों ने जितना लोकप्रिय नहीं किया है उससे अधिक लोकप्रिय फिल्मों और उसके गीतों ने किया है। आम प्रचलन ही हिन्दी को विकसित करेगा। लोगों को हिन्दी गलत बोलने दें गलत लिखने दें। आते आते भाषा उन्हें आ ही जायेगी और शुद्ध नहीं भी आयी तो कोई बात नहीं। भाषा का विस्तार तो हुआ। यह बहुत है।&lt;br /&gt;हिन्दी को बढ़ावा दिया है जो व्यापार करते हैं। उन्हें हिन्दीभाषी प्रदेशों में अपना माल बेचना है तो उत्पाद की प्रशंसा, उत्पाद की जानकारी हिन्दी में देनी है। वे हिन्दी अख़बारों में विज्ञापन देते हैं जिससे हिन्दी के अखबार फल-फूल रहे हैं। हिन्दी के टीवी कार्यक्रमों में विज्ञापन देते हैं तो मनोरंजन उद्योग बढ़ रहा है। ये अखबार, ये टीवी चैनल सिर्फ़ विज्ञापन परोस कर ज़िन्दा नहीं रह सकते। उन्हें जनत के दुखदर्द से जुड़ना पड़ता है। इसके बिना जनता उन्हें नहीं अपनायेगी फिर विज्ञापन भी उन तक नहीं पहुंचेगे। इसलिए अखबारों व टीवी की यह मज़बूरी है कि वे यदि विज्ञापन को जनता तक पहुंचाना चाहते हैं तो जनता की आवाज़ बनें,  उनकी पसंद का खयाल रखें, उन्हें वह दें जो वह चाहती है। उन्हं यदि मुनाफा कमाना है तो जनदर्दी बनना ही होगा। मज़बूरी में जनदर्दी नेता ही नहीं बनते धंधेबाज भी बनते हैं। मतलब यह कि उपयोगिता किसी भाषा के विकास की तर को तीव्र करती है और प्रगति के लिए रदस पहुंचाती है। हिन्दी का उपयोग आप बढ़ा दें तो उसका महत्व अपने आप बढ़ जायेगा। हिन्दी में रोज़गार बढ़ेगा, व्यापार बढ़ेगा तो रुतबा अपने आप बढ़ेगा। आप बस हिन्दी पर भरोसा की किजिए, हिन्दी का सम्मान कीजिए वह आपको सम्मान दिलायेगी। हिन्दी को अपनाकर हिन्दी की सामूहिक शक्ति को बढ़ायें। यह सामूहिक शक्ति ही बड़ी बात है। इसलिए हम विभिन्न भाषाओं वाले देश में अपनी-अपनी भाषा बोलते रहें पर सामूहिक शक्ति का परिचायक हिन्दी को बनायें और उसे भी मज़बूती दें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक अरब से अधिक लोगों की जुबान हिन्दी बने,  उनकी अस्मिता और उनके सम्मान की प्रतीक बने तो देंखे हिन्दी का जादू। दुनिया के सिर चढ़कर बोलेगा।&lt;br /&gt;-अंग्रेजी के जो शब्द आम जनता के प्रचलन में आ गये हैं उनके लिए हिन्दी के नये शब्दों को गढ़ने का काम बंद होना चाहिए। बल्कि उन्हें हिन्दी में प्रयोग के लिए बढ़ावा देना चाहिए। लोगों की हिचक दूर करना चाहिए कि वे अंग्रेजी के शब्द का हिन्दी में प्रयोग धड़ल्ले से करें। इतना करें कि वह ऐसा रचबस जाये कि वह हिन्दी का ही लगने लगे। हिन्दी का विकास चाहते हैं तो नये शब्द गढ़ने बंद कीजिए और दूसरी भाषा के शब्दों को हिन्दी के स्वभाव के अनुरूप अपना लीजिए। समस्या खत्म हो जायेगी। हिन्दी को मेल मिलाप की भाषा बनने से एकदम गुरेज नहीं है।&lt;br /&gt;हिन्दी को खतरा उन लोगों से भी है जो चाहते हैं कि हिन्दी की बोलियों का विकास रुक जाये। वे यदि भाषा का दर्जा पाने की कोशिश करती हैं तो उन्हें लगने लगता है कि हिन्दी का क्या होगा? हिन्दी कैसे रहेगी। यदि उसकी बोलियां स्वतंत्र भाषा हो गयीं तो फिर हिन्दी का क्या रह जायेगा। उन्हें लगता है कि भोजपुरी, राजस्थानी, अवधी, ब्राजभाषा, मगही यदि भाषा बन गयी तो हिन्दी कमज़ोर हो जायेगी। वे यह भी मानते हैं कि मैथिली जैसी भाषा की स्वतंत्र पहचान मिलने से हिन्दी कमज़ोर हुई है। तात्पर्य यह कि उनका मानना है कि हिन्दी का वर्चस्व इसलिए है कि हिन्दी इसलिए प्रमुख भाषा बनी हुई है क्योंकि कई बोलियों को स्वतंत्र भाषा का दर्जा नहीं मिला है। यदि उन्हें भी भाषा का दर्जा मिल गया तो कोई हिन्दी का नामलेवा नहीं रह जायेगा। इसी आधार पर कुछ मासूम लोग यह दावा तक कर बैठते हैं कि हिन्दी अगले बीस सालों में मर जायेगी क्योंकि हिन्दी की तमाम बोलियां भाषा बन जायेंगी। मैं उन लोगों से विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि हिन्दी की बोलियां भी यदि भाषा बन गयीं तो हिन्दी और मज़बूत होकर उभरेगी। उसका कारण यह है कि हिन्दी की बोली समझी जाने वाली भाषाओं के समर्थन के कारण दक्षिण भारत की भाषाएं या बालियां हिन्दी को अपने से दूर समझती थीं। हिन्दी की बोलियों को स्वतंत्र भाषा बन जाने के बाद दक्षिण की भाषाओं से हिन्दी का विभेदीपूर्ण रवैया खत्म हो जायेगा और वे भी हिन्दी को तटस्थ तौर पर स्वीकार करने लगेंगी। आखिर हमें एकसूत्रता में बांधने के लिए कोई भाषा तो चाहिए ही। और चूंकि भारतीय भाषाओं में हिन्दी को जानने समझने वाले सबसे ज्यादा है स्वाभाविक तौर पर वही सबकी पहली पसंद और प्राथमिकता है। कहना न होगा कि हिन्दी ही भारत में वह भाषा है जिसमें सबसे अधिक प्रांतों की स्मृतियां जुड़ी हैं और सबसे अधिक भारतीय भाषाओं के शब्द उसमें शामिल हैं। हिन्दी हमारी सर्वाधिक साझी स्मृति की भाषा है इसलिए साझी विरासत भी। बोलियों से स्वतंत्र भाषा होने से यह साझी विरासत और मज़बूत होगी। आज की हिन्दी अगर खड़ी बोली का विकास है तो इस अर्थ में वह किसी की भाषा नहीं है और इसलिए वह सबकी भाषा है। उसमें देश की तमाम बोलियों का नवनीत है। दूसरे जो हिन्दी भाषी नहीं हैं वे हिन्दी को क्यों नहीं अपनायेंगे, आख़िर अंग्रेज़ी जिनकी भाषा नहीं है क्या वे उसे पढ़ते-लिखते समझते नहीं हैं और क्या अंग्रेज़ी की जो मज़बूत स्थिति है उसमें गैर अंग्रेजीभाषी लोगों को योगदान नहीं है।&lt;br /&gt;बोलियों के विकास से हिन्दी का महत्व और समझ में आयेगा। यह नहीं भूलना होगा कि रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर महात्मा गांधी तक जिन लोगों ने हिन्दी को भारत की भाषा बनाने की हिमायत की थी वे हिन्दी भाषा नहीं थे। उनका मानना तो बस इतना था कि जिसमें देश के बहुसंख्य लोगों की बात हो उसे ही इस देश की राष्ट्रभाषा की गरिमा प्रदान की जाये। यही लोकतंत्र का तकाजा है। वह सामर्थ्य उन्होंने हिन्दी में देखी थी। उसी में एकसूत्रता की शक्ति पायी थी।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;(यह आलेख लेखक के केन्द्रीय संदर्भ पुस्तकालय, कोलकाता की ओर से 14 सितम्बर 2010 को हिन्दी पखवाड़ा के अन्तर्गत आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर दिये गये वक्तव्य का हिस्सा है। इस कार्यक्रम में विशेष अतिथि राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता के निदेशक स्वपन चक्रवर्ती एवं अध्यक्ष केन्द्रीय संदर्भ पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष डॉ.केके कोच्चुकोशी थे। कार्यक्रम का संचालन पुस्तकालय की उप सम्पादक अंचना श्रीवास्तव ने किया।)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-1246618117929861986?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/1246618117929861986/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1246618117929861986'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/1246618117929861986'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html' title='हिन्दी दिवस पर कुछ यक्ष प्रश्न'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-glAyH7kt4Ho/TrAftQyLNKI/AAAAAAAABHs/fHw9H2HPHLE/s72-c/Deshbandhu%252C%2BOnline%2Bnews%2Bportal%252C________%2B____%2B___%2B_____%252C%2B____%2B_______%2B______%2B______%2B____1%2Bcopy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-6064353702848536897</id><published>2010-09-07T02:07:00.001-07:00</published><updated>2010-09-07T02:07:25.159-07:00</updated><title type='text'>तुम्हारी सम्पदा कोई छीन ले इससे अच्छा है परोपकार करो और बांट दो</title><content type='html'>अर्थ व्यवस्था के नियमों के बाहर होते हैं परोपकार के कामकाज। लेकिन इससे आॢथक असमानता को पाटने में अवश्य कुछ मदद मिल सकती है। बशर्ते परोपकार किसी अंधविश्वास के तहत न किया जा रहा हो। हमारे यहां मंदिरों में अकूत खजाने पड़े हुए हैं और उसका उपभोग निठल्ले करते हैं। इन मंदिरों में चढऩे वाले चढ़ावे अंधविश्वास से प्रेरित होते हैं जो अभिलाषाओं की पूॢत की चाह में पूरी होने पर ऋण के तौर पर चढ़ाये जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी सम्पन्नता और खुशहाली के लिए ईश्वरीय शक्तियों के प्रति आभारी होते हैं और आभार स्वरूप वे दान करते हैं। चाहे वह नगदी हो, आभूषण हो या जमीन। कुछ दान कर्मकांडों की वजह से भयस्वरूप भी लोग करते रहते हैं किन्तु इसके पीछे परोपकार की भावना नहींं होती है और ना ही दान देने वाला यह सोचता है कि हमारी दी गयी दौलत का उपयोग सही तरीके से हो रहा है नहीं। पंडे पुजारी महंतों की चांदी कटती कटती है। मंदिरों में आने वाले चढ़ावों और संचित सम्पदा का परोपकार के कारर्यों मेंं खर्च करने की व्यवस्था की जाये तो इस देश के हजारों लोगों को आसानी से भुखमरी से बचाया जा सकता है। &lt;br /&gt;आॢथक असमानता दूर करने में माक्र्सवाद की थ्योरी है वह किसी हद तक ही कारगर है क्योंकि वह वर्ग संघर्ष पर आधारित है। वह छीनने के नकारात्मक भाव पर टिकी है और उसमें हिंसा मूल अस्त्र है। उसकी विसंगतियां भी सामने आती हैं क्योंकि समानता एक यूटोपिया है। इन विसंगतियों को जार्ज आरवेल ने अपनी किताब एनीमल फार्म में उजागर किया है। परोपकार के सम्बंध में सभी धर्मों की धारणाएं किसी हद तक सकारात्मक हैं जिनमें फेरबदल कर आज की नैतिकताओं से जोड़े जाने की आवश्यकता है। &lt;br /&gt;आॢथक असमानता को मिटाने के लिए जहां माक्र्सवाद पर जोर दिया जाता रहा है वहीं पूंजीवाद ने परोकार के अस्त्र से उस खायी को पाटने की कोशिशें शुरू की हैं। इससे हिंसा वह रूप नहीं दिखायी देगा जो माक्र्सवाद के चलते दिखायी देता है। आॢथक दूरी को पाटने के लिए पूंजीवादी रवैये का विकास वक्त की मांग है। जिसमें बिल गेट्स और वारेन बफे लगे हुए हैं। इसका अनुसरण कर ही माक्र्सवादी रवैये के विकास को रोका जा सकता है। औद्योगिक जगत में बिजनेस एथिक्स का विकास इन्हीं उद्देश्यों से किया जा रहा है। अब वह दिन दूर नहीं जब हर चौथा पूंजीपति परोपकार की बातें करता नजर आयेगा और जमकर माल कमाने वाले समाज सुधार से जुड़े तमाम कार्यक्रमों के सर्वेसर्वा नजर आयेंगे। वह जिनके पास दुनिया की तमाम पूंजी एकत्रित हो रही है गरीबों को भुखमरी से जूझ रहे लोगों के लिए कार्यक्रम भी उन्हीं द्वारा संचालित होंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो बगावत होगी और निशाना वे ही बनेंगे। बेहतर रास्ता है परोपकार का। इसमें भूखों ने छीन लिया से बेहतर है हमने भूखों में बांट दिया। चीन के पूंजीपतियों को अमरीका से यह सबक सीखने से नहीं हिचकना चाहिए। चीन के अरबपति परोपकारी कार्यों के लिए अपनी धन संपदा दान देने के इच्छुक नहीं हैं। दुनिया के दो प्रमुख अरबपतियों बिल गेट्स और वारेन बफे ने इन दिनों दुनिया भर के अमीरों से अपनी संपत्ति का एक हिस्सा परोपकारी कार्यों के लिए दान करने को कह रहे हैं। इसी अभियान के तहत गेट्स और बफे ने चीन के 50 सबसे बड़े अमीरों को 29 सितंबर को बीजिंग में एक रात्रि भोज में शामिल होने का आमंत्रण दिया है। पर ज्यादातर चीनी अरबपतियों ने गेट्स और बफे के साथ इस आयोजन में शामिल होने के आमंत्रण को ठुकरा दिया है। उन्हें आशंका है कि इस मौके पर उनसे अपनी संपत्ति दान करने की प्रतिबद्धता ली जा सकती है। अमरीका में अरबपतियों की संख्या 117 है, वहीं चीन में यह 64 है। गेट्स और बफे की यह जोड़ी अब तक दुनिया के 40 अरबपतियों को अपनी आधी संपत्ति दान करने के लिए भरोसे में ले चुकी है। इस संपत्ति का मूल्य 125 अरब डालर बैठता है।   &lt;br /&gt;अपने देश की सर्वोच्च न्यायालय कहती है यदि अनाज को गोदामों में नहीं रख सकते तो गरीबों में बांट दो। ठीक कहा गया है। इससे सरकार का मानवीय चेहरा भी बचा रहेगा। स्ट्रेस मैनेजमेंट के ये आधुनिक गुर हैं इन्हें सीखना ही होगा। यदि किसानों के लिए हुए कर्ज की वसूली में अधिक पैसा खर्च होता है तो उससे अच्छा है उनके कर्ज माफ कर दो। यह मौजूदा सम्प्रग सरकार कर चुकी है। उसे ऐसा करना भी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-6064353702848536897?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/6064353702848536897/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/09/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6064353702848536897'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6064353702848536897'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='तुम्हारी सम्पदा कोई छीन ले इससे अच्छा है परोपकार करो और बांट दो'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-798890197858000738</id><published>2010-08-12T02:42:00.000-07:00</published><updated>2010-08-22T03:35:51.577-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिमाग़ में घोंसले'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विजय शर्मा'/><title type='text'>सरस रचनात्मक ताजगी की डगर</title><content type='html'>Sanmarg-22 August 2010&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/THD9ZFmTg5I/AAAAAAAAAyw/JhPbQAuPnkk/s1600/sanmarg.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 140px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/THD9ZFmTg5I/AAAAAAAAAyw/JhPbQAuPnkk/s200/sanmarg.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5508180951715513234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TGPCPB0PXfI/AAAAAAAAAyI/9B2gwYanIEc/s1600/Dimag+Mein+Ghosle+2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 140px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TGPCPB0PXfI/AAAAAAAAAyI/9B2gwYanIEc/s200/Dimag+Mein+Ghosle+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5504456733018250738" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दिमाग़ में घोंसले/उपन्यास/लेखक-विजय शर्मा/ प्रकाशक-अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद-201005/मूल्य-200 रुपये &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अपने पहले ही उपन्यास 'दिमाग में घोंसलेÓ के साथ कथाकार विजय शर्मा यह उम्मीद जगाते हैं कि वे इस दिशा में काफी कुछ करने की सामथ्र्य रखते हैं। उनकी किस्सागोई का अन्दाज अलग है और भाषा चुस्त-दुरुस्त। परिदृश्य के डिटेल्स पर वे बहुत ज्यादा ध्यान देते हैं जो पाठकों को बहुत कुछ नया, अचीन्हा और कई बार कुछ नये अंदाज में जाना पहचाना उपलब्ध कराता है लेकिन इसी कारण कारण उपन्यास में कई बार मुख्य-कथन गौण हो जाता है और पाठक यह भूल जाता है कि वह विभिन्न विषयों पर ललित निबंध पढ़ रहा है या उपन्यास। उपन्यासकार को कथा-सूत्रों के निर्वाह पर भी ध्यान देना चाहिए जिसके बिना रचना की शर्त पूरी नहीं होती। पतंग चाहे जितनी उड़े नियंत्रण तभी रह सकता है जब डोर आपके हाथ में हो। कटने के बाद वह कहां गयी इसका श्रेय पतंग उड़ाने वाले को नहीं जायेगा। हालांकि परिदृश्य के विस्तार के बावजूद उपन्यास की पठनीयता में कोई कमी नहीं आती क्योंकि वे जिस विषय को भी उठाते हैं सरसता के साथ उठाते हैं। कई नये स्थलों की जानकारी तो मिलती ही है विभिन्न विचार सरणियों के अन्तर्विरोधों पर भी उनकी बेलाग टिप्पणियां हमें झकझोरती हैं और अपनी दृष्टि को मांजने में मदद करती हैं और उन्हें नयी धार देती हैं। &lt;br /&gt;इस उपन्यास का नायक ब्रजराज है, जो 14 साल कैदी की जिन्दगी गुजारता है। सामाजिक बदलाव चाहने वाले लोगों के बौद्धिक जगत से जुड़े ब्रजराज को संगत के कारण ही बिना किसी जुर्म के जेल हो जाती है और उस पर कई दफाओं के तहत मामला चलता है, जिसमें खून का संगीन मामला भी था। राज्य के खिलाफ युद्ध किस्म के राजनैतिक मामले तो थे ही। उसे संभवत: उसी के साथी कामरेड सूरज ने गिरफ्तार करवाया था। वे दोनों भाकपा, माकपा के शीर्ष नेताओं के चहेते कार्यकर्ता थे। इस उपन्यास में 1971 के बाद के बंगाल का राजनैतिक सामाजिक इतिहास है और उस दौर की स्थितियों का बेलौस वर्णन, जिसमें नक्सलबाड़ी के उभार और सीपीआईएमएल की गतिविधियों के विस्तार और युवाओं की मानसिक स्थिति का विश्लेषण है, जो इसे कथ्य और तथ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाता है किन्तु उपन्यास का 'प्रेम डगरÓ खण्ड ही उनकी औपन्यासिक क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें तथ्य और कथ्य के अलावा कथा-तत्व के रेशे भी हैं जिनके बिना कोई कथानक कथानक नहीं बनता। पूर्वा, गज्जो और विदिशा के साथ नायक ब्रजराज के रोमांस व प्रेम प्रसंग का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली है। हालांकि पूर्वा व गज्जो की ब्रजराज के जीवन में वापसी का इन्तजार पाठक को तो बना रहता है किन्तु उपन्यासकार उसे पता नहीं क्यों भूल जाता है। विजय के यहां यह तीनों स्त्री चरित्र गंध, परिदृश्य व स्वाद के साथ जुड़े हैं, जो पाठक की स्मृति में भी प्रवेश कर जाते हैं और उपन्यासकार विजय शर्मा की नायिकाओं के नाम गुम हो जाते हैं और यह सब उन्हें याद करने में सहायक होते हैं। पूर्वा के साथ काजागर का चन्द्रमा और अजवाइन जुड़ी है। पूर्वा के साथ ब्रजराज अपने सम्बंधों को यूफोरिया कह कर सम्बोधित करता है। उसी के अपने शब्दों में-'हम लगातार एक-दूसर के करीब जाने की कोशिश करते थे, लेकिन बीच का वो फिक्स्ड, अलंघ्य फासला कभी नहीं लांघा गया।' गज्जो से जुड़ी ब्रजराज की स्मृतियों में मठरी और नींबू के अचार की गंध बसी है तो विदिशा नींबू नमक का स्वाद। &lt;br /&gt;उपन्यास के कथा विस्तार के लिहाज से सबसे कमजोर पकड़ के बावजूद एक महत्वपूर्ण खण्ड 'उत्तर कथन' है, जो संभवत: उपन्यास से इतर लेखक का एक आलेख है जिसे एकबारगी पाठक उपन्यास का हिस्सा मानकर पढ़ता जाता है और अन्त में अपने को ठगा हुआ सा पाता है। फिर भी यह खण्ड पठनीयता के लिहाज से आकर्षक है और यहीं विजय शर्मा का रचनात्मक कौशल भी उभर कर आता है कि वे बिना तारतम्य वाले अध्याय को भी उपन्यास में जोड़ दें तो उसे भी अन्त तक पढ़ा जा सकता है। इतना ही नहीं एक वर्चुअल शहर 'अबतकनहींआबादपुर, का उन्होंने इस खण्ड में वर्णन किया है जो काफी दिनों के लिए पाठक के दिलोदिमाग पर अपने स्थापत्य का प्रभाव छोड़ जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-798890197858000738?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/798890197858000738/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/08/blog-post.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/798890197858000738'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/798890197858000738'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='सरस रचनात्मक ताजगी की डगर'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/THD9ZFmTg5I/AAAAAAAAAyw/JhPbQAuPnkk/s72-c/sanmarg.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-8734613382491100281</id><published>2010-07-30T04:02:00.001-07:00</published><updated>2010-07-30T07:21:24.686-07:00</updated><title type='text'>राहुल महाजन के बहाने इमोशनल अत्याचार पर कुछ बातें</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TFLf2LwB7nI/AAAAAAAAAxY/crAAY-MpBWM/s1600/Rahul-Mahajan-Dimpy-Ganguly.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 186px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TFLf2LwB7nI/AAAAAAAAAxY/crAAY-MpBWM/s200/Rahul-Mahajan-Dimpy-Ganguly.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5499704216932970098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;टीवी रियल्टी शो 'इमोशनल अत्याचार' की कलई आखिर खुल ही गयी। अब तक न्यूज मीडिया को पेड न्यूज मामले को सामाजिक कोपभाजन का शिकार बनना पड़ रहा है तो क्या रियल्टी टीवी शो विश्वसनीय हैं। हम जैसे लोगों की सीधी सादी बीवियां इमोशनल अत्याचार की करतूतों को हकीकत मान बैठती हैं और हमें रोज सुनना पड़ता है सारे मर्द ऐसे ही लुच्चे होते हैं। अब पत्नी को कौन समझाये के अंगदवा एक से बढ़कर एक सुन्दर लड़कियों को अपनी अंडरकवर एजेंट बनाकर मर्दों को रिझाने भेज देती हैं जो उनकी मर्दानगी और दिलफेंक तबीयत को खुल्लमखुल्ला चुनौती देती दिखायी देती हैं। वे बस अपनी ओर से आफर नहीं करतीं लेकिन मर्दों से आनन-फानन में दोस्ती गांठती और मिलती जुलती हैं ऐसे में शरीफ से शरीफ व्यक्ति ऊपरवाले की मेहरबानी समझ उनसे कैसे आंखें मूंदे रहे। वे बेचारे जाल में फंस जाते हैं और अंगद बेदी अपने प्रेमी की बेवफाई पर आंसू बहाती उनकी प्रेमिकाओं को सांत्वना दिलाने के लिए अपना कंधा हाजिर रखता है। तो लुच्चा कौन? &lt;br /&gt;पिछले दिनों राहुल महाजन पर इसी इमोशनल अत्याचार टीम ने उनकी पत्नी व मॉडल डिम्पी गांगुली के कहने पर उनका लायल्टी टेस्ट किया।  डिम्पी ने राहुल से इमेजिन टीवी के अत्यधिक लोकप्रिय शो 'राहुल दुल्हनियां ले जायेंगे' में शादी की थी। &lt;br /&gt; राहुल को स्वीमिंग पूल में दो-तीन तीन हसीनाएं अंडरकवर एजेंट के तौर पर हसीनाएं उपलब्ध कराई गयीं और हैरत की बात यह थी कि राहुल शरीफ बने रहे। और डिम्पी ने पूरे गर्व से कहा कि राहुल महाजन सुधर गये हैं और उनकी लम्पट छवि मीडिया की गढ़ी हुई है। कलर्स चैनल के रीयलिटी शो 'बिग बॉस' में राहुल की शराफत पायल रोहतगी और मंदिर बेदी के साथ बार-बार उभर कर सामने आयी। अब डिम्पी को राहुल की जमकर धुनाई कर दी तो बात सामने आ रही है कि इमोशनल अत्याचार में राहुल की छवि गढ़ी गयी और संभवत: पेड थी। &lt;br /&gt;22 वर्षीय मॉडल डिम्पी ने एक टीवी चैनल को बताया कि राहुल ने मेरे फोन पर आए एक संदेश का मतलब जानने के लिए मुझे जगाने के बाद गुरुवार की सुबह मेरी पिटाई की। जब मैंने उससे सोने को कहा तो वह गुस्से से आगबबूला हो गया और मुझ पर प्रहार करना शुरू कर दिया। उसने मुझे लात घूंसों से पीटा और मुझे बाल पकड़ कर खींचा। &lt;br /&gt;यह दूसरी बार है जब मादक पदार्थ सेवन के अभियुक्त रह चुके राहुल पर घरेलू हिंसा का आरोप लगा है। उनके बचपन की मित्र उनकी पहली पत्नी श्वेता सिंह ने उन पर शारीरिक प्रताडऩा का आरोप लगाया था। दोनों के बीच 2008 में तलाक हो गया था। &lt;br /&gt;यूं भी हम जैसे पति बेदियों से भयभीत रहे हैं। 'आपकी कचहरी' टीवी शो में किरण बेदी जिस कार्यक्रम को प्रस्तुत करती हैं उससे लोगों का भला कम होता और बुरा अधिक। पत्नियों को यह जानकारी मिलती-रहती है कि अरे यह जुल्म तो हम भी आये दिन होता रहता है, हम तो चुप रहते हैं। हमें अब चुप नहीं रहना चाहिए था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-8734613382491100281?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/8734613382491100281/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/8734613382491100281'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/8734613382491100281'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html' title='राहुल महाजन के बहाने इमोशनल अत्याचार पर कुछ बातें'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TFLf2LwB7nI/AAAAAAAAAxY/crAAY-MpBWM/s72-c/Rahul-Mahajan-Dimpy-Ganguly.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-8181134754528688280</id><published>2010-07-29T01:55:00.000-07:00</published><updated>2010-08-13T00:27:52.710-07:00</updated><title type='text'>जानी-पहचानी सी दुनिया में एक संवेदनात्मक ताजगी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TFUsYag_P-I/AAAAAAAAAx0/bS226f2ajTY/s1600/01_08_2010_196_013.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 184px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TFUsYag_P-I/AAAAAAAAAx0/bS226f2ajTY/s200/01_08_2010_196_013.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5500351317849096162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुस्तक-अनहद/लेखक-राजेश रेड्डी/प्रकाशक-डायमंड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि., 10-30, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-2, नयी दिल्ली-110020/मूल्य-95 रुपये।&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;सुपरिचित गजलकार राजेश रेड्डी की चुनिंदा गजलों का संकलन 'अनहद' उनके प्रशंसकों के लिए कोई नयी रचना की सौगात भले न ले आया हो किन्तु उनकी चॢचत कृतियों उड़ान, आसमान से आगे और वुजूद से बेहतरीन रचनाओं का चयन है, जो उन पाठकों के लिए महत्वपूर्ण है, जो उन्हें संक्षेप में पढ़ाना समझना चाहते हों। इस कृति में उनकी गजलों के विविध शेड्स मिल जायेंगे, जो उन्हें संक्षेप में भी सम्पूर्णता में समझने में का आभास देते हैं। &lt;br /&gt;इस कृति की रचनाओं से गुजरते हुए बराबर यह एहसास बना रहता है कि हम जिस शायर को पढ़ रहे हैं उसमें गजल की पूरी परम्परा का रचाव ही समाहित नहीं है बल्कि यह शायर परम्परा के विकास की सही लीक पर चलते हुए नये को भी उसी क्लासिक ऊंचाई पर ले जाने में समर्थ है, जो नये-पुराने के भेद को मिटा कर सदा नवीन और सदा प्रासंगिक बना रहता है। इस शायर में नये तजुरबे हैं, कहने का ढर्रे में भी नयापन है पर वह नया कहने के लिए नया नहीं कहता इसलिए एक जानी-पहचानी सी दुनिया में एक ताजगी का अहसास कराता है-'थी यही कोशिश मेरी पगड़ी न जाय/बस इसी कोशिश में मेरा सिर गया/बेच डाला हमने कल अपना जमीर/जिन्दगी का आखिरी जेवर गया।'&lt;br /&gt;राजेश रेड्डी की गजलों में व्यवस्था को बदलने की कोशिश तो दिखायी देती है लेकिन संवेदना भी जिसके कारण वह खोखला बनने से बची हुई हैं और विश्वसनीयता को बनाये रखने में कामयाब हैं-'मंजिल मेरी अलग है मेरा रास्ता अलग/इक आम से सफर का मुसाफिर नहीं हूं मैं।' उसका कारण यह है कि वे खोखली क्रांतियों का हस्र जानते हैं-'बिल आखिर बिक ही जाती है बगावत/हर इक बागी का कोई दाम तय है।'&lt;br /&gt;उनकी शायरी केवल विचार से उपजी शायरी नहीं है। वे दुनियादारों की तरह ही नहीं उन फकीरों और संतों की तरह भी सोचते हैं जिनसे गजल की परम्परा का गहरा वास्ता है। वे कहते हैं-'सुन ली मैंने दिमाग की तज्वीज/अब जरा दिल को खटखटा लूं मैं।' राजेश रेड्डी की निगाह समाज की उन तमाम विडम्बनाओं पर है जो आदमी को आदमी बने रहने देने में बाधक हैं, और वे यह भी जानते हैं कि स्वाभिमान की जिन्दगी जीना कितना कठिन है-'मैं सोचता तो हूं कि लूं खुद्दारियों से काम/रहती कहां है पर मेरी गरदन झुके बगैर।'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-8181134754528688280?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/8181134754528688280/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_9447.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/8181134754528688280'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/8181134754528688280'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_9447.html' title='जानी-पहचानी सी दुनिया में एक संवेदनात्मक ताजगी'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TFUsYag_P-I/AAAAAAAAAx0/bS226f2ajTY/s72-c/01_08_2010_196_013.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-2154634491097769571</id><published>2010-07-29T01:54:00.001-07:00</published><updated>2010-07-29T01:54:55.241-07:00</updated><title type='text'>बड़े सरोकार की संवेदनशील रचनाशीलता</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुस्तक का नाम-समुद्र में नदियां/लेखक-स्वाधीन/प्रकाशक-स्वाधीन साहित्य प्रकाशन समिति, 150/4, एलआईजी, 4 फेज, केपीएचबी कालोनी, हैदराबाद-500072/मूल्य-85 रुपये।&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;पिछले ढाई दशकों में स्वाधीन ने अपनी कविताओं और गजलों ने अपनी एक विशिष्ट पहचान बना ली है। उनकी रचनाओं में हिन्दू और उर्दू दोनों जुबानों की मिठास और उसके भाषिक संस्कार मिले हुए हैं, जो पाठक को कविता के एक नये आस्वाद से परिचित कराती हैं। स्वाधीन की कविताएं पढ़कर यह भरोसा होता है कि यह बदतर होती दुनिया कभी बेहतर होगी, निराश होने की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो बस मिल जुल कर बदलाव की कोशिश करने की। उनकी कविताओं में बदलाव और मुश्किलों से निजात का रास्ता अकेले के प्रयासों से संभव होता नहीं दीखता। वे सामूहिक प्रयासों के हामी रहे हैं और इस संग्रह में भी बदलाव के सामूहिक प्रयासों के प्रति उनकी भरोसा कायम है। मौजूदा दौर में आदर्शों का हश्र देखने के बाद उनकी कविताओं में बदलाव का भरोसा लगभग रोमांटिक लगने लगता है किन्तु वही उन्हें एक सच्चा और बड़ा कवि भी बनाता है। उनकी रचनाओं कब अपना दर्द समूह का दर्द और समूह का दर्द अपना बन जाता है कहना मुश्किल है। एक बानगी देखें- 'इक रोज तुम्हें अपने ही घर याद करेंगे।/बिछड़े हुए आंगन के शजर याद करेंगे।/तुम अपने लहू रंग के परचम तो उठाओ/ ये सुर्ख सबेरों के नगर याद करेंगे।'&lt;br /&gt;व्यक्ति और समूह उनके यहां एक है। माक्र्सवादी प्रतिबद्धता उनकी रचनाओं को रसद पहुंचाती है किन्तु वे विचारों की नारेबाजी करते नहीं दिखायी देते जो उनकी रचनाओं के उथला और इकहरा होने से बचाती है- 'खुद बन गये जब आईने पत्थर कई दिन तक।/ बेचेहरा रहे हम भी तो अक्सर कई दिन तक।/वो अपने वतन के थे, बसाना था उन्हें भी/ मिलते रहे हम उन से बराबर कई दिन तक।' &lt;br /&gt;इस संग्रह में गजलों अलावा कुछ कविताएं भी हैं। वे संवेदनशीलता और वैचारिकता से हमें बांधती हैं-'नदियों के बंटवारे को लेकर/कोर्ट के फैसले के विरुद्ध/लगा दी गयी है पानी में आग/और जला दी गयी हैं बसें.../इस आहूत बंद में/यह जलती हुई कावेरी, कृष्णा और गोदावरी/कहां जाकर करेगी फरियाद?/क्या इन सब की सुनवाई/समुद्र करेगा।/फिलहाल समुद्र में नदियां/अपने अपने हिस्से का पानी तलाश रही हैं/अपनी अपनी नदियों के पक्ष में/रहनुमा खटखटा रहे हैं आंदोलन का द्वार/और पानी में मछलियां/लामबंद हो रही हैं इन के खिलाफ।'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-2154634491097769571?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/2154634491097769571/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_29.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2154634491097769571'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2154634491097769571'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_29.html' title='बड़े सरोकार की संवेदनशील रचनाशीलता'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-2069148660120583671</id><published>2010-07-25T01:36:00.000-07:00</published><updated>2010-08-18T00:36:03.069-07:00</updated><title type='text'>बच्चों के खिलाफ घर से लेकर स्कूल तक गुंडागर्दी पर रोक स्वागतयोग्य</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TGuNVSzr1NI/AAAAAAAAAyo/aNNFXNKHFsg/s1600/June+2010+f.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 57px; height: 77px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TGuNVSzr1NI/AAAAAAAAAyo/aNNFXNKHFsg/s200/June+2010+f.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5506650366355952850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TGuMTbxNTnI/AAAAAAAAAyY/_6Zsclkod6c/s1600/subllog1+copy.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 142px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TGuMTbxNTnI/AAAAAAAAAyY/_6Zsclkod6c/s200/subllog1+copy.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5506649234890116722" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TGuMIhQ4KdI/AAAAAAAAAyQ/U8NFCRwQ-qA/s1600/subllog-2+copy.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 142px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TGuMIhQ4KdI/AAAAAAAAAyQ/U8NFCRwQ-qA/s200/subllog-2+copy.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5506649047386565074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बच्चों पर होने वाली गुंडागर्दी पर रोक लगाने की दिशा में सरकार ने ठोस&lt;br /&gt;कदम उठाने शुरू किये हैं यह स्वागतयोग्य है। अब तक सर्वाधिक प्रताडऩा का&lt;br /&gt;वाला वर्ग बच्चों का ही है, जिनके खिलाफ कारगर तरीके से बहुत कम आवाज़&lt;br /&gt;उठायी जाती है। उसका एक कारण यह है कि भले ही समाज में वंचितों के लिए&lt;br /&gt;न्याय की अवधारणा पर बार बार विचार किया जाता रहा हो किन्तु बच्चों के&lt;br /&gt;शोषण पर प्राय: ध्यान नहीं दिया गया। इस दिशा में बाल श्रमिकों के खात्मे&lt;br /&gt;के लिए किसी हद तक कमज़ोर सी आवाज उठाकर कर्तव्य की इतिश्री मान ली गयी।&lt;br /&gt;जबकि सच यह है कि सुविधा सम्पन्न घरों में भी बच्चों का शोषण उनके जन्म&lt;br /&gt;के साथ ही शुरू हो जाता है। घर से शुरू यह शोषण स्कूलों में भी बदस्तूर&lt;br /&gt;जारी रहता है। बच्चों के शोषण के तौर-तरीके अन्य प्रकार के शोषण से अलग&lt;br /&gt;है इसलिए उसकी भयावहता दिखायी नहीं देती।&lt;br /&gt;कई बार तो बच्चे के जन्म के पहले से ही उसके शोषण का ताना-बाना तैयार&lt;br /&gt;होने लगता है। भ्रूण परीक्षण उसी का एक रूप है जो चिकित्सकीय आवश्यकताओं&lt;br /&gt;से कम और इस इरादे से ज्यादा कराया जाता है कि वह पुत्र शिशु ही तो है न।&lt;br /&gt;अर्थात 'मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राज दुलारा ' की कामना वाले लोग&lt;br /&gt;अपना नाम रोशन करने और अपनी मान मर्यादा की रक्षा एवं उसमें इजाफे के लिए&lt;br /&gt;उसे एक कारगर अस्त्र मिल जाता है और उसे मनचाहे तरीके से इस्तेमाल करने&lt;br /&gt;की जुगत में जाते हैं। माता-पिता, कुल-खानदान के लिए संतानें एक ऐसा जीव&lt;br /&gt;होती हैं जिन पर वे अपने सपनों का बोझ लाद देते हैं और उसके जीवन के&lt;br /&gt;लक्ष्य, उसकी जिम्मेदारियां स्वयं निर्धारित कर देते हैं। वह क्या बनेगा&lt;br /&gt;यह बच्चे की अपनी च्वाइस नहीं हुआ करती। उसके लक्ष्य के निर्धारण में&lt;br /&gt;बच्चे की क्षमता गौण होती है और अभिभावक की प्रमुख। भावात्मक दबाव के&lt;br /&gt;बावजूद जब बच्चा उनके चाहे तौर-तरीके नहीं अपनाता और निर्धारित लक्ष्य की&lt;br /&gt;दिशा में ही आगे नहीं बढ़ता तो उस पर प्यार का दावा करने वाले अभिभावक ही&lt;br /&gt;बल प्रयोग करने लगते हैं। अपने बच्चों को पिटाई को मां-बाप इस दावे के&lt;br /&gt;साथ ग्लोरीफाई करते हैं कि वे बच्चे की बेहतरी के लिए ही ऐसा कर रहे हैं।&lt;br /&gt;अपने को सभ्य समझने वाले अभिभावक दुनिया भर का अनुशासन बच्चे पर लागू कर&lt;br /&gt;अपने को गौरवान्वित समझते हैं।&lt;br /&gt;और तो और ऐसे अभिभावकों की कमी नहीं है जो यह मानते है कि स्कूलों में भी&lt;br /&gt;बच्चों की पिटायी हो ताकि वे ठीक से पढ़ें लिखें और अनुशासित हों। कई&lt;br /&gt;बच्चे छोटी कक्षाओं में अनुशासन के नाम पर पिटते हैं और मां-बाप यह सोचकर&lt;br /&gt;प्रसन्न रहते हैं कि उनकी संतान लायक बनायी जा रही है। अक्सर बच्चे स्कूल&lt;br /&gt;से निकलकर कोचिंग पढऩे या घर पर ट्यूशन पढऩे में जोत दिये जाते हैं।&lt;br /&gt;ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक भी बच्चों को पीटकर उसके अभिभावक पर अपनी&lt;br /&gt;अच्छी इमेज बनाने में कामयाब रहता है।&lt;br /&gt;यह प्रताडि़त बच्चे ऐसी स्थिति में किससे अपना दुखड़ा रोयें। एक तरह&lt;br /&gt;बस्ते का बोझ, अव्यवहारिक बहुतायत में पाठ्यक्रमों का बोझ और अनुशासन के&lt;br /&gt;नाम पर तमाम बंदिशें। बच्चे का स्वाभाविक जीवन छीनकर उन्हें&lt;br /&gt;प्रतियोगिताओं के योग्य बनाने में जुटे अभिभावकों को जरा भी इस बात का&lt;br /&gt;एहसास नहीं होता कि वे अपनी संतान के साथ कैसी बर्बरता कर रहे हैं। उन पर&lt;br /&gt;निर्धारित लक्ष्य प्राप्ति का मानसिक बोझ इतना होता है कि नतीजे खराब&lt;br /&gt;होने के दु:स्वप्न देखने लगते हैं और सचमुच खराब हो जाने पर आत्महत्या&lt;br /&gt;जैसे कदम उठा बैठते हैं।&lt;br /&gt;स्कूलों में बच्चों की पिटायी आम बात है और इसे नैतिक मानने में&lt;br /&gt;समाजसुधारक होने का दम्भ भरने वाली तमाम इकाइयों को गुरेज नहीं। सामान्य&lt;br /&gt;तबके के स्कूलों में तो शिक्षक पढ़ाने के लिए कम और बच्चों को दंडित करने&lt;br /&gt;के लिए अधिक जाने जाते हैं। बड़ा होने के बाद भी मन में स्कूलों में चाक&lt;br /&gt;से नहीं बेंत से अंकित इबारतें स्पष्ट रहती हैं।&lt;br /&gt;यह तो अच्छा है कि पहले मां-बाप पर बच्चों को पीटने पर बंदिश लगी और अब&lt;br /&gt;स्कूलों में शिक्षकों पर। इस दिशा में और कदम उठाये जाने की आवश्यकता है।&lt;br /&gt;कोलकाता स्थित ला मार्टीनियर स्कूल के आठवीं कक्षा के छात्र द्वारा&lt;br /&gt;आत्महत्या करने के मामले ने इतना तूल पकड़ा कि राष्ट्रीय बाल अधिकार&lt;br /&gt;संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने सभी विद्यालयों में अनिवार्य रूप से 'बाल&lt;br /&gt;अधिकार प्रकोष्ठÓ गठित करने की सिफारिश की है। इधर देश भर में कई स्कूलों&lt;br /&gt;में शरीरिक दंड की शिकायतें बढ़ गयी थीं। आयोग ने शारीरिक दंड पर अपनी&lt;br /&gt;सिफारिशें 22 जून 2010 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पेश कर दी&lt;br /&gt;जिसमें सभी राज्य सरकारों से स्कूलों में अनुशासन एवं दंड से जुड़े&lt;br /&gt;विषयों के लिए प्रणाली को ढांचागत स्वरूप प्रदान करने को कहा गया है। इन&lt;br /&gt;सिफारिशों के साथ कोलकाता के ला मार्टीनियर स्कूल के प्राचार्य एवं उप&lt;br /&gt;प्राचार्य को हटाने की भी सिफारिश की गई है। एनसीपीसीआर की अध्यक्ष शांता&lt;br /&gt;सिन्हा का कहना है कि आयोग ने शारीरिक दंड पर अपनी सिफारिशें मंत्रालय को&lt;br /&gt;पेश कर दी हैं।&lt;br /&gt;आयोग ने अपनी सिफारिशों में कोलकाता स्थित स्कूल के प्राचार्या एवं उप&lt;br /&gt;प्राचार्य के अन्य शिक्षकों द्वारा छात्रों को शारीरिक दंड देने की&lt;br /&gt;अनदेखी करने और स्कूल में भय का माहौल बनाने का भी उल्लेख किया। इसके साथ&lt;br /&gt;ही स्कूल से शरीरिक दंड देने वाले शिक्षकों की वेतन वृद्धि रोकने तथा&lt;br /&gt;शिक्षा के अधिकार कानून के आलोक में शिक्षकों के सेवा नियमों की समीक्षा&lt;br /&gt;करने को भी कहा गया है।&lt;br /&gt;रिपोर्ट के अनुसार सभी राज्य सरकारों से स्कूलों में छात्र, शिक्षक,&lt;br /&gt;स्कूल प्रबंधन और अभिभावक को व्यवस्था से जोडऩे को कहा गया है ताकि&lt;br /&gt;भविष्य में ऐसी घटनाओं को होने से रोका जा सके। आयोग ने अपनी सिफारिशों&lt;br /&gt;में स्कूलों से अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा के अधिकार कानून पर अमल&lt;br /&gt;सुनिश्चित करने को कहा है। इसमें विशेष तौर पर कानून की धारा 17 का&lt;br /&gt;उल्लेख किया गया है जिसमें सभी प्रकार के शारीरिक दंड का निषेध है और&lt;br /&gt;इसका उल्लंघन करने वाले मामलों में कड़ी कार्रवाई करने को कहा गया है। इस&lt;br /&gt;संबंध में आरटीई की धारा 17 पर अमल के लिए राज्य नियम और दिशा निर्देश&lt;br /&gt;तैयार करने को कहा गया है।&lt;br /&gt;इधर, सरकार एक ऐसा कानून बनाने पर विचार कर रही है जिसके तहत मां बाप ने&lt;br /&gt;अपने बच्चे के साथ क्रूरता की तो उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है।&lt;br /&gt;यह कानून शिक्षण संस्थानों के अलावा बच्चों के पैरेंट्स, रिश्तेदारों,&lt;br /&gt;पड़ोसियों या उनके मित्रों पर भी लागू हो सकता है। यानी अमरीका की तरह अब&lt;br /&gt;भारत के बच्चों को भी उन पर अत्याचार करने वाले मां-बाप व रिश्तेदारों को&lt;br /&gt;जेल भिजवाने का हक मिल सकता है।&lt;br /&gt;प्रस्तावित कानून यदि अमल में आता है तो पहली बार बच्चे को पीटने पर&lt;br /&gt;अभियुक्तों को एक साल की सजा या 5 हजार का जुर्माना हो सकता है लेकिन&lt;br /&gt;दूसरी बार भी यदि इस तरह का मामला सामने आया तो दोषियों को तीन साल की&lt;br /&gt;जेल और 25 हजार तक का जुर्माना भरना पड़ सकता हैै।&lt;br /&gt;महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इस बिल के मसौदे को शीघ्र ही कैबिनेट में&lt;br /&gt;लाने जा रहा है। महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ के मुताबिक बिल&lt;br /&gt;के मसौदे पर चर्चा जारी है और जल्द ही इसे कैबिनेट में लाया जायेगा।&lt;br /&gt;कोलकाता में कथित तौर पर प्राचार्य द्वारा बेंत से पिटाई के बाद एक छात्र&lt;br /&gt;की आत्महत्या के बाद सभी ओर से दबाव के बीच लाल मार्टीनियर स्कूल फॉर&lt;br /&gt;बॉयज ने शारीरिक दंड पर पाबंदी लगा दी। स्कूल के प्राचार्य सुनिर्मल&lt;br /&gt;चक्रवर्ती ने स्वीकार किया था कि उन्होंने आठवीं कक्षा के छात्र रूवनजीत&lt;br /&gt;रावला की बेंत से पिटाई की थी। हालांकि उन्होंने इसे आत्महत्या से जोडऩे&lt;br /&gt;से इनकार किया और कहा कि वे परिणाम भुगतने को तैयार हैं। रूवनजीत के पिता&lt;br /&gt;अजय रावला ने चक्रवर्ती के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। विदित हो कि&lt;br /&gt;रूवनजीत ने गत 12 फरवरी को आत्महत्या की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-2069148660120583671?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/2069148660120583671/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_25.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2069148660120583671'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2069148660120583671'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_25.html' title='बच्चों के खिलाफ घर से लेकर स्कूल तक गुंडागर्दी पर रोक स्वागतयोग्य'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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src="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TEKzthgxuJI/AAAAAAAAAwg/lWge4USccFw/s200/sanmagg.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5495152090016757906" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TD8YnNNE4sI/AAAAAAAAAwY/QtG-NS9hL5s/s1600/Narayan.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 126px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TD8YnNNE4sI/AAAAAAAAAwY/QtG-NS9hL5s/s200/Narayan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5494137132253766338" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुस्तक : कॉरपोरेट गुरु नारायण मूर्ति/ लेखक: एन.चोक्कन/ प्रकाशक-प्रभात पेपरबैक्स, 4/19 आसफ अली रोड, नयी दिल्ली-110002/मूल्य: 95 रुपये&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पुस्तक प्रमुख सॉफ्टवेयर कंपनी इन्फोसिस के मुख्य संस्थापक एवं उद्योगपति नारायण मूर्ति के जीवन की एक ऐसी विलक्षण तस्वीर पेश करती है, जो देश के उन युवाओं के लिए प्रेरणादायक हो सकती है जो अपने जीवन में नया कुछ कर गुजरने की चाहत रखते हैं। उनका जीवन विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए एक व्यक्ति की कहानी है जिसने अपना मार्ग स्वयं चुना और बनाया है। गरीबी दिन व्यतीत कर रहे हाईस्कूल के अध्यापक पिता की आठ संतानों में से वे एक थे।&lt;br /&gt; आर्थिक तंगी के कारण आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास करने के बावजूद से प्रवेश नहीं ले पाये थे। शादी से पहले उनकी यह स्थिति नहीं थी कि वे अपनी प्रेमिका के साथ घूम-फिर सकें। शुरू में वे वामपंथी विचारधारा के प्रति उनका झुकाव था। यह वामपंथी विचारधारा ही थी जिससे अभिभूत होकर मूर्ति ने पेरिस में बचाया अपना अधिकतर पैसा वहीं लुटाया और खाली हाथ भारत लौट आये थे। हालांकि उन्हें बुल्गेरिया में वामपंथ को लेकर एक कटु अनुभव हुआ और उनकी अवधारणा बदल गयी। और उन्हीं दिनों वामपंथ, समाजवाद और पूंजीवाद के अच्छे पहलुओं पर आधारित एक कंपनी खोलने का निश्चय किया था। वे अब भी यह मानते हैं कि 'आदमी को खूब पैसा कमाना चाहिए और उससे जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।' &lt;br /&gt;अच्छी खासी नौकरी छोड़कर उन्होंने नौकरीपेशा अपनी पत्नी सुधा से 10 हजार रुपये उधार लिये और 1981 में अपने छह अन्य दोस्तों के साथ पुणे में इन्फोसिस की आधारशिला रखी। इस टीम के सदस्य इस प्रकार थे-एनआर नारायण मूर्ति, नंदन नीलकेनी, के दिनेश, एस गोपालकृष्णन, एनएस राघवन, एसडी शिबुलाल एवं अशोक अरोड़ा। यह सभी पाटनी कंप्यूटर्स में कार्यरत थे। यह टीम आज भी साथ है हालांकि इनमें से केवल अशोक अरोड़ा कुछ कारणोंवश 1989 में अलग हो गये। &lt;br /&gt;शुरू के दस साल कंपनी के लिए कठिनाइयों के रहे लेकिन उन्होंने और उनके सोच के प्रति विश्वास रखने वाले दोस्तों ने सारी बाधाएं पार कीं और आज यह कंपनी दुनिया की एक जानी मानी सॉफ्टवेयर कंपनी है, बेंगलुरु में जिसका मुख्यालय परिसर विश्व का सबसे बड़ा कंप्यूटर सॉफ्टवेयर परिसर है। 90 हजार कर्मचारियों वाली इस कंपनी का राजस्व 2008 में 4.18 अरब अमरीकी डॉलर के पार पहुंच गया। &lt;br /&gt;इस किताब को पढ़ते हुए हमें एक दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को करीब से जानने-समझने का मौका मिलता है। हमें यह भी पता चलता है कि यदि इन्फोसिस कंपनी इतनी बुलंदी तक पहुंची तो उसका कारण मूर्ति का वृहत्तर विजन था-'अपने नहीं देश के लिए धन कमाने का।' वे मानते हैं कि 'कोई कंपनी किसी भी तरह से सफल हो सकती है लेकिन अगर उसमें सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना न हो तो वह सफलता पूरी नहीं हो सकती।' दूसरी तरफ उन्हें ऐसी जीवनसंगीनी सुधा मिली थीं जो टाटा कंपनी समूह के अध्यक्ष जे.आर.डी.टाटा की इस सीख पर अमल करने में विश्वास रखती हैं कि 'हमें वह लाभ समाज को लौटा देना चाहिए, जिसे हम उसी से अर्जित करते हैं।' सुधा स्वयं टाटा की कंपनी टेल्को में कुछ अरसे तक कार्यरत थीं, जिसे उन्होंने पारिवारिक व्यस्तताओं के कारण छोड़ दिया था।&lt;br /&gt; 1996 में स्थापित इन्फोसिस फाउंडेशन का नेतृत्व सुधा नारायण मूर्ति के हाथ में है, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक विकास के कार्यों को समर्पित है और वार्षिक पांच करोड़ रुपये इन कार्यों पर खर्च होता है। &lt;br /&gt;मूर्ति और नारायण सुधा आज भी बेंगलुरु के जयनगर इलाके के एक अपार्टमेंट में एक साधारण फ्लैट में रहते हैं जहां कोई नौकर नहीं है और ना रसोइया। घर के काम-काज में तब तब मूर्ति भी सुधा का हाथ बंटाते हैं। यही कारण है कि उन्हें 'कॉरपोरेट गांधी' कहा जाता है। वे गांधीजी के जीवन दर्शन से काफी प्रभावित रहे हैं।&lt;br /&gt;इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह भारत में औद्योगिक परिदृश्य के बदलाव को भी चित्रित करती है। 1991 के पहले का भारत भी इसमें है जब औपचारिकताओं के नाम पर तमाम बाधाएं पहुंचायी जाती थीं और बाद का परिदृश्य है जब भारत दुनिया में क्रमशः आर्थिक शक्ति बनता गया। 1991 में नरसिंह राव की सरकार में वित्तमंत्री मनमोहन सिंह थे और दोनों के आर्थिक सुधारों का लाभ इन्फोसिस जैसी तमाम कंपनियों को मिला, जो नये तरह का उद्यम लगाने को तत्पर थीं। &lt;br /&gt;यह पुस्तक व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए ही नहीं बल्कि जनसामान्य के लिए भी पठनीय है। इसके लेखक एन. चोक्कन तमिल के जाने माने लेखक है जिनकी तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं तथा वे एक सॉफ्टवेयर कंपनी में निदेशक होने के कारण उस दुनिया को करीब से जानते समझते हैं जिसके शीर्ष पुरुषों में मूर्ति का शुमार होता है। पुस्तक का हिन्दी अनुवाद महेश शर्मा ने किया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-6574377093435223569?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/6574377093435223569/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_15.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6574377093435223569'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6574377093435223569'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_15.html' title='युवाओं को बहुत कुछ सिखाता है नारायण मूर्ति का जीवन'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TEKzthgxuJI/AAAAAAAAAwg/lWge4USccFw/s72-c/sanmagg.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-4119778182540378988</id><published>2010-07-07T05:26:00.001-07:00</published><updated>2010-07-07T05:29:25.819-07:00</updated><title type='text'>ममता की ताजपोशी की तैयारी</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDRzAPRZ94I/AAAAAAAAAuI/uaSVA6vnDM4/s1600/mail.google.com.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 114px; height: 154px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDRzAPRZ94I/AAAAAAAAAuI/uaSVA6vnDM4/s200/mail.google.com.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5491140293608208258" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;साभार: सबलोग, मई, 2010&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDRy1Ql79BI/AAAAAAAAAuA/Q-MDeWkglQ0/s1600/1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 142px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDRy1Ql79BI/AAAAAAAAAuA/Q-MDeWkglQ0/s200/1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5491140104984196114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDRyrwzZN2I/AAAAAAAAAt4/lFVmhBlrtag/s1600/2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 142px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDRyrwzZN2I/AAAAAAAAAt4/lFVmhBlrtag/s200/2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5491139941831882594" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;साभार: सबलोग मई, 2010&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-4119778182540378988?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/4119778182540378988/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_07.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/4119778182540378988'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/4119778182540378988'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_07.html' title='ममता की ताजपोशी की तैयारी'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDRzAPRZ94I/AAAAAAAAAuI/uaSVA6vnDM4/s72-c/mail.google.com.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-8443451794837863843</id><published>2010-07-04T07:02:00.000-07:00</published><updated>2010-07-15T02:20:29.624-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तहलका'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='न्याय का स्वरूप'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समीक्षा'/><title type='text'>न्याय का स्वरूप पर तहलका में समीक्षा</title><content type='html'>&lt;a href="http://www.tehelkahindi.com/review/books/624.html"&gt;तहलका&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDCUn1PLEVI/AAAAAAAAAtw/V41JDhDpxSY/s1600/tehelka.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 101px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDCUn1PLEVI/AAAAAAAAAtw/V41JDhDpxSY/s200/tehelka.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5490051357791162706" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-8443451794837863843?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/8443451794837863843/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_04.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/8443451794837863843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/8443451794837863843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post_04.html' title='न्याय का स्वरूप पर तहलका में समीक्षा'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' 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src="http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDBVUK6QCMI/AAAAAAAAAtg/b_FWRGN3T18/s200/04_07_2010_196_011.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5489981750779054274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-5317046356748170762?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/5317046356748170762/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5317046356748170762'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5317046356748170762'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='समीक्षा_  सखी'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TDBVUK6QCMI/AAAAAAAAAtg/b_FWRGN3T18/s72-c/04_07_2010_196_011.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-7977712459539796587</id><published>2010-06-29T02:31:00.007-07:00</published><updated>2010-06-29T09:51:22.406-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नागार्जुन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अभिज्ञात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जन्म शती वर्ष'/><title type='text'>अनवरत गत्यात्मकता के विलक्षण कवि नागार्जुन</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TCm_znh7VxI/AAAAAAAAAtI/Kuq1I1-aAu4/s1600/naga-abhi.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 154px; height: 106px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TCm_znh7VxI/AAAAAAAAAtI/Kuq1I1-aAu4/s200/naga-abhi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5488128514433177362" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;blockquote&gt;फोटो कैप्शनः बाएं से अभिज्ञात, नागार्जुन, मंजु अस्मिता, सकलदीप सिंह व अन्य&lt;/blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;26 जून से शुरू बाबा नागार्जुन के जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(परिचयः नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र है परंतु हिन्दी साहित्य में वे बाबा नागार्जुन के नाम से मशहूर रहे हैं। जन्म : 1911ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ग्राम तरौनी, जिला दरभंगा में। परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा। सुविख्यात प्रगतिशील कवि एवं कथाकार। हिन्दी, मैथिली, संस्कृत और बांग्ला में काव्य रचना। मातृभाषा मैथिली में "यात्री" नाम से लेखन। मैथिली काव्य संग्रह "पत्रहीन नग्न गाछ" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित। छः से अधिक उपन्यास, एक दर्जन कविता संग्रह, दो खण्ड काव्य, दो मैथिली;(हिन्दी में भी अनूदित)। कविता संग्रह, एक मैथिली उपन्यास, एक संस्कृत काव्य "धर्मलोक शतकम" तथा संस्कृत से कुछ अनूदित कृतियों के रचयिता। उनके मुख्य कविता-संग्रह हैं: सतरंगे पंखों वाली, हज़ार-हज़ार बाहों वाली इत्यादि। उनकी चुनी हुई रचनाएं दो भागों में प्रकाशित हुई हैं। निधन : 5 नवम्बर 1998।) &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ना&lt;/span&gt;गार्जुन के साथ हिन्दी कविता का आचरण बदला। कविता सुरुचि सम्पन्न पाठकों की परिधि से निकलकर चायखानों तक आयी। यह बदलाव सहज उपलब्ध हो सका हो ऐसा नहीं है। इसका मूल्य कबीर से लेकर नागार्जुन तक ने चुकाया है। कलाहीनता के आरोप झेलते हुए और वक्तव्यबाज कहलाते हुए भी इन्होंने ऐसा किया। कविता का सड़क और नुक्कड़ पर उतर आना किस-क़दर ख़तरनाक़ हो सकता है यह कहने की आवश्यकता नहीं। समाज के दुःख-सुख, जद्दोजहद को सीधे-सीधे कविता में उसी के सामने लौटाना एक दुस्साहस ही है। मीडिया द्वारा बुनी, रची, सोची गयी साज़िशों और अवसरवादी मानकों ध्वस्त करते हुए सच को अपनी नजर से देखकर उस सीधे पाठकों और श्रोताओं तक पहुंचे यह नागार्जुन के ही बूते का था। जनता को उकसाने के आरोप उन पर बड़ी आसानी से लगाये जा सकते थे, जो इसी माइने में सार्थक भी है-&lt;br /&gt;'आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी&lt;br /&gt;यही हुई है राय जवाहरलाल की&lt;br /&gt;रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की&lt;br /&gt;यही हुई है राय जवाहरलाल की&lt;br /&gt;आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ, शाही बैण्ड बजायें&lt;br /&gt;आओ बन्दनवार सजायें&lt;br /&gt;खुशियों से डूबें उतरायें&lt;br /&gt;आओ तुमको सैर करायें&lt;br /&gt;उटकमंड की, शिमला नैनीताल की।' (नागार्जुन, प्रतिनिधि कविताएं, सम्पादक-नामवर सिंह, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 98)&lt;br /&gt;ऐसे कवियों के लिए जनता एक अमूर्त वस्तु नहीं है:जिसकी अमूर्तता की चिन्ता स्व.विजयदेव नारायणदेव साही को हमेशा रही। ना ही उनके यहां उनका दुःख-दर्द अख़बारों से छनकर आता है। उनका काव्य-संसार लोकगीतों, लोककथाओं में अपना रूप बड़ी अन्तरंगता के साथ तलाश सकता है। यह अन्तरंगता मात्र लोगों केसात ही नहीं, बल्कि प्राणियों और वनस्पतियों से भी है, प्रकृति से भी। यही कारण है कि नागार्जुन को जहां विघटन के कई स्तरों का पता है, वहीं उल्लास के अनन्त अवसरों का भी, जो प्रकृति के बगैर तादात्म्य स्थापित किये संभव नहीं-&lt;br /&gt;'धूप में पसरकर लेटी है&lt;br /&gt;मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सूअर...&lt;br /&gt;जमना-किनारे&lt;br /&gt;मखमली दूबों पर&lt;br /&gt;पूस की गुनगुनी धूप में &lt;br /&gt;पसरकर लेटी है&lt;br /&gt;वह भी तो मादरे हिन्द की बेटी है&lt;br /&gt;भरे-पूरे  बारह थनों वाली!&lt;br /&gt;लेकिन अभी इस वक््त छौनों को पिला रही है दूध&lt;br /&gt;मन-मिज़ाज़ ठीक है&lt;br /&gt;कर रही आराम&lt;br /&gt;अखरती नहीं है भरे-पूरे थनों की खींच-तान&lt;br /&gt;दुधमुंहे छौनों की रग-रग में &lt;br /&gt;मचल रही है आख़िर मां की हो तो जान!' (वही, पृष्ठ 77)&lt;br /&gt;नागार्जुन के अपने लोग गांव के किसान हैं और नगर के श्रमिक। वे इनकी यातनाओं को भी उसी शिद्दत से महसूस कर लेते हैं जिस सदाशयता से उनके हास। यह अद्भुत है कि यह वर्ग किन विषम परिस्थितियों में कैसे और कहां रत्ती-रत्ती खुशी पाता चलता है। नागार्जुन की कविता उल्लास की अनेक परिषाभाएं एक साथ दे सकती है, जो अन्तत्र दुर्लभ है। कई-कई तो अपरिभाषित रह जाने का जोख़िम और माद्दा रखती हैं।&lt;br /&gt;उनकी कविता तटस्थ कविता नहीं है, जो मानवीय सरोकारों से उठ कर आध्यात्म और स्व-मुक्ति की सोचे। वह पक्षधरता की हिमायती है और वह पक्ष है-सर्वहारा का। इस पक्षधरता के लिए वे निरन्तर कटिबद्ध और प्रतिबद्ध रहे हैं-&lt;br /&gt;'प्रतिबद्ध हूं, जी हां प्रतिबद्ध हूं&lt;br /&gt;बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त&lt;br /&gt;संकुचित स्व की आपाधापी के निषेधार्थ।' (वही, पृष्ठ 15)&lt;br /&gt;यही कारण है कि उनका रचना-क्रम जिस पक्ष को प्रारम्भ में साधता है साधता ही चला गया है। इस पक्षधरता के पीछे तत्कालिक उद्वेग न था बल्कि वह वैज्ञानिक सोच था जो शोषित और दमित जनता की मुक्ति में समाज की सम्पन्नता और खुशहाली देखता है। उनका अभिष्ट साहित्यिक नहीं सामाजिक क्रांति है। नागार्जुन का जन यही है जो उनकी ममता, स्नेह और समर्थन का पात्र है। इसके प्रति लिखते हुए नागार्जुन में सहज की कोलमला आ जाती है, एक गहरी संवेदना जिसके भीरत करुणा की अविरल धार है, कहीं-कहीं रुमानियत की हद तक। और यह स्वाभाविक है अपने प्रियजन के पक्ष में लिखते हुए। उनके प्रियजन भारत के किसान, मज़दूर और नवयुवक हैं। अखिल विश्व के संघर्षशील लोग हैं।&lt;br /&gt;शोषक पक्ष की बात आते ही उनका लहज़ा व्यंग्यात्मक हो उठता है जिसकी धार गहरे तक असर करती है। व्यंग्य साहित्य में निचला दर्ज़ा पाते हुए भी नागार्जुन के यहां प्रतिष्ठा पाता है। नागार्जुन व्यंग्य की महत्ता और सिध्दि के कवि हैं। जन-पक्ष में इसका इस्तेमाल होने के कारण व्यंग्य जीवन का सकारात्मक पक्ष ही साबित होगा। कम-से-कम उनके संदर्भ में यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है। उसकी एक बानगी देखें-&lt;br /&gt;'दिल्ली की सर्दी कम होती&lt;br /&gt;तंत्र-मंत्र के हीटर से&lt;br /&gt;अपनी किस्मत आप मिलता लो&lt;br /&gt;योग-सिद्धि की मीटर से&lt;br /&gt;राजघाट में बातें कर लो&lt;br /&gt;यूसुफ से या पीटर से&lt;br /&gt;लोकतंत्र का जूस मिलेगा&lt;br /&gt;नाप-नाप कर लीटर से।' (नागार्जुन, पुरानी जूतियों का कोरस, 1983, पृष्ठ 144)&lt;br /&gt;नागार्जुन की कविता अपने यथार्थबोध के कारण भी याद की जाती है। वे व्यक्तिगत को समष्टिगत यथार्थ की कसौटी पर कसकर ही उसकी हीनता और उत्कृष्टता का निर्धारण करते हैं। व्यक्तिवादी मूल्यों के लिए उनककी कविता में कत्तई गुंजाइश नहीं है किन्तु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि व्यक्ति के रागतत्त्वों और प्रेम तथा शृंगार भाव की उन्होंने उपेक्षा की हो या ये उनके कार्य-प्रदेश में वर्जित रहे हों। ये भाव मानव-मात्र के हैं और सर्वव्यापक भी। नागार्जुन की कविता में रागतत्त्व जिस सहजता और तन्मयता से आये हैं, वे सार्वजनीन हैं। पूरे आदमी की भरपूर ज़िन्दगी से। इन्हें निजी मन की दमित व कुण्ठित कामनाओं का दस्तावेज़ नहीं बनाया गया है और ना ही इसमें डूबकर ज़िन्दगी की वास्तविकताओं को व्यर्थ और सारहीन। उनके यहां राग-तत्त्व जीवन के संघर्ष में प्रेरक और साहचर्य हेतु आया है।&lt;br /&gt;प्रकृति और सौन्दर्यबोध उनकी कविता के महत्त्वपूर्ण सोपान हैं जो एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति के प्रति उनका सम्बंद कुछ हद तक रागात्मक ही है। यह उनके सौन्दर्यबोध की क्लासिक ऊंचाई के चलते है। नागार्जुन भविष्य के विश्वास के कवि हैं। वे आस्था के और नये युग के नव निर्माण के लिए नवयुवकों से आशावान रहे। भविष्य के लिए उनके पास जो कुछ था वह दे जाना चाहते थे। एक जीवन्त कवि की एक बड़ी विशेषता यह होती है कि वह आने वाली पीढ़ी को अपनी विरासत बड़े जतन, प्यार और विश्वास के सात दे जाये। वह भी संघर्ष की विरासत। वे एक सीमाबद्ध कवि कदापि नहीं हैं। उसका एक कारण स्थितियों को खुली नज़र से देखने और उसे बिना लाग-लपेट कहने की धड़क थी। तत्कालीन मसलों पर उन्होंने खूब लिखा और ज़रूरत महसूस करने पर उन्हें ताली बजाकर उन्हें नुक्कड़ों पर गाया और नाचा भी है। भले इससे कला का ह्रास हुआ हो, कला निथरी न हो और कई बार कविता कविता रह ही नहीं गयी हो। ऐसी रचनाओं को एक जागरुक और संघर्षशील नागरिक की तत्कालिक आवश्यक प्रतिक्रिया समझ कर संतोष करना पड़ सकता है। संस्कृत साहित्य के व्यापक अध्ययन मनन के कारण एक कलात्मक संस्कार भी नागार्जुन में कहीं-न-कहीं विद्यामान रहा। इसीलिए एक ओर उनकी भाषा, बोध और ज़मीन खुरदुरी है तो दूसरी ओर कई कविताओं में ऐसी कलात्मक ऊंचाइयां और गत्यात्मकता है, जो हतप्रभ और मुग्ध कर देती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-7977712459539796587?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/7977712459539796587/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_2029.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/7977712459539796587'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/7977712459539796587'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_2029.html' title='अनवरत गत्यात्मकता के विलक्षण कवि नागार्जुन'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TCm_znh7VxI/AAAAAAAAAtI/Kuq1I1-aAu4/s72-c/naga-abhi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-3504198213405574375</id><published>2010-06-20T12:54:00.000-07:00</published><updated>2010-06-26T12:37:32.682-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अभिज्ञात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कवि'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अज्ञेय'/><title type='text'>कलात्मक सुगढ़ता व कथ्यात्मक औदर्य के कविः अज्ञेय</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TB51zCLUL7I/AAAAAAAAAtA/oIV7JVtLSFY/s1600/agyeya-sati.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 140px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TB51zCLUL7I/AAAAAAAAAtA/oIV7JVtLSFY/s200/agyeya-sati.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5484950915801952178" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(7 मार्च, 1911-4 अप्रैल, 1987) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जन्मशती वर्ष पर विशेष&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अज्ञेय हिन्दी कविता में एक ऐसे बहुआयामी हस्ताक्षर का नाम है जिसकी गहन-गंभीर काव्य-यात्रा एक धैर्यपूर्ण विवेचन की मांग करती है। उनमें जहां कलात्मक सुगढ़ता है वहीं कथ्यात्मक औदर्य भी। उनकी वाम विरोधी अस्तित्ववादी अवधारण सदैव ही प्रगतिशील काव्य-यात्रा से रगड़ खाती हुई भी अपने वैशिष्ट के कारण मूल्यवान और अर्थपूर्ण बनी रही। अपने जीवन-काल में ही अज्ञेय एक मिथक और चुनौती दोनों एक साथ बने रहे तथा उनका प्रभाव हिन्दी-काव्य जगत में सहज स्वीकारणीय रहा। उनकी गहन अध्ययनशीलता और रचनात्मक क्षमता सदैव ही ईर्ष्या की वस्तु रही और सुखद आश्चर्य की भी। अज्ञेय की चिन्तनशीलता और विचार पर सार्त्र, अल्बेयर कामू आदि के वैचारिक चिन्तन का व्यापक प्रभाव रहा, फिर भी अज्ञेय उतने ही परम्परावान हैं जितने कि आधुनिक। यही अन्तर्विरोध उनके व्यक्तित्व को सम्मोहक और रहस्यमय बनाता रहा। कन्हैयालाल नन्दन उनके बारे में लिखते हैं-'कैसी विडम्बना रही है कि एक ओर उनकी रचनाधर्मिता को नये मूल्य गढ़ने में भंजक की भूमिका निभानी पड़ी है तो दूसरी ओर उनके निबन्धों की अनेक पंक्तियों में परम्परा को नये सिरे से पुनर्जीवित करने की ललक का प्रतिबिम्बन भी है।' (कन्हैयालाल नंदन, नवभारत टाइम्स, दिल्ली, 5 अप्रैल 1987)&lt;br /&gt;अज्ञेय ने कविता में उस समय प्रवेश किया जब प्रगतिशील काव्य-धारा ने सिर्फ़ स्थापित थी, बल्कि कविता का पर्याय थी। छायावादी कवि पूर्णतया नकारे जा चुके थे। हर प्रकार के व्यक्तिवादी मूल्यों पर शोक प्रस्ताव स्वीकृत हो चले थे। प्रगतिशीलों में एक नया रूमानवाद था। आदर्शवादी रूमानवाद, जो यथार्थ के रूप में पहचाना जा रहा था। उनकी कविताओं में जोश था, अतिरिक्त उत्साह था, क्रांतिकारी चेतना थी, बुर्जुआ और पूंजीवादी तत्त्वों से लोहा लिया जा रहा था, श्रमिक और किसान जन-नायक थे किन्तु इन सब ख़ूबियों के बावज़ूद बहुत कुछ था, जो गौण था, जो कविता को कविता रहने देने में बाधक था। यहां कला गौण थी। इस कविता में प्रतिबद्धता कम थी, उसका प्रदर्शन अधिक था। कविताएं मार्क्स का वैचारिक काव्यानुवाद भर होकर रह गयीं। समाज सर्वोपरि था। व्यक्ति की आशा-आकांक्षा गौण ही नहीं हेय थी। यह काव्य-युग कला और उसमें व्यक्ति के ह्रास का रहा।&lt;br /&gt;अज्ञेय के पास इन दोनों ख़ामियों का पूरक तत्त्व था। कला और व्यक्ति अज्ञेय की मूल स्थापनाएं बनीं। काव्य-कला के स्तर पर सबसे अधिक प्रयोग हिन्दी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल के पश्चात अज्ञेय के रचना-प्रभाव काल में हुए। विवादों के बावज़ूद यह कमोबेश स्वीकार किया जाता है कि प्रयोगवादी काव्य-धारा के प्रवर्तकों में अज्ञेय की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने न सिर्फ़ सप्तक काव्यों का सम्पादन किया बल्कि आलोचना क्षेत्र में प्रयोगवाद का औचित्य सिद्ध करते हुए उसके महत्त्व व वैशिष्ट को रेखांकित किया। वे उसकी सीमाएं भी जानते थे, अतः शीघ्र ही नयी कविता के आन्दोलन से भी जुड़े और उसमें बहुत कुछ जोड़ा। अपने व्यापक अध्ययन और सतत रचनाशीलता के कारण यह हो पाया। आधुनिकता की दृष्टि से अज्ञेय अग्रदूत कहे जा सकते हैं। अज्ञेय ने क्षण के महत्त्व को स्वीकार कियो, जो क्षणिकता का निषेध करती है और यह नयी कविता की केन्द्रीय दृष्टि रही-&lt;br /&gt;'यह सूरज का जपा-फूल&lt;br /&gt;नैवेद्य चढ़ चला&lt;br /&gt;सागर-हाथों&lt;br /&gt;अम्बा सांस-भर&lt;br /&gt;फिर में यह पूजा-क्षण&lt;br /&gt;तुम को दे दूंगा&lt;br /&gt;क्षण अमोघ है, इतना मैंने &lt;br /&gt;पहले भी पहचाना है&lt;br /&gt;इसलिए सांस को नश्वरता से नहीं बांधता &lt;br /&gt;किन्तु दान भी है, अमोघ, अनिवार्य,&lt;br /&gt;धर्मः&lt;br /&gt;यह लोकालय में धीरे-धीरे जान रहा हूं&lt;br /&gt;(अनुभव के सोपान!)&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;दान वह मेरा तुम्हीं को है।' (.अज्ञेय, कितनी नावों में कितनी बार, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, पांचवां सस्करण, 1986, पृष्ठ 16)&lt;br /&gt;अज्ञेय की कविताओं में व्यक्ति की सत्ता सर्वोपरि है। उसके हर्ष, विषदा, मनोकामनाएं, उसका प्रेम, सब कुछ महिमामण्डित और चिन्तनीय है। व्यक्ति के मन में घटने वाली छोटी-से-छोटी उद्विग्नता सृष्टि और समाज की बड़ी-बड़ी घटनाओं से कत्तई कम नहीं। अज्ञेय की साधना व्यक्ति के रूप में सत्य को पाने की है। शुभ और सुन्दर व्यक्ति और उसकी कामनाओं का ही नाम है।  'अपने अद्वितीय होने का अहंकार उन्हें एक ऐसा गहरा और समृद्ध आत्मविश्वास देता है कि दुनिया की हर चीज़ को वे अपनी निजी कसौटी पर कसकर ही ग्रहण या व्यक्त करना चाहते हैं।'(राजेन्द्र यादव, व्यक्ति युग का समापन, वैचारिकी, सम्पादकः मणिका मोहनी, अप्रैल-जून 1988, पृष्ठ 69)&lt;br /&gt;'दरअसल अज्ञेय जी व्यक्तिवाद नहीं, व्यक्तित्ववाद के लेखक हैं। स्वयं के व्यक्तित्व की स्थापना को उन्होंने सबसे ऊपर रखा। परम्परा, संस्कृति या विचारधारा, हर जगह उनका संघर्ष एक नियामक या कम से कम प्रथम प्रस्तावक की हैसियत बनाने का है। प्रयोग हो या प्रचलन, प्रथमता उनकी पहली शर्त रहीxxxxमैं  उनके व्यक्तित्व का सबसे मुख्य तथ्य है। गीता के 'मैं' में तो 'हम' को कोई स्थान नहीं, क्योंकि वह व्यक्ति का विराट् है। अज्ञेय जी का 'हम' उनके 'मैं' का ही व्यक्तिगत विस्तार है। संस्कृति, समाज, देश और काल की बड़ी से बड़ी चिन्ता करते हुए भी अज्ञेय जी स्वयं के व्यक्ति का अतिक्रमण नहीं, सिर्फ़ विस्तार करते रहे हैं।' (शैलेश मटियानी, काल चिन्तक की अकाल यात्रा, वही, पृष्ठ 61)&lt;br /&gt; अज्ञेय की कविता में शून्य और मौन की उपस्थिति बराबर है, जो विस्मयकारी और हिन्दी कविता में प्रायः अनुपलब्ध है। उनका चुप वाचकता से अधिक कहता जान पड़ता है। वह चुप्पी कहे जाने के समानान्तर उपस्थित है, जो कहे जाने से रह जाया करती है या अकथनीय ही बने रह जाने को अभिशप्त है। इस उपक्रम में मौन सन्नाटा कहने का उपक्रम है। अतिरिक्त अर्थ व्यंजकता और रहस्यमयता के साथ, अलौकिक सा। वर्षों पहले की उनकी एक कविता है-'मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊं-इन तीन शब्दों की खोज में उनकी कविता मौन की ओर बढ़ती हुई कविता है। पहला शब्द वह जो जिह्वा पर लाया न जा सके, दूसरा वह जो कहा तो जा सके पर दर्द से ओछा ठहरता हो और तीसरा खरा शब्द वह, जिसे पाकर यह प्रश्न उठाया जा सके कि क्या इसके बिना काम नहीं चलेगा? अर्थात् वे तीन शब्द जिनसे गुजर कर अन्ततः मौन रहा जा सके।' ( डॉ.सुमन राजे, शब्द से मौन तक की यात्रा, वही, पृष्ठ 63) &lt;br /&gt;अज्ञेय की कविता में मौन, सन्नाटे व एकान्तिकता में एक गहरी उदासी छिपी है, जो उनकी अधिकांश कविताओं में झांक-झांक जाती है। उनकी कविताओं में प्रकृति प्रमुख रूप से उनके रागात्मकता के आलम्बन के लिए ही आयी है किन्तु उस पर जहां कहीं भी स्वतंत्र रचना है, वहां वे उस पर रीझें हैं मगर इस रीझ में एक रहस्यमयता है। उनकी कविता में अकेलापन है मगर असहाय अकेलापन नहीं, दम्भ में दिप्त अकेलापन जिसका मामूलीपन भी उसकी खासियत है। उसकी घुटन, निराशा, शंका, कुण्ठा, स्व-केन्द्रियता सब कुछ निरा अपना और स्वाभाविक है। अपने मन की गांठें खोलना, गुत्थियां सुलझाना, आत्मविश्लेषण, यह सब कुछ कविता की ऐतिहासिक और प्रारंभिक जरूरत उन्हें हमेशा महसूस होती रही। उनकी कविता अनेकायामी यथार्थ की तहों की कविता है। यह सच है कि उनमें भावात्मक या संवेदनात्मक अन्तःक्रियाओं से अधिक बौद्धिकता है। स्वर इतना संयमित की आवेग, आक्रोश या संघर्षशीलता उभर नहीं पायी है मगर शिल्प का संतुलन अपनी प्रभविष्णुता से सदैव प्रभावित करता है चाहे वह लम्बी कविता 'असाध्य वीणा' हो या छोटी कविताएं, जो 'हाइकू' शैली में लिखी गयी हैं। अपने मितकथन में गहन वैचारिकता, दार्शनिकता का जैसा प्रयोग वे करते हैं वह एक किस्म के मिथक की सृष्टि करता चलता है। अज्ञेय का काव्य संवेदना से नहीं, बौद्धिकता से अनुशासित है और उसी परिप्रेक्ष्य में उनकी कविता पर विचार समीचीन होगा।&lt;br /&gt;-----------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-3504198213405574375?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/3504198213405574375/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/3504198213405574375'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/3504198213405574375'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_20.html' title='कलात्मक सुगढ़ता व कथ्यात्मक औदर्य के कविः अज्ञेय'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TB51zCLUL7I/AAAAAAAAAtA/oIV7JVtLSFY/s72-c/agyeya-sati.jpg' height='72' 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मज़दूरों को प्रति घंटा मात्र 26 पेंस (16 रुपए) ही मज़दूरी मिलती है जो ग़लत है। प्रवक्ता का कहना था कि अब केटी प्राइस के परफ्य़ूम की बॉटलिंग का काम भारत से हटाकर ब्रिटेन और फ्रांस ले आया गया है। भारत में इस परफ्य़ूम की बॉटलिंग का काम प्रगति ग्लास कंपनी करती थी। केटी प्राइस को जॉर्डन के नाम से भी जाना जाता है और उनके नाम पर कई ब्रांडेड उत्पाद बिकते हैं जिनमें बिस्तर, किताबें और स्वीमिंग से जुड़े सामान भी हैं। &lt;br /&gt;यह खबर इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि भारत इधर आउटसोर्सिंग के लिए दुनिया भर में विशेष तौर पर लोकप्रिय हुआ है और कई देश भारत में कम कीमत पर काम कर रहा हैं। गौरतलब यह है कि यहां के पढ़े लिखे लोगों से आनलाइन काम कराने का ठेका लेने वाली भारतीय कम्पनियां विदेश से वहां काम काम वहां के बाजार के भाव के तुलना में कम कीमत पर ही लेतीं बल्कि वे उसमें अपना हिस्सा बहुत अधिक रखकर यहां जिन लोगों से काम कराती हैं वह बहुत ही शर्मनाक होता है। किन्तु बेरोजगारों की फौज वाले भारत में बेकार बैठने की तुलना में जितना मिले उसी में काम करो के मनोभाव के साथ काम कर रही हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि गूगल जैसी कंपनी के अत्यंत महत्वपूर्ण शोधपरक अंग्रेजी आलेखों का अनुवाद भारतीय भाषाओं में 40 पैसे प्रतिशब्द में कराया जा सकता है। &lt;br /&gt;आज जब कि एक देश से दूसरे देश के बीच के सम्बंध का पूरा तानाबाना ही व्यवसायिक हितों से जुड़ा होता है और मित्र और शत्रु राष्ट्र का मुख्य आधार कोई और मूल्य नहीं बल्कि परस्पर व्यवसायिक हित हैं व्यावसायिक नैतिक को विशेष तरजीह दिये जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। जो भी देश और कंपनियां नैतिकताओं को तरजीह देंगी आगे बढ़ेंगी और यह होना भी चाहिए। पूरी दुनिया को शोषक और शोषित में बांटने वाले माक्र्सवादी सिद्धांतों के सिद्धांतों का काट व्यावसायिक नैतिकता के विकास में ही निहित है। वाजिब कार्य की वाजिब कीमत देना उनमें सबसे महत्वपूर्ण है। आशा है इत्र प्रकरण से अन्य कंपनियां सबक लेंगी। कई कंपनियां पहले भी बच्चों से काम कराने जैसे मामलों की शिकायत पायी जाने पर ऐसे कदम उठा चुकीं हैं किन्तु वाजिब मेहनताना का मुद्दा कुछ हटकर है किन्तु बड़ा मुद्दा है और इसकी परिधि भी व्यापक है। विदेशों ही नहीं अपने घरेलू बाजार में भी इन बातों पर ध्यान दिये जाने की जरूरत है। कम कीमत पर वस्तुएं पाने की होड़ के दौर में इस बात की ओर भी सबका ध्यान आकृष्ट कराया जाना है कि कोई वस्तु कम कीमत पर उपलब्ध क्यों है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-5843164395687178525?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/5843164395687178525/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_17.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5843164395687178525'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5843164395687178525'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_17.html' title='केटी के परफ्यूम की व्यावसायिक नैतिकता को सलाम!'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-2692330496771503932</id><published>2010-06-14T00:44:00.001-07:00</published><updated>2010-06-14T00:48:21.002-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रवीन्द्रनाथ'/><title type='text'>रवीन्द्रनाथ के डेढ़ सौ साल पर आलेख</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TBXeVZf9GLI/AAAAAAAAAso/2K0_4qVuzMU/s1600/name.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 87px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TBXeVZf9GLI/AAAAAAAAAso/2K0_4qVuzMU/s200/name.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5482532580596979890" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TBXeLn2DmTI/AAAAAAAAAsg/pziBWe3pv3E/s1600/ori.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 63px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TBXeLn2DmTI/AAAAAAAAAsg/pziBWe3pv3E/s200/ori.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5482532412649085234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-2692330496771503932?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/2692330496771503932/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_14.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2692330496771503932'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2692330496771503932'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_14.html' title='रवीन्द्रनाथ के डेढ़ सौ साल पर आलेख'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TBXeVZf9GLI/AAAAAAAAAso/2K0_4qVuzMU/s72-c/name.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-5716351351707025549</id><published>2010-06-13T12:45:00.000-07:00</published><updated>2010-06-26T12:33:54.141-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शमशेर बहादुर सिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जन्म शती वर्ष'/><title type='text'>अविचल रागात्मक संवेदना के अक्षत कवि-शमशेर बहादुर सिंह</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TBU2eYbAsoI/AAAAAAAAAsY/_zBGbN3m-Is/s1600/shamsher_image.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 161px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TBU2eYbAsoI/AAAAAAAAAsY/_zBGbN3m-Is/s200/shamsher_image.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5482348016973165186" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(जन्म शती वर्ष पर विशेष)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;परिचयः जन्म: 13 जनवरी 1911-निधन: 12 मई 1993।&lt;br /&gt;जन्म स्थान-देहरादून। प्रमुख कृतियाँ-कुछ कविताएँ (1959), कुछ और कविताएँ (1961), चुका भी हूँ मैं नहीं (1975), इतने पास अपने (1980), उदिता: अभिव्यक्ति का संघर्ष (1980), बात बोलेगी (1981), काल तुझसे होड़ है मेरी (1988)।  1977 में "चुका भी हूँ मैं नहीं" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं मध्य प्रदेश साहित्य परिषद के "तुलसी" पुरस्कार से सम्मानित। सन् 1987 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा "मैथिलीशरण गुप्त" पुरस्कार से सम्मानित।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;शमशेर बहादुर सिंह अपने काव्य-शिल्प एवं संवेदन-वैशिष्टय के कारण हिन्दी काव्य-परिदृश्य में एक अपूर्व मेधा के रचनाकार दिखायी देते हैं। प्रगतिवादी काव्य-धारा से लेकर प्रयोगवाद, नयी कविता, साठोत्तरी कविता से जनवादी कविता तक साहित्य के अनेक आन्दोलन और प्रवृत्तियां प्रवहमान हुईं किन्तु इनमें अपनी प्रबल काव्य-चेतना के चलते वे इन सबके प्रभाव को अपनी शर्तों और अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर अलग प्रकार से स्वीकारते दिखायी देते हैं। यही नहीं शमशेर का झुकाव उर्दू-फ़ारसी काव्य की ओर भी रहा तथा उन्होंने ग़ज़लें भी लिखीं हैं, इसलिए उलझाव के दोहरे मोर्चे उनके रू-ब-रू उपस्थित रहे होंगे, ऐसा कहने की स्थिति बनती है।&lt;br /&gt;शमशेर की अविचल रागात्मक संवेदना इससे अ-क्षत और अपने तेवर में प्रगाढ़तर होती गयी, जो उनकी लेखकीय जिजीविषा की उद्दाम बनावट और माद्दा का परिचय देती है। शमशेर में जहां नित-नूतनता है वहीं निरन्तर बढ़ाव या उठान भी। नित-नित परिष्कृत होती उनकी शैली अपने वैशिष्ट के चलते एक जीवित मिथक गढ़ती गयी है। शमशेर स्थूल के आग्रही किन्हीं विशेष परिस्थितियों में अपवादवश भले रहे हों, मूलतः सूक्ष्म संवेगों की छटी हुई अनुभूतियों का खाका उनकी कविताओं में विद्यमान हैं-&lt;br /&gt;'शाम का बहता हुआ दरिया कहां ठहरा!&lt;br /&gt;सांवली पलकें नशीली नींद में जैसे झुकें&lt;br /&gt;चांदनी से भरी भारी बदलियां हैं&lt;br /&gt;ख़्वाब में गीत पेंगे लेते हैं&lt;br /&gt;प्रेम की गुइयां झुलाती हैं उन्हें;&lt;br /&gt;-उस तरह का गीत, वैसी नींद, वैसी शाम-सा है&lt;br /&gt;वह सलोना जिस्म।&lt;br /&gt;उसकी अधखुली अंगड़ाइयां हैं&lt;br /&gt;कमल के लिपटे हुए दल&lt;br /&gt;कसे भीनी गंध में बेहोश भौंरे को।'( कुछ कविताएं व कुछ कविताएं और, पृष्ठ 64)&lt;br /&gt;ऐसा होना शुभ है कि शमशेर एक चित्रकार भी रहे। कविता में चित्रों का रचाव कला की संभावना और व्यापकता को अतिरिक्त गहनता, व्यापकता और सूक्ष्मता प्रदान करता है। शमशेर के यहां शब्दों के रंग और उन रंगों के उतार-चढ़ाव भी हैं। दो कलाओं का संयोग एक किस्म के सौन्दर्य-बोध और आस्वाद की सृष्टि से पाठक को सम्पृक्त करता है, जिसको महसूस करने की जितनी सुविधाएं हैं उन्हें व्याख्यायित करने की उतनी कठिनाइयां भी-&lt;br /&gt;'पूरा आसमान का आसमान है&lt;br /&gt;एक इन्द्रधनुषी ताल&lt;br /&gt;नीला सांवला हलका-गुलाबी&lt;br /&gt;बादलों का धुला&lt;br /&gt;पीला धुआं...&lt;br /&gt;मेरा कक्ष, दीवारें, क़िताबें, मैं, सभी&lt;br /&gt;इस रंग में डूबे हुए से&lt;br /&gt;मौन।&lt;br /&gt;और फिर मानो कि मैं&lt;br /&gt;एक मत्स्य-हृदय में &lt;br /&gt;बहुत ही रंगीन&lt;br /&gt;लेकिन&lt;br /&gt;बहुत सादा सांवलापन लिए ऊपर&lt;br /&gt;देखता हूं मौन पश्चिम देश :&lt;br /&gt;लहरों के क्षितिज पर&lt;br /&gt;एक &lt;br /&gt;बहुत ही रंगीन हलकापन&lt;br /&gt;बहुत ही रंगीन कोमलता।&lt;br /&gt;कहां हैं &lt;br /&gt;वो क़िताबें, दीवारें, चेहरे, वो&lt;br /&gt;बादलों की इन्द्रधनुषी हंसियां?&lt;br /&gt;बादलों में इन्द्रधनुषाकार लहरीली &lt;br /&gt;लाल हंसियां&lt;br /&gt;कहां हैं?' (वही, पृष्ठ 49)&lt;br /&gt;यहां यह कह देना समीचीन होगा कि शमशेर की संचालित जीवन-दृष्टि प्रगतिशील है और कला के मानदण्ड में यह दृष्टि उनके 'विजन' को एक रास्ता देती है, दूसरी ओर भटकाव का शिकार नहीं होने देती। शमशेर की 'बैल' कविता श्रम पर लिखी सार्थक नक्काशीदार अद्भुत कविता है, जो कला और दृष्टि के साझे की मिसाल है। शमशेर शहरी स्वभाव के कवि हैं। गांव में उनका मन कम रमा है। नगरबोध के त्रासद अनुभव उनकी कविता में अक्सर पाये जा सकते हैं, आसानी से। एक और सकारात्मक कला पक्ष है उनकी कविता का वह है-प्रेम। प्रगतिशील धारा के आगमन के पश्चात लम्बी अवधि तक प्रेम कविताएं कम लिखी गयीं और जो लिखी गयीं वे सतही और गैर-ईमानदार हैं। अपनी स्वाभाविक और सहज मनोवृत्तियों का स्पर्श उनमें नहीं है और वे हृदय के उद्गारों से नहीं वैचारिकता से ओतप्रोत हैं। केदारनाथ अग्रवाल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, केदारनाथ सिंह जैसे कुछेक कवि इसके अपवाद हैं। शमशेर के पास प्रेम कविताओं की सम्पन्नता है। उसका कारण शायद यही ठीक जंचता है कि अन्दर से बिना बड़ा हुए बड़ी और निष्कपट कविता संभव नहीं, कम से कम प्रेम कविता तो नहीं ही। शमशेर में वह खरापन है, जो विश्वसनीय है। उनकी आन्तरिक उद्वेगों से उपजी कविताएं भरोसेमंद हैं। वैसी ही भरोसेमंद जैसी मुक्तिबोध की जनसंघर्ष पर लिखी कविताएं।&lt;br /&gt;शमशेर के पास कला और दृष्टि का अनूठा संगम था। कला की दृष्टि से उनकी कविताएं क्लासिक हैं और बोध के स्तर पर वामपंथी प्रगतिशील। अतएव कविता में शमशेर की उपस्थिति ने हिन्दी कविता को अधिकाधिक समृद्ध किया। शमशेर ने अपनी कविताओं के लिए जोख़िमभरा मार्ग चुना। उन्हें 'कवियों का कवि' यूं ही नहीं कहा गया। उन्होंने कला और कविता की स्वायत्त दुनिया की उपस्थिति को कमोबेश स्वीकार किया है और कई महत्त्वपूर्ण रचनाकारों पर कविताएं लिखीं-निराला से लेकर अज्ञेय, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, मोहन राकेश, गिन्सबर्ग, गुलाम रसूल संतोष से लेकर प्रभात रंजन तक पर। उनकी कविताओं में एक पठनीय दृष्टि-भंगी है, जो उनके लिखने के ढर्रे के कारण एक अलग आस्वाद का अनुभव कराती हैं या यह कहना ज्यादा ठीक पड़ेगा कि अनुभव का आस्वाद कराती हैं। एक नयी दिशा की ओर जाने वाले अर्थ का संकेत का नाम है-शमशेर की पाठ-प्रक्रिया। यह एक शर्त है उनकी कविता के साथ कि पाठक को उनकी कविता को समझने के लिए ख़ुद भी शामिल होना पड़ता है तथा अपनी ओर से कुछ जोड़-घटाव भी करना पड़ सकता है।&lt;br /&gt;शमशेर एक बिम्ब-समृद्ध कवि हैं। वे ऐन्द्रिक बिम्बों के लिए अलग से पहचाने जा सकते हैं। इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि कवि संसार को अपने संवेगों और क्षमताओं के आधार पर दुनिया को अलग-अलग ग्रहण करता है और उस ग्राह्य में बहुत कुछ काट-छांटकर और उतना ही अपनी ओर से जोड़कर अपने सांचे में ढालकर कला में वापस उलीचता है। इस प्रकार कला गर्भधारण से लेकर प्रजनन तक की एक प्रक्रिया तक से गुज़रती है। शमशेर की कविता इस सच की आधार-शिला पर अपनी पुख़्ता पहचान के साथ उपस्थित है। उन्होंने शब्दों के मुहावरे नहीं गढ़े, किन्तु शब्दों को एक नया आचार दिया है और एक नया व्यवहार भी, जिसके कारण वे विशिष्ट बनते हैं और शमशेर की शैली के सम्मोहक चुम्बकत्व में एक नयी स्थिति में क़ायम रहते हैं, अधर में लटके हुए से, एक नये लोक में मंत्रबद्ध&lt;br /&gt;'चुका भी हूं मैं  नहीं&lt;br /&gt;कहां किया मैंने  प्रेम&lt;br /&gt; अभी&lt;br /&gt;जब करूंगा  प्रेम&lt;br /&gt;पिघले उठेंगे&lt;br /&gt; युगों के भूधर&lt;br /&gt;उफन उठेंगे&lt;br /&gt;सात सागर।&lt;br /&gt;किन्तु मैं हूं मौन  आज&lt;br /&gt;कहां सजाये मैंने साज &lt;br /&gt; अभी।'( चुका भी हूं मैं नहीं, द्वितीय संस्करण, 1981, पृष्ठ 111)&lt;br /&gt;शमशेर के बारे में शलभ श्रीराम सिंह का मानना था-&lt;br /&gt;'आज साठोत्तरी कविता के जिन चन्द कवियों की कविताओं को लेकर व्यक्तिवादी रुमानियत और रूपवादी रुझान की बात की जा रही है वस्तुतः वे शमशेर बहादुर सिंह की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले कवि हैं। ध्यान से देखने पर साफ़-साफ़ पता चल जायेगा कि ये कवि व्यक्तिवादी रुमानियत और रूपवादी रुझान के सांचों को तोड़कर भविष्य की मुख्यधारा को गति प्रदान कर रहे हैं।' (शलभ श्रीराम सिंह, समकालीन संचेतना,  कलकत्ता, 13 जुलाई 1990, पृष्ठ 2) शमशेर अपनी ग़ज़लों के लिए अलग से पहचाने जाते हैं। हिन्दी के कवियों में ग़ज़ल लेखन की प्रवृत्ति नयी नहीं है। उनके पूर्व भी भारतेन्दु, गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही', मैथिलीशरण गुप्त से लेकर सूर्यकान्त त्रिपाठी' निराला' आदि तक ने ग़ज़लें लिखीं। उनके समकालीनों में त्रिलोचन ने भी एक पूरा ग़ज़ल संग्रह  'गुलाब और बुलबुल' प्रकाशित करवाया। हालांकि यह विधा किसी और से उतनी नहीं सध पायी जितनी शमशेर से। शमशेर ने ग़ज़ल के परम्परागत स्वरूप को खण्डित किये बग़ैर उसे आत्मसात किया और ग़ज़ल की अपनी आन्तरिक आवश्यकताओं को पूरा करने में वे सफल भी रहे। 'सन् 1961 में प्रकाशित शमशेर बहादुर सिंह के संग्रह 'कुछ और कविताएं' में उनकी 7 ग़ज़लें संग्रहीत हैंxxxशमशेर के बाद ही सन् 1974-75 में दुष्यंत कुमार का प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी 52 ग़ज़लें संग्रहीत हैं। दुष्यंत भाषा के स्तर पर भारतेन्दु या निराला की परम्परा के कवि नहीं बल्कि शमशेर बहादुर सिंह की परम्परा के कवि हैं। दोनों की ग़ज़लें कई स्थानों पर उर्दू के कठिन शब्दों से भरी हैं परन्तु वे उसे आम बोलचाल की भाषा कहते हैं। जहां तक कथ्य का प्रश्न है दुष्यंत भारतेन्दु व निराला से जुड़ जाते हैं।' (डॉ.हनुमंत नायडू, जलता हुआ सफ़र, मुंबई, 1987, पृष्ठ 14) &lt;br /&gt;यह पहले ही कहा जा चुका है कि शमशेर ने ग़ज़ल के परम्परागत ढांचे को स्वीकारते हुए ही अपनी बात कही है और इस विरासत का मूल्य भी कम नहीं है। शिल्पगत ढांचे को तोड़कर नयी बात कहना किन्ही अर्थों में अपेक्षाकृत सरल है किन्तु परिपाटी के बीच रहकर नया कुछ कर ग़ुजरना कठिन। हिन्दी कवियों में शमशेर की परम्परा का लगभग वैसा ही निर्वाह किया शलभ श्रीराम सिंह ने। यह रास्ता उनकी पहचान को पुख़्ता करने वाला ही साबित हुआ। शमशेर लिखते हैं-&lt;br /&gt;'वही उम्र का एक पल कोई लाये&lt;br /&gt;तड़पती हुई सी ग़ज़ल कोई लाये&lt;br /&gt;हक़ीक़त को लायें तख़ैयुल से बाहर&lt;br /&gt;मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाये।' (कुछ कविताएं व कुछ और कविताएं, 1984, पृष्ठ 18/19)&lt;br /&gt;-----------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-5716351351707025549?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/5716351351707025549/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_13.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5716351351707025549'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5716351351707025549'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post_13.html' title='अविचल रागात्मक संवेदना के अक्षत कवि-शमशेर बहादुर सिंह'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TBU2eYbAsoI/AAAAAAAAAsY/_zBGbN3m-Is/s72-c/shamsher_image.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-6059970567906856657</id><published>2010-06-02T04:07:00.001-07:00</published><updated>2010-06-11T11:36:13.571-07:00</updated><title type='text'>परिवर्तन की आंधी में बंगाल ममता की ताजपोशी को तैयार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAY7ebFUYPI/AAAAAAAAArg/6nL7QLKfl5A/s1600/mamata.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 149px; height: 113px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAY7ebFUYPI/AAAAAAAAArg/6nL7QLKfl5A/s200/mamata.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5478131390594965746" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;स्थानीय निकाय परिणाम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल में कुल 16 जिले के 81 निकायों में चुनाव हुए।&lt;br /&gt;जिनमें से 36 निकायों पर जीती टीएमसी।&lt;br /&gt;18 पर लेफ्ट विजयी रही।&lt;br /&gt;6 पर कांग्रेस ने जीत हासिल की।&lt;br /&gt;शेष 21 पालिकाओं में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोलकाता नगर निगम के चुनाव परिणाम&lt;br /&gt;कुल सीटों (वार्ड) की संख्या 141&lt;br /&gt;सभी 141 वार्डों के नतीजे घोषित&lt;br /&gt;टीएमसी जीती 95 पर।&lt;br /&gt;सीपीएम जीती 33 पर।&lt;br /&gt;कांग्रेस जीती 10 पर।&lt;br /&gt;बीजेपी जीती 3 पर।&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;----------------------------------&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पश्चिम&lt;/span&gt; बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्ववाले दल तृणमूल कांग्रेस ने राज्य और देश में वामदलों की साख को करारा धक्का पहुंचाया है। बंगाल में लगातार तीन दशक से अधिक अवधि तक राज करने के बाद वाम दलों को गुरूर हो गया था और वे जनता की भावनाओं को तरजीह देने के बदले उन्हें अपने तौर पर हांकने पर आमादा हो चले थे। यह आवाम के बदले कैडर राज में तब्दील हो गया था। उनकी शेखियां हवाई हो चुकी थीं और दिमाग सातवें आसमान पर। विचारशील पैंतरेबाजियों वाले इन दलों का उनका मानसिक दिवालियापन व बड़बोलापन तब सामने आया जब संप्रग सरकार के गठबंधन को उन्होंने केन्द्र में अपने दिये गये समर्थन को वापस लिया। उन्होंने न तो महंगाई के मुद्दे पर सरकार पर दबाव बनाया ना ही बदहाल बंगाल के लिए पैकेज की ही मांग की। वे लगातार परमाणु समझौते को रद्द किये जाने के तरजीह देते रहे और अन्तः प्रधानमंत्री को बदलने की बिनमांगी सलाह संप्रग को देने के बाद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। केन्द्र सरकार को में बिना किसी उपलब्धि के चार साल तक बाहर से समर्थन देते रहे। और अंत में किसी भी स्तर पर जाकर सरकार गिराने की विफल कोशिश में मात खायी। इसी कोशिश में बौखलाये वामपंथियों ने तब अपनी इमेज और बिगाड़ ली जब दलित की बेटी होने की एकमात्र क्वालीफिकेशन के आधार पर मायावती को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाने का ख्वाब देखा और उजाकर किया। भ्रष्टाचार के कई आरोपों में लिप्त मायवती को नैतिक समर्थन देने का इरादा जाहिर कर बंगाल के बौद्धिकों की निगाह में वामदल वाले गिरते चले गये।&lt;br /&gt;इसके बाद जो परिस्थितियां बंगाल में पैदा हुई वह उनके संभाले न संभली। कारखाने के लिए भूमि अधिग्रहण पर मुआवजे का मसला हल कर कर पाना यहां की सरकार की नासमझी को उजागर कर गया। टाटा के नैनो के लिए भूमि अधिग्रहण के मसले को ममता बनर्जी ने अपना हथियार बनाया और आम लोगों के प्रतिरोध की आवाज बनकर सामने आयीं। और वाम दलों ने केन्द्र से समर्थन वापस लेने के बाद बंगाल में बिगड़ रहे हालत पर काबू पाने में केन्द्र का समर्थन नहीं मांगा। और यहां जो औद्योगिक वातावरण बुद्धदेव भट्टाचार्य तैयार करना चाहते थे, बिगड़ता चला गया।   &lt;br /&gt;गौरतलब यह है कि वामदलों को किसी बुर्जुआ दल ने नहीं हराया है। ना ही किसी विचारधारा वाले दल ने। बल्कि लगभग दिशाहीन दल, जिसका नेतृत्व एक चंचल वृत्ति की महिला ममता बनर्जी के हाथ में है। इसका अर्थ यह निकलता है कि यहां लोगों को परिवर्तन चाहिए था और तृणमूल कांग्रेस के अलावा कोई ऐसा दल यहां सक्रिय नहीं जिसमें किसी भी अर्थ में यहां की सरकार को बदलने की सामर्थ्य तो दूर इच्छाशक्ति तक हो। दूसरे यह कि जिन अंचल के लोगों ने हराया उनमें देहात के वंचित वर्ग के लोग हैं भी और वहां के लोगों ने भी जहां कल-कारखाने तो हैं पर उनमें अधिकतर तालाबंदी है। जबकि भूमि सुधार का मामला वामपंथ के लिए हमेशा से गर्व का मामला रहा है और कल-कारखानों में सशक्त ट्रेड यूनियनों की उपस्थिति यह दर्शाती थी कि वह प्रबंधन से अपनी मांगें मनवा पाने में सक्षम है। वाममोर्चा की मौजूदा विफलता बताती है कि दोनों मोर्चों पर मौजूदा सरकार से मोहभंग ने यहां के राजनैतिक परिवर्तन को रसद ही नहीं पहुंचायी बल्कि यह बदलाव लाने वाले वे लोग हैं जो कभी न कभी वामपंथ के प्रति आस्थावान रहे हैं। और वह मुस्लिम वर्ग भी वाम से खफा हो गया जो धर्म निरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम मतदाताओं का हिमायती बना हुआ था। इस वर्ग के देर से ही समझ में आ गया कि इस सरकार ने मुस्लिम वर्ग का केवल इस्तेमाल किया है, उनके हालत बदलने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।&lt;br /&gt;इससे यह भी स्पष्ट है कि परिवर्तन चाहने वाली जनता का हौसला बढ़ा है और ममता बनर्जी ने कोई नयी मूर्खता नहीं की तो आगत विधानसभी चुनाव में उनकी विजय तय है। हालांकि इतिहास गवाह है कि यह दौर क्षणिक होता है और विद्रोह के लिए जाने जानी वाली अग्निकन्या अपनी ही खामियों के कारण अपनी उपलब्धियों को न जाने कब खो बैठेगी, इसकी आशंका बराबर बनी रहेगी।&lt;br /&gt;तृणमूल के साथ वे युवा नहीं हैं जो पढ़-लिखकर बंगाल में ही अपना भविष्य संवारना चाहते थे क्योंकि टाटा की दुनिया की सबसे सस्ती कार नैनो का कारखाना बंगाल से हटकर गुजरात के सांणद में शुरू हुआ। उसका दोष ममता के सिर जाता है। यह इक्तफाक की बात है कि जिस दिन स्थानीय निकाय के नतीजे निकले हैं उसी दिन टाटा मोटर्स ने दुनिया की सबसे सस्ती कार नैनो के विनिर्माण कारखाने का उद्घाटन किया। पश्चिम बंगाल से बाहर होने के बाद यहां नया कारखाना स्थापित करने में दो साल का समय लग गया। गुजरात के साणंद में कंपनी के इस कारखाने का उद्घाटन राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा ने किया। नैनो का यह कारखाना 2,000 करोड़ रुपये की लागत से 1,100 एकड़ क्षेत्र पर बना है। &lt;br /&gt;ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल का अगला मुख्यमंत्री का ताज पहनाने को तो आम जनता तैयार है मगर यह ताज कितने दिन रहेगा यह कहना मुश्किल है। लोगों के विश्वास को पलीता औद्योगीकरण के मुद्दे पर ही लगेगा क्योंकि वाम से भड़कने वाले उद्योगपति किसी तरह उन्हें झेल गये और बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके मन में वाम के प्रति साफ्ट कार्नर बनना शुरू हुआ था जिस पर ममता बनर्जी के आंदोलनों ने न सिर्फ पानी फेर दिया बल्कि पूरी दुनिया में संदेश गया कि बंगाल में औद्योगीकरण के खिलाफ वातावरण केवल वाम का मुद्दा नहीं है बल्कि वह यहां की फिजाओं में बुरी तरह पसरा हुआ है। देश भर में जिन नक्सलियों की हिंसा से चिन्ता व्याप्त है उनके प्रति ममता बनर्जी और उनके पक्ष में खड़े महाश्वेता देवी जैसे बुद्धिजीवियों की सहानुभूति खतरनाक संकेत देती है जो व्यावसायिक महौल के विपरीत है।&lt;br /&gt;ममता की पटरी से उतरने के बाद बंगाल की राजनीति की ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद फिर वामदलों की मोहताज होगी या दूसरा विकल्प है राहुल गांधी का। यदि उन्होंने बंगाल के विकास में दिलचस्पी दिखायी और जमकर फील्ड वर्क किया तो कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है। हालांकि फिलहाल ममता बनर्जी कह रही हैं कि अगला चुनाव संप्रग के साथ मिल कर लड़ेंगी लेकिन ऐन वक्त पर कौन सी छोटी सी बात उनके ईगो को हर्ट कर जायेगी कहना मुश्किल है। फिर भी बंगाल में राजनीतिक परिवर्तन के इतिहास में उनके प्रयास मील के पत्थर साबित होंगे इसमें शक नहीं। खास तौर पर इसलिए भी कि वे जिस वाममोर्चा से टकरा रही हैं उसके विचार मार्क्स के हैं और जिस कांग्रेस की वे केन्द्र में सहयोगी हैं उसका आजादी के दौर से ही लम्बा चौड़ा इतिहास रहा है और जिसकी बंगाल में ममता के सामने कोई औकात नहीं है। ऐसे में जनता की बदलाव की चाहत ही वह केन्द्रीय मुद्दा है जो ममता को परिवर्तन में सहायक साबित होगा।&lt;br /&gt;इस बार के स्थानीय निकाय चुनाव में राज्य स्तर पर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का गठबंधन नहीं हुआ था, जिसके कारण दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। इन नतीजों का महत्व इसलिए और भी है क्योंकि अगले साल पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस को भी राज्य में गठबंधन के समय कमजोर स्थिति के कारण नरम होकर सीटों का तालमेल करना पड़ेगा। पश्चिम बंगाल की मुख्य विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने ममता बनर्जी के नेतृत्व में राज्य के चुनावों में जीत का सिलसिला बरकरार रखा है। तृणमूल ने 2009 में हुए लोकसभा चुनाव दोनों दल साथ लड़े थे। इस बार के स्थानीय निकाय चुनावी नतीजों से इस बात को साबित कर दिया कि बनर्जी ने कहा कि यह मां-माटी-मानुष की जीत है। उन्होंने यह जनादेश राज्य में राजनीतिक परिवर्तन के लिए दिया है। हालांकि वाम मोर्चे के अध्यक्ष विमान बोस ने कहा कि हम अभी से अगले साल चुनाव तक लोगों का विश्वास जीतने के लिए वाम मोर्चा बहुत मेहनत करेगा। यहां यह गौरतलब है कि स्थानीय निकाय चुनाव कोलकाता और शहरों व कस्बों में हुए हैं, जबकि पश्चिम बंगाल-विधानसभा की 294 सीटों में लगभग दो सौ देहाती अंचल में हैं। वहां पंचायतों में तृणमूल कांग्रेस ने असर तो दिखाया है, पर वाममोर्चा के पास अब भी पंचायती लोकतंत्र का बहुमत है। दो सौ सीटों का यह आंकडा ममता बनर्जी को पूरा करना होगा। ममता बनर्जी कांग्रेस के बगैर वाममोर्चा की सरकार का सफाया कर देंगी, यह अस्पष्ट है। &lt;br /&gt;तृणमूल कांग्रेस की अपनी हैसियत बहुत नहीं है। वह एक क्षेत्रीय पार्टी ही है और ममता बनर्जी को रेल मंत्री होने का फायदा भी इस चुनाव में मिला है। संप्रग ने भी उन्हें मंत्रिमंडल में बहुत तरजीह दी है क्योंकि उन्हें वामदलों से हिसाब चुकता करना है। ममता  ने कई नयी रेलगाडियां चलाई हैं और बंगाल को इसमें विशेष तरजीह दी गयी है, जिसको लेकर उन्हें देश भर में पक्षपात के आरोपों का सामना भी करना पड़ा है। वे केन्द्रीय रेल मंत्रालय का लाभ बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए कर रही हैं और देर सबेर इस बात को लेकर उनकी निन्दा भी होनी है। &lt;br /&gt;1977 से पहले पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का राज था। सिद्धार्थ शंकर रॉय वहां के आखिरी कांग्रेसी-मुख्यमंत्री थे और आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी-विरोधी लहर के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने पश्चिम बंगाल की सत्ता पर कब्जा कर लिया। तब से 33 साल हो गए, पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा का शासन ही चला आ रहा है। ज्योति बसु ने उम्र के कारण राजनीति से अवकाश ले लिया और उन्होंने बुद्धदेव भट्टाचार्य को वहां की कमान सौंप दी। पार्टी की अपनी गुटबाजी के कारण भट्टाचार्य ममता बनर्जी के आंदोलनों का सामना करने में विफल रहे। कांग्रेस में स्थानीय नेतृत्व का अभाव है, जिसका लाभ ममता बनर्जी को मिला है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में तालमेल करके चुनाव लडेगी तो यह परिर्तन की लहर अपना कमाल अवश्य दिखायेगी। और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की मिली-जुली सरकार बनेगी। राज्य में पहली महिला मुख्यमंत्री ममता बनेंगी। मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तीनों ने फिलहाल पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ बने रहने का मन बना लिया है। प्रणब मुखर्जी ने भी तृणमूल से गठबंधन पर मुहर लगा दी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-6059970567906856657?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/6059970567906856657/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6059970567906856657'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6059970567906856657'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='परिवर्तन की आंधी में बंगाल ममता की ताजपोशी को 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जलालपुर (सारण) प्रखंड के विशुनपुरा ग्राम में सन् 1930 में जन्मे सिंह ने काव्य एवं आलोचना के क्षेत्र में साहित्य जगत को अविस्मरणीय सौगात दी है। श्मशानी पीढ़ी के संस्थापक सिंह पांचवें दशक में व्यक्तिक्रम काव्य संग्रह से चर्चा में आये। पत्थर और लकीरें, आकस्मिक, प्रतिशब्द, निसंग और ईश्वर को सिरजते हुए आदि इनके महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है। इन्होंने तत्कालीन कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया जिसमें नया संदर्भ भी शामिल है। &lt;br /&gt;यह जानकारी उनके पारिवारिक सदस्य कथाकार जवाहर सिंह और पत्रकार तीर्थराज शर्मा ने फोन पर दी है। जानकारी के मुताबिक वे अपने पुत्र सुजीत सिंह के साथ दुर्गापुर में रह रहे थे। विस्तृत जानकारी के लिए सुजीत सिंह से सम्पर्क फिलहाल नहीं हो सका है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-520309298233299795?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/520309298233299795/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_29.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/520309298233299795'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/520309298233299795'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_29.html' title='सकलदीप सिंह नहीं रहे'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' 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alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479952190964077906" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुस्तक समीक्षा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;पुस्तक का नाम-न्याय का स्वरूप/ लेखक- अमर्त्य सेन/प्रकाशक-राजपाल एण्ड सन्ज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली-110006/मूल्य-425 रुपये। &lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जाने माने अर्थशास्त्री डॉ.अमर्त्य सेन के विचार अर्थशास्त्रीय अध्ययन के लिए ही नहीं जाने जाते बल्कि उनके सामाजिक सरोकार दुनिया को अलग-अलग प्रसंगों में भी आकृष्ट करते रहे हैं। उनके अर्थशास्त्र की परिधि में वे तमाम मुद्दे स्वयं आ जाते हैं जो मनुष्य मात्र को किसी भी तौर पर प्रभावित करते हैं और साथ ही सामाजिक अध्ययन के विभिन्न पहलुओं को समझने में भी सहायक होते हैं। दरअसल दर्शन के प्रति सेन का लगाव उनकी दृष्टि को एक ऐसी ऊंचाई देता है जहां से वे मनुष्य की अनिष्टकारी शक्तियों की कार्यपद्धति को बारीकी से समझते, समझाते नजर आते हैं। गरीबी, अकाल और मनुष्य की सभ्यता का विकास ही उनके अध्ययन की जद में नहीं रह जाता है वे वहां तक जाते हैं जहां विभिन्न समुदायों में अलग-अलग परिवेश में जी रहे मनुष्य के प्रति हो रहे विभिन्न स्तर पर अन्याय हो रहा है। &lt;br /&gt;इन दिनों अमरीका स्थित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में दर्शन और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर सेन का हाल ही में प्रकाशित उनका नया ग्रंथ 'द आइडिया ऑफ जस्टिस' उसका पुख्ता उदाहरण है जिसका हिन्दी अनुवाद 'न्याय का स्वरूप' नाम से प्रकाशित हुआ है। अनुवाद भवानीशंकर बागला ने किया है। इस ग्रंथ में वे न्याय की अवधारणा और अन्याय के विभिन्न स्वरूपों की विस्तृत व्याख्या केवल तथ्यात्मक आधार पर नहीं करते बल्कि इस क्रम में उस करुणा तक भी जाते हैं जो उनके आशयों को केवल सामाजिक अध्ययन बनने से बचाता है। दुनिया की सारी कृतियां किसी न किसी रूप में न्याय और अन्याय को ही परिभाषित करती रही हैं, इस क्रम में प्रो.सेन की इस कृति को देखा जाना चाहिए जो हमें न्याय के प्रति अपनी अवधारणा को आद्यतन करने में सहायता पहुंचाती है। &lt;br /&gt;कृति के प्राक्कथन की शुरुआत ही डॉ.सेन ने उपन्यासकार चाल्र्स डिकेन्स के उपन्यास 'ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स' के उल्लेख से करते हैं और अन्याय के अहसास की चर्चा करते हैं। यह जो 'अहसास' का उल्लेख है वह उनके अध्ययन को अधिक अर्थवान, अधिक मानवीय और अधिक प्रासंगिक बनाता है। सेन इस निष्कर्ष तक हमें ले जाते हैं कि यह यह अहसास ही है, जो अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने को तैयार करता है। &lt;br /&gt;सेन ने स्पष्ट किया है कि इस कृति का उद्देश्य है- 'हम किस प्रकार अन्याय को कम करते हुए न्याय का संवर्धन कर सकते हैं।'&lt;br /&gt;न्याय को लेकर विविध विचार सरणियों का चर्चा के बीच वे प्रमुख रूप से जॉन रॉल्स के विचारों के साथ खड़े दिखायी देते हैं क्योंकि उन्होंने व्यक्तियों को अपने जीवन को अपने ढंग से जी पाने का सही अवसर प्रदान करने की आवश्यकता को परोक्ष तौर पर स्वीकृति दी थी। रॉल्स के सम्बंध में सेन कहते हैं- 'मानवीय स्वतंत्रता को सहायक रूप से रेखांकित कर रॉल्स ने अपने न्याय-सिद्धांत में स्वतंत्रताविषयक विचारों को एक निश्चित स्थान तो प्रदान कर ही दिया है।'  सेन न्यायविषयक विचारों के सिद्धांतकारों की चर्चा तो करते हैं कि वे उनमें उन तत्वों को रेखांकित करते हैं जिनमें साझी मान्यताएं समाहित हैं। हालांकि वे किसी भी सिद्धांत या मत को अंतिम मानने से परहेज करते हैं वे कहते हैं-'हम न्याय की अन्वेषणा किसी भी विधि से करने का प्रयास करते रहें पर मानव जीवन में यह अन्वेषणा कभी समाप्त नहीं हो सकती।'&lt;br /&gt;एक नयी सोच के साथ न्याय की व्यवस्था के विविध पक्षों पर मौलिक विचार से लैस यह कृति अन्याय के विरुद्ध एक सार्थक आवाज उठाती है और न्याय की एक नयी व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। भारतीय समाज के लिए यह और भी प्रासंगिक है क्योंकि यहां गांव देहात में खाप पंचायतों का अस्तित्व अब भी है जो ऑनर कि लिंग के दोष में किसी की हत्या तक के फरमान जारी कर देती है तो किसी अन्य प्रदेश की पंचायत किसी महिला को डाइन कह कर प्रताडित करने से गुरेज नहीं रखती। &lt;br /&gt;अपने-अपने समय में दुनियाभर के विचारकों रूसो, कांट, लॉक, हॉब्स ने न्याय पर विचार किया है। इस क्रम में डॉ.सेन की इस कृति को भी देखा जाना चाहिए। यहां यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने इसके पूर्व आर्थिक विषमताएं, गरीबी और अकाल, भारतीय राज्यों का विकास, भारतीय विकास की दिशाएं, आर्थिक विकास और स्वातंत्र्य, हिंसा और अस्मिता का संकट, भारतीय अर्थतंत्र: इतिहास और संस्कृति जैसी रचनाएं विश्व को दी हैं। 1998 में अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया था।&lt;br /&gt;-----------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-4621010829925507483?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/4621010829925507483/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_27.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/4621010829925507483'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/4621010829925507483'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_27.html' title='न्याय की एक नयी व्यवस्था की रूपरेखा'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAyze9CJlVI/AAAAAAAAAr4/EfGO9DY761s/s72-c/abhi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-3949795780217133721</id><published>2010-05-14T06:04:00.001-07:00</published><updated>2010-05-14T06:04:47.163-07:00</updated><title type='text'>फिल्म ब्लड मंकी  देखकर:  एक अच्छी कहानी का अन्त कैसा हो?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-1KZpS4tLI/AAAAAAAAAok/gGWSo-cWjqM/s1600/blood+monkey.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 139px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-1KZpS4tLI/AAAAAAAAAok/gGWSo-cWjqM/s200/blood+monkey.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5471110926767273138" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी फिल्म रॉबर्ट यंग निर्देशित 'ब्लड मंकी' एक वैज्ञानिकों के खोज से जुड़ी प्रक्रिया पर बनी है। दुर्भाग्य से ऐसे विषयों पर अपने यहां फिलहाल फिल्म बनने की कल्पना नहीं की जा सकती। हिन्दी या भारतीय फिल्में बहुत कुछ कर सकती हैं तो इतना कि उसकी कहानी व दृश्यों को झाड़ लें और चोरी पकड़ी जाने पर उससे प्रेरणा लेना कहकर अपने मौलिक होने की साख को बचाये रखने की हास्यास्पद कोशिश करें।  &lt;br /&gt;हालांकि 'ब्लड मंकी' की कहानी उत्कृष्ट है लेकिन अन्त का सफल निर्वाह नहीं हो पाया है। पता नहीं कहानीकार की कमी है या कहानी के साथ छेड़छाड़ करते हुए निर्देशक ने उसका कबाड़ा कर दिया है, जैसा विकास स्वरूप की कहानी स्लमडाग मिलेयनियर के साथ हुआ है।  &lt;br /&gt;कहानी में वैज्ञानिक एक ऐसी प्रजाति की खोज एक ऐसे जंगल में कर रहा होता है जहां मनुष्य पहले नहीं गया था। वैज्ञानिक छात्र-छात्राओं को यह कहकर उस जंगल में ले जाता है कि तुम्हें जंगल में नयी चीजों को देखना और लिखना है, जो पाठ्यक्रम का हिस्सा होगा। लेकिन चालाकी पूर्वक छात्रों के वापस लौटने का रास्ता बंद कर देता है। वहां मनुष्य और बंदर के बीच की प्रजाति की उपस्थिति के प्रमाण उसे मिला था जिसकी वह पुष्टि करने का प्रयास करता है। इस बीच रहस्यमय तरीके से कई छात्रों की मौत हो जाती है। अन्तत: वैज्ञानिक छात्रों को बताता है कि वह जानता है कि उनकी जान का खतरा है फिर भी वह शोध के बिल्कुल करीब पहुंच चुका है और शोध होने पर कुछ लोगों की मौत मनुष्य जाति के इतिहास में कोई माने नहीं रखती। और अंतत: स्वयं वैज्ञानिक 'ब्लड मंकी' के हाथों मारा जाता है। छात्रों के सामने ही उसकी मौत हो जाती है। उसके बाद बचे छात्र शोध को आगे बढ़ाने का कतई प्रयास नहीं करते और वापस भागना चाहते हैं और भागते हुए ही 'ब्लड मंकी' के हाथों मारे जाते हैं। अन्त तक दर्शकों को आशा बनी रहती है कि छात्रों के नजरिये में बदलाव आयेगा और वे अपने गुरु के प्रति अपना नजरिया बदलते हुए शोध को आगे बढ़ायेंगे लेकिन ऐसा नहीं होता। क्या सचमुच शोध के प्रति सारे के सारे छात्रों का नजरिया एक जैसा होता है। किताबें पढऩा, अच्छे नम्बर पाना और बड़े पद और पैसा हासिल करना ही शोध की नियति है। अच्छा तब लगता कि उन छात्रों में से कोई छात्र-छात्रा शोध को आगे बढ़ाने की कोशिश में मारा जाता। एक अच्छी कहानी का अन्त ऐसा ही होना चाहिए था और एक अच्छी वास्तविकता का भी।&lt;br /&gt;यह अमेरिकी हॉरर फिल्म है जिसे टीवी के लिए बनाया गयाथा। 2008 की यह फिल्म रॉबर्ट यंग ने निर्देशन किया है। जिसे थाईलैंड में फिल्माया है। फिल्म के छह छात्रों का एक समूह अफ्रीका में पढ़ाई के बाद प्रोफेसर हैमिल्टन के यहां जाते हैं। हैमिल्टन प्रोफेसर के रूप में एफ मूर्रे इब्राहीम ने शानदार अभिनय किया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-3949795780217133721?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/3949795780217133721/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_14.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/3949795780217133721'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/3949795780217133721'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_14.html' title='फिल्म ब्लड मंकी  देखकर:  एक अच्छी कहानी का अन्त कैसा हो?'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-1KZpS4tLI/AAAAAAAAAok/gGWSo-cWjqM/s72-c/blood+monkey.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-5629103675368062650</id><published>2010-05-13T07:07:00.000-07:00</published><updated>2010-05-13T07:08:46.268-07:00</updated><title type='text'>मन मोहा आलोक श्रीवास्तव की शायरी ने</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-wH5VUG1II/AAAAAAAAAoc/wr6vXNngMaA/s1600/alok%2Bamin+.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 105px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-wH5VUG1II/AAAAAAAAAoc/wr6vXNngMaA/s200/alok%2Bamin+.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5470756328903726210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कोलकाता:&lt;/span&gt; आलोक श्रीवास्तव ने अपनी गज़लों, नज्मों और दोहों से कोलकाता के प्रबुद्ध श्रोताओं का मन मोह लिया। खास तौर पर अपने काव्य संग्रह आमीन की रचनाएं उन्होंने भारतीय भाषा परिषद की ओर से आयोजित अपने सम्मान में आयोजित गोष्ठी में सुनायी। यह कार्यक्रम रविवार 9 मई को सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि शैलेन्द्र और संचालन परिषद के निदेशक और आलोचक डॉ.विजय बहादुर सिंह ने किया। उन्होंने जो दोहे सुनाये उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-&lt;br /&gt;उजली-उजली देह पर, नक़्क़ाशी का काम&lt;br /&gt;ताजमहल की ख़ूबियां, मज़दूरों के नाम&lt;br /&gt;मां-बेटे के नेह में एक सघन विस्तार&lt;br /&gt;ताजमहल की रूह में, जमना जी का प्यार &lt;br /&gt;आँखों में लग जाएँ तो, नाहक़ निकले ख़ून,&lt;br /&gt;बेहतर है छोटे रखें, रिश्तों के नाखून। &lt;br /&gt;उनकी जिस गजल ने अच्छा समां बांधा वह है-&lt;br /&gt;सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ,&lt;br /&gt;के' जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ।&lt;br /&gt;दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं,&lt;br /&gt;वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ।&lt;br /&gt;ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है,&lt;br /&gt;सुलगती-साँसे, तरसती-आँखें, मचलती-रूहें, धड़कती-छतियाँ।&lt;br /&gt;उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू,&lt;br /&gt;किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ।&lt;br /&gt;मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के' तुमने देखा है पी को आते,&lt;br /&gt;न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियाँ ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-5629103675368062650?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/5629103675368062650/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_821.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5629103675368062650'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5629103675368062650'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_821.html' title='मन मोहा आलोक श्रीवास्तव की शायरी ने'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-wH5VUG1II/AAAAAAAAAoc/wr6vXNngMaA/s72-c/alok%2Bamin+.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-7633794730843127326</id><published>2010-05-13T02:58:00.000-07:00</published><updated>2010-05-13T02:59:59.883-07:00</updated><title type='text'>मुहावरों से सावधान!</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-vNly9cgPI/AAAAAAAAAoU/VBhpJmoE-68/s1600/Nitin_Gadkari_0.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 155px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-vNly9cgPI/AAAAAAAAAoU/VBhpJmoE-68/s200/Nitin_Gadkari_0.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5470692221589946610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भाषा से मुहावरों के लोप के खतरे लगातार महसूस किये जाते रहे हैं कहा जाता रहा है कि आज जो भाषा चल रही है उसमें पहले जैसी मुहावरेदारी नहीं है। बात को तरीके से कहने के बदले अब जोर इस बात पर दिया जा रहा है कि वह सम्प्रेषित हो रही है कि यदि बात सम्प्रेषित हो गयी तो मान लिया जाता है कि काम हो गया। खास तौर पर जब से विश्वबाजार के प्रभाव के बढऩे के साथ भूमंडलीकरण का जो दौर आया उसमें सम्प्रेषणीयता बड़ा मूल्य हो गया और भाषा के इस्तेमाल के तौर तरीकों में लापरवाही आयी। भाषा की बनावट के प्रति गंभीरता कम हुई। ऐसा कई भाषाओं के एक दूसरे के करीब आने के कारण हुआ। भाषाएं जब करीब आती हैं तो मुहावरों का महत्व गिरने ही नहीं लगता बल्कि कई बार तो वह अनर्थकारी हो जाता है क्योंकि मुहावरों में शाब्दिक अर्थ से उसका निहितार्थ अलग होता है। भाषा सीधी-सरल सपाट हो तो वह दूसरी भाषा में अनूदित होने में सुविधाजनक हो जाती है। &lt;br /&gt;हालांकि भाषाओं से मुहावरेदारी के कम होने का खामियाजा भी समाज को भुगतना पड़ता है। कभी शशि थरूर को 'कैटल क्लासÓ शब्द को इस्तेमाल करने पर निन्दा झेलनी पड़ी तो उससे पहले अपने को वाचडाग कहने वाले वामपंथियों का खासा माखौल उड़ाया गया। अब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की बातों पर मचा है। उनके आशय को समझने के बजाय शब्दों को लेकर बतंगड़ बनाया जा रहा है। लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव के बारे में उनके दिये बयान का अनर्थ निकाला जा रहा है, जिसके लिए वे माफी भी मांग चुके हैं किन्तु बवाल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। मुहावरों से सावधान! !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-7633794730843127326?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/7633794730843127326/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_13.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/7633794730843127326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/7633794730843127326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post_13.html' title='मुहावरों से सावधान!'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-vNly9cgPI/AAAAAAAAAoU/VBhpJmoE-68/s72-c/Nitin_Gadkari_0.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-8060264588574305979</id><published>2010-05-11T02:48:00.000-07:00</published><updated>2010-05-11T02:52:33.258-07:00</updated><title type='text'>डॉ.विजय बहादुर सिंह और मुनव्वर राना को कौमी एकता सम्मान</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-kososMRaI/AAAAAAAAAoM/7kzwTf92qlE/s1600/Dr.vijay%2Bmunwwar.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 82px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-kososMRaI/AAAAAAAAAoM/7kzwTf92qlE/s200/Dr.vijay%2Bmunwwar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5469947969720305058" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कोलकाता : आल इंडिया कौमी एकता मंच की ओर से विभिन्न क्षेत्रों में&lt;br /&gt;उल्लेखनीय कार्य करने वालों को कौमी एकता सम्मान प्रदान किया गया। हिन्दी&lt;br /&gt;साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए आलोचक व भारतीय भाषा&lt;br /&gt;परिषद के निदेशक डॉ.विजय बहादुर सिंह एवं उर्दू साहित्य में योगदान के&lt;br /&gt;लिए शायर मुनव्वर राना को सम्मानित किया गया। प्रख्यात आलोचक और कवि&lt;br /&gt;डॉ.विजय बहादुर सिंह की नागार्जुन का रचना संसार, 'नागार्जुन संवाद,&lt;br /&gt;कविता और संवेदना, समकालीनों की नजऱ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,&lt;br /&gt;उपन्यास: समय और संवेदना, महादेवी के काव्य का नेपथ्य आदि आलोचना&lt;br /&gt;पुस्तकें तथा मौसम की चिट्ठी, पतझड़ की बांसुरी, पृथ्वी का प्रेमगीत,&lt;br /&gt;शब्द जिन्हें भूल गयी भाषा तथा भीम बेटका काव्य कृतियां प्रकाशित हैं।&lt;br /&gt;आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की जीवनी आलोचक का स्वदेश एवं शिक्षा और समाज&lt;br /&gt;सम्बंधी कृतियां आओ खोजें एक गुरु और आजादी के बाद के लोग भी उनकी चर्चित&lt;br /&gt;पुस्तकें हैं। भवानी प्रसाद मिश्र, दुष्यंत कुमार और आचार्य नन्द दुलारे&lt;br /&gt;वाजपेयी की ग्रंथावलियों का संपादन उन्होंने किया है। जबकि प्रख्यात&lt;br /&gt;उर्दू शायर मुनव्वर राना की मां, गज़ल गांव, पीपल छांव, बदन सराय, नीम के&lt;br /&gt;फूल, सब उसके लिए, घर अकेला हो गया, कहो जिल्ले इलाही से, बग़ैर नक्शे का&lt;br /&gt;मकान, फिर कबीर आदि कृतियां प्रकाशित हैं। देश विदेश के मुशायरों में&lt;br /&gt;काव्यपाठ के लिए विशेष तौर पर जाने जाते हैं।&lt;br /&gt;पत्रकारिता के लिए पं.आनंद मोहन जुत्शी गुलजार देहलवी, कला एवं संस्कृति&lt;br /&gt;में योगदान के लिए रमनजीत कौर तथा समाज सेवा के लिए आनंद लोक अस्पताल के&lt;br /&gt;देव कुमार सराफ को केन्द्रीय पर्यटन राज्य मंत्री सुल्तान अहमद के हाथों&lt;br /&gt;यह प्रदान किया गया। यह कार्यक्रम शनिवार को कला मंदिर में आयोजित था। इस&lt;br /&gt;अवसर पर अखिलभारतीय कवि-सम्मेलन व मुशायरा भी हुआ। मंच के महासचिव आफताब&lt;br /&gt;अहमद खान ने सम्मानित लोगों का परिचय कराया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-8060264588574305979?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/8060264588574305979/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/8060264588574305979'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/8060264588574305979'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='डॉ.विजय बहादुर सिंह और मुनव्वर राना को कौमी एकता सम्मान'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S-kososMRaI/AAAAAAAAAoM/7kzwTf92qlE/s72-c/Dr.vijay%2Bmunwwar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-3531780673357082038</id><published>2010-03-26T20:57:00.000-07:00</published><updated>2010-03-26T21:03:45.118-07:00</updated><title type='text'>एक क्षेत्र की जानकारी दूसरे क्षेत्र में काम नहीं आती</title><content type='html'>कवि प्रभात पाण्डेय जी का एक ई मेल मुझे मिला। उससे कुछ बातें निकलीं जो आप तक पहुंचाने में कोई हर्ज नहीं लग रहा ताकि आप भी उस पर विचार करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2010/3/27 Prabhat Pandey &lt;br /&gt;prabhat_lucknow@yahoo.co.in&lt;br /&gt;हिमालय प्रहरी के सम्पादक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने पत्रिका के मार्च - अप्रैल 2010 अंक के सम्पादकीय में एक घटना का जिक्र किया है जो इस प्रकार है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी प्राथमिक विद्यालय के एक अंकगणित के शिक्षक ने बच्चों से सवाल किया. शिक्षक का सवाल था - कुल तेरह भेड़ मैदान में चर रहीं थी जिसमें से तीन भेड़ गड्ढे में गिर गयीं. बताओ कितनी भेड़ें रह गयीं. कक्षा के एक बच्चे को छोड़ कर सभी ने कहा - दस. बच्चों के उत्तर से शिक्षक संतुष्ट हुए. कक्षा का एक बच्चा अपना हाथ उठाये चुपचाप बैठा रहा. शिक्षक ने उससे पूछा - क्या तुम कुछ कहना चाहते हो. बच्चा बोला - मास्टर जी, एक भी भेड़ नहीं बची. शिक्षक ने रंज होते हुए कहा - आज तुमने अपना परिचय दे ही दिया. बस यही कहने के लिए तब से हाथ उठाये बैठे हो. बच्चा बोला - मास्टर जी, मैं ठीक कह रहा हूँ. मेरे घर में भेड़ हैं. मैं उन्हें मैदान में चराने जाता हूँ. जब कभी झुंड की एक भेड़ गड्ढे में गिर जाती है तो बाकी सभी भेड़ें उसके पीछे गड्ढे में गिर जाती हैं.&lt;br /&gt;प्रश्न यह कि कौन सा उत्तर सही था और क्यों - जो एक को छोड़ बाकी बच्चों ने दिया या वो जो उस बच्चे ने दिया जो भेड़ चराता था.&lt;br /&gt;प्रश्न यह भी कि क्या यह घटना हमें कुछ और इंगित करती है.&lt;br /&gt;मेरा उत्तर था-यह प्रसंग यह बताता है कि अनुभव से प्राप्त ज्ञान की भी सीमाएं हो सकती हैं। विधा का ज्ञान दूसरे क्षेत्र में लागू किया जाये तो उसके नतीजे गलत भी हो सकते हैं। गणित और मनोविज्ञान दोनों अलग-अलग शास्त्र हैं। छात्र गणित के उत्तर मनोविज्ञान से देने की कोशिश कर रहा था। छात्र मनोविज्ञान में पास हो जायेगा लेकिन गणित में कभी पास नहीं होगा। एक क्षेत्र की समस्या का हल दूसरे क्षेत्र के हल से नहीं खोजा जा सकता। हम वही कोशिश करते हैं और विफल हो जाते हैं। और बच्चे के जवाब से संतुष्ट लोगों की इस देश में बहुतायत है। &lt;br /&gt;एक क्षेत्र विशेष के मूल्यों को दूसरे क्षेत्र में प्रयोग मुसीबत में डालते हैं और सफलता को संदिग्ध बना देते हैं।&lt;br /&gt;-राम को लोकजीवन और आध्यात्म  जगत से निकाल कर राजनीति में किया गया प्रयोग देश के लिए सर्वनाशी साबित हो रहा है।-फ्रायड ने मनोविश्लेषण के लिए जब अपनी ही बेटी के क्रिया कलापों को चुना तो लोकजीवन में उसकी निन्दा हुई। -यौन जीवन की चर्चा जब हम खुले मंच पर करते हैं तो वह निन्दनीय बन जाता है।-कामयाबी को ही नैतिक जीवन की कसौटी मानना व्यावहारिक जीवन में सराहनीय होता है किन्तु मूल्यों के क्षेत्र में कामयाबी का कोई महत्व नहीं है और विफल लोग समाज के आदर्श बन सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-3531780673357082038?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/3531780673357082038/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/03/blog-post_26.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/3531780673357082038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/3531780673357082038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/03/blog-post_26.html' title='एक क्षेत्र की जानकारी दूसरे क्षेत्र में काम नहीं आती'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-2973998070764210871</id><published>2010-03-24T04:47:00.000-07:00</published><updated>2010-03-24T13:34:34.151-07:00</updated><title type='text'>सामाजिक जीवन में बदलाव के लिए अदालत का क्यों करें इन्तजार!</title><content type='html'>भारतीय समाजिक जीवन में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। मेरा खयाल बदवाव की गतिशीलता में तेजी का कारण मीडिया की लोगों तक व्यापक पहुंच और व्यवसाय के भूमंडलीकरण रहा है। एक देश के मूल्य तेजी से दूसरे देश के मूल्य को प्रभावित कर रहे हैं। आने वाले समय में विश्व स्तर पर मिली-जुली संस्कृति का ही बोलबाला हो जायेगा। जीवन शैली और मूल्य में कोई भी नयापन हमें नहीं चौंकायेगा। और यह जो भारत में एक साथ कई कई दौर के एक साथ जी रहे हैं उसमें और वैविध्य आयेगा। भविष्य की फिल्म भारत में बनने लगी हैं। भारत दुनिया के भविष्य के एजेंडे तय करने में लगा है ऐसे में अदालतों के फैसले यदि युगानुकूल आते हैं तो यह समाज के स्वास्थ्य के लिए संतोषप्रद है। दरअसल न्याय या दंड की अवधारणा से जुड़े मुद्दे ही किसी समाज की आधुनिकता या पिछड़ेपन का सूचक हैं। जिन पंचायतों में आनर किलिंग की घटनाएं घटती हैं वे कबीला कल्चर से अभी बाहर नहीं निकला पाये हैं और उससे निजात दिलाने के लिए आधुनिक समाज को हस्तक्षेप भी करना चाहिए। खैर ...&lt;br /&gt;देश की उच्चतम न्यायालय ने विवाह पूर्व यौन सम्बन्धों और सहजीवन की वकालत करने वाले लोगों के अनुकूल व्यवस्था देते हुए 23 मार्च 2010 को कहा कि किसी महिला और पुरुष के बगैर शादी किये एक साथ रहने को अपराध नहीं माना जा सकता। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति के. जी. बालकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा और न्यायमूर्ति बी. एस. चौहान के पीठ ने कहा, 'दो बालिग लोगों का एक साथ रहना आखिर कौन सा गुनाह है। क्या यह कोई अपराध है? एक साथ रहना कोई गुनाह नहीं है। यह कोई अपराध नहीं हो सकता।' न्यायालय ने कहा कि यहां तक कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान कृष्ण और राधा भी साथ-साथ रहते थे। सहजीवन या विवाह पूर्व यौन सम्बन्धों पर रोक के लिए कोई कानून नहीं है। न्यायालय ने यह व्यवस्था दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान अपना फैसला सुरक्षित करते हुए दी है। शिकायतकर्ताओं के वकील का कहना था कि विवाह पूर्व यौन सम्बन्धों के कथित समर्थन वाली खुशबू की टिप्पणियों से युवाओं का मन भटकेगा नतीजतन मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों का पतन होगा। पीठ ने देश के नागरिकों को जीवन जीने और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देने वाले संविधान के 21वें अनुच्छेद का हवाला देते हुए कहा, 'कृपया हमें बताएं कि ऐसा आचरण किस धारा के तहत अपराध है। साथ रहना जीवन का अधिकार है। &lt;br /&gt;मैंने इस विषय पर दो दशक पहले उपन्यास लिखा था 'अनचाहे दरवाज़े पर'। उस समय इस उपन्यास को साहित्यिक हलके ने रुचि के साथ देखा लेकिन कोई भी प्रतिक्रिया मुझे नहीं प्राप्त हुई। लोगों ने यह जरूर कहा कि वे उसे दुबारा पढ़ गये हैं किन्तु उस पर सार्वजनिक टिप्पणियों से उसे पढऩे वाले बचे। त्रिलोचन जी ने अलबत्त्ता मुझसे यहां तक कहा था कि ऐसा नायिका हिन्दी साहित्य में नहीं है मैं दिल्ली वालों को यह उपन्यास दिखाऊंगा। &lt;br /&gt;साहित्य भी यदि अपने समाज की सीमाओं से बंधा रहेगा तो प्रतिक्रिया कौन देगा? क्या समाज को दिशा देने वाले चिन्तकों को अपनी राय व्यक्त करने से पहले अदालतों का इन्तजार करना चाहिए? मैं समझता हूं साहित्य व संस्कृति से जुड़े लोगों को उन रास्तों का संधान करना चाहिए जहां समाज को सहज और स्वाभाविक जीवन मुहैया कराया जा सके। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.करुणानिधि ने उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी का स्वागत किया है। करुणानिधि ने कहा कि विवाह पूर्व यौन संबंधों का उल्लेख संगम साहित्य काल में भी मिलता है। &lt;br /&gt;मुझे यकीन है कि इस तरह का जीवन अधिक मानवीय मूल्यों से जुड़ा है क्योंकि इसमें जिम्मेदारियों के प्रति कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। कानूनी मान्यताओं ने वैवाहिक रिश्ते का काफी हद तक मशीनीकरण कर दिया है और दोनों पक्ष रिश्ते के खूबसूरत पहलुओं की लगातार अनदेखी करते जीते हैं। &lt;br /&gt;पारिवारिक रिश्तों के प्रति अधिकारों और जिम्मेदारियों की जितनी बात कानूनन मान्य है क्या उतने का ही निर्वाह हम व्यावहारिक जीवन में करते हैं। कानूनन तो दहेज को जुर्म करार दिया जा चुका है। फिर भी बेटी के पिता बेटे के बेचने वालों की फितरत को जानते हुए अपने जीवन की ज्यादातर पूंजी बेटी के लिए जुटाते रहते हैं और उसे बेटी पर न्यौछावर कर देते हैं। किस किताब में लिखा है कि अपनी औलाद को महंगी से महंगी तालीम देना कानूनन मज़बूरी है फिर भी लोग कर्ज लेकर भी आलौदों को पढ़ाते लिखाते हैं। उनकी सेहत के लिए चिन्तित रहते हैं वक्त पढ़ने पर मां-बाप अपनी संतान के लिए जान देने से भी पीछे नहीं हटते। मतलब यह कि रिश्तों में कानून भी होता किन्तु उसका दायरा ज्यादातर सुरक्षा और नियमन से जुड़ा होता है। रिश्तों की गर्माहट, उसे स्वस्थ बनाने के उपक्रमों से नहीं। आज के दौर में हम पाते हैं कि एकल परिवारों का प्रचलन तेजी से बढ़ा है ऐसे में दूर के रिश्तेदारों से सम्पर्क केवल रस्मी होता है उनकी तुलना में दोस्ती के रिश्ते अधिक करीबी होते हैं। अनुभव यह बताता है कि जिन सम्बंधों में कानूनी बाध्यता नहीं होती वे अधिक संवेदना से भरे होते हैं। स्त्री पुरुष के सहजीवन में यदि कानूनी बाध्यताएं न हों तो भी बेहतर जीवन जिया जा सकता है बल्कि तब जीवन और बेहतर होने की संभावना हो सकती है। यदि इन रिश्तों के प्रति समाज का नजरिया बदलता है तो समाज यह भी दबाव बना सकता है आर्थिक सुरक्षा के कानूनी अधिकार भी बनें और ऐसे रिश्ते से पैदा हुई संतान की जिम्मेदारी की नियमन भी हो। फिलहाल तो अदालत का फैसला ऐतिहासिक महत्व का है।  बहुत से देश ऐसे हैं दुनिया में जहां लीव इन रिलेशन को सामाजिक मान्यता है। शहरी जीवन की आपाधापी में यदि ऐसे रिश्ते भारत में भी हैं तो उस पर हायतौबा मचाने की कोई आवश्यकता नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-2973998070764210871?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/2973998070764210871/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2973998070764210871'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/2973998070764210871'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.html' title='सामाजिक जीवन में बदलाव के लिए अदालत का क्यों करें इन्तजार!'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-5311468400595234465</id><published>2010-03-20T03:29:00.001-07:00</published><updated>2010-03-21T01:54:36.872-07:00</updated><title type='text'>हमारे लोकाचारों को बख्श दें बहन जी!!</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S6Sj-yuENOI/AAAAAAAAAi0/kO3U8tos6HI/s1600-h/a_mayawati_0414.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 174px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S6Sj-yuENOI/AAAAAAAAAi0/kO3U8tos6HI/s200/a_mayawati_0414.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5450661748187346146" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मायावती ने मूर्तियों स्थापित की तो हंगामा हो गया। मायावती ने नोटों की माला पहनी और हंगामा हो गया। अपने देश में हम जिसे पसंद करते हैं उनकी मूर्तियां बनाने, उन्हें पूजने, उन्हें याद करने, उनके प्रति श्रद्धा ज्ञापित करने की प्रथा रही है। दक्षिण भारत में तो बाकायदा अपने चाहने वालों के मंदिर तक बना लिये जाते हैं। &lt;br /&gt;इसी प्रकार अपनी पसंद लोगों को माला पहनाने की भी प्रथा है। जिसमें फूल की माला के साथ-साथ नोट गुंथी हुई माला भी शामिल है। हमारे यहां घर परिवारों में हर संस्कार में रुपयों को लेन देने को कभी बुरा नहीं समझा गया। रुपये का लेन देन हमारे पारिवारिक व्यवहार और लोकाचार का अभिन्न अंग है। फिर प्रश्न यह है कि जब मायावती से ये मामले जुड़ते हैं तो विवाद क्यों खड़ा हो जाता है। &lt;br /&gt;उसका कारण यह है कि हमारे जो भी रीति रिवाज हैं उनके पालन में मुख्य उद्देश्य लोकाचार के प्रति सम्मान व्यक्त करना रहा है हथियार बनाना नहीं। मायावती ने अपने कृत्य से लोकाचार को अपनी स्थापना के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। वरना मायावती के दो दो बार लाखों-करोड़ों की माला पहनने के बाद भाजपा के नेता व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू की तस्वीरें मीडिया में दिखायी दी। दस-दस के नोट उनके गले में पड़ी माला में दिख रहे थे। कुल मिलाकर दो सौ रुपये भी नहीं रहे होंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि सिद्धू जी के प्रशंसकों की निगाह में उनकी औकात सौ-दो सौ की ही है मायावती के प्रशंसकों की निगाह में मायावती की करोड़ों में। हमें डर यह है कि पता नहीं मायावती हमारे किन किन रिवाजों को ताम झाम के साथ अपनाने वालीं और उनसे हमारी तमाम प्रथाओं पर लोगों की सवालिया नजरें उठेंगी।  &lt;br /&gt;यह जरूर है कि हमारे यहां साधु-संतों ने व्यक्ति पूजा का जो दोहन किया है उस पर समाज की निगाह नहीं गयी। मायावती कर रही हैं तो प्रश्न इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि वे सीधे सीधे सत्ता में और राजनीति में। इसलिए उनके कामकाज का सीधा प्रभाव हमारी व्यवस्था के ढांचे पर पड़ेगा।&lt;br /&gt;भले मायावती की मूर्तियों, जन्म दिन पर मिले कीमती तोहफों और करोड़ों समझी जाने वाली मालाओं की आयकर तथा अन्य सम्बंद्ध विभागों द्वारा जांच की जा रही है लेकिन यदि भ्रष्टाचार स्थापित न भी हो पाया तो भी कई सामाजिक व्यवहारों के भौंडे प्रदर्शन से तो हम शर्मसार हैं ही। कन्याधन के नाम पर विवाह के समय दी जाने वाला आर्थिक सहयोग दहेज नाम की एक बड़ी चुनौती बना हुआ है जिससे समाज तबाह है। विवाह के समय तामझाम को जो भोंडा प्रदर्शन होता रहा है वह कम शर्मनाक नहीं है। इस क्रम में मायावती के चाहने वालों के कारनामों ने इजाफा किया है। यदि इस पर अंकुश नहीं लगा तो यह सार्वजनिक जीवन का एक वीभत्स माडल बन जायेगा।&lt;br /&gt;संसद की एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, समाज सुधारकों और प्रख्यात हस्तियों के बुतों से अटे पड़े संसद भवन परिसर में भविष्य में और प्रतिमाओं की स्थापना पर पूरी तरह रोक लगाने का फैसला किया है। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की अध्यक्षता वाली संसद भवन परिसर में राष्ट्रीय नेताओं और सांसदों की मूर्तियों या पोट्र्रेट स्थापित करने संबंधी समिति ने पिछले दिनों हुई अपनी एक महत्वपूर्ण बैठक में संसद भवन परिसर में अब और मूर्तियों की स्थापना न करने के प्रस्ताव को स्वीकृत किया है। केवल अपवाद के तौर पर कुछ बेहद दुर्लभतम मूर्ति या चित्र लगाने की अनुमति दी जा सकती है। प्रस्ताव संसद की हेरिटेज कमेटी के पास भी जायेगा। &lt;br /&gt;अच्छा होता कि इस पर हेरिटेज कमेटी भी अपनी सहमति दे देती जो संसद इमारत की देखभाल की जिम्मेदारी संभालती है। बैठक में यह फैसला किया गया कि संसद भवन में अब केवल प्रतीकात्मक रूप से चित्रों का अनावरण मात्र किया जायेगा। संसद भवन में मूर्तियों की स्थापना पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव की पिछले काफी समय से मांग की जा रही थी। संसद भवन में 50 से अधिक मूर्तियां और इतनी ही संख्या में विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के नेताओं के चित्र लगे हैं। संसद भवन परिसर में स्थापित की जाने वाली मूर्तियों के निर्माण में औसतन प्रति फुट एक लाख रुपये तक का खर्च आता है और एक प्रतिमा नौ से दस फुट लंबी होती है। इस फैसले से जनता का पैसा अनावश्यक कार्यों में खर्च होने से बच जायेगा। &lt;br /&gt;आम-जनता के पैसे का दुरुपयोग मूर्तियां स्थापित करने के बाद तो सरकार और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को भी मूर्तियों की स्थापना के विरोध में आगे आना चाहिए। फिर वे चाहे जिसकी हों। प्रतीक जब विकृत हो जायें तो उनके औचित्य पर विचार जरूरी है। संसद भवन भवन परिसर ही नहीं देश भर में लोगों को सम्मान देने के नये प्रतीक गढऩे होंगे। और हो सके तो मालाओं से भी बचा जाये। चाहे वह फूल की हों या नोटों की। देश की मुद्रा के दुरुपयोग पर रोक तो यूं भी लगनी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-5311468400595234465?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/5311468400595234465/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/03/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5311468400595234465'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/5311468400595234465'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/03/blog-post_20.html' title='हमारे लोकाचारों को बख्श दें बहन जी!!'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S6Sj-yuENOI/AAAAAAAAAi0/kO3U8tos6HI/s72-c/a_mayawati_0414.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-6142750186114623707</id><published>2010-03-12T14:02:00.000-08:00</published><updated>2010-03-16T13:11:11.099-07:00</updated><title type='text'>शलाका पुरुष के साथ एक शाम</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S5s3_fXJnvI/AAAAAAAAAh0/i5BxGIupFrA/s1600-h/krisan+bihari+misra.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 155px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S5s3_fXJnvI/AAAAAAAAAh0/i5BxGIupFrA/s200/krisan+bihari+misra.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5448009738124631794" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S5s36S5XvsI/AAAAAAAAAhs/uw2li8fdLoI/s1600-h/Vijay+Bahadur+Singh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 135px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S5s36S5XvsI/AAAAAAAAAhs/uw2li8fdLoI/s200/Vijay+Bahadur+Singh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5448009648879156930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S5s30bt_0SI/AAAAAAAAAhk/e_mfKxyWOME/s1600-h/kedarnath_singh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 198px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S5s30bt_0SI/AAAAAAAAAhk/e_mfKxyWOME/s200/kedarnath_singh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5448009548168155426" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक सार्थक दिन था। जो कवि केदारनाथ सिंह के साथ गुज़रा। 8 मार्च 2010 सोमवार। अपराह्न चार बजे के करीब मैं पहुंचा था उनकी बहन के यहां हावड़ा, बी गार्डेन के पास बीई कालेज के गेट के पास स्थित उनके घर पर। केदार जी ने अपनी मां से मिलवाया था। केदार जी की मां पर लिखी कविताएं मुझे याद थीं, पर 95 साल की उनकी मां से मिलने या कहिए उन्हें देखने का यह पहला अनुभव था। अब केदार जी उन्हें क्या और कैसे समझाते कि मैंने केदार जी पर शोध किया है, सो उन्होंने भोजपुरी में उनसे कहा- 'मैंने इन्हें पढ़ाया है। और ये पास हो गये हैं आपको देखने आये हैं।'&lt;br /&gt;बात उनसे दो घंटे से अधिक देर तक चलती रही। मेरी लिखने पढ़ने की भावी योजनाओं के बारे में उन्होंने पूछा था विचार व्यक्त किया था कि मैं इस बात पर गौर कर रहा हूं कि क्या भोजपुरी को भाषा से इतर भोजपुरी संस्कृति की शिनाख्त नहीं की जानी चाहिए। क्योंकि बहुत से ऐसे लोग हैं जो भोजपुरी में नहीं हिन्दी में लिखते हैं लेकिन उनकी रचनाओ में भोजपुरी संस्कृति है। वह भोजपुरी संस्कृति किन तत्वों से बनी है, उसकी विशेषताएं क्या हैं और उसका जीवट क्या है इसकी अलग से शिनाख्त होनी चाहिए। भोजपुरी को भाषा बनाने की कवायद तो चल रही है किन्तु भोजपुरी संस्कृति को सिरे से परिभाषित किये जाने की भी महती आवश्यकता है। मैंने उन्हें बताया कि मैं सोच रहा हूं कि 'भोजपुरी संस्कृति का स्वरूपः कबीर से केदार तक' पर पूरी एक किताब ही लिख मारूं और यह भी कि मैं इसमें कविताओं को केन्द्रीय धुरी के तौर रेखांकित करना चाहता हूं। उन्होंने इस विषय पर लगभग सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।&lt;br /&gt;इसी बीच भारतीय भाषा परिषद के निदेशक और आलोचक डॉ.विजय बहादुर सिंह की चर्चा चल निकली। और केदार जी ने उन्हें फोन लगाने को कहा। जब केदार जी से उनकी बात हुई तो सहसा अगली योजना बनी डॉ.कृष्ण बिहारी मिश्र के यहां जाने की। विजय जी ने बताया कि वे बीमार चल रहे हैं सो उन्हें देख आया जाय। चालीस मिनट बाद हम भारतीय भाषा परिषद में थे विजय जी के यहां और अगले पंद्रह मिनट में कृष्ण बिहारी जी के घर की संकरी सीढ़ियां चढ़ रहे थे।&lt;br /&gt;बात उनकी संकरी सीढ़ियों और घर की हालत को लेकर ही शुरू हुई और केदार जी इस बात से मुतमइन होना चाहते थे कि यह वही कमरा है न जिसमें वे लगभग दो दशक पहले उनसे मिलने आये थे। कृष्ण बिहारी जी ने बताया कि सीढ़ियों और कमरे की पुताई तक की सार्वजनिक चर्चा लेखों और मंचों में भी होती रही है। केदार जी ने बताया कृष्ण बिहारी जी और वे बलिया में आसपास के गांव के हैं और वे जब बनारस में रहकर पढ़ते थे कई बार एक साथ ट्रेन पकड़ते थे। उन्होंने अपनी पुरानी यादों को ताजा किया जिसके क्रम में वाक्यपदीयम के भाष्यकार की भी चर्चा छिड़ी जिसके बारे में केदार जी ने हिन्दुस्तान दैनिक में अपने कालम में लिखा था और जो उनके निबंधों के संग्रह 'कब्रिस्तान में पंचायत' में संग्रहीत है। कृष्णबिहारी जी ने वह निबंध नहीं देखा था सो पुस्तक भिजवाने का वादा केदार जी ने किया। संस्कृत काव्य 'वाक्यपदीयम्' बलिया की कचहरी में मुकदमे की सुनवाई का इन्तज़ार करते हुए एक वृक्ष के नीचे बैठकर किया गया था। वेदान्त और व्याकरण दर्शन के क्षेत्र में काम करने वाले विद्वान पं.रघुनाथ शास्त्री ने भतृहरि के प्रसिद्ध ग्रंथ 'वाक्यपदीयम्'के भाष्यकार हैं। भाष्य कार्य उन्होंने तब किया जब वे वाराणसी के सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य पद से अवकाश ग्रहण कर चुके थे। गांव में प्रतिभाएं अपना काम किस प्रकार और किस अंदाज में करती हैं इसका ज़िक्र किया।&lt;br /&gt;कृष्ण बिहारी जी ने अपनी नयी पुस्तक 'न मेधया' दिखायी जो रामकृष्ण परमहंस पर ही है जिन पर उनकी एक और पुस्तक 'कल्पतरु की उत्सवलीला' आयी थी। और उसी पर उन्हें ज्ञानपीठ प्रकाशन का मूर्तिदेवी पुरस्कार मिला था। उन्होंने बताया 'न मेधया' उस पुस्तक की पूरक है जिसे उन्होंने डेढ़ माह की अल्प अवधि में पूरा किया और वह तुरत-फुरत प्रकाशित होकर आ भी गयी।&lt;br /&gt;वहां पहले से विराजमान थे मित्र परिषद के पदाधिकारी पारसमल बोथरा। विजय बहादुर जी से वे मुखातिब थे और 'सन्मार्ग' में उनके प्रकाशित साक्षात्कार का जिक्र उन्होंने किया और यह भी चर्चा हुई कि विजय जी इधर कविताएं लिखने में फिर रमे हैं और एक कविता तो कई भाषाओं में अनूदित हुई है। कुल मिलाकर यह एक संक्षिप्त लेकिन दिलचस्प और रचनात्मक सद्भभावना से ओतप्रोत मुलाकात थी। याद नहीं कि किस ने कहा पर कहा गया कि भई किसी के मोबाइल में कैमरा हो तो फोटो हो जाये, पर अफसोस कि किसी के भी मोबाइल फोन में यह सुविधा न थी। &lt;br /&gt; हम फिर भारतीय भाषा परिषद के लिए रवाना हो गये थे। कार में एक सैमसंग कंपनी द्वारा टैगोर पुरस्कार दिये जाने की भी चर्चा हुई जिस पर केदार जी पहले ही सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराजगी व्यक्त कर चुके थे। उन्होंने बताया कि कंपनियों द्वारा पुरस्कार दिये जाने पर उन्हें आपत्ति नहीं है आपत्ति है उसमें साहित्य अकादमी की संलिप्तता को लेकर। साहित्य अकादमी चूंकि स्वयं भी पुरस्कार प्रदान करती है सो उसे एक निजी कंपनी को अपनी साहित्यिक सेवाएं नहीं देनी चाहिए थी। इससे उसकी गरिमा को ठेस पहुंचती है। और इस सम्बंध में पहले भी अकादमी में नीति निर्धारित की जा चुकी थी कि उसे इन पचड़ों में नहीं पड़ना चाहिए और उसे निजी कंपनियों को अपनी सेवाएं नहीं देनी चाहिए।&lt;br /&gt;परिषद पहुंचे तो लिफ्ट पर मिलीं बंगला कवयित्री खेया सरकार। वे परिषद में किसी संस्था द्वारा आयोजित कवि-सम्मेलन में शामिल होने के लिए गलती से पहुंच गयी थीं, जबकि आयोजन किसी और दिन था। वे विजय जी से परिचित थीं और विजय जी ने हम लोगों से उनका परिचय कराया तो कुछ देर वे हम लोगों के साथ बैठीं।&lt;br /&gt;बंगाला साहित्यकार सुबोध सरकार, सुनील गंगोपाध्याय, महाश्वेता देवी, शंख घोष, शक्ति चट्टोपाध्याय और जय गोस्वामी की चर्चा हुई। विजय जी समकालीन बंगला साहित्यकारों में शंख घोष पर विशेष देते रहे जबकि खेया और मैं जय गोस्वामी पर। मैंने महाश्वेता देवी के गल्प में एकहरेपन की बात उठायी तो केदार जी इससे असहमत थे। केदार जी ने उन दिनों की रोचक चर्चा की जब अशोक वाजपेयी द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के तरह उन्होंने शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताओं का बंगला से हिन्दी अनुवाद किया था। &lt;br /&gt;फिर बात एकाएक भोपाल की चल निकली और केदार जी ने विजय जी से इच्छा जाहिर की कि उन्हें भोपाल में एक छोटा सा फ्लैट दिला दें। भोपाल उन्हें भी इधर भाने लगा है। विजय जी का अपना आवास वहां है ही। विजय ने आश्वस्त किया कि आपको वहां अलग फ्लैट लेने की क्या आवश्यकता है मेरा एक कमरा अब से आपके लिये बुक हुआ, जिस पर केदार जी सहमत थे। और हमें इस अनुबंध का गवाह बनाया गया। यूं भी विजय जी का विदिशा का आवास तो कई और लेखकों का भी पता था। बाबा नागार्जुन, शलभ श्रीराम सिंह और वेणु गोपाल जैसे रचनाकार अरसे तक उनके यहां रहे।&lt;br /&gt;वापसी में कार मुझे सियालदह छोड़ते हुए केदार जी को हावड़ा छोड़ने जाने वाली थी लेकिन केदार जी चाहते थे मैं उन्हें घर छोड़ता हुआ अन्त में सियालदह जाऊं टीटागढ़ के लिए ट्रेन पकड़ने। राह में केदार जी ने मुझे आश्वस्त किया इस बार तो 23 मार्च को दिल्ली में शलाका पुरस्कार लेने के लिए जल्द लौटना है। लेकिन अगली बार कोलकाता आऊंगा तो तीन माह रहूंगा। उसमें से एक सप्ताह तुम्हारे यहां। और एक ऐतिहासिक लम्बा इंटरव्यू तुम्हें दूंगा। तो यह रही एक शाम अपने वरिष्ठ लेखकों के साथ, जिसका मैं साक्षी था।&lt;br /&gt;हालांकि अगले ही दो एक दिन में मीडिया में खबरें आयीं कि केदार जी ने हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान ठुकरा दिया है। जिसके कारण तेईस मार्च को होने वाला सम्मान समारोह  टल सकता है। दरअसल, वर्ष 2008-09 के पुरस्कारों का फैसला करने वाली अकादमी की उस वक्त की कार्यकारिणी ने शलाका सम्मान के लिए कृष्ण बलदेव वैद का नाम तय किया था। लेकिन वैद को सूचित कर दिए जाने के बावजूद अंतत: जब अकादमी ने वर्ष 2009-10 के पुरस्कारों के साथ ही वर्ष 2008-09 के पुरस्कारों की घोषणा की तो उसमें सिर्फ यह उल्लेख किया गया कि उस वर्ष का शलाका सम्मान किसी को नहीं दिया जा रहा है।&lt;br /&gt;इसे हिंदी के कई लेखकों ने एक लेखक का अपमान करार दिया था। उसके बाद वरिष्ठ आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने वैद के साथ हुए बर्ताव के विरोध में साहित्यकार सम्मान लेने से इनकार कर दिया। अगले ही दिन केदारनाथ सिंह ने वर्ष 2009-10 का शलाका सम्मान लेने से इनकार कर दिया। उनके साथ ही  रेखा जैन, पंकज सिंह, गगन गिल, विमल कुमार और प्रियदर्शन ने भी विभिन्न श्रेणियों में घोषित पुरस्कार ठुकरा दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4573645367565854902-6142750186114623707?l=tatkalexpress.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/feeds/6142750186114623707/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/03/blog-post_12.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6142750186114623707'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4573645367565854902/posts/default/6142750186114623707'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://tatkalexpress.blogspot.com/2010/03/blog-post_12.html' title='शलाका पुरुष के साथ एक शाम'/><author><name>डॉ.अभिज्ञात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06943544230145995433</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/TAAEP29CUmI/AAAAAAAAArA/GQcr8qtg5SU/S220/SP_A0123-ok.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_DzCvlmFxL5M/S5s3_fXJnvI/AAAAAAAAAh0/i5BxGIupFrA/s72-c/krisan+bihari+misra.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4573645367565854902.post-1847136325619607394</id><published>2010-03-11T01:40:00.000-08:00</published><updated>2010-03-11T09:49:43.311-08:00</updated><title type='text'>ना कहना परोपकार है मान्यवर</title><content type='html'>अपने देश के सदाचारों में ना नहीं करने की प्रथा भी शामिल है। 'हां' और 'ना' कहने को हमने लिहाज की श्रेणी में रखा है। और जो ना कहते हैं उन्हें बेलिहाज कहकर उनकी निन्दा की जाती है। शिष्टाचार का मामला जब कर्मक्षेत्र में प्रवेश करता है तो नयी मुश्किलें शुरू हो जाती हैं। अक्सर हम पाते हैं कि किसी काम से किसी अधिकारी के पास जाइये तो 'हां' या 'देखते हैं' का सिलसिला चल निकलता है और वह अन्तहीन हो जाता है। देखते देखते को प्राय: देखते ही रह जाना पड़ता है या फिर काफी अरसे बाद ना का सामना करना पड़ता है। इससे दोनों की पक्षों के मन में खटास पैदा हो जाती है। अच्छा होता कि पहले ही ना हो जाती। ना का गम बहुत नहीं होता तकलीफ होती है मामले के अरसे तक लटकने के बाद ना होना। &lt;br /&gt;मोब
